जायसी और पद्माकर की नायिकाओं के व्यक्तित्व के सामाजिक पक्ष का तुलनात्मक अध्ययन:अंतिम क़िस्त

आरती रानी प्रजापति
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में हिन्दी की शोधार्थी. संपर्क : ई मेल-aar.prajapati@gmail.com

पदमावत में रानी नागमती नहीं चाहती कि हीरामन उसके राजभवन में रहकर राजा से पद्मावती की कोई भी बात करे. वह सुआ की हत्या का आदेश देती है. यहाँ नागमती का डर उसे पद से वंचित होने का डर भी है. पद्मावती आयेगी तो उसका पद नागमती से उँचा होगा इसलिए नागमती नहीं चाहती कि रत्नसेन को पद्मावती के बारे में पता लगे. वह हीरामन को मरवा देती है. राजा को जब ये पता लगता है तो वह उसे कहता है कि तुम उसे किसी भी प्रकार लेकर आओ या तुम भी चली जाओ. यहाँ नागमती के माध्यम से बहुपत्नी प्रथा में पटरानी तक की अवस्था को समझा जा सकता है. वह है तो रानी के पद पर किंतु उसे कोई अधिकार प्राप्त नहीं है वह मात्र पितृसत्ता की कठपुतली है. नित्यानंद तिवारी लिखते हैं

‘अध्यात्म में तो वह बड़ी बाधा है ही, काम के क्षेत्र में भी वह केवल उपभोग की वस्तु है. उसकी अपनी कोई स्वतन्त्र सत्ता और अस्मिता नहीं है. कवि ने उस आध्यात्मिक और कामुकता के अतिरेक से भरे समाज में नागमती की ‘प्लेसिंग’ इस तरह से की है कि नारी की सामाजिक हैसियत अत्यंत त्रासद रुप में उभरती है’.
वह रानी है पर उसका जीवन एक पुरुष के अधीन है. वह पुरुष ही जिसके कारण वह रानी के पद पर है पर उसी के कारण उसे सुआ जैसे प्राणी जिसे राजभवन में आये ज्यादा समय नहीं हुआ था कि मौत पर अपनी राजभवन में सही स्थिति का पता लगता है. नागमती को राजा ये ही दर्शाता है कि उसे वह बेहद प्रेम करता है पर उसकी जरा सी गलती उसे बर्दाश्त नहीं. पदमावत की ये घटना हमारे भारतीय समाज की बहुत बड़ी सच्चाई है. जहाँ औरत को महान पद में भी पुरुष के अधीन रखा गया है. नागमती कहती है
एतनिक दोस बिरचि पिउ रूठा. जो पिउ आपन कहै सो झूठा..3॥
ऐसें गरब न भूलै कोई. जेहि डर बहुत पियारी सोई॥4॥21
अपने रुप और पति पर प्रेम का गर्व करने वाली नागमती को सुआ मरवाते ही अपनी वास्तविक स्थिति का पता लगता है. वह रानी है पर क्या वह अधिकारों में भी रानी बन पाती है? नित्यानंद तिवारी लिखते हैं

‘नागमती पटरानी है और पुराने इतिहास ग्रन्थों के अनुसार उसे विशेष प्रशासनिक और राजकीय अधिकार प्राप्त हैं. लेकिन उसकी विशेष राजकीय स्थिति के बावजूद, नारी होने के कारण, उसकी सामाजिक हैसियत नगण्य है’22.रत्नसेन ने पहले भी ऐसा किया होगा तभी तभी रानी को ऐसी चिंता सताती है. राजा रत्नसेन राज्य में ध्यान नहीं देता बस उसका ध्यान इस बात में रहता है कि कहाँ सुन्दर स्त्री है. अगर रत्नसेन अपने राज्य पर ठीक से ध्यान देता तो कभी नागमती को सती होने की आवश्यकता न होती. नागमती सभी रानियों में सुंदर और रत्नसेन की पटरानी है फिर भी उसे ये भय सताता है कि रत्नसेन उसे छोड देगा तो अन्य रानियों की क्या दशा होती होगी? वह कितनी चिंतित रहती होगी? रत्नसेन पद्मावती के रुप पर इतना मोहित हुआ कि अपने राज्य को छोडकर उसे पाने के लिए निकल पड़ा. किसी भी आलोचक को यह बात नहीं खटकती. रत्नसेन की क्या कोई जिम्मेदारी अपने राज्य के प्रति नहीं थी? क्या वह प्रेम को पाने के लिए जाता है एक स्त्री के लिए जाता है पर उसका जाना महिमा मंडित कर दिया गया है. एक स्त्री को पाने के लिए दूसरी को छोडकर जाना यहाँ उचित बन जाता है. पद्मावती में स्त्री की झलक दिखा कर जायसी ने रत्नसेन को सभी प्रकार की खुली छूट दे दी. उसका दूसरी स्त्री के पास जाना इतना मंडित हुआ है कि सभी उसमें खो जाते है. लक्ष्य था स्त्री को पाना पर उसे ईश्वर को पाने में बदल दिया गया.
तुम्ह तिरिआ मति हीन तुम्हारी. मूरुख सो जो मतै घर नारी.
राघौ जौं सीता सँग लाई. रावन हरी कवन सिधि पाई.
यहु संसार सपन कर लेखा. बिछुरि गए जानहु नहिं देखा.
राजा भरभरि सुनि रे अयानी. जेहि के घर सोरह सै रानी.
कुचन्ह लिहें तरवा सहराई. भा जोगी कोइ साथ न लाई.
जोगिहि काह भोग सों काजू. चहै न मेहरी चहै न राजू.
जूड़ कुरकुटा पै भखु चाहा. जोगिहि तात भात दहुँ काहा.
कहा न मानै राजा तजी सबाई भीर.
चला छाड़ि सब रोवत फिरि कै देइ न घीर.23
राजा स्त्री को पाने के लिए जा रहा है और कहता है कि योगी को राज्य और स्त्री से कोई मतलब नहीं होता. मतलब दूसरी स्त्री के पास सबकुछ छोडकर योगी हो कर जाना एक महान कार्य है. जायसी के समयके साहित्यकारों ने नारी के लिए अलग-अलग स्थितियों का उल्लेख किया है. वे पतिव्रता की अहमियत को बताते हैं पर स्त्री के भावों की कद्र वे नहीं जानते. वे स्त्री को त्यागने की बात करते हैं और खुद स्त्री होकर ईश्वर को समर्पित होना चाहते हैं. यहाँ जायसी ने पद्मावती में ईश्वर की झलक दिखा दी इसलिए रत्नसेन उसे पाने के लिए दौड पडता है. किंतु पद्मावती चितौड आते ही अपने साधारण रुप में आ जाती है. वह नागमती से लडती है.
समाज पुरुष को बहुपत्नी की आज़ादी अनायास ही दे देता है. हमारे समाज में ऐसे कई लोग हैं जो अपने किसी और स्त्री से संबंध रखने को अनुचित नहीं मानते. साहित्य में भी इस बात का अधिकांश चित्रण मिल जाता है. ये सम्बंध विवाहेत्तर भी हो सकते हैं. मध्यकालीन समाज में बहुपत्नी रखने का चलन था. जायसी कृत पदमावत में रत्नसेन की कई पत्नियाँ थी. वह पद्मावती के रुप सौंदर्य को सुनकर ही उसे पाने के लिए दौड़ पडता है. वह एक पल भी नहीं सोचता कि उसकी और पत्नियाँ हैं. उनकी क्या दशा होगी? इस व्यवहार से क्या उनकी मन:स्थिति को कोई ठेस पहुँचेगी? जब रत्नसेन को पद्मावती को पाने की धुन लगती है तो वह सब कुछ भूल जाता है. पद्मावती को पाने के लिए रत्नसेन घर छोड़ देता है. नागमती व अन्य रानियाँ विलाप करती रह जाती हैं.
रोवै नागमती रनिवासू. केइँ तुम्ह कंत दीन्ह बन बासू.24


राजा की अनेक रानियाँ हो सकती है इसे समाज स्वीकार करता है. राम के पिता दशरथ की तीन रानियाँ थी ये बात भी सभी जानते हैं और कोई कुछ नहीं कहता. पुरुष की अनेक पत्नियाँ हो सकती हैं पर जब भी किसी औरत ने अनेक पुरुषों से संबंध बनाए हैं उसे हीन नज़रों से ही देखा गया है. पति चाहे जैसा हो पर हमारा समाज औरत को हमेशा उसकी गुलामी सीखाता है. स्त्री किसी अन्य से संबंध बना ले तो उसे परकीया कह देते हैं और यदि वह स्त्री कई पुरुषों से संबंध रखना चाहती है तो उसे कुल्टा कह दिया जाता है. स्त्री को सामाजिक, शारीरिक संदर्भों में स्वतंत्रता देने वाले पद्माकर भी उसके अनेक पुरुषों से संबंध बनाने पर कह उठते हैं:
पुरुष अनेकन सों जु तिय राखति रति की चाह.
कुलटा ताहि बखानहीं जे कबीन के नाह॥25

ये पद्माकर अपने मन से भले ही कह रहे हो, इसमें उनका रचनाकार भले ही शामिल हो किंतु समाज में स्त्री के लिए ऐसे ही मानदंड बने हुए हैं. समाज स्त्री को प्रेम करने की स्वतंत्रता नहीं देता. जायसी के समयसे आज आधुनिक काल तक जो भी स्त्री कई पुरुषों से संबंध बनाती है उसे कुलटा, कुलनासिन जैसे शब्दों से नवाज़ा जाता है. स्त्री के मन को कोई महत्व नहीं दिया जाता. सूरदास स्त्री को प्रेम करने की आज़ादी तो देते हैं पर वह प्रेम भी कृष्ण से कर रही हैं. पति और कृष्ण इसके अलावा उनके कोई और प्रेम सम्बंध नहीं दिखाये गये. स्त्री के मन को किस तरह कुचला जाता है. इस बात को हम यहाँ देख सकते हैं. उसके मन को ही बचपन से ऐसा बनाया जाता है कि वह एक ही पुरुष की हो कर रहे और यदि वह एक से अधिक पुरुषों से संबंध बनाती है तो उसे कुलटा कहा जाता है. क्या समाज या साहित्य में कभी कुल्टा शब्द पुरुष के लिए भी प्रयुक्त हुआ है? इन दोनों रचनाओं के माध्यम से हम मध्यकालीन और आधुनिक समाज को भी मूल्यांकित कर सकते हैं.

पहली क़िस्त  :जायसी और पद्माकर की नायिकाओं के व्यक्तित्व के सामाजिक पक्ष का तुलनात्मक अध्ययन

समाज में पुरुष को इतनी स्वतंत्रता मिली हुई है कि वह एक पत्नी के होते हुए दूसरी के पास जाना अपना हक समझता है| यदि किसी स्त्री के अनेक पति हो तब भी वह रूप से आकर्षित होकर अन्य पुरुष के पास उससे विवाह के लिए चली जाए तो ऐसा ग्रंथ महान बन जायेगा? नहीं ऐसे साहित्य को पापाचार की कथा कहकर या तो जलाया जायेगा या प्रतिबंधित कर दिया जायेगा. वैसे हमारी मानसिकता ये सोच भी नहीं सकती कि किसी स्त्री के अनेक पति हो सकते हैं. ये अधिकार पुरुषों को ही प्राप्त हैं. पदमावत में तो राजा रत्नसेन को कवि साफ छूट देते दिखते है| कवि का उद्देश्य राजा को दूसरी स्त्री के पास भेजकर ही पूरा होना था इसलिए उन्होंने इस स्त्री में ईश्वर की झलक देखने का प्रयास किया| साहित्य समाज को राह दिखाने का काम भी करता है| क्या जायसी ने ये सोचा होगा की जिस तरह वे इस ग्रन्थ की रचना कर रहे हैं उसका समाज पर क्या असर पडेगा? समाज में प्रत्येक पुरुष स्त्री में ईश्वर की झलक देखकर विवाह करता रहेगा बिना ये सोचे की स्त्री की क्या मन:स्थिति होती है| समासोक्ति का माध्यम अपनाने वाले जायसी ने नागमती के प्रति अपने कर्तव्य की इतिश्री उसका वियोग वर्णन लिख कर पा ली| मध्यकाल में राजाओं की अनेक रानियाँ होती थी| साहित्य के माध्यम से हम उन स्त्रियों की दशा को भली-भांति समझ सकते हैं| एक स्त्री जो अपना सब कुछ छोड़कर पुरुष के परिवार को अपनाती है यदि पुरुष दूसरी स्त्री को उसका स्थान दे उसे प्रेम करे तो स्त्री की क्या दशा हो सकती है? वह अपने को ठगा हुआ महसूस करती है| राजा रत्नसेन जब रानी पद्मावती को साथ लेकर वापस चितौड़ आता है रानी नागमती अपना रोष इस प्रकार प्रकट करती है|
नागमती मुख फेरि बईठी| सौंह न करै पुरुख सौं डीठी||
ग्रीखम जरत छाडि जो जाई| पावस आव कवन मुख लाई||
जबहिं जरे परबत बन लागे| औ तेहि झार पंखि उडि भागे||
अब साखा देखिअ औ छाहाँ| कवने रहस पसारियअ बाहाँ||
कोउ नाहिं थिरकि बैठ तेहि डारा| कोउ नहि करै केलि कुरुआरा||
तूँ जोगी होइगा बैरागी| हौं जरि मई छार तोहि लागी||
काह हंससि तूँ मोसौं किए जो और सौं नेहु||
तोहि मुख चमके बीजुरी मोहि मुख बरसे मेहु||26


जगद्विनोद में एक नायिका का पति रात भर दूसरी स्त्री के पास रहकर आता है. स्त्री ने जब अपने पति के आलस्य से भरे नेत्र देखे उसने कुछ नहीं किया. न पति को अति आदर देने का कार्य वह करती है न उसपर रोष प्रकट करती है बस कुछ नहीं कहती जैसी है वैसी ही बनी रहती है. यहाँ नायिका के व्यक्तित्व में उसका समाज देखा जा सकता है. वह जानती है कि पति रात भर किसी अन्य स्त्री से साथ प्रेम में था तब भी वह कुछ नहीं कहती. ऐसी ही रहती है जैसे उसे कुछ फर्क नहीं पड रहा है.
रसिकराज आलस भरे खरे दृगन की ओर.
कछु न कोप आदर न कछु भावती भोर॥27
ऐसा नहीं हो सकता है कि उसके मन को दु:ख न हुआ है पर वह दु:ख वह चाह के भी व्यक्त नहीं कर सकती. समाज इस चीज की स्वतन्त्रता स्त्री को नहीं देता. स्त्री को इतना ही अधिकार मिला हुआ है कि बाहर गये पति का पूरी रात इंतज़ार करे या नागमती की तरह साल भर से ज्यादा विरह में बिता दे. एक ही समाज में स्त्री-पुरुष दोनों रह रहे हैं पर पुरुष को ऐसे कई अधिकार मिले हुए हैं जिनसे स्त्री के मन को पीड़ा मिलती है.

पदमावत में पुरुष का दूसरी स्त्री के पास जाना महिमा-मंडित कर दिया गया है| समाज की यही स्थिति है पर समाज स्त्री को ऐसी स्वतंत्रता नहीं देता कि वह दूसरे पुरुष से सम्बन्ध बनाए| विवाहिता के लिए परपुरुष से सम्बन्ध बनाना तो पूर्ण रूप से वर्जित ही होता है| किन्तु पद्माकर उढा नायिका के माध्यम से समाज की उन स्त्रियों का चित्रण कर देते हैं जो अपने विवाहेत्तर सम्बन्ध बना रही थी| वह ससुराल में बहुत कठिनाईयों के बाद प्रियतम से मिल पाने का मौका निकाल पाती है| ये प्रियतम रीतिकाल में कृष्ण ही थे किंतु थे तो सही. कृष्ण के माध्यम से इन कवियों ने बड़ी सहजता से स्त्रियों के सामाजिक बंधनों को दिखा दिया है. स्त्री का प्रेम भले ही किसी आमपुरुष से हो पर वह उसके लिए उसी उत्कंठा से सबकुछ छोडकर चली आती है जैसे कृष्ण के प्रेम में गोपियाँ.
गोकुल के कुल के गली के गोप गाउन के जौ लगि कछू को कछू भारत भनै नहीं.
कहै पदमाकर परोस पिछवारन के द्वारन के दौरि गुन औगुन गनैं नहीं.
तौं लौं चली चातुर सहेली याहि कोऊ कहूँ नीके कै निचोरै ताहि करत मनै नहीं.
हौं तौ स्यामरंग में चुराइ चित्त चोराबोर बोरत तौ बोरयौ पै निचोरत बनै नहीं.28

यहाँ हम यह नहीं कह सकते कि पद्माकर की स्त्री का प्रेम रत्नसेन से कमत्तर है. वह अपने प्रेम के बारे में कहती है कि उसका रंग अब उतरेगा नहीं क्योंकि वह प्रियतम के रंग में बार-बार रंगी है| जिससे उसके प्रेम का रंग गहरा और गहरा होता जाता है| क्योंकि ये समाज की पितृसत्ता के ढांचे को तोड़ने वाली स्त्री है इसलिए हम इसे गलत कह सकते हैं| यहाँ पद्माकर की नायिका समाज में स्त्री की प्रचलित छवि को बदलती है. स्त्री का भी मन होता है कि वह अपने पति के अलावा किसी अन्य पुरुष से सम्बंध बनाये वह इस काम को कर नहीं पाती क्योंकि समाज नहीं चाहता| पद्माकर की नायिका समाज से विद्रोह करती है| सबके सामने वह प्रेम को स्वीकार भी करती है.


रत्नसेन कभी पद्मावती के पास जाता है कभी नागमती| उसके अन्दर का पुरुष उसे कभी एक स्त्री से संतुष्ट नहीं रहने देता| रत्नसेन को पद्मावती अच्छी लगती है वह उसके पास चला जाता है, उसे नागमती की याद आती है तो वह चितौड़ वापस आ जाता है| जिस नागमती को रतनसेन अपशब्द ‘तुम्ह तिरिआ मति हीन तुम्हारी’ कहकर गया था अचानक उसे वह इतनी प्रिय हो जाती है कि वह चितौड़ की पहली रात उसके साथ बिताता है| कवि ने समासोक्ति के चक्कर में मानवीयता का हनन कर दिया है| मूल भारतीय कथा में कोई नागमती नहीं है| रत्नसेन को यदि आविवाहित अवस्था में पद्मावती मिलती तो किसी का किसी से दुराग्रह न होता| क्योंकि नागमती और पद्मावती सौत है इसलिए नायक एक के पास जाता है तो दूसरी जल उठती है|
कही दुख कथा रैनि बिहानी| भोर भएउ जहँ पदुमिनि रानी||
भान देख ससि बदन मलीनी| कँवल नैन राते तन खीनी||
रैनि नखत गनि कीन्ह बिहानू| बिमल भई जस देखे भानू||
सुरुज हँसा ससि रोई डफारा| टूटी आंसू नखतंह के मारा||
रहै न राखे होइ निसांसी| तंहवहि जाहि निसि बासी||
हौं के नेहु आनि कुँव मेली| सींचै लाग झुरानी बेली||
भए वै नैन रहंट की घरी| भरीं ते ढारी छूंछी भरीं||29

जायसी की नायिका पति के दूसरी औरत के पास जाने पर चुपचाप आंसू बहाती है. वह उसे कुछ कह नहीं सकती. मामूली सा विरोध कर देने पर वह पति को पुन: अपनाती है. क्या कोई सहजता से ऐसे संबंधों को अपना सकता है? जायसी की नायिका पति को परमेश्वर मानने वाली स्त्री है. पति से रोष प्रकट करने की छूट पितृसत्ता उन्हें नहीं देती इसलिए नागमती वर्ष भर रोती हुई रत्नसेन की प्रतीक्षा करती है. जब रत्नसेन उसे अपमानित करके त्याग देता है तो भी ऐसे व्यक्ति के साथ बंधे रहने का क्या अर्थ है? जायसी अपने उद्देश्य को तो पूरा होने (रत्नसेन का पद्मावती से मिलना) देते हैं पर नागमती के आत्मसम्मान की रक्षा वह नहीं करते.

पद्माकर की नायिका नागमती से थोडी अलग स्थिति की है. वह पति को अपना सब-कुछ मानती है पर पति की गलतियों को स्वीकार करना उसके व्यक्तित्व का पक्ष नहीं. वह पति को सुनाती है, उसे अपना प्रत्यक्ष रोष दिखाती है. यहाँ ये नायिका आधुनिक स्त्री की तरह बर्ताव करती है. पद्माकर की नायिका पति पर व्यग्यं करती है.
भूले से भ्रमे से काहि सोचत स्रमे से अकुलाने से बिकाने से ठगे से ठीक ठाए हौ.
कहै पद्माकरसु गोरे रंग बोरे दृग थोरे थोरे अजब कुसुंभी करि लाए हौ.
आगे कौं धरत पर पीछे कौं परत पग भोर ही तें आज कछु औरै छबि छाए हौ.
कहाँ आए तेरे धाम कौन काम घर जानि तहाँ जावो कहाँ जहाँ मन धरि आए हौ.30
भारतीय समाज पर पितृसत्ता बहुत गहरे तक हावी है. रत्नसेन नागमती के पास आता है. वह उससे बात नहीं करती रत्नसेन ने इसे अपनी अवज्ञा समझी. यहाँ रानी नागमती के व्यक्तित्व का वह पक्ष उजागर होता है जिसमें उसकी इच्छा, अस्वीकार का कोई मूल्य नहीं:
 नागमती तूँ पहिलि बियाही. कान्ह पिरीति डही जसि राही.
बहुते दिनन्ह आवै जौं पीऊ. धनि न मिलै धनि पाहन जीऊ.31

समाज की पितृसत्ता और पुरुष की मानसिकता जो स्त्री को अपनी वस्तु के रूप में देखती है, पर महादेवी वर्मा लिखती हैं-“भारतीय पुरुष जैसे अपने मनोरंजन के लिए रंग-बिरंगे पक्षी पाल लेता है; उपयोग के लिए गाय-घोड़े पाल लेता है, उसी प्रकार वह एक स्त्री को भी पालता है तथा अपने पालिक पशु-पक्षियों के समान ही उसके शरीर और मन पर अपना अधिकार समझता है.”32रत्नसेन का वापस आना और नागमती को संयोग न करने पर बुरा-भला कहना उसपर अपना अधिकार जमाना ही था. स्त्री मात्र वस्तु समझी जाती है इसलिए उसपर अपना हक हर कोई जमा लेता है. आलोचकों को नागमती का विरह-वर्णन हिंदी का सर्वश्रेष्ठ विरह वर्णन लगता है. आलोचक स्त्री के हक, अधिकार की बात नहीं करते. ये ही आलोचक रीतिकाल में खंडिता नायिका के वर्णन को ठीक मानते हैं. पुरुष की गलती इन्हें दिखाई नहीं देती. मानों ये आलोचक भी स्त्री के विरह के पक्ष में हो. आचार्य रामचंद्र शुक्ल लिखते हैं:‘जायसी के भावुक हद्य ने स्वकीया के पुनीत प्रेम के सौंदर्य को पहचाना नागमती का वियोग हिंदी साहित्य में विप्रलम्भ शृंगार का अत्यंत उत्कृष्ट निरूपण है.’33

रत्नसेन ने जब चाहा नागमती को त्याग दिया फिर मन किया तो अपनाने चला आया. पद्मावती से शादी के बाद क्या नागमती बुद्धमति हो गई थी जो रत्नसेन उसके पास चला आता है. यदि उसे इतना ही प्रेम नागमती से था तो वह गया ही क्यों? क्या विवाह इसे ही कहते है. पति चाहे कुछ भी कर ले यदि वह पत्नी के पास आता है तो पत्नी को उससे मिलना ही चाहिए. नागमती का यह व्यक्तित्व उसी राज-दरबारी परम्परा की देन है जिसमें वह और पद्मावती पैदा हुई. वह चाह कर भी अपने पति की अवज्ञा नहीं कर सकती. पर क्या समाज की औरत ऐसी ही होती है? जायसी की नायिकायें अपना दु:ख प्रकट नहीं करती उनके मन का रोष व्यक्त नहीं हो पाता पर पद्माकर की नायिका अपने पति को दूसरी के पास जाने पर आपार दु:ख का अनुभव करती है और उसे दूसरों से कहती भी है. एक स्त्री अपना सबकुछ छोड़कर पति के पास आती है पर यदि उसे वहाँ भी छल मिले तो वह बहुत दु:ख होती है. पद्माकर के समाज में भी भले ही पुरुष परस्त्री गमन कर रहा था पर उनकी नायिका बोलना सीख गयी थी पद्माकर की नायिका पति के दूसरी औरत के पास आने पर तीव्र विरोध कर कहती है:
   खान  पान  सज्जासयन  जासु  भरोसे आइ.
  करै सु छलि अलि आप सौं ताको कहा बसाइ..34
जायसी की नायिका पद्मावती यौवन में अपने अलग स्थान यानि धवलगृह में रहती है. पद्मावती का यहाँ रहना उसके व्यक्तित्व के आर्थिक पक्ष का एक रुप है. राजकुमारियों को व्यस्क होने पर ऐसी जगह रखा जाता है जो सबसे उंची होती थी. उसके साथ ऐसी सहेलियाँ रखी जाती है जो अभी तक कौमार्य धारण किये हुए हैं. पति का जिनसे संग नहीं हुआ है.
      बारह बरिस मौह भइरानी. राजैं सुना संजोग सयानी.
      सात खंड धौराहर तासू. पदुमिनी कहै सो दीन्ह नेवासू.
     औ दीन्ही संग सखी सहेली. जो संग करहिं रहस रस केली.
     सबै नवल पिय संग न सोई. कॅवल पास जनु बिगसहिं कोई॥35


यहाँ कुमारी कन्याओं को पद्मावती के संग रखना समाज की यौन शुचिता की धारणा है. पद्मावती के संग यदि ऐसी सखियों को रखा जाता जो विवाहित है तो वह अपनी सखी पद्मावती को यौन-सम्बंधों के बारे में बताती तब वह भी प्रेम करने की इच्छा व्यक्त करती जिसकी मध्यकाल इजाजत नहीं देता. पद्मावती के पास उसके उम्र की व अविवाहित स्त्रियों रखने के कारण वह पति से मिलने को इतनी व्याकुल नहीं है. इसलिए पद्मावती खेल क्रियाओं में लगी रहती है. पद्मावती का अपने यौवन काल में किसी पुरुष को साथ सम्पर्क नहीं दिखाया गया है. इसका असर उसके व्यक्तित्व पर गहरा पडता है. वह अपने जीवन में आने वाले प्रथम पुरुष रत्नसेन से ही प्रेम कर बैठती है.

पद्माकर की नायिका का समाज ऐसा नहीं है वह पुरुष से प्रेम करना चाहती है. समाज में उसे भी कई बंधनों को झेलने पड रहे थे पर फिर भी वह पद्मावती से कहीं ज्यादा स्वतन्त्र है. पद्माकर की नायिका अविवाहित होने पर भी विवाहित पुरुष से प्रेम करती है वह भले ही अज्ञातयौवना बन कर भी चित्रित हुई है पर यदि उसे प्रेम का बोध हो जाता है तो समाज के सारे बंधनों को वह तोड‌ती है. जहाँ एक ओर पद्मावती जीवन में आये प्रथम पुरुष से प्रेम करती है वहीं पद्माकर की नायिका ने जरुर चुनाव करके, भली-भांति सोच कर ही विवाहित पुरुष का संग किया होगा.
अनब्याही तिय होति जहँ सरस पुरुष रस लीन.
ताहि  अनूढ़ा कहत  हैं  कबि  पंडित परबीन॥36

राजकुमारी पद्मावती राजा के बंधनों में जकड़ी है उसका सबसे प्रिय मित्र (तोता) भी राजा मारना चाहता है. रानी जिसके पास मन बहलाने के लिए तोता या सखियाँ थी. वह अपने मन की बात किसी से नहीं कह सकती थी. तोता हीरामन पद्मावती के हृदय की बात सुनता और समझता है. राजा पद्मावती के इस मित्र को भी छीन लेना चाहता है क्योंकि वह सुआ पद्मावती के मन को समझकर उसके अनुकुल वर ढूढने की बात कह रहा था. पद्मावती राजकुमारी है उसके पास सब सुख-सुविधायें हैं पर वह अपने मन की बात किसी से नहीं कर सकती थी. पद्मावती को कवि ने भले ही ईश्वर की झलक बनाने की कोशिश की है पर उसके मन को समझा नहीं है. वह अपने दिल की बात सुआ हीरामन से करती है और राजा उसे ही मारना चाहता है. ये कैसा समाज है जिसमें स्त्री को कहीं भी अपनी बात कहने का हक नहीं है. नागमती और पद्मावती अपने प्रतीकात्मक रुप में अलग-अलग स्थान रखती है (आलोचकों के अनुसार) पर जहाँ वे स्त्री है वहाँ उनकी स्थिति एक सी है. एक बंधक जैसी स्थिति जहाँ उन्हें कोई स्वतंत्रता नहीं है.

जायसी की नायिका पति के दूर जाने पर विरह में व्याकुल हो रही है. पति दूसरी स्त्री के पास गया है तब भी वह उसी पति की चाहना करती है और चाहती है कि वह वापस आ जाये. पुरुष समाज ने स्त्री को मानसिक रुप से इस कदर जकड लिया है कि वह इससे निकलने की सोच भी नहीं पाती. पति दूसरी स्त्री के पास गया है तब भी नागमती उसके लिए मरे जाती है मानो उसका व्यक्तित्व ही रत्नसेन से हो. यहाँ नागमती की सामाजिक स्थिति को बखूबी समझा जा सकता है. वह विद्रोह नहीं करती घर से भागती नहीं है. बस रत्नसेन के लौट आने का इंतज़ार करती रहती है. जिसमें उसे ये भी नहीं पता कि वो कब आयेगा? आयेगा भी या नहीं?
नागमती चितउर पँथ हेरा. पिउ जो गए फिरि कीन्ह न फेरा.37


किंतु पद्माकर की नायिका ऐसी नहीं है उसका पति अगर दूसरी स्त्री के पास जाता है तो वह उसे अपना क्रोध प्रकट करती है. पद्माकर की स्त्री भी वियोगी होती है पर इस अवस्था में वह तब नहीं पहुँच रही जब पति किसी दूसरी स्त्री के पास गया है बल्कि वह पति के देस से बाहर जाने पर दु:ख होती है. यहाँ इन दोनों नायिकाओं के व्यक्तित्व का अंतर साफ हो जाता है. दोनों ही स्त्रियाँ विवाहित हैं. एक वो है जो जानती है कि पति किसी दूसरी के पास गया है उस स्त्री को यह तक नहीं पता कि उसका पति वापस आयेगा भी या नहीं. रत्नसेन के जाने और लौट के आने तक कोई सूचना चितौड़ में नहीं थी कि वह कब आयेगा. तब भी नागमती वियोग में जलती रहती है. ऊर्मिला के वियोग की समयावधि पहले से तय थी इसलिए वह रात-दिन गिनती है पर नागमती को तो भी अंदेशा नहीं था कि रत्नसेन कब आयेगा? फिर भी वह बेचारी इंतजार करती रहती है. इसलिए नागमती सिर्फ इसी संदर्भ में आलोचकों को अच्छी लगती है. यहां हमें हिंदी आलोचना को भी समझना चाहिए. साहित्य में अब विद्रोही स्त्री की कद्र होने लगी है, अब तक हर ऐसी स्त्री को नीची नज़र से देखा जाता था. इसलिए नागमती की उस समय आलोचना होती है जब वह रत्नसेन को जाने से रोकती है और विरह में प्रशंसा. पद्माकर की नायिका ऐसी नहीं है. उसका समाजीकरण ऐसा नहीं हुआ है. किंतु ऐसा नहीं है कि वह अपने पति को कम प्रेम करती है पर वह पति के अत्याचार को नहीं सहती.
अनत रमें पति की सु अति गहि गहि गहकि गुनाह.
 दृग सरोज  मुख मोरि तिय  छुवन देति नहि  छाँह॥38

समाज आज भी स्त्री-पुरुष के प्रेम सम्बन्ध को स्वीकार नहीं करता| प्रेम चोरी-चोरी किया जाये तब तो चल जाता है किन्तु प्रेम का पता किसी को चल गया तो समाज उस स्त्री को जीने नहीं देता| समाज में पुरुष का प्रेम करना सबको उचित लगता है पर स्त्री के प्रेम का पता लगने पर उसे विभिन्न यातनाओं से गुजरना पडता है. पदमावत में पद्मावती अपने प्रेम में व्याकुल होने की चर्चा सिर्फ तोते  और धाय करती है. प्रेम को गुप्त रखना ही उसे जीवित रखना होता है. समाज को ताक पर रख कर स्त्री प्रेम कर लेती है पर उसे हर वक्त डर रहता है कि कही उसके प्रेम का पता न चल जाए| पद्मावती को ये डर नहीं सताता. किंतु पद्माकर की नायिका प्रतिपल इस बात से डरती है कि कहीं उसके प्रेम का बोध किसी को न हो जाये. उसका ये डर तत्कालीन समाज में प्रेम करने वाली स्त्री की स्थिति को बताता है. ये नायिका उस समाज से परिचालित है जहाँ वह चोरी-छुपे प्रेम तो कर लेती हैं पर भीतर- ही-भीतर भयाकुल रहती हैं. जगद्विनोद की नायिका नायक से कहती है:
 मैं तरुनी तुम तरुन तन चुगुल चवाई गाउँ.
मुरली लै  न बजाइयौ  कबहूँ  हमारो नाउँ||39

जायसी का समाज औरत को जीने की स्वतंत्रता तो देता ही नहीं है पर उसे मरने पर मजबूर जरुर कर देता है. पदमावत में नागमती और पद्मावती रत्नसेन के मरने पर आत्महत्या कर लेती हैं ताकि वह मुस्लिम शासक के हाथों न आ पाये. समाज में स्त्री को इस सांचें में ढालना सीखा दिया जाता है कि वह कैसे अपने शील की रक्षा करे उसे लड़ना नहीं सीखाया जाता बस ये समझा दिया जाता है कि यदि कभी उसके शील पर आ बने तो उसे आत्महत्या कर लेनी चाहिए. तत्कालीन समाज में एक कुप्रथा भी प्रचलित थी जिसे सती प्रथा का नाम दिया जाता है. यानि पति मर गया तो स्त्री को भी उसके साथ मर जाना चाहिए. समाज हर समय स्त्री को यह बताना चाहता है कि पति के बिना तुम्हारा कोई अस्तित्व नहीं है. पति के साथ मरने की इस प्रथा को महिमा‌-मंडित भी किया गया ताकि स्त्रियाँ स्वयं इस कार्य को करें. पदमावत में सती प्रसंग पर रामचंद्र शुक्ल कहते हैं:‘राजा रत्नसेन के मरने पर रोना-धोना नहीं सुनाई देता. नागमती और पद्मावती दोनों शृंगार करके प्रिय से उस लोक में मिलने के लिए तैयार होती हैं. यह दृश्य हिंदू स्त्री के जीवन दीपक की अत्यंत उज्ज्वल और दिव्य प्रभा है जो निर्वाण के पूर्व दिखाई पड़ती है.’40

रामचंद्र शुक्ल जैसे आलोचक स्त्री की इस आत्महत्या में गौरव देख रहे हैं. शुक्ल जी किसी मध्ययुग के आलोचक नहीं हैं. वे उस समय के हैं जब सती प्रथा का विरोध होने लगा था. तब भी वे पदमावती और नागमती की सती घटना को गौरव मानते हैं. स्त्री का गौरव उसके मर जाने में है क्योंकि वो जिंदा रहेगी तो दूसरे की बन सकती है. इससे उसका पतिव्रता धर्म खंडित होगा. स्त्री को लड़ना, विपरीत परिस्थितियों का समना करना नहीं सीखा रहे बस पति मर गया तो वह भी मर गई. यहाँ हम मध्यकालीन समाज की स्त्री को इन दोनों नायिकाओं के माध्यम से समझ सकते हैं. पति के मरने के बाद कोई स्त्री यदि जीने की कामना करती थी तो उसे मीरां की तरह कई दु:ख झेलने पडते थे. मीरां इसलिए भी सती नहीं हो पाई क्योंकि वह राज घराने से थी और उसका मोह कृष्ण से था पर किसी भी आम स्त्री के लिए यह कर पाना सम्भव नहीं था. स्त्रियों को जबरन आग में डाल दिया जाता था. शासक अकबर ने सती प्रथा का विरोध किया था. इस कुप्रथा पर उनका मत था-
‘भारत में यह एक प्राचीन प्रथा है कि अपने पति की मृत्यु के पश्चात स्त्री, चाहे उसे अपने पति के हाथों दुर्व्यवहार ही क्यों न सहना पड़ा हो, अपने आपको आग में झोंक देती है और पूरी बहादुरी के साथ अपने बहुमूल्य जीवन का बलिदान कर देती है और इस कार्य को वह अपने पति की मुक्ति का साधन समझती है. पुरुषों का भी यह विचित्र आचरण है कि अपनी मुक्ति के लिए वे अपनी पत्नियों से इस प्रकार की सहायता की अपेक्षा रखते हैं.’41

यहाँ पद्मावती और नागमती स्वयं आग में जल रही हैं क्योंकि उनको भी उसी समाज ने ये सब बातें समझाई हैं कि पति बिना उनका कोई अस्तित्व नहीं है और ये ही एक उपाय है दूसरों से अपने शील को बचाये रखने का. किंतु पद्माकर की नायिका ऐसा नहीं करतीं. रीतिकाल में ऐसा वर्णन शायद ही मिले. रीतिकाल के कवि स्त्री के जीवन के पक्ष में हैं. वे स्त्री-जीवन के महत्व को समझते हैं इसलिये उनके काव्य की स्त्री सभी कालों से भिन्न ही दिखाई देती है. रीतिकाल की स्त्री अपनी स्वतंत्रता की बात करती है. वह समाज के कई बंधनों को तोडती है उसे कवि प्रेम करने का अधिकार देते हैं. रीतिकालीन समाज में भले ही स्त्री सती हो रही रही थी पर कवियों ने इस स्थिति को प्राय: नहीं ही दिखाया है. रीतिकाल के रचनाकारों के लेखन के इस पक्ष पर त्रिलोचन शास्त्री ने लिखा है.‘रीतिकाल में सतीप्रथा पूरे जोर पर थी, कोई गाँव शायद ही रहा हो जहाँ ‘सती चौरा’ न रहा हो. हमारे इन (रीतिकालीन) कवियों में से किसी ने इधर ध्यान नहीं दिया; अनुकूल या प्रतिकूल लिखने की बात ही अलग है.’42
दरबार में कवि लिख रहे थे. दरबार में सती प्रथा के विरोध या पक्ष में बात सुनी जा सकती है? जो शासक स्त्री-पुरुष के सन्योग के चित्रण में आनंदित थे उनके रचनाकार स्त्री के जबरन मर जाने की घटना को काव्य का विषय बनायेगे और राजा और अन्य दरबारी सुन भी लेंगे? राजमहल में कवि चाह के भी ऐसी बात नहीं कह सकता. रचनाकार की परिस्थिति को जानते हुए भी शास्त्री जी का यह कथन अनुचित सा लगता है.


समाज के स्त्री समुदाय का एक सच उसमें रहने वाली वेश्यायें भी हैं. हमारे समाज में स्त्री को घर में बंद कर पुरुषों को स्वतंत्रता दी जाती है. पदमावत और जगद्विनोद दोनों में ये स्थिति हम देख सकते हैं. पुरुष दूसरी स्त्री के पास जाता है पर वह विवाहिता उसे कुछ नहीं कहती. अपना लेती है हर समय. यह हमारे समाज की पितृसत्ता ही है जो स्त्री से ये सब करवा लेती है. इसी पितृसत्ता की देन स्त्री का वेश्या होना है. वेश्या वो स्त्री होती है जो धन या किसी अन्य उद्देश्य के लिए देह को माध्यम बनाती है. आज वेश्याओं की दयनीय दशा सोची भी नहीं जा सकती क्योंकि आज ये एक देह क्रिया से जुड गया है. आदिकाल, मध्यकाल में वेश्याओं की ऐसी स्थिति नहीं थी. उपन्यास सलाम आखिरी में मध्यकालीन वेश्या की स्थिति का पता इस सम्वाद से चलता है.

‘वे विभिन्न कलाओं को जानने वाली गुणी स्त्रियों होती थी. पहले नृत्य और संगीत पर सिर्फ वेश्याओं एवं बाईजियों का ही एकाधिकार था पर आज बदलते सोच के चलते, नृत्य और संगीत की स्कूलों के चलते नृत्य और संगीत घर-घर तक पहुच गये हैं . तो उस लिहाज से भी ज्यों-ज्यों इनकी कला का स्तर गिरता गया वे हीन विलुप्त हो गई और बचा रह गया केवल शरीर… एक स्थूल शरीर कलाहीन, रुपहीन रुप की हाट में बिकता एक रुग्ण शरीर.’43

मध्यकालीन व्यवस्था में वेश्या की स्थिति भले ही एक विवाहिता जैसी नहीं थी पर उस समाज में कवि इस स्त्री को भी भरपूर मान देते थे. भक्तिकाव्य में नागमती जो एकनिष्ठ प्रेम में जी रही है, पतिव्रता है को जायसी अपशब्द कहलवाते हैं. उस काल के ठीक बाद के काल रीतिकाल में वेश्या स्त्री सम्मान से देखी गई है. रीतिकालीन कवि वेश्या का भी चित्रण अपने काव्य में करते हैं. वेश्या धन के हेतु रति करती है यहाँ वेश्या के चरित्र की एक विशेषता उभर कर आती है कि वह स्त्री विवाहिता नहीं है न ही परकीया है इन दोनों से अलग वह ऐसी स्त्री है को काम सम्बंधों में केवल धन को चुनती है. वेश्या के इस चयन में भी उसके सामाजिक व्यक्तित्व को देखा जा सकता है.
तन सुबरन सुबरन बसन सुबरन उकति उछाह.
धनि सुबरनमय ह्वै रही सुबरन की ही चाह॥44
यदि वह दरबारी वेश्या है तो वह ऐसे व्यक्ति को ही अपना संग देती है जो दरबार का हो. साधारण वेश्या के लिए चयन की ये स्थिति नहीं है.

गणिका के व्यक्तित्व में आराम नहीं है. वह रात-भर केलि करती है और सुबह भी केलि के उसे तैयार रहना पड़ता है. गणिका की स्थिति रीतिकालीन समाज में वैसी ही थी जैसी आज की वेश्याओं की है. वे भी रात-दिन देह-व्यापार करती थीं और ये भी. गणिका रात-भर केलि में रत रहकर भी आराम नहीं कर सकती क्योंकि उसे आजीविका के लिए काम करना पडेगा| गणिका आराम इसलिए नहीं करना चाहती क्योंकि उसके पेशे के दिन अधिक नहीं होते| उम्र के साथ उसकी मांग कम होती जाती है| इसलिए वो निरंतर काम करना चाहती है| रात की केलि से थकी, आलस्य से भरी वेश्या का चित्रण करते हुए पद्माकर लिखते हैं
आरस सों आरत सम्हारत न सीसपट गजब गुजारत गरीबन की धार पर.
    कहै पदमाकर सुगंध  सरसार  बेस बिथुरि बिराजैं  बार हीरन के हार पर.
 छाजत छबीले छिति छहरि छरा के छोर भोर उठि आई केलिमंदिर के द्वार पर.
  एक पग भीतर  सु एक देहरी पै धरे  एक कर कंज  एक कर है  किवार पर॥45


रीतिकाल के कवियों ने गणिका को सामान्य स्त्री की भांति ही संवेदनशील समझते हुए उसके हर मनोभावों को चित्रित किया गया है. स्वकीया के जो भेद जैसे आगतपतिका, प्रवत्स्यपतिका आदि मिलते हैं वही गणिका के लिए भी चित्रित हो रहे हैं. एक तरफ साहित्य का जायसी का समय है जिसमें स्त्री को अपशब्द कहे जा रहे थे दूसरी तरफ रीतिकाल में सर्वत्र स्त्री ही स्त्री दिखाई देती है. ये स्त्री भले ही पुरुष द्वारा चित्रित है, पर क्या समाज में ऐसी स्त्रियाँ नहीं थी? नायिका भेद सिर्फ दरबारी स्त्रियों पर लिखा गया हो ऐसा भी नहीं है. वहाँ हर तरह की स्त्री है. क्या ऐसा हमें जायसी का समय में दिखाई देता है? गणिका अपने कार्य के अनुसार व्यक्ति का चयन करके ही उससे प्रेम करती है|
बड़े साह लखि हम करी तुम सौं प्रीति बिचारि|
कहा जानि तुम करत हौ हमैं चोरि की नारि॥46
इस चयन में नायिका को कितने द्वंद से गुजरना पड़ा होगा? वह पुरुष को देख-समझ कर ही उससे प्रीति रखती होगी| जगद्विनोद में गणिका के इन मनोभावों और सामाजिक पक्ष  को कवि ने बखूबी चित्रित किया है|

निष्कर्ष- जायसी और पद्माकर के समाज में काफी अंतर है. एक के कवि हैं दूसरे रीतिकाल के लिए. जायसी का समयमें स्त्री को माया माना गया है. नागमती उसका सबसे बड़ा उदाहरण है. जायसी और पद्माकर का ये परिवेश उनकी रचनाओं में चित्रित नायिकाओं के व्यक्तित्व पर भी प्रभाव डालता है. नागमती मुह बंद करके रहती है. पति के दूसरी स्त्री के पास जाने पर भी वह कुछ नहीं करती पर जगद्विनोद की नायिका स्वतंत्र है इन सभी मामलों में. वह पिय को पास बुलाती है और यदि वह किसी और के पास से आता है तो उसे सुनाती भी है. वह रति में आनंद भी लेती है और रोष होने पर रति से विमुख भी होती है. वह समाज से निडर होकर प्रेम भी करती है पर जैसे ही लगता है कि वह पकडी जायेगी, डरती भी है.पद्माकर और जायसी ने अपने समय के अनुसार काव्य रचना की है. पदमावत और जगद्विनोद का अध्ययन करने पर कहीं-कहीं लगता है कि जायसी की नायिकायें इस लोक की नहीं है पर जगद्विनोद की नायिकायें इसी लोक की स्त्री का प्रतिनिधित्व करती नज़र आती हैं.

संदर्भ सूची

20.नित्यानंद तिवारी, मध्यकालीन साहित्य:पुनरवलोकन, पृष्ठ-80 
21. पदमावत, पद-89
22. नित्यानंद तिवारी, मध्यकालीन साहित्य:पुनरवलोकन, पृष्ठ-80
23.पदमावत, पद–132
24.  पदमावत, पद-131 (प्रथम पंक्ति) 
25. जगद्विनोद, छंद- 108
26.   पदमावत, पद -527
27. जगद्विनोद, छन्द-162
28.जगद्विनोद, छन्द-80
29.पदमावत, पद-430
30.जगद्विनोद, छंद-61
31.पदमावत, पद-428
32.महादेवी वर्मा, शृंखला की कड़ियाँ, पृष्ठ-83
33.रामचंद्र शुक्ल, त्रिवेणी, पृष्ठ-38 
34.जगद्विनोद- छन्द-131 
35. पदमावत, पद-54
36.जगद्विनोद, छंद 
37.पदमावत, पद-341
38. जगद्विनोद, छंद-74
39.वही छंद-22-
40.रामचंद्र शुक्ल, त्रिवेणी, पृ.37, 
41.अकबर की सूक्तियाँ अकबरनामा से (उल्लेखित) भारतीय इतिहास में मध्यकाल, लेखक इरफान    हबीब, पृष्ठ-38
42.त्रिलोचन शास्त्री, रीतिकाल एक क्षयी युग- (लेख), पुस्त. साहित्य इतिहास और आधुनिक बोध,        पृ.199, 
43. सलाम आखिरी
44.जगद्विनोद, छंद-125  
45.वही, छंद-124 
46.वही, छंद-170

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