संतोष अर्श की कविताएं : स्त्री

संतोष अर्श
शोधार्थी गुजरात केंद्रीय विश्वविद्याल संपर्क- poetarshbbk@gmail.com

निवेदन

तुम मुझमें उतनी ही हो
जितना मैं ख़ुद में हूँ
न रत्ती भर कम
न रत्ती भर ज़्यादा.
इसीलिए नाभिनाल काटने की छूरी से
मैंने इस पृथ्वी को काटा दो फाँकों में
बराबर, बराबर !
न रत्ती भर कम
न रत्ती भर ज़्यादा.

स्त्री- 1

उसे देखने की शुरुआत वहाँ से हुई
जब वह चूते छप्पर के नीचे
गीले ईंधन से रोटियाँ पकाने की ज़िद कर रही थी.
उसकी गोद में बच्चा था
जो न जाने किस ज़िद में चिल्लाता था
रोता नहीं था अपनी माँ को चिढ़ाता था.
वह उसे चुप कराने की ज़िद में थी
और खाँस-खाँस कर
फुँकनी से चूल्हे में फूँक कर
गीले कंडो को जलाने की भी !
वह ज़िद्दी थी.
कारखाने से लौटा उसका भूखा मरद
गुस्से में अलुमिनियम की पतीली को
नंगे पाँव कुचल-कुचल कर
चपटा किए दे रहा था.
वह भुनभुना रही थी खीझ में
गोद का बच्चा सूखा स्तन चबाकर प्रसन्न था
नरदहे का मेढक उसे
उभरी हुई आँखों से घूर रहा था
वह मेढक की पीठ की पीली लकीर को.
उसे देखने की शुरुआत वहाँ से हुई
जब मैं उभरी आँखों वाला
नरदहे का मेढक था.        

स्त्री- 2

वह कभी-कभी सल्फ़ास
या ऐसा ही कोई आसानी से मिल जाने वाला
ज़हर खा या पी लेती
वह नहीं जानती थी कि ज़हर कैसे बनता है.
फाँसी लगा लेती
दिल की फाँस निकालने के लिए
या कुएँ में कूद जाती
थोड़ी सी गहराई की तलाश में.
 गाँव के पास नदी होती
तो उसमें बह जाती
वह नदी बनना चाहती थी.
रेलवे लाइन होती तो रेल के नीचे कटती
उस रेल में उसका कोई परिचित सवार नहीं होता
बस जनरल बोगी में उसके जैसी ही कुछ स्त्रियाँ होतीं.
नहर में बहती तो उसकी लाश
कई दिन बाद रेगुलेटर में फँसी मिलती
मृत्यु और कलंक से भीगे हुए आँचल के साथ.
कभी-कभी ही उसकी लाश का पोस्टमार्टम होता
लेकिन उसकी मृत्यु का सही कारण नहीं पता चलता.
वह विवाहित होती तो जला दी जाती
कुंवारी होती तो दफना दी जाती.
लेकिन वह मरती नहीं थी !
कभी मुँह से झाग उगलती
कभी फंदा गले में डालकर झूलती
कभी कुएँ के जगत पर बैठी
कभी नदी-नहर के किनारे खड़ी
कभी रेल की पटरी पर सिर झुकाए बैठी
देखी जाती रही.    

स्त्री- 3

कारखाने की कॉलोनी के घरों में
कभी-कभी उसे जला दिया जाता
न जाने ज़िंदा या मुर्दा.
यहाँ वह खाते-पीते इज़्ज़तदार
घर की नवब्याहता होती थी.
उसे जलाने में अच्छा-ख़ासा
जीवाश्म ईंधन प्रयोग होता
सास, ननद, देवर जुटते
पति और ससुर देखते रहते.
उसे भली-भाँति जलाकर
कोयला बना दिया जाता.
जली हुई स्त्री-देह की भी एक मुद्रा होती !
कोयले की कलाई में जली हुई चूड़ियाँ
कोयले की उँगलियों में जली हुई अंगूठियाँ
कोयले के पाँवों की
कोयले की उँगलियों में, जले हुए बिछुए
जली हुई पायलें !
और जैसे हाथ जलते समय उठा ही रह गया
रोकने के भाव से, मत मारो !
उसकी जली हुई देह का पंचनामा
पुलिस का सिपाही पिये बगैर नहीं कर पाता.
उसकी जली हुई देह
वर्षों चर्चा का विषय रहती
जबकि उसका पति जेल से निकल कर
इधर-उधर सिगरेट सुलगाते हुए दिख जाता.

स्त्री- 4

ख़ुद जल कर मर गई
या जला कर मार दी गई
विवाहित औरतों को बराबर जलाया जाता रहा.
यह कह कर कि औरतें बहुत जलनशील होती हैं
बताया जाता रहा
कि जवान औरत की चिता की राख के सिरहाने
चप्पल उतार कर खड़े हो जाओ
तो वह राख झाड़ कर उठ खड़ी होती है
और नाचने लगती है.
बताया जाता रहा कि
चुड़ैल, प्रेत से अधिक डरावनी होती
और डायन कच्चा चबा जाती है.
कुएँ, नदी, तालाब में डूब गईं
रेल के नीचे कट गईं
पहनी हुई साड़ी से ही
फाँसी लगाकर झूल गई औरतों को
चुड़ैल बनाकर जिंदा रखा गया.
मरने के बाद भी उनकी पायलों
की छम-छम सुनी जाती रही
जलाने से पहले
जिनकी धड़कन तक नहीं सुनी गयी.

मादा प्रलाप

औरतें मुझे पुकारती रहीं
कुहरे में रेल की सीटी की तरह.
औरतें मुझे पुकारती रहीं
जैसे सावित्री बाई फुले को
स्कूल पुकारता था
जैसे फूलन देवी मल्लाह को
चंबल के बीहड़ों ने पुकारा था
जैसे गौरा देवी को पेड़ पुकारते थे.
औरतें मेरी प्रतीक्षा में थी
जैसी अकेली घसियारिन रास्ता देखती है
कि कोई आए और गठरी उठवा कर
उसके सिर पर रखवा दे
जैसे दर्दमंद भोर की प्रतीक्षा में होते हैं
औरतें मेरी प्रतीक्षा में थीं.
मैं आती जाती औरतों को देखता रहा
ठूँठ सा गड़ा रहा, खड़ा रहा
अब चाहता हूँ
कि मैं स्कूल बन जाऊँ
चंबल का बीहड़
या पेड़ बन जाऊँ कि घास.

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