उन्नीसवें भारत रंग महोत्सव में स्त्रियों की भागीदारी

मंजरी श्रीवास्तव
एक लम्बी कविता 'एक बार फिर नाचो न इजाडोरा' बहुचर्चित.नाट्य समीक्षक,कई नाट्य सम्मान की ज्यूरी में शामिल. संपर्क : ई मेल-manj.sriv@gmail.com

पिछले 1 फरवरी से प्रारम्भ हुए भारत रंग महोत्सव का प्रथम चरण स्त्रियों को समर्पित रहा. उदघाटन समारोह में जहाँ मुख्य अतिथि भरतनाट्यम एवं ओडिसी शैलियों की विख्यात नृत्यांगना एवं गुरु डॉ. सोनल मानसिंह थीं, वही विशिष्ट अतिथि इज़रायल की प्रसिद्ध युवा निर्देशक वेरा बरज़ाक श्नाइडर थी.

महोत्सव के दूसरे दिन रंगप्रेमी दर्शकों, अध्येताओं और शोधार्थियों ने मणिपुर की वरिष्ठ अभिनेत्री और मशहूर निर्देशक स्वर्गीय एच. कन्हाईलाल की जीवन संगिनी सावित्री हेस्नाम को ‘लिविंग लीजेंड’ के तहत सुना,  जिसमें उन्होंने अपने जीवनानुभव लोगों से साझा किये. इन जीवनानुभवों में अपनी रंगयात्रा, एक अभिनेत्री के रूप में अपनी मेकिंग और अपने प्रियतम और पति कन्हाईलाल जी के साथ बिताई यादों को उन्होंने दर्शकों के साथ साझा किया. उसी शाम सावित्री जी को कन्हाईलाल निर्देशित नाटक ‘पेबेट’ में देखना एक सुखद अनुभव रहा. मंच पर सावित्री हेस्नाम जी को देखना खुद पर फ़ख्र करने जैसा है और रश्क करने जैसा है कि हमारी आने वाली पीढियां याद रखेंगी कि हमने माँ सावित्री को देखा है, गुरु माँ को देखा है. पेबेट की माँ की भूमिका निभा रही माँ सावित्री मंच पर कोई वृद्धा या वरिष्ठ नायिका नहीं लगती, बल्कि चिड़िया-सी फुदकती सोलह बरस की किशोरी या युवती लगती हैं. मंच पर कोई सेट नहीं, कोई ताम-झाम नहीं, कोई साज-सज्जा नहीं सिर्फ अपनी आवाज़, अपने सुरीले कंठ से निकलती विभिन्न प्रकार की ध्वनियों, अपने अभिनय और भाव-भंगिमाओं से वह ऐसा जादू उत्पन्न करती हैं कि मंच पर कोई और कलाकार दर्शकों को दिखता ही नहीं. दर्शक ठगे-से, मंत्रमुग्ध से सिर्फ़ उन्हीं को निहारते रह जाते हैं. एक और बात जो उनके कुशल अभिनेत्री होने का परिचायक है कि अपने रंग सहयात्री और जीवनसाथी कन्हाईलाल जी को खोने की वेदना से भरी होने के बावजूद उन्होंने अपने अभिनय पर अपनी वेदना, अपनी पीड़ा को भारी नहीं पड़ने दिया है. मंच पर उनका अभिनय ही उनकी वेदना पर भारी पड़ता है जबकि कल दिन में ही हुए अलायड इवेंट के ‘लिविंग लीजेंड’ कार्यक्रम के दौरान एक घंटे तो उन्होंने शोधार्थियों, रंगमंच के अध्येताओं और दर्शकों से अपनी भावनाओं पर काबू करते हुए बड़ी ही कुशलता से बातचीत की, लोगों से अपनी रंग और अभिनय यात्रा के महत्वपूर्ण अनुभवों को साझा किया, लेकिन अंत तक आते-आते उनकी आँखें कन्हाईलाल जी को याद करते हुए बरबस छलक पड़ी थीं.

पेबेट वह पहला नाटक है, जिसमें कन्हाईलाल ने रंगमंच से सम्बंधित अपनी विचारधारा और आदर्शों को शिल्प और कथ्य के माध्यम से प्रकट किया. यह रंगमंच की एक वैकल्पिक शैली के माध्यम से बंधी-बंधाई रंग-परंपरा में हस्तक्षेप था जो जनता से जुड़ने में सफल रहा.

पेबेट एक ‘फुंगा वारि’ है, जो मणिपुर की एक परंपरागत कथा-शैली है जिसमें बड़े-बूढ़े आग के पास बैठकर बच्चों को कहानी सुनाते हैं. कन्हाईलाल ने इस कहानी को आज की राजनीतिक और सांस्कृतिक स्थिति को रेखांकित करने और परिचित के व्यतिक्रमण से रंगमंच में चेतना प्रवाहित करने के लिए प्रयोग किया है.
पेबेट एक छोटी चिड़िया है, जिसे बहुत समय से देखा नहीं गया है. शायद उसकी प्रजाति ख़त्म हो गई है. अपने बच्चे की हिफाज़त करते हुए माँ पेबेट शिकारी बिल्ली की चापलूसी करके उसका ध्यान बंटाने की कोशिश करती है. वह तब तक उसके मन के मुताबिक़ बातें करती रहती है जबतक कि उसके बच्चे अपनी रक्षा करने में सक्षम न हो जाएँ. जैसे ही वे बड़े होते हैं, चिड़िया बिल्ली का विरोध करती है और बिल्ली उसके सबसे छोटे चूज़े को पकड़ लेती है लेकिन चिड़िया चालाकी से बिल्ली से अपने बच्चे को छुडा लेती है. सभी पेबेट चिड़ियाँ आख़िरकार संगठित होती है और बिल्ली उनके जीवन से हमेशा के लिए चली जाती है.

सावित्री हेस्नाम और अन्य 

इस पूरे नाटक में पेबेट चिड़ियाओं की माँ बनी सावित्री हेस्नाम, मक्कार साधु बने अभिनेता एच. तोम्बा और पेबेट के बच्चे बने अभिनेताओं जी. गोकेन, पी. त्योसन, धनञ्जय राभा, एस. बेम्बेम और एच. लोहीना,  सबने शानदार अभिनय किया है. माँ सावित्री ने तो कमाल का अभिनय किया है. वे सचमुच चिड़िया ही लग रही हैं. उनकी वे मुद्राएँ अद्भुत हैं जब वे अपने सबसे छोटे बच्चे को उड़ना और दाना चुगना सिखा रही हैं, जब वे बिल्ली से अपने बच्चों की हिफाज़त कर रही हैं, अपने पंख फैलाकर. अपने हाथ से वे पंखों का जो दृश्य उत्पन्न करती हैं वह क़ाबिल-ए-तारीफ़ है. अपने बच्चों को लेकर, उनकी हिफाज़त को लेकर उनके चेहरे पर और उनकी आँखों में जो चिंता के भाव हैं वे लाजवाब हैं. ऐसा महसूस ही नहीं होता कि हम मनुष्यों को अभिनय करते देख रहे हैं. महसूस होता है कि मंच पर हम चिड़ियों को देख रहे हैं, किसी मक्कार बिल्ली को देख रहे हैं.
यह नाटक स्वर्गीय एच. कन्हाईलाल जी की स्मृति को समर्पित था. इस नाटक के माध्यम से पूरे रंग जगत ने एच.कन्हाईलाल को श्रद्धांजलि दी है.

‘अ स्ट्रेंजर गेस्ट'

दूसरे दिन की ही एक और महत्वपूर्ण प्रस्तुति थी युवा निर्देशक अनुरूपा रॉय की कठपुतली प्रस्तुति ‘महाभारत’. अनुरूपा बेहद प्रतिभाशाली कलाकार हैं और अभी हाल ही में हुए जश्ने बचपन में अपनी कठपुतली प्रस्तुति डायनासोर से धूम मचा चुकी हैं. महाभारत की कहानी सब जानते हैं पर अनुरूपा का कमाल यह है कि उन्होंने इसे बिलकुल समकालीन बनाकर दर्शकों के समक्ष पेश किया है. कठपुतलियों, मुखौटों, छाया-पुतलियों और अन्य सामग्रियों के साथ यह प्रस्तुति महाभारत को एक गतिशील वृत्तांत के रूप में देखती है जो तोगालु गोम्बेयट्टा के सिल्लाकेयाटा महाभारत के हजारों वर्षों के गायन के दौरान विकसित हुआ और समकालीन पुतुलकारों की नई खोजों में भी प्रासंगिक है. आज के स्वीकृत संघर्ष कालित युग में इस कहानी की प्रासंगिकता तो निःसंदेह है ही, इस तरह इसके पात्र भी हर संघर्ष में प्रतीक की हैसियत पा चुके हैं फिर चाहे वह संघर्ष विश्व की राजनीति में हो, समुदाय में हो या फिर परिवार के स्तर पर, और इसका वृत्तांत राजनीतिक, सांस्थानिक और सामाजिक स्थितियों के लिए एक बड़ा रूपक बन गया है लेकिन  अनुरूपा इस नाटक के माध्यम से केंद्रीय प्रश्न यह उठाती हैं कि क्या कुछ ऐसा हो सकता था कि महाभारत का युद्ध न हुआ होता ? वह कौन सा चुनाव था जो कोई पात्र किसी और ढंग से भी कर सकता था ? वह कौन सी भूमिका थी, जिसे किसी और द्वारा किसी और ढंग से निभाया जा सकता था ?  और हम खुद अपने किस चुनाव और किस भूमिका को बदल सकते हैं ? किन स्थापित धारणाओं और मान्यताओं पर प्रश्न करके हम भविष्य में ऐसे किसी युद्ध से बचे रह सकते हैं और क्या हम यहाँ से यह मानते हुए एक नई शुरुआत कर सकते हैं कि इस तरह के युद्ध में कोई नहीं बचता, इसलिए हमें इससे बचना चाहिए, कोशिश करना चाहिए कि इसकी पुनरावृत्ति न हो.

उन्नीसवें भारत रंग महोत्सव का उद्धाटन

इसी दिन की आख़िरी प्रस्तुति पहली विदेशी प्रस्तुति थी ‘अ स्ट्रेंजर गेस्ट’ जिसका निर्देशन किया था, इज़रायल की युवा निर्देशक वेरा बर्ज़ाक श्नाइडर ने. यह नाटक मॉरिस मैतरलिंक के नाटक ‘दि इंट्रयुडर’ से प्रेरित एक दृश्यात्मक प्रस्तुति है. यह कहानी है एक ऐसे परिवार के घर की एक शाम की जिसमें एक माँ बीमार पड़ी है और उसकी दो बेटियाँ अपने पिता के साथ चिंतामग्न हैं. डॉक्टर यह कह कर जाता है कि उसकी स्थिति अब बेहतर हो रही है फिर भी घर का वातावरण कुछ और ही संकेत करता दिखाई देता है, पूरे घर में मृत्यु के संकेत दृष्टिगोचर हो रहे हैं, घर मृत्युगंध से भर जाता है, पिता और दोनो पुत्रियों को मृत्यु की पदचाप सुनाई देती है और वहां उस माँ के और उस पूरे परिवार के भाग्य से सम्बंधित एक रहस्य का भाव भी मौजूद है. परिवार के सदस्य मौसी के आने की प्रतीक्षा कर रहे हैं. इस विशेष शाम को कुछ विचित्र और असामान्य-सा घट रहा है. हर चरित्र अलग-अलग तरीके से इसका अनुभव लेता है और शाम के दौरान एक भिन्न बिंदु पर कोई व्यक्ति या कोई चीज़ घर की ओर आ रही है और इसके पास आने का एहसास और उसकी अदृश्य उपस्थिति उनलोगों को उत्तरोत्तर बेचैनी का आभास करा रही है. दरअसल यह नाटक एक दुखप्रद सामान्य स्थिति और हमसे अभिन्नता से जुड़े व्यक्ति की बीमारी के बारे में है. नाटक परिवार के सदस्यों के भीतरी संसार में झांकता है. भावनात्मक स्थिति और अंतर्द्वंद्व जिनसे वे गुज़र रहे हैं और साथ ही साथ उनके मध्य के सम्बन्ध खोने के उस भय से हर कोई किस तरह जूझता है...कौन हठपूर्वक आशाओं से चिपका पड़ा है और कौन अधिक यथार्थवादी है, कौन-सी स्मृतियाँ उनके मस्तिष्कों में  रही हैं. मुद्राओं, गतियों, प्रकाश, ध्वनि और साथ ही साथ पाठ के माध्यम से निर्देशक ने इन भावनाओं और तीन अलग-अलग व्यक्तियों के माध्यमों से तीन प्रकार के मनोविश्लेषणों को समझने और व्याख्यायित करने का एक ईमानदार और प्रामाणिक प्रयास अभिनेताओं और निर्देशक ने किया है. इस नाटक का सेट से लेकर साइलेंस तक शानदार था. एक ऐसी चुप्पी तारी थी प्रस्तुति के दौरान कि नाटक ख़त्म होने तक पूरी दर्शक दीर्घा में मौत की सी मनहूसियत और मातमी सन्नाटा छा गया था, यहाँ तक कि दर्शक स्तब्ध थे और मृत्युगंध और उस अदृश्य उपस्थिति को महसूस करते हुए मृत्युबोध से भर गए थे और यह एहसास इतना हावी था कि नाटक ख़त्म होने पर दर्शक ताली बजाना तक भूल गए थे. मंच पर अमिचई पार्दो, शाकेद सबग और हदस वीसमैन ने शानदार अभिनय किया. अलेक्सांद्र  एल्हारर के प्रकाश-परिकल्पना और अलेक्सांद्र नोहाम के प्रकाश संचालन ने इस सायकोलोजिकल हॉरर को सस्पेंस से भर दिया था. और ध्वनि अभिकल्पना देखिये ज़रा कि रसोई के नल से पानी की एक बूँद के निरंतर टपकने से इस सस्पेंस में एक अजीब सा हॉरर भर दिया था ध्वनि अभिकल्पक ओसिफ़ उन्गेर ने.
   
सावित्री हेस्नाम की प्रस्तुति
     
महोत्सव के तीसरे दिन मास्टर क्लास ने नाट्यप्रेमी रूबरू हुए मशहूर ओडिसी नृत्यांगना माधवी मुद्गल और वेरा बरज़ाक श्नाइडर से जिसमें वेरा ने अपने नाटकों पर दर्शकों की प्रतिक्रियाओं और सवालों का संतोषजनक उत्तर देने की कोशिश के साथ-साथ इज़रायल और अंतर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में थिएटर और निर्देशन को देखने की कोशिश की. माधवी मुद्गल ने ओडिसी नृत्य में नाट्य तत्वों की उपस्थिति पर बातचीत की और नाटक को नृत्य से जोड़कर देखने और काम करने की कोशिश पर बल दिया.

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दलित स्त्रीवाद मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

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