ऑब्जेक्ट से सब्जेक्ट बनने की जद्दोजहद

सुधा उपाध्याय
जानकीदेवी मेमोरियल कॉलेज,दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाती हैं संपर्क:ईमेल:sudhaupadhyaya@gmail.com

हमने जो तर्ज़े-फुगाँ की थी कफ़स में ईजाद
फैज़ गुलशन में वही तर्ज़े-बयाँ ठहरी है….(फैज़अहमदफैज़)

क्या स्त्रियों का खुलकरअपनी बात कहना, पतनशील होना है?क्या दायरे की देहरी में रहकर अपने हक़ की माँग करना, पतनशील होना है? जब सारी उम्मीदें बंद दरवाज़े तक सीमित होकर सिर्फ अंधेरे में दाख़िल हो जाए, ऐसे में अपनी आवाज़ बुलंद करना पतनशील होना है?क्या एक स्त्री जब अपने अधिकारों के बारे में खुलकर बात करती है और ख़ुद को एक सामनासे ऊपर उठाकर पतियों के साथ बराबरी की बात करती है तो उसे पतनशील होना कहेंगे? क्या दुनिया में जो परिपाटी चल रही है स्त्रीविमर्श के नाम परअगर उससे अलग होकर अपनी बात पाठकों के सामने बड़ी बेबाकी से रखदी तो पतनशीन होना है?

अगर ये सारे सवाल उठाना पतनशील पत्नी कहलाना है तो फिर लेखिका नीलिमा चौहान को यही मंजूर है और इसलिए उन्होंने इन तमाम सवालों के जवाब ढूंढने के लिए पतनशील पत्नियों के नोट्स की रचनाकर डाली।नीलिमा साफ शब्दों में कहती हैं “एक लंबे समय तक स्त्रीवाद के नाम पर ख़ुद को दुनिया से अलहदा कर एक कड़क, दिलजली, खीजी, पकी बुझी-थकी-अकेली, नारेबाज़ नारी को झेला है आपने।ऐसा झेला कि फेमिनिज़्म के नाम से ही नाक-भौं सिकोड़कर कन्नी काटकर नौ दो ग्यारह होते रहे आप।आप ही क्या औरतें भी थक-हारकर इसबात को सच मान चली थीं कि ऐसा हायतौबा का क्या लाभ जो विकल्पहीन- लक्ष्य हीन   हो और दुनिया को हिला डालने के हवाई सपने से भरी हो।” (इसी पुस्तक से)

सदाशयता और सहानुभूति हम पतनशील पत्नियां कबतक ढोती रहेंगी।हमें अपने मोर्चे की लड़ाई अब खुद ही लड़नी होगी।हम कबतक पिता, पति, भाई को दोष  देकर उनका आसरा ढूंढती रहेंगी।हमें अब रिपेयरिंग नहीं टोटल चेंज की बात करनी ही होगी।स्वयं चेती हुई स्त्री के स्वाधिकार ही हमारे विमर्श हैं।हमारा मनोविज्ञान हमें सिखाता है हम, झुकें, डरें लजाएं आखिर कबतक? हम भी सब्जेक्ट बनना चाहती हैं।हम वस्तु नहीं व्यक्ति हैं।कबतक हमें घर परिवार में संपत्ति की तरहऔर बाहर बाज़ार में वस्तु की तरह आंका जाएगा।आत्मनिर्भर हो रही स्त्रियां, जीवन में अकेले रहने का निर्णय लेती स्त्रियां, परिवार कोख उलझते दमघोंटू सम्बन्धों को नकारती स्त्रियां, देह की कामना को न केवल पहचानने और उन्हें तृप्त संतुष्ट करने वाली स्त्रियां अब पुरुषसत्तात्मक समाज के लिए ख़तरे की घंटी साबित होंगी और हम जब बजेंगी तभी स्वानुभूति  और सहानुभूति का मुद्दा हल होगा।

तमाम स्त्रीविमर्शों, विचारों और स्त्री चर्चा से जुड़ी बातों को चाहे आप कुछ भी कहते हों उनके सामने किताब पतनशील पत्नियों  के नोट्स, एक नया आयाम खोलता है।अच्छा होगा कि अगर नीलिमा ने देहरी के दायरे में रहकर जो अधिकारों की बात को नए अंदाज में उठाया है उस पर खुलकर नए सिरे से बहस हो।देहरी के दायरे का मतलब है पत्नी रहकरअपनी आवाज़ उठाने की कोशिश।पत्नी, मां, बहू, परिवार, समाज से अलग होकर नीलिमा बात नहीं करना चाहती हैं।वो चाहती हैं कि बातें इसी दायरे में हो।क्या यह संभव नहीं कि एक पत्नी जो हमेशा से धुरी है परिवार की, उसको केंद्र में रखकर, उसे पूरी अहमियत देकर समाज का निर्माण हो? इसबात का ख़ास ध्यान रखना होगा कि यहां पर किसी एक पति की बात नहीं की गई है।बल्कि पतियों यानी पुरुष मानसिकता की बात की गई है।और  साथ ही किसी एक पत्नी नहीं बल्कि मध्यवर्गीय परिवार में सांस लेने वाली तमाम पत्नियां हैं, जो लगभग एक जैसी ही है।असल में नीलिमा उन तमाम रस्मों-रिवाज़ों पर सवाल उठाती हैं जो पत्नियों पर थोपे जा रहे हैं।“यह किसका फैलाया हुआ वहम है कि औरत का वजूद उसके माँ हुए बिना बेमक़सद हुआ करता है।वारिस की पैदाइश के लिए औज़ार होने के अलावा भी औरत का वजूद है इस बात के ख़याल तक को किस शातिराना तरीक़े से ख़तावाराना बना दिया गया है।इतना संगीन जुर्म की हर औरत के लिए ज़िंदगी का सबसे अहम सपना और चाहत माँ बनकर दिखाना हो।” (इसी पुस्तक से) 



क्या हम ऐसे समाज की कल्पना कर सकते हैं जहाँ पत्नियों को खुलकर साँस लेने की आज़ादी मिल सके? क्या ऐसा संभव है कि पत्नी अपनी इच्छानुसार माँ बने और उसके फैसले को घर के बाकी लोग स्वीकार करें।

“माँ बनने की दैहिक क़ाबिलियत भर से माँ बन जाने की मजबूरी किसी भी औरत को अपने वजूद के ख़िलाफ़ ही नहीं मानवाधिकार के ख़िलाफ़ भी लगनी चाहिए।” (इसी पुस्तक से) 

पतनशील पत्नियों के नोट्स को लेखिका ने भले ही नोट्स कहा है पर असल में यह सिर्फ नोट्स नहीं बल्कि दस्तावेज़ है उन तमाम पत्नियों के जो घर-परिवार, बाल-बच्चे, सास-ससुर की देखरेख के साथ-साथ नौकरी भी करती हैं।पुस्तक को नीलिमा चौहान ने सात हिस्सों में बाँटा है।क़ैद में ही बुलबुल, अक्स करे सवाल, ताले जज़्बातों वाले, दर्द का नाम दवा रखा है, बुनियादें पहने हैं पायल, कुछ इश्क किया कुछ सफ़र किया और अदब का दारोग़ा।इन तमाम हिस्सों मेंअलग-अलग अनुभव है।पर सारे अनुभव सिलसिलेवार तरीके से रखे गए हैं।इनका आपस में जुड़ना एक कहानी को मुकम्मल रूप देने जैसा है। इस क़िताब को पढ़ते हुए आप बार-बार अपने अनुभवों के साथ बहने लगेंगे।पतनशील पत्नियों के अनुभवों से आप एक तादात्म गांठ लेंगे।यही इस पुस्तक की खुबसूरती है।नीलिमा ने पत्नियों के अनुभवों को एक साकार रूप दिया है जो आपका अपना लगता है।तय है कि बहुत सारे लोग इस किताब पर सवाल उठा सकते हैं।जो लोग सवाल उठा रहे हैं और उनके सवालों में जो अनकहा सा रह जा रहा है, असल में वही इस किताब की सार्थकता है।वो सारे सवाल जो अबतक आपने उठाने की हिमाकत नहीं की, वैसे सारे पहलू जिसके बारे में मन ही मन खूब बातें करते हों प रखुलकर बोलने से डरते हों, वही सारे सवालों से नीलिमा बार-बार टकराती हैं और हमारे सामने बड़ी निडरता सेर खती हैं।नीलिमा का यह साहस वाकई प्रशंसनीय है। जब औरतें अपने बारें में खुलकर नहीं बोलेंगी तो फि रकुछ तो लोग कहेंगे, लोगों को काम है कहना।

अश्लीलता पुरुषवादी वर्चस्व को कायम रखने की एक साजिश है। जब-जब स्त्री नैतिकता की बनी बनाई छवियों को तोड़ने के लिए बने बनाए प्रतिमानों को तोड़ती है, उसे पारंपरिक समाज अश्लील ठहराता है।आज की स्त्री अगर अस्मिता को अस्त्र बनाकर लिख रही है तो गलत क्या है।दिक्कत तभी आती है जब आलोचकीय दृष्टि न रखते हुए भी आलोचना करने बैठते हैं।स्त्रियां बाहर आने से नहीं  घबरातीं, वे अब बोल रही हैं अच्छा संकेत हैं।लेकिन मैं मानती हूं कि स्त्री और पुरुष के सम्बन्ध अब भी कारागार में बंधे हैं।श्रेणी, वर्ग, जाति, नस्ल चाहे अलग-अलग हों किंतु जेंडर के धरातल पर दुनिया भर में स्त्री का संघर्ष एकसा ही है।उनकी भावनात्मक मनोवैज्ञानिक, नैतिक भाषित औरअस्मिता सम्बन्धी समस्याएं प्राय: एक सी हैं।स्त्री काव्यक्ति के रूप में प्रकाशित हो सकना, अपनी संपूर्णता में जी सकना, मनुष्य जाति के बचे रहने की पहली शर्त है।

नीलिमा ने कुछ इश्क किया कुछ सफ़र किया हिस्से में दो अनुभव से पाठकों को अवगत कराया है।जिनमें पहला है रेडलाइट पर एक मिनटऔर दूसरा है अधखिंची हैंडब्रेक।इन दोनों को पढ़ने के बाद सहसा मन मेंआता है कि स्त्रियों का सड़कों पर कंधे चौड़े करके निकलना अकसर मर्दों को  रास नहीं आता।गाड़ी चलाती स्त्रियां को देखकर मर्द तो एकदम से हीनभावना का अनुभव करने लगते है-

“एक बात पक्की होती है कि वो फनफनाता हुआ कोई मर्दपने का मारा ही हो ता है। बन्दे के चेहरे के काँइयाँपन से, फोकेपन से ही पता चल जाता है कि इसे इतनी भी समझ नहीं कि जिस ओवरटेक के मौक़े को उसने हो-हुल्लड़ से, हाय-तौबा से हासिल किया वह उसे तरस खाते हुए दिया गया है।xxxxxxxxxxxxxxx बगलवाला और दबाता जाता है अगर ज़रा भी स्पेस देने की मुद्रा दिखाओ।xxxxxxxxxx अमाँ यार जो इतनी जद्दोजहद से सिखाया गया था वह ऐनवक्त पर एकदम उलट साबित होता है।इसलिए बचने के लिए कब हटना हैऔर कब अड़ना है यह तो मौक़े, माहौल, ज़रूरत, ज़िगकऔर बस अपन के मूड की बात है।”



सौ बात की एकबात कि पूरी किताब के हर खंड आपस में इतने गुत्थे हुए हैं कि इस को बिखरा कर पढ़ना, सब्जेक्ट के साथ छेड़छाड़ करना होगा।जिन्हें अबतक नोटिस नहीं किया गया उनके नोट्स छपने लगे, यह एक क्रांतिकारी कदम है।और इसका स्वागत होना चाहिए।स्वागत अपराजिता शर्मा द्वारा बनाई गई आकृतियों का भी होना चाहिए जो इस पुस्तक में मौन होकर भी बहुत मुखर है।लफ़्ज़ों के साथ कदमताल करती हुई बेहतरीन आकृतियां। बल्कि कई जगहों पर तो आकृतियां शब्दों से आगे निकल जाती हैं और अपनी भाव-भंगिमा से पूरा संसार रच जाती हैं।कुल मिलाकर पतनशील पत्नियों के नोट्स इस सदी का ऐसा दस्तावेज है जो निहायत ही बिंदास, बेबाकऔरआंखों में आंखें डालकर अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठाता है।तमाम स्थितियों और बातों को खुलकर साझा करना सबके बूते की बात न हीं।नीलिमा चौहान ने वाकई साहस का काम किया है।


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