मैं स्त्रीवादी नहीं ,मार्क्सवादी हूँ : श्रीलता स्वामीनाथन

बात 2004 की है. श्रीलता स्वामीनाथन को स्त्रीकाल के लिए हम श्रीराम सेंटर में इंटरव्यू कर रहे थे. एक युवक काफी देर से हमें सुन रहा था. उसने पास बैठने की अनुमति माँगी और श्रीलता जी से मुखातिब हुआ, 'आपकी आँखें बहुत खूबसूरत हैं, क्या हम तस्वीर खीच सकते हैं.' श्रीलता जी ने बड़ी सहजता से उसका स्वागत किया और हाँ कहा. आज वे नहीं रहीं. यह वाकया सहज याद आ गया. उन्हें याद करते हुए उसी बातचीत पर आधारित यह आलेख. 

संपादक


श्रीलता स्वामीनाथन “नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा”की ग्रेजुएट थीं,  तथा 1972-73 में इंग्लैंड में भी थियटर कर चुकी थीं.समृद्ध परिवार में जन्मीं श्रीलता को अपनी तमाम गतिविधियाँ बेमानी लगी,जब उन्हें लगा कि ये सारी गतिविधियाँ देश की 10 प्रतिशत जनता के लिए नहीं हैं.

तब वे 1972  में एनएसडी में स्वयं को दुबारा शिक्षित तो कर रही थीं,  परन्तु तीर तो कहीं और का लगा था, वेदना कुछ और थी.थियटर वे छोड़ भी नहीं सकती थी, उहपोह में थीं, खुद उनके शब्दों में,'थियटर तो मेरे लिए मुश्किल था, लेकिन इरादा तो बुलंद था.' तब महरौली में फ़ार्म हाउस के मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी भी नहीं मिलती थी,वहां इंदिरा गांधी का भी फार्म हॉउस था.श्रीलता ने वहां देहात मजदूर यूनियन बनाया .स्वयं बताया उन्होंने, ‘यहीं से मेरी असली शिक्षा प्रारम्भ हुई इसके पहले रईस तबके की बिगड़ी हुई बेटी थी. जिनके खिलाफ आन्दोलन किया वे सभी मेरे घर आते थे  और मुझे  पता था  कि वे जितना खर्च अपने स्कॉच पर करते हैं, उतना भी मजदूरों के उपर नहीं’.  ‘1974 के आपातकाल में मुझे  तिहाड़ जेल  में डाल दिया, परन्तु यह जेल यात्रा भी मेरे जीवन के लिए  माइल स्टोन साबित हुई.मुझे मिसा के तहत अन्दर डाला गया था’.  तिहाड़ में महिलाओं के लिए अलग से राजनीतिक सेल नहीं था,इसलिए उन्हें आम अपराधियों के साथ रहना पड़ता था.जेल में तो दो जून का खाना,कपड़ा और रहना ही उपलब्ध नहीं था, इसलिए उन्हें आम अपराधियों  के साथ रहना पड़ता था और बिडम्बना यह कि महिलाएं जेल जीवन को बेहतर जीवन मानती थीं, क्योंकि बाहर तो उनके लिए यह व्यवस्था भी नहीं थी “मुझे लगा इनके लिए कुछ करना हैं. तिहाड़ जेल में वहां के कर्मचारियों की पक्की नौकरी के लिए भी मैंने संगठन बनाया, पक्की नौकरी दिलाने की कोशिश की,”


छूटकर श्रीलता स्वामीनाथन मद्रास गई.वहां भी बंदरगाह में मजदूरों के  लिए कोई सुविधा नहीं थी.किसी का बाजू कट जाता था, तो किसी की टांग.संगठित करते हुए वहां पुलिस  ने उन्हें काफी तंग किया.इमरजेंसी के बाद राजस्थान के बांसवाडा इलाके में उन्होंने आदिवासियों के बीच काम शुरू किया.1977 से वहीं घंटाली गाँव में रहने लगी.वहां जाने के पहले श्रीलता ने मीडवाइफ़री तथा होमियोपैथी का काम सीखा और वही काम शुरू किया.’ 1998 तक वहीं रहकर होमियोपैथी के माध्यम से लकवा,अस्थमा आदि बीमारियां ठीक की. उनके अनुसार एलोपैथी का तो बड़ा उद्देश्य पैसा कमाना मात्र है,इसकी कोई फिलोसफी नहीं,सिर्फ मुनाफ़ा और मुनाफ़ा. मनुष्य से पहले मुनाफा. 1989 में मैं स्वंय बीमार पड़ी, दोनों किडनी फेल. मोरारजी भाई की सलाह से मैंने स्व-मूत्र चिकित्सा शुरू की’,थोड़ा हंसकर ‘और आज मैं आपके सामने हूँ’.

बीमारी के पहले महेंद्र चौधरी और श्रीलता स्वामीनाथन ने 1988 के अकाल में आदिवासियों के बीच काम किया-15 मांगो को लेकर: खासकर नसबंदी के विरोध में, हैंडपंप के लिए ,राहत कार्य के लिए आन्दोलन तीव्र किए,सरकार संपर्क करने पर हमेशा हां करती ,परन्तु वहीं ढाक के तीन पात. बाताया, ‘हमने और महेंद्र ने लोगों से मिलकर बांसवाडा के बीच का रास्ता रोक दिया.पुलिस आयी,मांगे मानने का आश्वासन दिया,  तथा सबको हटाकर हम दोनों को जेल में डाल दिया,. हमने जमानत नहीं ली. 15 दिनों तक भूख हड़ताल पर बैठे. 1991 में आइपवा  में शामिल हुई (आल इंडिया पीपुल्स वीमेन एसोसिएशन )और 1994 से मैं  वहां अध्यक्ष हूँ.'

श्रीलता स्वामीनाथन की सक्रियता निरंतर बनी रही है.रूपकंवर,भंवरी बाई आदि मामले में चले महिला आन्दोलन में इनकी भागीदारी रही. नर्मदा बाँध के विरोध में, ईराक युद्ध के खिलाफ,डब्ल्यूटीओ के खिलाफ,मंहगाई के खिलाफ-हर मोर्चे पर श्रीलता स्वामीनाथन की मौजूदगी रही.  उनका मानना रहा कि ‘हर मोर्चे पर महिला –पुरुष को अलग रखने की जरुरत नहीं हैं’.कम्युनिस्ट पार्टियों के विषय में उनका कहना था कि इन पार्टियों ने कम से कम पुरुषों को बदलने का प्रयास दिखा,परन्तु हैं  तो वे इसी पितृसत्तात्मक समाज से'
कई मोर्चे पर श्रीलता बेबाक राय रखती थीं  ‘बलात्कारी को फांसी की सजा मिलनी ही चाहिए.बलात्कार हत्या से कम नहीं है.बलात्कारी का लिंग काट दिया जाए तो अगला बलात्कारी नहीं मिलेगा.आज हर कोई दुखी है,चाहे वह अमीर हो या गरीब .मैं बहुत से ठकुरानी औरतों को जानती हूँ. जो काफी धनी हैं,  लेकिन उनके  अपना कुछ नहीं.हमें तो वर्गीय,जातीय और लैंगिक तीनों ही स्तरों पर लड़ने की जरुरत है. झुनझुन में आज भी (2004 में) औरतों को मैला उठाना पड़ रहा है,उनके साथ पूरा छूआ-छूत है,काम के बदले उन्हें एक रोटी मिलती है.
‘औरतों के मन में इतनी असुरक्षा है कि वे पुरुषों को मैनीपुलेट करने में लगी होती हैं ,एक दूसरे से लड़ती हैं, पितृसत्तात्मक समाज ‘बांटो और राज करो’की नीति पर चलता है. मेरा मानना है कि समाज में महिलाओं  की अपनी एजेंसी हो,मन में कोई डर नहीं हो.’



‘मैं फेमिनिस्ट नहीं हूँ, हां,जो औरतों के लिए बोलता है,वह फेमिनिस्ट तो है ही.वर्ग–भेद दूर हो तो 80 प्रतिशत महिलाओं की समस्या का समाधान हो जाएगा. इसलिए मैं स्वंय को मार्क्सवादी मानती हूँ, स्त्रीवाद आज भी शहरी,बुद्धिजीवी चीज है .इधर स्त्रीवादियों की भी समझ बनी है कि गाँव की औरतों को भी जोड़ना है,.परन्तु अभी प्रयास करना होगा, क्योंकि आज 80 प्रतिशत औरतों की वास्तविकता को स्त्रीवाद शामिल नहीं करता.

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