रूपा सिंह की कविताएँ

रूपा सिंह
एसोसिएट प्रोफ़ेसर, अलवर, राजस्थान ' संपर्क : rupasinghanhadpreet@gmail.com.
1.

सबसे खतरनाक समय शुरू हो रहा है
जब मैं कर लूंगी खुलेआम प्यार।
निकल पडूँगी  अर्धरात्रि दरवाजे से
नदियों में औंटती, भीगती, अघाती
लौट आउंगी अदृश्य  दरवाजे से
घनघोर भीतर।
अब तक देखे थे जितने सपने
सबको बुहार कर करूंगी बाहर।
सीझने दूंगी चूल्हे पर सारे तकाजों को
पकड़ से छूट गये पलों को
सजा लूंगी नई हांडी मैं
और कह दूंगी अपनी
कौंधती इंद्रियों से
रहें वे हमेशा  तैयार मासूम आहटों के लिये।
आज दिग्विजय पर निकली हूं मैं
स्त्रीत्व के सारे हथियार साथ लिये
सबसे खतरनाक समय शुरू हो रहा है
जब  करने लगी हूं मैं खुद से ही प्यार।

2

तुम्हें मैं नहीं जानती-ऐसा नहीं।
खूब पहचानती हूं तुम्हे।
तुम्हारे सांसों की गमक, होंठों की तड़पन
छाती की धमक, सब खूब पहचानती हूं।
उतरी नहीं अभी तो मैं चमड़ी में
दौड़ी नहीं रगों में
खुबी नहीं तुम्हारे चेहरे के तिलों में
चुभन भरी दहकन साथ लिये
भटकी नहीं उबचुभी डाढ़ियों में।
सदियों  पहले आदम की चमड़ियों में
उतर गई थी ऐसे ही
दौड़ पड़ी थी रगों में
भटक गई थी दहकती गुफाओं में।
वहीं की वहीं हूं अब तलक।
मैं खूब पहचानती हूं, तुम्हारी हर चुभन को
गमक को ...... धमक को .... एक-एक करतूतों को
तिलों की विरासत को
ऐसा कैसे है कि, तुम नहीं जानते मुझे?

3
रूको ...... ठहरो ....।
इत्मीनान से बातें करना चाहती हूं तुमसे।
अपने अंदर जितने अंधेरे थे
सबको दरेर कर बना ली है एक मोमबत्ती।
धागा डाला जिसमें बचे-खुचे स्नेह का।
तुम्हारी मांगें  है मानो दियासलाई का झब्बा
या तो बन जाउं धीमी लौ
या हो जाऊं एकदम स्वाहा
मुझे तय करना है बहुत-कुछ।

रूको ...... ठहरो ......।
बहुत चली हूं मैं।
जरा जांच लूं अपने सलामत बचे पैरों को
धन्यवाद करूं उन हाथों को, जिनके सामने फैले तुम।
चेहरे की लुनाई में छुपा होगा दुख का पीलापन
होंठों की खुश्की  ने ही किया होगा उन्हें रक्ताभ रक्तिम।

ठहरो..... रूको.......।
सोचने दो मुझे मेरे बारे में
मेरे अंग कैसे और कब हुए तुम्हारे?
टूटती पीड़ा आज फूटने को तैयार है
अपने फूल चुनने हैं मुझे
अपनी  ही लाश  से

ठहरो ...... रूको .......
बातें करुंगी तुमसे
पहले जरा बतिया लूं
अपने आप से..
इत्मीनान  से।
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