वक्रता का वाग्वैदग्ध्य : नागार्जुन की स्त्री केन्द्रित कवितायें

कर्मानन्द आर्य
कर्मानन्द आर्य मह्त्वपूर्ण युवा कवि हैं. बिहार केन्द्रीय विश्वविद्यालय में हिन्दी पढाते हैं. संपर्क : 8092330929
नागार्जुन जन-मन के चितेरे कवि रहे हैं.सादगी, सरलता और खुलापन बाबा के व्यक्तित्व की मूलभूत विशेषताएँ थी। जीवन के कठोर संघर्षों में तपकर उनका व्यक्तित्व कुंदन की भाँति निखरा था। दुख किसी को माँजता हो या न माँजता हो, नागार्जुन के व्यक्तित्व को उसने पूरी तरह माँजकर चमकाया था। निजी जीवन में परिवार के भार को उन्होंने कभी उठाया नहीं था, बल्कि हमेशा एक आत्मसम्मान और स्वाभिमानी रचनाकार ही बने रहे। उनका परिवार उनके अपने औरस पुत्र-पुत्रियों तक ही सीमित नहीं था, बल्कि उन मानव पुत्रों तक विस्तृत था, जिन्हें उन्होंने अपनी कृतियों में जन्म दिया था। हजारों पुत्र-पुत्रियों तथा परिवारों के मुखिया बाबा जीवन पर्यन्त सबसे जुड़े रहे तथा सभी पर अपना नेह-छोह बरसाते रहे। सरलता, सादगी और सौम्यता के साथ-साथ बाबा के व्यक्तित्व में वज्र- दृढ़ता भी थी, अन्यथा जीवन की कठोर वास्तविकताओं से टकराकर वह कब का चूर-चूर हो चुके होते। मेधावी, प्रत्युत्पन्नमति और सहज स्फूर्त प्रतिभा के धनी, बाबा की प्रत्येक बात उनकी अद्भुत पैनी बुद्धि का प्रमाण देती है।

नागार्जुन ने कई तरह के प्रयोग किए है। लोकछंदों की तर्ज पर कविताएँ लिखने के अलावा, मुक्तछंद तथा ग्रामीणों द्वारा प्रयुक्त ‘बुझौवल’ (बूझो तो जाने) शैली की कविताएँ लिखी हैं। गांवों में ओझा जिस शैली का उपचार करते और भूत उतारते हैं उसे शैली का एक अप्रतिम उदाहरण उनकी ‘मंत्र’ कविता है। ‘अकाल और उसके बाद’, ‘बाकी बच गया अंडा’, जैसी लघु, सूत्रवत् कविताओं से लेकर ‘बादल को घिरते देखा है’, ‘हरिजन-गाथा’, ‘अच्छा किया, उठ गए हो दुष्ट’ जैसी लंबी कविताएँ उन्होंने लिखी। छोटी रेखाचित्र-जैसी अर्थ गंभीर कविताओं के साथ दीर्घ वितानवाली स्फीत कविताएँ भी लिखी हैं। साधारण जन से लेकर बौद्धिक जनों को परिष्कृत रूचि तक की व्याप्ति वाली रचनाएँ नागार्जुन की काव्य-समृद्धि की द्योतक है। परम्परा से अर्जित भावबोध और काव्यबोध के साथ-साथ आधुनिकतम आशयों तक को स्पर्श करती है नागार्जुन की रचनाएँ।

नागार्जुन ने कई भाषाओं में कविताएँ रचीं, मैथिली (जिसके लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला), हिन्दी, संस्कृत और बांग्ला में उन्होंने उत्कृष्ट रचनाएँ लिखी। एक बातचीत में विश्वनाथ त्रिपाठी ने नागार्जुन की पंजाबी रचनाओं का भी जिक्र किया। नागार्जुन कई साल पंजाब में साहित्यिक पत्रकारिता करते रहे। कोई आश्चर्य नहीं कि उन्होंने कुछ पंजाबी कविताएँ भी लिखी हो। हो सकता है किन्हीं अन्य भाषाओं में उनके द्वारा रची कुछ रचनाएँ भविष्य में मिले। राहुल सांकृत्यायन के बाद वैसी बहुमुखी प्रतिभावाला अगर कोई रचनाकार है तो वह नागार्जुन ही है। उनकी स्त्री विषयक कविताओं की कहीं कोई कमी नहीं है. बाबा सौन्दर्य और प्रेम के जितने अद्भुत कवि हैं उतने बड़े रसिक भी.उनकी कविता की रूढ़ि वक्रता देखिये.

कविता स्वयं में एक सुन्दर वस्तु है। वस्तुतः कविता कवि की जीवनदृष्टि और उसके समग्र जीवनानुभव का एक अद्भुत संसार निर्मित करती है। कविता के संसार में सौन्दर्य की खोज वैसे ही है जैसे फूलों के भीतर खुशबू, हवा-पानी और कांटे भी साथ रहते है। कविता में सौन्दर्य कभी अकेले नहीं मिलता। कभी-कभी तो कविता बीहड़ इलाकों में ले जाती है यहाँ जीवन में कोमल-कठोर, नर्मी और रूखापन एक साथ मिलते है। काव्यलोक का ऐसा ही एक बीहड़ क्षेत्र रचते हैं कवि नागार्जुन। इस बीहड़ की विशेषता भी है नागार्जुन के यहाँ। वह यह कि ये इलाके कभी निर्जन नहीं होते। इनमें कलियों के चिटकने से लेकर पत्तियों के झरने तक की आवाजें है। हर्ष, करूणा, क्रोध, आवेग सब कुछ है अपनी गूँज छोड़ता हुआ। नागार्जुन की कविताओं से गुजरते हुए यह विश्वास होता है कि सौन्दर्य केवल वहीं नहीं है जो ऊपर से सुन्दर दिख रहा होता है। वे तो ऐसी जगहों में सुन्दरता को ढूँढ़ लेते हैं जहाँ कलाप्रेमियों की दृष्टि थमती भी नही। उनकी कविता की वक्रताएं सहजा और आहार्या दोनों रूपों में प्राप्त होती हैं.
आजादी मिलने से कुछ ही पहले, रामकथा के एक मार्मिक प्रसंग को आधार बनाकर नागार्जुन ने ‘पाषाणी’ कविता लिखी थी। सुरपति इंद्र गौतम ऋषि का रूप धारण करके अहल्या से जो छल करते हैं, उस पर कुपित होकर गौतम अपनी पत्नी को वेश्या से भी निकृष्ट बताते हैं और पत्थर बन जाने का शाप दे देते हैं। राम ‘पाषाणी’ का उद्धार करते हैं, उसे निष्कलुष-निष्पाप ही नहीं कहते, मॉं कहकर ‘घुटने टेक प्रणाम’ भी करते हैं।

अहल्या आशीष देते हुए कहती हैं-
वत्स, राजकुल में पाया है जन्म /
कभी बनोगे तुम्हीं कोसलाधीश
फिर चरणों पर नाना दिग्देशीय
अर्पित होगे शत-शत सुंदर फूल /
(अनाघ्रात अस्पृश्य सहज कमनीय) !
अंतःपुर में षोडशियों के मध्य /
बिता सकोगे तुम भी तब दिन-रात
शरद शिशिर मधु ग्रीष्म और बरसात
नहीं अहल्या आयेगी फिर याद ! 1

अपना उद्धार करने वाले राम के प्रति भी अहल्या शंकाशील है, वह राम के आगे जो आशंका रखती है, वह सामंती सभ्यता पर प्रताड़ित नारी का सबसे बड़ा व्यंग्य है। उसका अविश्वास नागार्जुन के आलोचनात्मक विवेक का प्रतिबिंब है। राम अहल्या के दोनों पैर छूकर प्रतिज्ञाबद्ध होते हैं.


इसी तरह जो ‘जगततारिणी प्रकट हुई है नेहरू के परिवार में’, वह नागार्जुन के रुढ़ि का सर्वाधिक शिकार बनी है। उसने ढहते हुए कांग्रेसी शासन को नया जीवन दिया है। इस ‘जगतारिणी’ के छल-बल-कौशल से हाल यह हो गया कि कविता में देवी की रूढ़ि का वर्णन करते हुए कवि कहता है कि -
संविधान की रूई रूपहली भद्रलोक धुनते हैं
देवि, तुम्हारे स्टेनगनों से तरूण-मुंड भुनते हैं2

डायन के गुर सीखकर आंत चबाने वाली इस ‘जगततारिणी’ के फरेब पर नागार्जुन कहते हैं-
मंहगाई की सूपनखा कौ कैसे पाल रही हो.
सत्ता का गोबर जनता के मत्थे डाल रही हो ............
  पग-पग तुम लगा रही हो परिवर्तन के नारे
  जन-युग की सतरंगी छलना, तुम जीतीं, हम हारे...........3.

यह देवी कंकालों से अपने नव-सामंतों और महाजनों की रखवाली करने में ऐसी व्यस्त है कि कवि रुढ़ि के आधार पर आगाह करता है-नागार्जुन की प्रसिद्ध कविता है ‘बसंत की अगवानी’। प्रकृति पर हर तरफ बसंत का उल्लास छा गया है, दूर अमराई में कोयल बोलती है, वृद्ध वनस्पतियों की टूटी शाखाओं में पोर-पोर, टहनी-टहनी दहकने लगती है, अलसी के नीले फूलों पर आकाश मुस्काता है, पिचके गालों पर भी कुंकुम न्योछावर हो जाता है। रंगों के इस उल्लास में जब सारा संसार वसंत की अगवानी करने के लिए बाहर निकलता है, तो ठौर-ठौर पर सरस्वती माँ खड़ी दिखायी देती हैं। वे प्रज्ञा की देवी हैं। वे सहज उदार हैं। वे अपने अभिवादन में झुके आस्तिक-नास्तिक सभी को संबोधित करती हैं-
‘‘बेटे, लक्ष्मी का अपमान न करना/जैसी मैं हूँ, वैसी वह भी माँ है तेरी
धूर्तों ने झगड़े की बातें फैलायी हैं /हम दोनों ही मिल-जुलकर संसार चलातीं
बुद्धि और वैभव दोनों यदि साथ रहेंगे.जनजीवन का यान तभी आगे निकलेगा।’’

स्पष्ट है कि आज लक्ष्मी और सरस्वती में संतुलन नहीं है, धूर्तों ने उनमें झगड़े की बात फैला रखी है। प्रज्ञा की देवी अपनी प्रिय संतानों को यह ज्ञान देती है कि बुद्धि और वैभव का अलगाव मिटाकर, दोनों को जोड़कर ही जनजीवन की प्रगति संभव है। ऐसा तभी होगा जब धूर्तों की चाल नाकाम कर दी जायेगी। व्यक्ति नागार्जुन के सम्मुख सामाजिक हितों और विचारों के निमित्त है। उन्हें लक्ष्य करके वे सामाजिक या राजनीतिक परिस्थितियों पर टिप्पणी करते हैं।
आओ रानी हम ढोएंगे पालकी / यही हुई है राय जवाहरलाल की
नागार्जुन व्यक्तिगत रूप से नेहरू की निंदा नहीं करते। रानी एलिजा़बेथ के स्वागत में खड़े भारतीय शासक वर्ग की समझौतावादी नीति को आक्रमण का लक्ष्य बनाते हैं। ‘रानी’ और ‘जवाहरलाल’ ब्रिटेन और भारत की राजसत्ता के प्रधान हैं। भारत स्वतंत्र हो गया है, लेकिन अभी भी ब्रिटेन की महारानी की ‘पालकी’ का बोझ भारतीय जनता के कंधे पर आयेगा। भारतीय जनता की कीमत पर साम्राज्यवाद का पोषण स्वतंत्रता के बाद भी नही रूका, बल्कि भारत के पूंजीवादी नेताओं ने खुद को ब्रिटिश साम्राज्य से सबंद्ध रखा। उनका सौन्दर्यबोध इस तरह से प्रकट होता है :
बहुत दिनों के बाद / अब की मैं जी भर सुन पाया
धान कूटती किशोरियों की कोकिल कंठी तान / बहुत दिनों के बाद 4

अपने अनुभव ज्ञान से सम्पन्न होकर उन्होंने ‘भिक्षुणी’ की कल्पना की है। वह मजबूरियों के कारण बचपन में ही बुद्ध की शरण में आ गयी। युवावस्था के साथ उसकी नारी-सुलभ आकांक्षायें जागने लगी। वह बुद्ध के प्रति आकृष्ट होती है। हीन यान-महायान समझ चुकने के बाद अब वह मानव-संबंधों का सहजयान जानना चाहती है-स्वभावतः बुद्ध के प्रति उसके आकर्षण का कारण है मातृत्व की भूख। यह उसकी मानवीय आकांक्षा है। संघों के नियम इस मानवीय आकांक्षा पर पाबंदियां लगाते हैं।
भगवान अमिताभ, सहचर मैं चाहती/ चाहती अवलंब, चाहती सहारा
देकर तिलांजलि मिथ्या संकोच को /
हृदय की बात लो, कहती हूँ आज मैं-
कोई एक होता / कि जिसको /अपना मैं समझती..........
भूख मातृत्व की मेरी मिटा देता; /
स्त्रीत्व का सुफल पाकर अनायास / धन्य मैं होती 5
नागार्जुन ने इन पाबंदियों के मुकाबले में मनुष्य की सहज अभिलाषाओं को रख दिया है और इसके लिए बुद्ध के जीवन में एक कल्पित स्थिति को माध्यम बनाया है। धर्म के प्रति, कम-से-कम बौद्ध धर्म के प्रति श्रद्धावान व्यक्ति धार्मिक विधान और मानवीय आकांक्षा की टक्कर दिखाकर संघबद्ध धर्म की निरर्थकता कभी उजागर न करता।नागार्जुन की यह कविता जिसकी मूल संवेदना प्रकृति में है लेकिन वास्तव में वहीं तक सीमित नहीं है। इसमें अन्य कई संवेदनायें आकर जुड़ती है और इस तरह एक जटिलता की रचना होती है। निजी जीवन का संताप, व्यवस्था के प्रति रोष, अन्याय का विरोध, आततायियों से घृणा, मुक्ति का अहसास-यह कविता पूरे जीवन पर एक टिप्पणी है।क्या नहीं है वह ? / माँ भी है, बेटी भी है, बहन भी है, / बहू भी है !
सहेली भी है, प्रेयसी भी है !/ साथिन है दुख-सुख की, सब कुछ है !
क्या नहीं है वह अपनी जनता के लेखे !6


‘कालीदास’ नागार्जुन की विश्व प्रसिद्ध कविता है जिसमें अमूर्त प्रेम को मूर्तता प्रदान की गई है। कवि ने अज के माध्यम से यह व्यक्त कर रहा है कि कालीदास तुम स्वयं ने इन्दुमती के प्रेम में आंसू बहाये थे कि वह अज ही था। नागार्जुन ने उस घटना को कविता के माध्यम से यहाँ इस रूप में चित्रित किया है जो कालवैचित्र्य वक्रता के रूप में व्यक्त हो रही है। यहाँ वर्तमान की कल्पना द्वारा कालवैचित्र्य वक्रता अनुपम सौन्दर्य को प्राप्त हो रहा है। वहीं दूसरे उदाहरण में आपसी वैमनस्य व्यक्ति को किस भांति स्पर्धा के लिए लालायित करता है किन्तु दुख के समय भविष्य में होने वाली दुर्घटना की ओर संकेत करती यह कविता कालवैचित्र्य वक्रता का अनुपम उदाहरण है। धूप में पसरकर लेटी है/मोटी-तगड़ी, अधेड़, मादा सुअर......
जमना-किनारे, मखमली दूबों पर/
पूस की गुनगुनी धूप में,पसरकर लेटी है
यह भी तो मादरे-हिंद की बेटी है7

वर्णित उदाहरण में इन्दिरा गांधी पर कवि एक गहरा व्यंग्य आरोपित कर रहा है। नागार्जुन की व्यंग्य भरी रचनाओं में अन्य पुरुष का प्रयोग बहुतायत हुआ है। उपरोक्त उदाहरण में मध्यम पुरूष के स्थान पर जहाँ अन्य-पुरुष की वक्रता रोचकता पैदा कर रही है वहीं पर व्यंग्य भी सार्थक रूप में व्यक्त हो रहा है।
और, उस रोज
आपका, दुख का यह अभिनय / सचमुच अनोखा था !
वैसा अपूर्व मंचन / शायद ही कभी किसी ने देखा हो !
दुख की उस एकि्ंटग के क्या कहने ! / शाबाश, महान अभिनेत्री !8

नागार्जुन ‘बादल को घिरते देखा है’ कविता में जिस समस्त पदावली का प्रयोग करते हैं, वह उनकी अपनी रचना प्रणाली का हिस्सा है। ‘मदिरारूण आँखों वाले उन/उन्मद किन्नर-किन्नरियों की/मृदुल मनोरम अंगुलियों को/वंशी पर फिरते देखा है!’’ ‘मेघदूत’ पर लिखते हुए नागार्जुन प्रकृति की इस विविधता पर मुग्ध हैं। उन्हीं के शब्द हैं- ‘‘यों कहने को पूर्वमेघ प्रकृति की ही सुषमा के चित्रों से जगमगा रहा है परन्तु उन चित्रों का रंगीलापन कोई सामान्य रंगीलापन नहीं, वह तो मानव-मर्म की सहज संदेवनशीलता से अन्तर्दीप्त है’’। नामवर सिंह ने कहा था कि छायावाद में प्रकृति मानवीय होकर ही काव्यात्मक बनती है। यही कैलाश है, अलकापुरी है, स्फूर्तिप्रद मेघ सन्देश हैं।‘नाकहीन मुखड़ा’ माघ की ठिठुरन में ‘गठरी’ बन गया है। नागार्जुन उसे ‘अद्भुत सर्वांग आसन’ में बैठा देख रहे हैं। वह इनसे बेखबर हैं।

नागार्जुन हिन्दी के ऐसे कवि हैं जिनका कर्म परिवेश और व्यक्तित्व, उनकी कविता के सम्मिलित रूप की संज्ञा बन जाती है। उनके जीवन से गुजरती है देश, धरती, प्रकृति। सम्वेदना से जनमती है कविता, कविता से जनमता है, उनका व्यक्तित्व और व्यक्तित्व से चमकती है एक गर्भस्थ सुन्दर दुनिया, जहाँ मनुष्यता हंसती, मुस्कुराती, मानवता उछलती-कूदती, करुण रुदन करती है। वह एक ऐसी सुंदर दुनिया है जो अपनी किलकारियों का आभास देती है। नागार्जुन का काव्य इन्सानियत के लिए जूझता है, उसका रचनाकार, अन्याय के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करता है। नागार्जुन की क्रांति-चेतना को रेखांकित करते हुए विश्वम्भर मानव ने लिखा है- ”उपेक्षित वर्ग के प्रति सहानुभूति तथा उसकी शक्ति को उभारने और अंतिम विजय में विश्वास प्रकट करने वाली बहुत सी कविताएँ है। जिनमें कवि ने अपनी प्रतिभा का पूर्ण उपयोग किया है।

नागार्जुन ने दाम्पत्य को उसके सामाजिक-चरित्र और पारम्परिक-गरिमा के साथ नितान्त मानवीय, धरातल पर अभिव्यक्त किया है। यह तुम थी कविता में कवि के वृद्धावस्था में पहुँचे दाम्पत्य-जीवन के गहन सम्बन्धों को अपनी जीवन शक्ति के रूप में अनुभव किया है। ‘यह तुम थीं’ कविता की पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं-
”झुका रहा डालें फैलाकर /कगार पर खड़ी कोढी गूलर
ऊपर उठ आयीं भादों की तलइया
जुड़ा गया बौने की छाल का रेशा-रेशा / यह तुम थी।“
इस कविता का ‘तुम’ सम्बोधन कवि की पत्नी के लिए है, तथा बुढापे की स्थिति के लिए प्रतीक रूप में गूलर और कचनार, उसी तरह ‘सिंदूर तिलकित भाल’ में प्रवास के दिनों में अपनी प्रिया पत्नी की याद है। जहाँ दाम्पत्य और रति का सात्विक भाव उसकी निष्ठा तथा मन की गहराइयों में छलकते प्यार की निर्मल अभिव्यक्ति है-
घोर निर्जन में परिस्थिति ने दिया है भाल
याद आता तुम्हारा सिन्दूर तिलकित भाल,
याद आते स्वजन
याद आता मुझे अपना वह ‘तरउनी’ ग्राम
याद आती लीचियाँ वे आम
याद आते मुझे मिथिला के रूचिर-भू-भाग याद आते धान।


नागार्जुन की ‘सिन्दूर तिलकित भाल’ - जैसी अन्य कविताओं में प्रेम-प्रसंग का रागात्मक आवेग ने होकर, स्मृति के क्षण में मूल्य-बोध की गहराई है, वहाँ प्रेम मानवीय और मार्मिक है। धनंजय वर्मा ने महाकवि निराला के उदात्त, प्रेम संदर्भों से नागार्जुन की प्रेम-प्रणय कविताओं की तुलना करते हुए लिखा है- ”यह सौंदर्य और सरसता के सारे संदर्भों के व्यतीत हो जाने पर भी स्मृति क्षणों को रागात्मकता से सिक्त पाता है, इसलिए कि यह प्रेम सारी जिंदगी के सुख-दुःख की सहचरी के मीठे बोल और तरल स्पर्श से घुला है। उन्मुक्त अनासक्त और प्रशांत भाव से प्रणय-श्रृंगार को संवारने में नागार्जुन निराला की ही तरह उदात्त है।नागार्जुन की कविता का सम्यक् अध्ययन करने से यह स्पष्ट होता है कि उनके जीवनकाल में कविता ने बहुत लम्बी यात्रा की है। नारी-पुरुष की एक दूसरे के प्रति नारी और पुरुष वाली दृष्टि के आकर्षण को छोड़ या अपेक्षाकृत उसे कम महत्व देकर, इस का की कविता उस कारा से मुक्त होकर एक नवीन एवं विस्तृत जगत् में प्रवेश करती है। जिसमें आपसी सम्बन्धों की विविधता है, विभिन्न पारिवारिक सम्बन्धों की मिठास, कटुता है, उस दुनिया में मित्र हैं, दोस्त हैं और सहज मानवीय संवेदनाएँ है। नागार्जुन में स्त्री-सौन्दर्य हमेशा अपनी आह्लाददायी तीव्रता के साथ उपस्थित मिलता है। ‘एक फाँक आँख एक फाँख नाक’ में एक स्त्री मुखड़े के अर्द्धांश के बारे में नागार्जुन कहते हैं-
कितनी देर तक रही नाचती कपाल के भीतर के कटोरी में
धारण किए क्रमशः तकली का रूप
एक फाँक आँख..... एक फाँख नाक .....
सौन्दर्य चाहे जिस रूप में प्रकट हो, नागार्जुन की कविता की कटोरी में तकली की तरह नाचता रहता है। यह उनकी संवेदना का एक सर्वथा भिन्न पर महत्वपूर्ण धरातल है।गूँगी बहरी जया निम्नमध्यवर्गीय पिता की चार वर्षीया बेटी है। वह चित्रकार-नर्तकी बनकर स्वावलंबी जीवन बिता सकती है लेकिन पिता की आर्थिक विवशताएँ उसे कुछ न बनने देगी। नागार्जुन को वह खिलौना या गगनबिहारी समझती होगी।
क्योंकि मैं उसे छू सकता हूँ/
और गुदागुदा भी सकता हूँ/ कभी-कभी तो/
जी भर उसका मन बहलाकर/ स्नेह सुधा में कई-कई घंटे नहलाकर/
उसे तृप्त कर देता हूँ/ अपना रस्ता लेता हूँ मैं।9
तीन साल का ‘चौथी पीढ़ी का प्रतिनिधि’ खुरपी लेकर ‘अपनी अम्मी का अनुसरण कर रहा है।’ उसकी माँ ‘गिट्टियाँ बिछाने वाली मजदूरिन’ है एक बजे आयेगी :
शिशु को चूमकर/पास बैठा लेगी
मकई के टिक्कड़ से तनिक-सा/तोड़कर बच्चे के मुँह में डालेगी.......
पूछेगी मुन्ना से-मेरी पुतलियों में देख तो, क्या है!
नागार्जुन की कविता का उद्गम भी, यही परिकल्पना नागार्जुन की तन गई रीढ़ कविता में भी है :
झुकी पीठ को मिला / किसी हथेली का स्पर्श / तन गई रीढ़ महसूस हुई कंधों को पीछे से, / किसी नाक की सहज उष्ण निराकुल साँसें तन गई रीढ़ / कौंधी कहीं चितवन /रंग गए कहीं किसी के होंठ निगाहों के जरिए जादू घुसा अंदर / तन गई रीढ़ /गूँजी कहीं खिलखिलाहट टूक-टूक होकर छितराया सन्नाटा /भर गये कर्णकुहर / तन गई रीढ़ आगे से आया /अलकों के तैलाक्त परिमल का झोंका
रग-रग में दौड़ गई बिजली तन गई रीढ़
जितने तरह के सामाजिक दृश्य और चरित्र नागार्जुन की आत्मीयता का अंग बने हैं, वह जीवन को देखने-जानने का सफल प्रयास है। नागार्जुन बाजार को स्त्री की मुक्ति नहीं बल्कि दासता का नया क्षेत्र मानते हैं। मुश्किल यह है कि आज अनेक स्त्रीवादी यह समझते हैं कि बाजार में देह की ‘मुक्ति’ भी स्त्री की मुक्ति है। इन्ही रंगों से सराबोर नागार्जुन की एक कविता और है ‘न आये रात भर ट्रेन’ :
बैठा बैठा मेल ट्रेन की प्रतीक्षा में / बाहर निकल आए है आँखों के डोरे
घंटा भर लेट / आधा घंटा और लेट / पैंतालीस मिनट और लेट
आह रे विधाता, क्या हुआ तुझे ?
कई दफा चटखाई उँगलियाँ / कई बार आई जँभाई
चाट गया अनेकों मैगजीनें / सुड़क आया हूँ सात कप चाय
खींच गया हूँ दो पाकिट सिगरेट / आह रे विधाता, अब क्या करूँ ?
रंगी-रची पेटी से उँगठी / गौना कराई दुल्हन / सोई है या जगी
घूँघट की आड़ में ! / लेकिन दूल्हा भर रहा है खर्राटें
पास ही काले कम्बल पर / सिरहाने सेंतकर सामान
इनकी रखवाली कर रही है / सिक्कों की माला और पत्तीदार बाजूबंद पहने
दुल्हन की अर्द्धव्यस्क नौकरानी / लाल किनारी की पीली साड़ी में
बिल्कुल मांगुर मछली सी है उसकी देह की कान्ति
लगती है कितनी अच्छी / अब क्यों निकलेंगे आँखों के डोरे
न आए रातभर मेलट्रेन!
पति-पत्नी के स्वच्छंद एवं भावात्मक प्रेम की व्याख्या भष्मांकुर में हुई है। रति कामदेव को इस कार्य से विरत करना चाहती है, क्योंकि उसे शिव की अपूर्व शक्ति का ज्ञान है। वह काम के शुभ के लिए सतत् चिन्तित रहती है। इसी प्रसंग में काम रति से क्रुद्ध हो जाता है और बसंत नारी जाति की भावुकता का चित्र अंकित कर, दोनों का (काम-रति) पुनः मेल कराता है-
शिशु समान होती है नारी जाति
मृदुमति, तरल स्वभाव,/
रूप-रस-गंध-शब्द-स्पर्श के प्रति अर्पित आप्राण!
पी जाती यह हालाहल चुपचाप / कंठ नहीं होते हैं इनके नील
खण्डित होने देती अपना शील / चुकता करती भावुकता का मूल्य
तन-मन-धन सब कुछ देती है झोंक।

नागार्जुन के साहित्यिक व्यक्तित्व के मूल्यांकन की दृष्टि से समानांतर व्यक्तित्व की तलाश करने पर यह करना अप्रासंगिक न होगा कि परम्परा के कवि के रूप में कबीर, निराला, नागार्जुन का त्रिकोणीय आकार एक ही बिन्दु पर आकर ठहरता है। भक्तिकाल की युगीन विसंगतियों, विडम्बनाओं को जिस तरह कबीर ने समय की मांग के अनुकूल युग-युगीन सन्दर्भों में चित्रित कर उसका विरोध किया है, ठीक-ठीक उसी तरह नागार्जुन भी अपने युग के बृहत्तर मानवीय धरातल पर खड़े होकर युग-युगीन संदर्भों, के यथार्थ को चित्रित करते हैं, व्यावहारिक जीवन के क्रिया-कलापों की तरह उनका समूचा साहित्य उनके बहु आयामी व्यक्तित्व का परिचायक है। यह तो रही प्रकृति और बच्चों की सहज आकर्षण युक्त क्रियाएँ। इनमें तो बाहरी व्यापार फिर भी कुछ घटित होते दीखता है। समकालीन कवि की पैनी दृष्टि कुछ ऐसे सुन्दर मूल दृश्यों को भी शब्दों में उकेरने में अत्यंत सफल रही है जहाँ कि क्रिया-व्यापार उतना ‘बोलता हुआ’ नहीं है, जहाँ चुपचाप, निःशब्द, कुछ घटनाएँ घटित हो रही हैं, किन्तु हैं वे सारी घटनाएँ एक अपूर्व आकर्षण से युक्त हैं।
‘पैने दाँतों वाली’ / धूप में पसरकर लेटी है
मोटी-तगड़ी, अधेड़, मादा सुअर..........
जमना-किनारे / मखमली दूबों पर / पूस की गुनगुनी धूप में
पसरकर लेटी है / यह भी तो मादरे-हिंद की बेटी है
भूरे-भूरे बारह थनों वाली! / लेकिन अभी इस वक्त
छौनों को पिला रही है दूध/मन-मिजाज ठीक है/ कर रही है आराम
अखरती नहीं है भरे-पूरे थनों की खींच-तान /
दुधमुंहे छौनों की रग-रग में
मचल रही है आखिर माँ की ही तो जान! / जमना-किनारे
मखमली दूबों पर / पसर कर लेटी है/
यह भी तो मादरे-हिंद की बेटी है! / पैने दाँतो वाली...........


नागार्जुन की संवेदना इतनी व्यापक है कि यहाँ सब कुछ के लिए स्थान है, कुछ भी वर्जित या त्याज्य नहीं है।‘वसंत की अगवानी’ कविता में नागार्जुन दिखाते हैं कि सरस्वती उन लोगों को धूर्त कहते हैं जिन्होंने लक्ष्मी से उनकी झगड़े की बात फैला रखी है। इन धूर्तों ने लक्ष्मी को अपने वश में कर लिया है। लक्ष्मी इन धूर्तों की कैद से आजाद होकर ही सरस्वती से मिल सकती है। तब वसंत के अग्रदूत को काव्य-कला-प्रवीण होकर रिक्तहस्त रहने की नौबत नहीं झेलनी पड़ेगी।प्रकृति के असंख्य रूपों ने नागार्जुन को तीव्रता को संवेदित किया है। उनके पहले कविता-संग्रह ‘युगधारा’ में एक कविता ‘रजनीगंधा’ संग्रहीत है-
तुम खिलो रात की रानी / हो म्लान भले यह जीवन और जवानी
तुम खिलो रात की रानी।’ / प्रहरी-परिवेष्टित इस बंदीशाला में
मैं सडूं सही, पर ताजी रहे कहानी / तुम खिलो रात की रानी/
यह प्रहरी के बूटों की कर्कश टापें / रह-रह कर बहुधा नींद तोड़ जाती है
आँखे खुलती तो बस झुंझला उठता हूँ...../
यह हृदय-हीन! ये नर-पिशाच! ये कुत्ते! / इतने में अनुपम सुवास से सुरभित
शीतल समीर का हल्का झोंका आता / सारे अभाव-अभियोग भूल जाता हूँ
या आकुल मन इतना प्रमुदित हो जाता/
जय हो जय हो कल्याणी! / यह जेल और यह सेल-नियंत्रित प्राणी
इस आँगन में उस ओर तुम्हारा खिलना / यह भिनी-भिनी सारी रात महकना
दिन हुआ कि बस हो गई मौन तुम सजनी /रजनीगंधा बनकर भू पर उतरी हो?
आभिशापित देवसुता या कि परी हो! / पुलकित होते तन-मन, जगती है वाणी
जय जय जय जय कल्याणी!

कविता का स्रोत मुख्यतः रात की रानी की सुंगंध में है। रात की रानी की सुगंध ने ही कविता के वाचक को व्यग्र किया है। पहली पंक्ति ‘तुम खिलो रात की रानी’ से लेकर अंतिम बंद की ‘जय जय जय जय कल्याणी’ तक। लेकिन यह कविता रात की रानी का वर्णन मात्र नहीं है। इस प्रकार हम देखते हैं कि वक्रता का पुट लिए नागार्जुन की स्त्रियाँ हमेशा प्रतिरोध रचती रहती हैं.

संदर्भ सूची 

1.युगधारा, पृ. 41,42
2.हजार-हजार बाहों वाली,  पृ0152-153
3.तुमने कहा था,  पृ048-49
4.सतरंगे पंखोंवाली,  पृ025
 5.युगधारा, पृ019
 6.पुरानी जूतियों का कोरस, पृष्ठ ११७
 7.नागार्जुन की चुनी हुई कवितायेँ, पृष्ठ २१० 
  8.ऐसे भी हम क्या! ऐसे भी तुम क्या! पृष्ठ १९ 
 9. युगधारा, पृष्ठ १०८ 
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