डाॅ. उतिमा केशरी की कविताएं

उतिमा केशरी
प्रकाशित कृतियांः चार कविता संग्रहः ‘मुहिम के स्वर’, ‘बौर की गंध’,‘तभी तो प्रेम ईश्वर के करीब है’एवं ‘उदास है गांव’ प्रकाशित. ‘जगदीशचंद्र माथुर के नाटकों में परंपरा और प्रयोग’-नामक आलोचनात्मक पुस्तक प्रकाशित. संपर्कः9771893850

कला के अधिनायकः हुसैन

हे!
हर दिल अजीज हुसैन
हम ऋणी हैं, तुम्हारी कला-साधना के.
पीड़ा में भी आनंद उठाने का
हौसला,
तुम्हारा उत्स था.
तुम साधते रहे, अपनी कूची को
अर्जुन की तरह,
लड़ते रहे-बिलकुल अकेले,
अभिमन्यु की तरह
और
कर्ण की तरह तन्हा रहना
कभी साला नहीं तुम्हें.
भीष्म पितामह की तरह
जख्मी होकर, पी गए
दर्द के हलाहल को
शिव की तरह.
नुक्कड़ की चाय की चुस्की का आस्वाद,
भला तुम्हें छोड़, कौन ले सकता है!
समय की धारा को,
तुमने ही दिया एक नई दृष्टि.
सचमुच, तुम कला के अधिनायक हो!
विराट के, इस महा-अस्तित्व में
तुमने जिस्म छोड़ा है
पर
रूह तो,
तुम्हारा
हर कलाकार प्रेमी के पास
आज भी
प्रेरणास्रोत बन
एक विलक्षण धरोहर के रूप में है.

आठ जून दो हजार नौ

रंगमंच के,
श्लाका पुरुष
हबीब तनवीर!

छियासी वर्ष का वह योद्धा
भारत के रंगमंच की आत्मा में
उत्फुल्ल जिजीविषा से समाया हुआ.
राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय पहचान
देनेवाले
हबीब तनवीर साहेब ने
बुनियाद डाली
नाट्य की एक नई परंपरा की.
उनके सपने और संघर्ष ने
कई ऐतिहासिक प्रयोग किए,
वे जानते थे-
कैसे बनाया जाता है
मिट्टी से सोना जैसा आकर्षण
देखा था मैंने-
पटना के पुस्तक मेला में
उनकी आंखों की गहराई
और उन चमक को-
वह खनकती रोबीली आवाज
आज भी गूंज रही है
मेरे मानस में
उपलब्धियों की उंचाई पर
आसीन होते हुए भी,
एक आम आदमी की तरह
सहज और आत्मीय.

सच!
हबीब साहेब!
आप हैं हर साहित्यकार के कीमत
समर्पित और निष्ठा भाव से
नाटक करनेवाले-
जगा गए मेरे मन में भी
एक गहरा रचनात्मक सम्मान!
वैचारिक प्रतिबद्धता से लबरेज
तेजोदीप्त हबीब साहेब को-
बार-बार मेरा सलाम.

 मैना 

मैना.
पाखी लोक की परी,
रोज आती है,
मेरे आंगन
छांव-कुठांव से
दाना चुगने.
उसकी मनस्विता की छटा से
मेरा मन थिरकने लगता है
और
बुनने लगता है-
प्रीतिकर संभावना
तभी तो मैं जोहती हूं बाट,
उसकी, दमकती मुद्रा का
जब उड़ती है फुर्र से
अपना गत्वाजोन दिखाकर
तब
मैं भी रचने लगती हूं,
रस निष्पति के सारे अलंकार.


कुली

रेलगाड़ी के रूकते ही
खड़े हो जाते हैं कुली
मानो! कर रहे हों अभिवादन
यात्रियों का.

सभी कुली आजमाते हैं-
अपना-अपना भाग्य.
कोई, अपना सामान उठवाते हैं
तो कोई स्वयं ही पीठ पर लाद
चल देते हैं.

कुली दूुर तक पीछा करता है,
उन यात्री का
और हर क्षण घटाता है
अपनी मजदूरी की दर
बाबू! दस के बदले पांच दे देना
पांच न सही दो दे देना!
पर, यात्री नहीं देखते मुड़कर
एक बार भी उस कुली को.

कुली कुछ दूर आगे बढ़ता है
वह मन से हारता नहीं है,
रहता है चुनौती के साथ
पुनः अगली ट्रेन की प्रतीक्षा करते हुए.

 खंडहर और बूढ़ा आदमी!

मेरे घर के सामने
उस खंडहरनुमा मकान में
न जाने कब से
वह बूढ़ा आदमी काट रहा है-
अपना बचा-खुचा जीवन!
वह खंडहर
पुराने मंदिर की तरह
सुनसान है,
सूखे तालाब की तरह
उदास है.
निस्सिम रात्रि में
कुत्ते की भौंकने की तरह
मनहूस दिखता है.
कहती है दादी-
उनका दोनों बेटा
परदेश  में जा बसा है,
बेटी, अपनी ससुराल में.

बूढ़ी के अनंत यात्रा पर
जाने के बाद
हो गया है-
बिलकुल अकेला.
वह प्राणी, अब हो गया है-
संदर्भहीन भी.
अपनी पकी दाढ़ी, मूछों
और
जटिल केश -राशि से आच्छादित
जब चलता है-तीन टांगों पर,
तब, उनकी झुकी गर्दन,
बना डालती है-समकोण
अपनी देहयष्ठि पर.
तब मैं फर्क नहीं कर पाती
खंडहर और उनमें.
एक बिना सांस का
एक दूसरा, सांस से जीता है.
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