प्रत्यक्ष प्रमाण से आगे और सूक्ष्म संवेदना की कविताएं : अभी मैंने देखा

सुनीता गुप्ता

अंतिका प्रकाशन से प्रकाशित ‘अभी मैंने देखा’ शेफाली फ्रॉस्ट की कविताओं का संकलन है, जिसका प्रकाशन इसी वर्ष हुआ है। फिल्म तथा प्रयोगात्मक आर्ट से जुड़ी शेफाली फ्रॉस्ट की कविताएं उनके सर्जनात्मक स्पर्श से सम्पृक्त हैं। विमर्शों के मुहावरों में परिणत होने वाले समय में शेफाली फ्रॉस्ट की कविताएँ अपनी ताजगी से आह्लादित करती हैं। ये कविताएं अपने समय के साथ खड़ी होकर उसका वक्तव्य बनती हैं। स्त्री गंध से सर्वथा अछूती होना इनका एक दुर्लभ पक्ष है। ये कविताएं बृहद मानवीय दृष्टि की उपज हैं जिन्हें किसी लैंगिक विभाजन में बांटकर नहीं देखा जा सका। ऐसा नहीं है कि यहां स्त्री नहीं है, पर उसकी उपस्थिति एक सम्पूर्ण मानवीय इकाई के रूप में है।



शेफाली फ्रॉस्ट की कविताओं का संसार देखे गए दृश्यों से निर्मित है, जैसे कोई किसी गाड़ी में बैठा हो और उसके सामने से एक एक कर दृश्य गुजर रहे हों। संग्रह की पहली कविता ‘क्या’ वह द्वार है जहाँ से हम कवयित्री के रचना संसार में प्रविष्ट होते हैं। इसे संग्रह की भूमिका के तौर पर भी देखा जा सकता है। इसके पात्र चौराहे पर दृष्टि के केन्द्र में एक-एक कर आते हैं और आगे चलकर संग्रह की कड़ी बनते हैं। चैराहे की भीड़ का भी अपना एक समाजशास्त्र होता है जिसके रेखाचित्र कवयित्री ने बड़ी बारीकी से उकेरे हैं। यह दुनिया फैब इंडिया की चमकदार पोशाक पहनकर कार में बैठे लोगों से अलग है। इस दुनिया में ‘हरे कनटोप में संभाले दुधमुंह बच्चा’ को लेकर ‘चैराहे पर सिरपिटायी हुई औरत है’, ‘मलिन दुपट्टे में’ तेल भरे कटोरे के साथ शनि का दान मांगती लड़की है’, सूर्या प्राॅपर्टिज की खाली पड़ी इमारत में शहर की सर्दी में एक दूसरे को जकड़कर मरे हुए लोग हैं, मॉल में टाइल पोंछने वाला लड़का है। कॉल सेंटर की सीढ़ियों पर ऑफिस कैब से उगल दिया जाता ‘वो हरी पट्टी पर स्वेटर का आदमी’ भी है। यहां शहर की दुनिया के सबके अपने दर्द और किस्से हैं। वे जो चैराहे के दृश्य पटल पर क्रम से आते हैं उनमें से हर एक की अपनी दुनिया, अपनी उलझनें और अपनी व्यथा है- पर अपनी विडम्बनाओं के साथ अन्ततः वे मनुष्य ही हैं- अपनी-अपनी पहचान लिये। इनमें एक वह औरत है जो एक दुध-मुंहे बच्चे को गोद में लिए लाल बत्ती के पास अ्रकबकायी खड़ी है। निराला की पत्थर तोड़ती औरत की तरह अलक्षित उस स्त्री की सिटपिटाहट अपने में एक एक लम्बी कथा समेटे है। कवयित्री दृश्य से परे उसके अंतर्मन में प्रवेश करती हैं और देख पाती हैं कि उसकी आंखों ने कई-कई सपने देखें होंगे, शहर की उस लाल-बत्ती वाले चैराहे पर पहुँचने तक जाने कितने विस्थापन से गुजरी होगी वह। आगे चलकर उन्हीं दृश्यों में एक लड़का आता है जो मॉल की टाइल्स पोंछने का काम करता हैं। भले ही वह अलक्षित सा हो भीड़ के लिए पर वह भी एक लड़की को पाने का सपना आँखों में संजोये हुए है।

कविता संग्रह को यदि हम उसकी समग्रता में देखें तो उसमें एक उपन्यास का विस्तार पा सकते हैं। इसमें पात्र अपनी दुनिया के साथ आते हैं और कथानक की कड़ी बन जाते हैं। इनमें कई पात्र ऐसे हैं जो फिर फिर उपस्थित होते हैं। चौराहे पर चालीस के पार की उम्र की एक औरत आती है जो अपने अंदर बीस वर्षों का आक्रोश समेटे है। उसके साथ ही उसका पुरुष साथी है। प्रौढ़ वय का वह व्यक्ति शहरी मशीनी दिनचर्या का पर्याय बन जाता है। प्रतिदिन की मशीनी दिनचर्या उसके जीवन का रस सोख लेती है। आगे चलकर एक कविता में इन दोनों का वार्तालाप उपस्थित किया गया है। यह वार्तालाप स्त्री पुरुष संबंधों की यांत्रिकता का पर्याय बन जाती है। रिश्तों की डोर में बंधा दो व्यक्तियों का संबंध कई बार बीच में कुछ इस कदर बिखरता है कि यह अहसास ही नहीं होता कि व्यक्ति कब एक दूसरे से छिटक कर दूर जा पड़े हैं। संबंधों की इस अजनबियत को इस संग्रह में जगह जगह महसूस किया जा सकता है। इसे शहरी सभ्यता का बाई प्रोडक्ट माना जा सकता है।
यह ठीक है कि शेफाली फ्रॉस्ट का कविता संसार गुजरते या देखे गये दृश्यों से निर्मित है। यहां अनुभूति की प्रामाणिकता का सवाल उठ सकता है। निश्चय ही इन कविताओं का संसार सहानुभूति से निर्मित है। किंतु यह निःसंकोच स्वीकार किया जा सकता है कि यहाँ जो बाहरी परिवेश है वह कवयित्री की संवेदनपूर्ण अंतर्दृष्टि से नम आौर उद्भासित है। कवयित्री इन दृश्यों पर त्वरित प्रतिक्रिया देकर नहीं हट जातीं बल्कि दोनों हाथों से बाहरी सतह की पारदर्शी परत को हटाकर उनकी दुनिया और अंतर्जगत में प्रवेश करती हैं। जब वे लिखती हैं कि ‘क्या तेल लगे बालों में कंघी घुमाता आदमी/उतार सकता है धूल भरा चेहरा जो शहर की गलियों ने उसे बिना पूछे पहनाया है’ तो शहर के गर्द भरे चेहरे के साथ शहरी जीवन की यंत्रणा, नियति और विवशता साकार हो उठती है। इन अलग-अलग देखे हुए दृश्यों को मिलाकर शहर का एक मुकम्मल कोलाज बनाया जा सकता है। यह शहर  है -‘भीड़ इतनी है लेकिन/ आदमी कुल्ला करे कि तकरार/प्यार करे कि मन भर सिंदूर डाल कर/ ताकता रहे आसमान/ निगल जाता है यह शहर/ खिड़की से आंख/दरवाजे से धड़’’।

 जैसा कि कविता संग्रह के शीर्षक से अभिप्रेत है, संग्रह की कविताएं देखे गए दृश्यों को लेकर हैं पर इससे इंकार नही किया जा सकता कि ये दृश्य महज देखे हुए नहीं हैं बल्कि अज्ञेयजी के ‘आलोक छुआ अपनापन’ की तरह कवयित्री की संवेदना से उद्भासित है। ऐसा लगता है कि दृश्य की ऊपरी परतों को दोनों हाथों की अंजुरी से हटाकर कवयित्री उसमें डुबकी लेती हैं। इस अंदर की दुनिया को बिना उसमें डुबकी लगाये जाना ही नहीं जा सकता। कवयित्री के लिए ये चरित्र महज कविता का विषय नहीं रह जाते हैं अपितु वे उनकी और पात्र की अस्मिता से भी जुड़ जाते हैं जो ऊपर से अदृश्य प्रतीत होते हैं, अलक्षित रह जाते हैं हमारी निगाहों से, वस्तुतः उनकी भी अपनी एक पहचान, एक आइडेंटिटी होती है। वे भी मनुष्य होने की चेतना से समृद्ध हैं। इसके विलोम में वह दुनिया है जो अपनी चकाचौंध से हमारी निगाहों में आ तो जाती है पर उसके बनावटपन के नीचे जो कुछ है वह नितान्त खोखला है क्योंकि अपनी निजता के घेरे में आबद्ध वह मनुष्य होने की मूल शर्त - संवेदना और वह मानवीय सरोकार - से असम्पृक्त हैं। ऐसे ही लोगों पर व्यंग्य करती एक कविता है ‘जियो, तुम जियो’ -‘’ जुबान जिरह तो करती हैं तुम्हारी/लेकिन/रोक लो भिंचे हुए दातों के बीच उसे/तुम्हारे जागने का कोई संदर्भ नहीं/जियो, तुम जियो’’।

माइक लिए शेफाली 

शेफाली फ्रॉस्टके रचना संसार में वंचित भी अपनी विडम्बनाओं के साथ प्रवेश पाते हैं। यथार्थ का एक रूप यह भी है जहां एक कोई औरत ‘साध रही है बर्तन सीलबंद चैक में/चिपके हैं बंद खिड़कियों के दरवाजे उस लेई से/जो उसने कल खुद को जोड़ने के लिए बनायी थी’’। यह सर्द हवाओं से बचने का प्रयास करती और रोटी की जद्दोजहद को झेलती स्त्री के जीवन का चित्र है जो मानो एक तरफ से छुपने का प्रयास करती तो दूसरी तरफ से उघड़ जाती है। इसके साथ ही शहर की सभ्यता का शिकार होता आदिवासी समुदाय है। प्रकृति के साथ इनका सीधा रिश्ता होता है, ये प्रकृति पर निर्भर होते हैं पर विकास की दौड़ में आज उसका दोहन किया जा रहा है। अपने भोलेपन में नादान ये आदिवासी मौन-भाव से अपने ही विरूद्ध हो रही साजिश के साझीदार बन रहे हैं -‘‘ वे हव्वा और आदम की औलादें/हार चुकी हैं जो/ लकड़ियों के व्यापार में/पत्ते चबाने का हक’’। सभ्य मनुष्य की न बुझने वाली पिपासा प्रकृति के सहयात्रियों को निवाला बना रही है - ‘‘वो देखो कुछ औलादें तुम्हारी/उतर रही हैं हवाई जहाज से दिक्कुओं के साथ/ सहेज रही है बाक्साइट की खादानें और तुम्हारा मौन।’’

बिरसा और मुण्डाओं के दर्द समेटती कवयित्री सभ्यता की सीमाओं को लांघती हुइ बिरसा के पास पहुंचती हैं -‘‘उत्तर रही हूँ मैं/सभ्यता की पंखुडी से/ गढ़ी जा रही है जंगलों में चलकाड़ के/ तुम्हारा व्यथा की लता।’
शेफाली फ्रॉस्टकी कविताएं वह कटोरी हैं जिसमें वे इन वंचितों के दर्द को समेटती हैं। ‘अश्रु चुनता दिवस उसका अश्रु चुनती रात’ की तर्ज पर वे अपने आस-पास के बिखरे दर्द को समेटती हैं, बल्कि समेटती  ही नहीं, उससे एकाकार हो जाती हैं - ‘‘मैं उतना ही रोना चाहती हूं जितना कि तुम’।

शेफाली की कविताओं का एक स्तर वह है जहां वे राजनीतिक मुद्दों से जूझती हैं। यह कवयित्री का कलात्मक कौशल है कि ये राजनीतिक मुद्दे नारों की शक्ल लिए बगैर हमारी चेतना में सरसराहट बनकर प्रवेश कर जाते हैं। एक कवि के रूप आजादी उनके लिए प्राणवायु की तरह है। आजादी और मानवीयता पर पड़ी हुई कोई भी चोट कवि की चेतना को आहत करने के लिए काफी होती है। राजनीति के लोक लुभावन चेहरों के पीछे जो उसका वर्चस्ववादी चेहरा और छद्म है, कवयित्री सीधे वहीं पर उंगली रखती हैं। आजादी, मकड़ी, अभी मैंने देखा आदि संग्रह में इस प्रकार की कई एक कविताएं शामिल हैं। इसके साथ ही दंगों की राजनीति भी उनकी संवेदना की जद में हैं। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि कवयित्री की संवेदना का प्रसार व्यक्ति, समाज, पर्यावरण से लेकर राजनीति तक है। यह स्त्री कविता को लेकर गढ़े गये उस मिथ का एक तरह से प्रतिवाद है जहां स्त्री द्वारा रची गयी कविता के संबंध में मान लिया जाता है कि इसकी सीमा घर, दहलीज और स्त्री विमर्श तक ही होगी। ये कविताएं इस बात का प्रमाण हैं कि स्त्री की चेतना के प्रसार के साथ ही उनकी कविताओं की परिधि भी विस्तृत हो रही है।

शेफाली फ्रॉस्ट की कविताओं में प्रकृति अपनी स्वायत्तता से परे मानवीय विडम्बना के साथ एकाकार हो गयी है। ये कविताएं प्रकृति के कोमल और रोमांटिक चित्रण का विलोम रचती हैं। मानवीय सरोकारों को समेटे प्रकृति यहां मानवीय अनुभूतियों में ढल गयी है। यह सूर्योदय है जिसके बारे में कवयित्री लिखती हैं-‘‘उतर रहा है कानों के पास/रात भर जागी चिड़िया का बड़-बड़़/रूके कमरे में फैल रहा है कोहरा/फूला हुआ/बरस रही है परछाईं वाली धूप/छत की झिर्रियों से’’। कोहरे भरी सुबह का यह चित्र है जिसे परछाईं वाली धूप के बिम्ब में बांधा गया है। संध्या के चित्र की विलक्षणता यहां देखी जा सकती है - ‘आसमान एक लकीर है पीली/चढ़ गयी है तलुवों से/घुटने की कगार तक/बचा नहीं उजाला/खिड़कियों के पास/ जो सुलगा दे बाकी की जांघ।’’ यह प्रकृति शहर की है जो कभी खिड़की की राह से झांकती है कभी छत की झिर्रियों से और आकर परिवेश से संयुक्त हो जाती है, प्रकृति की स्वतंत्र उपस्थिति वहां होती कहां है! परिवेश में घुली हुई यह प्रकृति शहरी परिदृश्य में रंग भरती है। यह प्रकृति अधिक आत्मीय प्रतीत होती है क्योंकि इसमें शहरी परिवेश की सच्चाई शामिल है। सूर्यास्त के भव्य बिम्बों से परे यह फुटपाथ है जिसकी संध्या कुछ अलग ही है - ‘‘फुटपाथ की शाम/समेट चुकी है मैल/जितना कि दिन के नाखून में’’। फुटपाथ की इस संध्या पर आमतौर पर किसी की नजर नहीं जाती। कवयित्री के बिम्ब की परिधि अत्यंत व्यापक है। ‘नाखूनो में समेटे हुए मैल’ का बिम्ब बचपन की स्मृतियों तक जाता है।



अपनी कविताओं में शेफाली नये तरह के प्रयोग भी करती चलती हैं। ये प्रयोग उनकी कविताओं को विशिष्ट बना देते हैं, यद्यपि कई बार ये जटिल पहेली की तरह भी हो गयी हैं। दृश्य इन कविताओं की इकाई हैं। ये कविताएं ऐसी रेखाचित्र हैं जिसकी गत्यात्मक्ता परिवेश के फिल्मांकन का आभास देती है - ‘गिर रही हैं ईंटों पर वह काली रात’, ‘पसर जाता रात का दंश/काले फुटपाथ पर अधीर’, ‘गुजरती जा रही है्/ ‘गठरी पकड़े महतारी की/ सुबकती हुई बड-बड़’। ‘लफाड़िया चांद’ संकलन की एक उल्लेखनीय कविता है। वह चांद जो आसमान में प्रतिदिन उगता है और जिसकी मोहकता को बिम्बों में बांधा जाता रहा है- उसका एक रूप यह भी है।  चकत्तेदार गड्ढों से भरा पड़ा चांद सूरज से रोशनी उधार लेता है और मानो आसमान से गिरकर हर तरफ से लतियाया जाता है, कभी जल की सतह उसे दुत्कारती है, कभी कीचड़ में पड़ता है पर डूबता उतराता यह चांद फिर निकलता है ‘‘लौट लौटकर आयेगा वो/पलट पलट के निकाला जायेगा/लफाड़िया लतियाया बेआबरू चांद/वो मरेगा नहीं कल /देखना’’।

शेफाली फ्रॉस्टकी कविताओं का बिम्ब अपने टटकेपन में ध्यान आकृष्ट करता हैं। इन बिम्बों में मूर्त और अमूर्त का एकीकरण अर्थ को विशिष्ट आभा से दीप्त करता है। ‘‘मेरे गले की झिल्लियों में/ फंसाकर अपना हाथ/वही पुरानी दास्तान/हकलाती है कितनी बार’’, ‘‘एक गीत का छिलका/उतर कर सब्जियों में लगा रहा है आवाज/फफोले वाले तवे पर दरकती है रोटी’’ जैसे प्रयोगों से इसे समझा जा सकता है।   कविता की ध्वन्यात्मकता इतनी प्रखर है कि उसमें दृश्यात्मकता भी आ जुड़ती है। कहीं-कहीं इन बिम्बों में स्वप्नलोक की आकृतियों का भी आभास मिलता है। इस प्रकार की कविताएं जटिल हो उठी हैं और इनका अर्थ धीरे-धीरे पंखुड़ी दर पंखुडी खुलता है और अपने साथ अर्थ की कई परतें लेकर आते हैं। कवयित्री के सर्जनात्मक स्पर्श से ये बिम्ब अपूर्व हो उठे हैं।

शेफाली फ्रॉस्टकी कविताओं का विन्यास इतना गठा हुआ है कि उसमें से एक शब्द को भी इधर उधर करना दीवाल की ईंट खिसकाने की तरह है। निश्चय ही ये कविताएं भावनात्मक उद्गार मात्र नहीं, एक गहन रचना-प्रक्रिया की उपज हैं। किसी चित्र की तरह इसकी एक-एक रेखा, एक-एक रंग बहुत बारीकी और कलात्मक से अंकित है। अपने कलात्मक संगुफन में ये कविताएं महादेवी के शिल्प गठन का स्मरण करा देती है।
शेफाली फ्रॉस्टका भविष्य की एक संभावना शील कवयित्री के रूप में स्वागत किया जाना चाहिए।

आलोचक सुनीता गुप्ता बिहार विश्वविद्यालय मुजफ्फरपुर के एक कॉलेज में हिन्दी पढाती हैं. संपर्क : मो0 09473242999

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