उस देश में और अन्य कविताएं

निवेदिता झा
तीन किताबें और 10 साझा संग्रह प्रकाशित, संपर्क :nivrditaart @ gmail com .
वहाँ की बातें

उस फैक्टरी में
अच्छे लोग काम करते हैं

जूतों की नयी खेप अब तैयार हो चुकी है
मालिक का बेटा नहीं पहनता
अपने  दुकान का बनाया
नकली चिपके
विदेशी नाम के पैरों का आवरण
वह  समझदार है शायद
वह वहाँ के गंध से दूर रहता है
पिता नहीं चाहते वह  गंधो को पहचानना जाने
और माहौल को देखे ,परखे
गरीब बच्चों की चमडी
उफ्फ वो दमघोटू खाँसी
संक्रामक है माहौल वहाँ

वहां एक देश का
भविष्य भी तो बनता है
पलते है कुछ एक छोटे पौधे
और कुछ महिलाएँ
सहनशीलता की विदाई होते ही
जूते के फीते से गोल वृताकार फंदा
और सुलेशन से चिपकाकर अपनी मजबूरी
सलामत अस्तित्व की कामना करते
कुछ नींद से डुबे मजदूर
झपकी लेकर बार-बार
समय से पीछे चलती घडी
देखते हैं

अच्छे लोग बातें भी करते हैं अच्छी
पीढियों की बातें
कर्मो और प्रेम की बातें
नफा नुकसान से अलग रहने की
माँग और उपभोक्ता तो मालिक की बाते हैं

इस बार की बोनस तगडी मिले
और शायद अब बच्चे पढ़ पायें
अच्छे लोग ये भी सोचते हैं वहाँ ।

अनुभव


किसी ने कहा
जो देखो लिखो वही तुम

बिना गाँव देखे कैसे चित्रित कर दिया गहबर
सच कहा था उसे बडे से मनुष्य ने
जो मान ही बैठा था खुद को जाना माना नाम
मानकर उसकी वो बात

दंगा में उजडता देखा था एक गाँव
जो बाद में मौका देखते शहर बन गया था
एक मंदिर के दरवाजे पर बिलखता बच्चा
और अँधे से खाई में डूबता अजान का रूँधता स्वर

कविता तब नहीं लिख पाई थी
वहाँ भी ऐसे पैबन्दनुमा बीच के अलग से जले घर
और सहमें कुछ यात्री जो रवाना होनें को
अनन्त यात्रा थी अलग मुसाफिर थे
सहमा था कोने में बिना रंग का प्रेम
मानवता की चादर समेटे सहमा हुआ
नमक था सर्वत्र पसरा हुआ

विस्मित हूँ वो सागर की सोचकर आज भी
वो खारेपन को बदलने लगा
चखने लगे लोग और बोलने लगे थे मधुर
ओ पवित्र सागर तुम अपनी मधुरता कायम रखना
जब तक दुनिया की मीठी लीमडी हरी -भरी रहे
और दंगा फिर न हो किसी सदी में ।

नगर

वहाँ एक नगर था
सभ्यता थी विकसित
नदियाँ रही होगीं
तभी तो विकसित हुआ वह सब शायद

जो वर्तमान है
आज है कल भी होगा शायद
वहाँ एक पुरूष था
गढता था नृत्य करती नर्तकियों के छोटे आकार
वहाँ एक स्त्री थी
पुरूष सूर्य के समान देविप्यामान
और सिक्के पर उसकी आकृति
ये सब स्नातक की पाठ्यक्रम
पढकर जान लिया बडे होते ही
दजला-फरात का किनारा ,सिंधु
या शाम हो यमुना की
वही रक्त बहता है धीरे-धीरे
सभ्यताएँ खत्म होती है
और नगर अपने नाम का कलंक
ढोता जाता है ,
गाँव बनता तो शायद बच ही जाता

मन कचोटता रहता है
रहता है ताउम्र !

एच आई वी

तुम्हें पता है
रोग का हो जाना
अचानक घन्टों का युग में तब्दील होना
फिर जूझना
और मन में अटकी रहती है विवशता
ईश्वर के कई रूपों से सीधे वाली बातचीत

यही है
तुम्हें पता नहीं है
मनोदशा उनकी
कभी थोपना
कभी प्रायशिचत
और कभी बिना पाप किए का परिणाम
उछलती हिरणी
रुक कर गिरती है जब पैर में उसके रस्सी जकड़ती है
अँधेरा छाता होगा ,कहाँ जान पाई दर्द

ये तीसरी प्रजाति ,ये दूसरे लोग
तुम्हारे जैसे,मेरी तरह सोचने वाले
मगर मजबूरी की अंतिम दशा
नहीं इनके एकाधिकार से भी बाहर है

ये रोग
बिना जाति-घर्म ,ग़रीब -अमीर के भेद से बाहर है
मगर जी सकते हो
और जी रहे हैं
किताबी ज्ञान ,व उनको देखकर
विश्वास है ।

उस देश में

अब धीरे-धीरे
धट रहै हैं कुछ लोग
बडे ईमारत से ढहते कुछ लाल पत्थर
कुछ जडे रत्न नोचे गए हों गाहे-बेगाहे
जैसे कैलेंडर पर गोला लगाए
 दिन उस देश में

रात को आकाश में छुपे बादलों के पीछे
बिना रोशनी के तारों का झुंड
गुम होते वो अवशेष
चाहे हडप्पा हो
या लाल पत्थरों वाली शहरी संस्कृति
धीमी पडती जाती वो आवाजें
जो कि आस्था के ईमारतों से
सुबहो शाम आती है
लोहे के लोग और पत्थर के नाखून
सहमी होती है जहाँ शाम
सूरज वहाँ बेखौफ नहीं निकलता है कभी

पुरानी बची कुछ झुर्रियों से
वहाँ के हों या यहाँ के
बिना बोले ही सुन सकते हो
अमन की बात और अमन की उम्मीद ।


दो  तरह की रात 
दो तरह की रात
जैसी ही होती है दो स्त्रियाँ
शहर की और गाँव की
मत कहना कि
पूनम की कौन और अँधरिया की कौन

सूरज से उम्मीद
दोपहर से उधार मांगी धैर्य
विरह से उदासी
और धरती से उठाकर धूल
दोनों एक हो जाती है कहीं कही
फिर पाटों में बंटती रूपहले सपने को गुनती बुनती
गांव से थोडा आगे रहती है शहर की

मगर घूमती धरती
स्याह और रोशनी में
एक झूठ को बताती नहीं कि
दोनों ही सिसकत हैं
पुरूष के असली चेहरे को देखकर ।
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