बिना इजाज़त अन्दर आना मना है

अर्चना वर्मा
 प्रसिद्ध कथाकार और स्त्रीवादी विचारक हैं. संपर्क: mamushu46@gmail.com 
वर्जीनिया वुल्फ की किताब  ‘ A Room of One's Own’ का प्रकाशन 1929 में हुआ था, उसका केन्द्रीय स्वर है कि एक स्त्री का अपने लेखन के लिए अपना कमरा होना चाहिए, अपने निजी को सुरक्षित रखने के लिए भी अपना कमरा, इसके लिए उसकी आर्थिक स्वतंत्रता जरूरी है. 

आयताकार. तीन दीवारो पर किताबों के शेल्फ़. चौथी दीवार में एक खिड़की और दीवार के सहारे एक दीवान. खिड़की के बाहर कोहरा, घना, सफ़ेद, ठोस, अपारदर्शी अपारदर्शी. खिड़की पर शीशा न होता तो जंगले का लिहाज़ किये बिना कमरे मेँ घुसा चला आ रहा होता. इससे ज़्यादा तो घने अंधेरे में भी सूझ जाता है. कम से कम आभास तो होता है, कोने में ज़्यादा घने होते अँधेरे से किसी परछाईं का, किसी और वजूद का. सफ़ेद मुझे इतना प्रिय होने के बावजूद पता नहीं क्यों इस वक्त ऐसा लग रहा है कि सफ़ेद को नाहक महिमा-मण्डित किया जाता है. भोला, पवित्र, निष्पाप वगैरह. लेकिन अन्धकार भी होता है वह. सफ़ेद होने के बावजूद. बीच दिसम्बर की एक सुन्न शाम. इस एक इकलौती, कोहरे से ढकी खिड़की वाले सन्नाटे कमरे मेँ लगता है इस क्षण जैसे कुल इतनी ही दुनिया है, इसके बाहर सारे ब्रह्माण्ड में कहीँ कुछ और है ही नहीं, कोई जीव-जन्तु – चरिन्दा, परिन्दा या दरिन्दा – कोई बस्ती, कोई आवाज़ कहीं कुछ भी नहीं.खिड़की से लौट कर मैँ कमरे में देखती हूँ.

यह सृजन का एकान्त है. कमरे, दीवार और खिड़की में उसका बिम्ब मैं रचती हूँ लेकिन दीवारों में वह समाता नहीं है, वह मेरे अस्तित्व के भीतर कहीं पैठता, मेरे दिमाग के रगो-रेशे में भिनता, मेरे साथ साथ होता है, हर कहीं. और अक्सर तो जहाँ मैं नहीं होती हूँ वहाँ भी –

" बार बार लौट आने के लिये / यही एक द्वार / मेरी प्रतीक्षा में रहता है/
परिचित हर कील, हर निशान, हर दीवार / चक्करदार सीढ़ियाँ और कोनों में / गाढा होता हुअ अन्धकार
यहाँ नहीं है उधार की रोशनी और माँगा हुआ संगीत.
खिड़की पर एक परदा है रेशमी / हवा से हिल जाता है / सबकुछ उसके बाहर है – /कोई आहट, कोई आघात, कोई आसमान / बिना इजाज़त अन्दर आना मना है.
उस पार दुनिया बहुत छोटी रह जाती है / यहाँ सिर्फ़ अपने झुलसने का प्रकाश है / बीमार ज़मीन और बौना आसमान / ढो नहीं पाते उसका ताप / कृपा करुणा दान – मुझे कुछ भी नहीं स्वीकार / चाहे उसे प्यार कहो या बन्धुता /अन्दर आने की इजाज़त नहीं है.
सिर्फ़ एक परदा है, रेशमी / हवा उसे हिला सकती है / और मैं यह फ़ासला तय करने से /इंकार कर देती हूँ.
बार बार लौटकर आने के लिये वही द्वार / कभी रक्षा के लिये गढ़ है, कभी कारागार."

आज मेरे पास यह कमरा है. सचमुच का मेरा अपना कमरा. अपना साम्राज्य. यहाँ किसी का कोई दखल, कोई घुसपैठ, कोई हस्तक्षेप नहीं. कहीं कोई ऐसा आभास तक नहीं. स्वच्छन्दता का यह शब्दातीत अनुभव, स्वयं अपना मोल ; अनमोल. मेरे सृजन का एकान्त. नहीं,यह संसार से विमुखता का पर्याय नहीं है, सामाजिकता से त्रुटित एकान्त नहीं है, किसी दूसरे वजूद की असहनीयता नहीं है. लेकिन इस क्षण यह, बस, ऐसा ही है. सुन्न, निश्चील, शब्दातीत. अचेतन की तलहटी को मथ कर उठती हलचल से फूटते शब्दों और उनकी बुनावट के तन्तुओं के जाल के फैलने की प्रतीक्षा का मौन एकान्त. यह कोई हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं करता.

मजीद भाई की ज़िद है कि मुझसे मेरे कमरे के बारे में लिखवाये बिना अपनी किताब को छपायेंगे ही नहीं और मैँ हूँ कि अब तो कई बरस हुए, टालती ही जा रही हूँ. नहीं, मुझे न लिखने की कोई ज़िद नहीं. बस ठीक ठीक पकड़ नहीं पा रही हूँ कि मेरे इस कमरे के बारे में ऐसा क्या है जो लिखने लायक हो. क्या लिखा जा सकता है कमरे के बारे में? मजीद भाई के स्तम्भ मेँ शामिल सभी भागीदार चूँकि लेखक हैँ इसलिये नतीजा निकाला जा सकता है कि मेरे कमरे का मतलब लिखने का कमरा है. लेकिन ऐसा मैने अब तक लिखा ही क्या है; और जो कुछ भी लिखा है वह इतना थोड़ा और कभी कभार; कि बावजूद लिखने की मेज़ और किताबों की अलमारियों के, मैँ खुद को लेखक और अपने बैठने की इस जगह को खींच-तान कर भी लेखक के कमरे की तरह परिभाषित करना एक तरह की ज़्यादती या मज़ाक ही पा रही हूँ.

तो समझिये कि यह कुल मिलाकर एक स्त्री का कमरा है जिसे पढ़ने, सोचने, समझने और कभी कभार कुछ लिख लेने का भी मुगालता है. और यही फ़िलहाल इस कमरे की आबादी और उसके संसार को निश्चि त, निर्धारित और परिभाषित करने वाला तथ्य है. इस आबादी का कुछ प्रतिशत पुरुषों का भी है लेकिन फ़िलहाल बात एक स्त्री की, और उसके कमरे की है. यह स्त्री कभी कभार की लेखिका और यह कमरा उसके लिखने की जगह है इसलिये फ़ोकस फ़िलहाल स्त्री पर ही है. इस स्त्री ने तकरीबन पचास साल पहले एक किताब पढ़ी थी, जो पचासी साल पहले लिखी गयी थी – 'ए रूम ऑफ़ वन्स ओन'. वह साहित्य-जगत का, खास तौर से स्त्री-साहित्य-जगत का मौलिक 'मेरा कमरा' था.


हमको भले लगता हो, एक खास उम्र में तो ज़रूर, कि मानो हम ही पहले-पहल नमूदार हुए हैँ इस अहसास से गुजरने वाले. जैसे नया शिशु देखता है नयी नकोर आँखों से, पहली बारिश. पेड़ में फूटने वाली हर नयी कोंपल को लगता है, धरती पर यह पहला वसन्त है. फिर बीतते हुए बरसों में धीरे धीरे पहचाना जाता हैँ, "हमसे पहले भी बर्दाश्तस की हद थी". सन 1929 में छपी इस किताब मेँ वर्जीनिया वुल्फ़ ने तय पाया था कि लेखिका बनने की इच्छुक हर स्त्री के लिये ज़रूरी है कि उसके पास अपना पैसा और अपना एक कमरा हो. आमदनी का अपना एक जरिया और बिल्कुल अपनी एक जगह. यह आज़ादी की नींव है. आत्मनिर्भरता जिससे स्त्री वंचित थी. वह पहले विश्व.युद्ध के बाद का संसार था. जब वर्जीनिया वुल्फ़ ने सवाल पूछा था कि इंगलैण्ड में सर्जनात्मकता के चरम शिखर - एलिज़ाबेथ के शासन काल- में सारे के सारे एक से बढ़ कर एक रचनाकार केवल पुरुष ही क्यों हैं, कहीं भूले से भी एक स्त्री का नाम क्यों दर्ज नहीं है? और जवाब में पाया था कि औरत हमेशा वंचित और हीन रखी गयी है, अपने अस्तित्व के लिये दूसरों पर निर्भर रखी गयी है, निर्धन रखी गयी है. निर्धनता का दारुण असर दिल और दिमाग पर पड़ता है. वह सृजन की क्षमता को या तो पनपने ही नहीं देता या छीन लेता है.

आज मेरे पास यह अपना कमरा है और मैँ कोई अपवाद नहीं हूँ. मेरी पीढ़ी में मेरे जैसियों की गिनती भले कुछ कम रही हो लेकिन आज की पीढ़ी में बहुत हैं. पचासी साल बाद हालात बदले हैँ. सारी दुनिया में बदले हैँ. कहीं काफ़ी कुछ. कहीं थोड़ा बहुत. हिन्दुस्तान मेँ भी बदले हैँ.

हालाँकि यह टिप्पणी दुनिया में औरत के बदलते हालात पर तफ़सरा नहीं है लेकिन फिर भी लोभ बहुत है ये सूचनाएँ शामिल कर लेने का जिन्हें मैँ मौका मिलते ही, बल्कि अक्सर तो मौका निकाल कर भी अपने आलेखों में घसीट लाती हूँ. कि आज भी पूरी दुनिया मैँ नितान्त निर्धनता मेँ रहने वाले लोगों की संख्या कुल मिलाकर 1.3 बिलियन है. इनमेँ 70% स्त्रियों का है. यही नहीं, पूरी दुनिया में जो 774 मिलियन वयस्क पढ़ लिख नहीं सकते उनका दो तिहाई औरतों का है. विकासशील दुनिया और तीसरी दुनिया मेँ इज्ज़त के लिये औरत की हत्या आज भी एक सम्मानित प्रथा है. आज भी कानून के बावजूद स्त्री प्रायः शिक्षा और स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार से वंचित रखी जाती है. भारत मेँ किशोर वय की लड़कियों को "अस्थायी जन" कहा गया है जो एक बार ब्याह दिये जाने के बाद कम से कम अपने पिता के लिये अपना अस्तित्व खो बैठेंगी ("Temporary people who would cease to exist at least by their fathers once they are married”) क्योंकि यहाँ लड़की के विवाह का अर्थ अब भी बड़े पैमाने पर अपने मातृकुल की सदस्यता से वंचित और अस्तित्वहीन हो जाना है. घरेलू हिंसा तथा अपनी स्वतंत्रता पर अन्य सांस्कृतिक और और नैतिक प्रतिबन्ध स्वयं स्त्रियों को भी स्वीकृत हैं – कहीं स्वेच्छा से, कहीं मज़बूरी से.

ये सभी सूचनाएँ यहाँ CARE (Cooperative for Assistance and Relief Everywhere) नामक अन्तर्राष्ट्रीय संस्था की प्रोजेक्ट रिपोर्टों ( 2008–13) से संकलित की गयी हैँ.

इन सूचनाओं को संकलित करने के लिये ललचाते और इन्हें इस आलेख में शामिल करते हुए मुझे अहसास था कि यह टिप्पणी दुनिया की या हिन्दुस्तान की औरतों के हालात पर नहीं, मेरे कमरे बारे में है लेकिन इन्हें यहाँ दर्ज कर चुकने के बाद मैं महसूस कर रही हूँ कि यह विषयान्तर नहीं. कि मेरा कमरा वहाँ तक फैला है जहाँ मैँ खुद मौजूद रहती हूँ और वहाँ तक भी जहाँ मैँ नहीं भी रहती हूँ. इसका विस्तार सृजन के वायवीय, अतीन्द्रिय एकान्त से लेकर स्मृति के उस माँसल, ऐन्द्रिक संसार तक फैला है जो ज़्यादातर वक्त विस्मृति में बिलाया रहता है, लगभग गायब रहता हुआ भी अचेतन में मौजूद, मेरे समूचे अस्तित्व का अदृश्यह "आयतन".


पैतालीस साल के अध्यापकीय जीवन में इस कमरे के बाशिन्दों में  जो शामिल होती गयी हैं वे पता नहीं किस कोने अँतरे से उठकर गाहे-बगाहे सामने आ खड़ी होती हैं. वह जिसकी पढ़ाई हर साल छुड़ा दी जाने की आशंका की सूली पर चढ़ी रहती थी ; वह जो फ़ाइनल-इयर के इम्तहान के ऐन पहले ब्याह दी गयी थी, पहले दूसरे साल में प्रथम श्रेणी लाई थी तो क्या, अब तो किताब को हाथ लगाने भर से मारी पीटी जाती है ; वह जिसे बाज़ार से आये सामान के लिफ़ाफे या पुड़िया के अखबारी काग़ज़ से पढ़ने की ललक मिटाने के लिये सबकी नज़र बचाकर बाथरूम में या छत पर छिपना पड़ता है – उन्हें सचमुच के कमरे की तो कौन कहे, अपने भीतर के एकान्त की भी तलाश का मौका मिला ही नहीं; वह भी जो ज़िद ठान कर तरह तरह की बाधाएँ पार कर भी गयी, लेकिन एक दिन किसी पत्रिका या पुस्तक पर उसके छपे हुए नाम और तस्वीर या किसी प्रशंसक के पत्र ने उसके हिस्से में घर और दाम्पत्त्य की एक नयी कहानी शुरु कर दी. वह भी जिसके पास नौकरी भी है और आमदनी का अपना एक जरिया भी लेकिन सारी योग्यताओं और संभावनाओं के बावजूद अपना कमरा यानी अपने वजूद के लिये जगह फिर भी नहीं. वह झेलती है पति के घायल अहं के साथ टकराव या फिर तनाव की परतों में लपेटी हुई कही-अनकही अपेक्षाओं का दबाव कि दाल छौंकने और बटन लगाने जैसे ज़्यादा ज़रूरी काम सँभाले जायें और हथियार (कलम, कॉपी, किताब?) डाल देती है. उसके हिस्से की नौकरी घर की आमदनी बढ़ाने का जरिया भर है, अपनी योग्यता की अभिव्यक्ति का सामान नहीं.

मैँ यहाँ स्त्री की व्यथा-वेदना के अपरम्पार सागर की थाह लेने नहीं बैठी. मानती हूँ कि जिसका उपचार सम्भव न हो वह रोग नहीं, जीवन कहलाता है. तो अपने कमरे के इन बाशिन्दों में मैँ सिर्फ़ उन्हीं की गिनती कर रही हूँ जिनके भीतर खुद अपना एक कमरा पाने की गुंजाइश थी लेकिन पूरी होने से रह गयी, और उनकी भी जो उसे पा लेने के आस-पास तक जा पहुँचने के बावजूद इन बाधाओं को कवच बनाकर अपने आपे का आमना-सामना करने से कतराती रह गयी.

भीतर की घुटन और असन्तोष के नतीजे में  खीझ और चिड़चिड़ाहट के स्थायी नशे में खौलती उबलती इस नायिका को मैं चाहे जो सुझाव दूँ, चाहे जो उपाय बताऊँ, उसके पास हर एक का तोड़ मौजूद होगा जिसकी वजह से वैसा किया नहीं जा सकता. लेकिन असल में इन मज़बूरियों और उनकी चिड़चिड़ाहट के बिना जिया भी नहीं जा सकता क्योंकि उसी मेँ उसकी अपनी अपरीक्षित विशिष्टता का अहसास भी छिपा है. परीक्षा का खतरा वह नहीं उठाती. अभी तो उसके पास बिना लड़े ही एक संघर्ष का अहसास है, असहनीय दुख की शक्ल मेँ एक सुख (?) जिसे वह जीवन-विधि की तरह अपनाती है. उनकी भी गिनती कोई कम नहीं जो मानसिक असन्तुलन के कगार पर आखिरी हद पार कर जाने से जैसे तैसे बची रह कर एक लम्बी लगातार आत्महत्या की अनवरत अवधि को जीवन की तरह जिये जाती हैँ. जो दाम्पत्त्य, मातृत्व और परिवार में 'स्वयं' को पूरा विलीन नही कर पाती, अपनी इच्छा, अपने वजूद के लिये लिये थोड़ा सा भी निजी अर्थ, निजी पहचान चाहती है उसकी कहानी के भी अन्य अनेक-आदि- इत्यादि संस्करण होंगे. वे भी मौजूद हैं इसी कमरे के किसी कोने में. एक दिन उठकर सामने आ खड़े होने और अपनी सुनाने की प्रतीक्षा में लेकिन उतना अथाह धीरज, उतनी ताकत, उतनी हिम्मत, उतनी सहानुभूति मैँ कभी जुटा पाउँगी या नहीं, कहना कठिन है. जिसने खुद ही अपने-आपे से इंकार कर दिया है उसकी पीड़ा की थाह लायक अथाह धीरज दूसरे किसीके पास कहाँ हो सकता है? लेकिन इसके बावजूद मेरे कमरे मेँ वे मौजूद हैं. क्यों?



क्योंकि इस बात पर मेरा बस नहीं कि कमरे में किसे दाखिला दूँ और किसे प्रवेश-निषेध की तख्ती दिखा दूँ, 'बिना इजाज़त अन्दर आना मना है' की घोषणा के बावजूद! इस उधेड़बुन में ज़रूर कुछ वक्त शायद व्यर्थ खर्च कर सकती हूँ कि क्या-क्या कैसे और क्यों इस कमरे में दाखिल होता और यहीं बसा रह जाता है. प्रवेश निषेध की यह तख्ती चारदीवारी वाले उस ठिकाने पर लगायी जा सकती है केवल, जो तीन तरफ़ किताबों के शेल्फ़ और एक तरफ़ खिड़की भर कोहरे और दीवान से बना है. भीतर से सिटकनी लगा ली जाये या बाहर से ताला डाल दिया जाय, भले ही गाहे-बगाहे दरवाजे का खटखटाया और भीतर के एकान्त क्रिया-कलाप का छन्द-भंग होना या उसे पूरी तरह से छिन्न-भिन्न किया जाना अपवाद की बजाय नियम की तरह ज़रूरी होता हो. एकान्त की यह चारदीवारी इसी दैनन्दिन दुनिया मेँ मौजूद है और उसकी अपनी दिनचर्या, अपनी मजबूरियाँ हैं. उधार के शब्दों में कहूँ तो "एक ढर्रा रोज़मर्रा," या "जीवन की आपाधापी," के हमले.


लेकिन इस चारदीवारी में न समाने वाला, हर जगह मेरे साथ चला आने वाला और वहाँ तक भी फैल जाने वाला यह भीतर का कमरा मेरे बावजूद मुझसे अलग एक दुनिया है, सम्प्रभु और स्वायत्त. 1929 के उस मौलिक कमरे की मालकिन वर्जीनिया वुल्फ़ ने कहा था, “ तुम चाहे दुनिया भर के पुस्तकालयों पर ताले डाल दो… “कोई किवाड़, कोई ताला, कोई सिटकनी नहीं जिसे तुम मेरे दिमाग़ की आ़ज़ादी पर लगा सको."

उस वक्त उसकी दुनिया में पुस्तकालयों पर ताले थे और उसे अपने लिये एक कमरे की तलाश थी. आज मैँ नहीं जानती यह मेरे दिमाग की आजादी है या उस आजादी के सामने खुद मेरी बेबसी. अब कहीं कोई रोक नहीं. अब पूरी दुनिया इसके भीतर है, न कोई निषेध, न कोई वर्जना. रास्ते, चौराहे, पेड़, पहाड़ पंछी, पोखर से लेकर अदब-कायदा, मर्यादा, अमर्यादा, बर्दाश्तत, नाबर्दाश्‍‍त, उन्माद, आक्रोश, ध्वंस, प्यार, सृजन, ईश्वर, मृत्यु और विस्फोट.

यह एक औरत का कमरा है जिसे पढ़ने, सोचने, समझने और कभी -कभी कुछ लिख लेने का मुगालता है.


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