बहन भी तो मेट्रो ले रही होगी इस वक्त

सिद्धार्थ प्रियदर्शी
क्रिएटिव राइटर और फिल्मों और सीरियल्स में सक्रिय लेखन।संपर्क: 9718277003
शाम 6 बजे ऑफिस छूटने के बाद की भारी भीड़ में 17 मिनट के इंतज़ार के बाद आई यह पहली मेट्रो ट्रेन थी. दरवाज़े खुलने के 6 सेकेंड बाद सारी सीटें फुल और अगले ही पल खड़े होने का ठिकाना ढूंढते लोग. ठसाठस भरी मेट्रो ट्रेन, दरवाज़े के पास वाले पैसेज में बलिष्ठ देह संरचनाओं के बीच 3 कमनीय युवतियां और अचानक मेहरबां हुई अपनी किस्मत पे इतराते वह चार लड़के !
अनाउंसमेंट हुआ - "दरवाजों से हटकर खड़े हों"

अपने शरीर को दरवाज़े से बचाने के क्रम में कमनीय काया ने खुद को थोड़ा पीछे किया. इधर उसके खुले बाल पीछे खड़े एक 'भइया जी' के कन्धों पे झूल गए और किसी अनोखी 'फील' से भइया जी का रोम रोम तृप्त हो उठा. युवती कानों में इयर प्लग लगाए किसी गीत में लीन थी और भइया जी सबसे नज़रें चुराकर युवती के बालों से लेकर नितम्बों तक उसके जिस्म को आँखों से सहलाने में तल्लीन थे. कभी ये युवती की नंगी सुराहीदार गर्दन को निहारते; कभी उसके बालों की खुशबू को 3 इंच की दूरी से अपने नथुनों में भरकर घर तक ले जाने की चेष्टा करते हैं. भइया जी तीन स्टेशन बाद यह सौभाग्यशाली यात्रा समाप्त कर ट्रेन से उतर गए.

ये तीनो युवतियां बेपरवाह और बेलौस थी. मेट्रो के इस ठेलम-ठेल के बीच सफ़र को 'सफर' करना उनके रोजमर्रा की दिनचर्या में था. वृहन महानगरीय संस्कृति की परिभाषा में स्त्री- पुरुष के बीच घटते सामाजिक फ़ासले की स्वीकार्यता और बढ़ती यौन कुंठाओं की जुगुप्सा ने इन लड़कियों को नफ़ा और नुक्सान दोनों पहुचाया है.

फ़िलहाल, ट्रेन चलती जा रही है. स्टेशनों के बाईं ओर स्थित प्लेटफार्म पर ट्रेन रूकती है. लोग उतरते और चढ़ते जा रहे हैं पर दाहिने दरवाजे के इस सुरक्षित कोने में दृश्य वैसा ही है जैसा कि उपर की पंक्तियों में बताया गया है.

ख़ैर; अब दूसरी रूपसी पर नज़र डालते हैं...

दिल्ली शहर के मौसम से सर्दी उतार पर है. फिर भी सुबह शाम टी-शर्ट में घूमना दिलेरी का काम है. जिम में पसीना बहाकर बनाई गई मुग्दड़ जैसी बाँहों को काली और सफ़ेद टी शर्ट में एक्सपोज़ करते दो देसी बन्दों के निहायत ही घटिया और हर बात में एक दूसरे की 'भैंण' को समर्पित क्रियात्मक शब्दों के बीच एक लकदक अत्याधुनिका बाला ! दिल्ली एनसीआर में भैंणें ( पढ़ें--बहनें ) बड़ी सस्ती बिकती हैं; हर बात में बिकती हैं, चाहे किसी की भी हों. ट्रेन की छत से लटकते स्टैंडिंग सपोर्ट को पकड़ने के क्रम में दोनों देसी ब्वॉयज़ ने अपने कन्धों के बीच युवती को लगभग जकड़ रखा है. इधर परेशान युवती बार-बार; इधर-उधर शिफ़्ट होकर उन्हें अपने होने के एहसास दिलाने की प्रक्रिया में उन्हें अपनी छुवन का और आनंद दे रही थी. और दोनों भाई लोग कस के आनंद ले रहे हैे. देखने वालों के नज़रिये में यहाँ गलती लड़की की ही है. ट्रेन में महिला डिब्बा होने के बावजूद वह सामान्य डिब्बे में चढ़ गई है, ज़रूर यह भी लोगों के बीच दबकर मज़े लेना चाहती होगी. कपडे भी बड़े मॉडर्न टाइप हैं, मतलब यह ********.

इतने में एक देसी ब्वॉय का हाथ नीचे की ओर गया और युवती अचानक चिहुँक उठी.
" एक्सक्यूज़ मी ! विल यू प्लीज स्टैंड प्रॉपरली !"
नम्र आवाज़ में की गई इस याचना का उत्तर उतनी ही फटी आवाज़ में आता है----
"के घणीं तकलीफ़ हो राखी है मैडम. बाक्की लोग्ग भी तो खाडे हैं !"
युवती ने निराशा में सिर को हलके से हिलाया और वापस वैसे ही खड़ी हो गई. अब उस लड़के का हाथ बार बार नीचे जा रहा है. युवती अब मौन है क्योंकि उसे भी एहसास हो गया कि अगले दस या बीस मिनट तक ये ज़लालत उसे झेलनी ही है. दोनों लड़कों की आपसी फुसफुसाहट और मुखर हो उठती है------
"देक्ख, केसो सिकुड़ी सी खडी है"


"भैंण** ! लाग रहा प्रपोज़ल डे के दिन साड़े ब्वायफ़्रेंड ने इसे अपणां प्रपोजल थाम दिया.
"खें खें खें......"
" भैंण की ** ! बाहें तो देख, मखमल सी हो राखी हैं"
" भाई, मेने तो टाँगे लेग-इन के ऊपर से हौलू से सहला दी."
आसपास के चार छह लोग ये जुगुप्सा जगाने वाली फुसफुसाहट सुन रहे हैं. उनकी बातों से कुछ के चेहरों पर मुस्कराहट है तो कुछ के चेहरों पर क्षोभ के भाव हैं. ये क्षोभ वाले चेहरे देखकर संतोष हुआ कि लोगों में 'अभाव' का 'भाव' भले हो; 'भाव' का 'अभाव' नहीं हैं.

अब कहानी के तीसरे पटल को देखिये.

जब उपर के दोनों दृश्य फिल्माए जा रहे हैं, उस वक़्त सिद्धार्थ बाबू ट्रेन डिब्बे के इस दायें दरवाज़े से सट कर बनाये गए उस खाली स्थान का लुफ़्त उठा रहे है जो भीड़ में खड़े होने के लिहाज़ से सर्वोत्तम है. सबसे ऊपर जिस चौथे लड़के का जिक्र किया गया है, ये वही हैं. हाँ, इनके साथ किस्मत पे इतराने वाली बात ज़रा सूट नहीं करती क्योंकि ये ऐसे पेशे से तआल्लुक़ रखते हैं जहाँ लड़के और लड़कियों के बीच का अनुपात 1 : 24 का है. एक नवयौवना इनसे सटकर खड़ी है. सिद्धार्थ बाबू ने शालीनता से उसको अधिकतम संभव स्थान दे रखा है. पर भीड़ के धक्के और लोगों के जिस्म का दबाव अब उनके पैरों को अस्थिर कर रहा है. अपने आईपैड को सँभालते औए कानों से हैडफ़ोन उतारते उनका पैर यौवना के जूतों पर पड़ जाता है. उधर से एक सिसकारी निकली और इधर सिद्धार्थ बाबू के मुँह बड्डड्डा वाला सॉरी. दोनों ने एक दूसरे की मज़बूरी समझी, आखों में मुस्कुराये और वापस पहले जैसी मुद्रा में खड़े हो गए. इस बार सटकर खड़े होने में भी दोनों तरफ निश्चिन्तता के भाव हैं. उसके बाएं हाथ के करीने से कटे नाख़ून और उस पर मैजेंटा कलर का नेलपेंट सिद्धार्थ बाबू को बहुत मोहक लगा.
एक उद्घोषणा होती है-----

"यह राजीव चौक स्टेशन है, दरवाज़े बाईं तरफ खुलेंगे"
अब सबको उतरने की जल्दी है. वो तीन युवतियां और सिद्धार्थ बाबू समेत दोनों देसी ब्वॉयज़ उतरने के लिए दाहिने दरवाज़े से बाएं दरवाज़े की तरफ आते हैं. सिद्धार्थ बाबू उस तीसरी युवती को सुगम निकास देने के लिए उसके आगे आ जाते हैं और भीड़ के बीच रास्ता बनाते हुए उतरते हैं. प्लेटफार्म तक पहुँचते पहुँचते सिद्धार्थ बाबू के पीछे चल रही तीसरी युवती फुसफुसाती है------ 'रॉस्कल' ! वह चौंकते हैं और आगे जाकर पीछे देखने के लिए मुड़ते हैं. लड़की अब येलो लाइन की ट्रेन लेने अंडर ग्राउंड सीढ़ियों की तरफ जा रही है. दोनों देसी ब्वॉयज़ बेशर्मी से किसी बात पे हँस रहे हैं. वह तीनो गेट नं 7 की ओर से कनॉट प्लेस के लिए बाहर निकल रहे हैं. आगे आगे दांत निपोरते देसी डूडस और पीछे सिद्धार्थ बाबू .
"भैंण की ** के तरबूज़ पे हाथ फेर दिया भाई"


एक देसी ब्वॉय अपनी महानतम उपलब्धि की बेशर्म मुनादी कर रहा है. दूसरा उससे बड़ी बेशर्मी से गर्व करता है----
" भाई मेने तो 20 मिंट जम के मज़े किये"
अचानक सिद्धार्थ बाबू को याद आता है कि उनकी बहन इस वक़्त गुड़गाँव स्थित अपने ऑफिस से निकलकर मेट्रो ले रही होगी. एकदम वह बहुत थके से महसूस करने लगे. पैरों में जैसे जान नहीं रही. ट्रेन के अंदर के सारे दृश्य उनकी आँखों पर चलचित्र बना रहे हैं. स्टेशन के चारों तरफ उठते शोर में उन्हें सिर्फ एक ही शब्द सुनाई देता है-----
" बहन...बहन...बहन....भैण..भैन

दलित स्त्रीवाद मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

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