मेरा क़ातिल ही मेरा मुंसिफ़ है

इला जोशी 

बेंगलुरु की शर्मनाक घटना के विडियो आये अभी कुछ घंटे ही बीते होंगे कि दिल्ली के मुखर्जीनगर में भी वैसा ही कुछ दोहराया गया और बेंगलुरु से ही आई एक सीसीटीवी फुटेज में देर रात स्कूटर पर सवार दो लड़के एक लड़की को मोलेस्ट करते नज़र आते हैं| इसी बीच यूट्यूब समेत सोशल साइट्स पर एक वीडियो वायरल होता है, जिसमें एक लड़का सार्वजनिक स्थानों पर लड़कियों को ज़बरदस्ती चूम कर भागता दिखाई देता है और इस पूरे प्रकरण को एक “मज़ाक” के नाम पर वो और उसका क्रू फ़िल्माता और साझा करता है| ये सब ऐसे वक्त होता है, जब नए साल के पहले हफ़्ते में अधिकतर लोग ये तय कर रहे होते हैं कि आने वाले साल में उनके जीवन की दिशा और दशा क्या होगी|


ऐसा नहीं है कि इस तरह के घटनाक्रम देश में पहली बार हो रहे हैं, या ये उपर्लिखित हादसों की तरह सिर्फ़ बड़े शहरों तक सीमित रह जाते हैं, दरअसल ये इस देश के हर शहर, हर कस्बे और हर गाँव की जीवनशैली का वो हिस्सा हैं; जो मौजूद सब जगह है लेकिन इस देश की आधी आबादी को उसकी मौजूदगी स्वीकारने में बहुत दिक्कत है| और जैसे ही इन घटनाओं के विरोध में औरतें आवाज़ उठाने लगती हैं, #NotAllMen जैसे हैशटैग ट्रेंड करने लगते हैं| ऐसे में मवाद भरी वो मानसिकता एक खुले ज़ख्म सी सामने आ जाती है, जो अभी तक प्रगतिशीलता और मानसिक खुलेपन जैसी कई परतों के नीचे ढकी हुई थी| लगभग हर साल मीडिया में ऐसी कई बड़ी ख़बरें आती हैं, तब हम अचानक से जागरूक हो जाते हैं। जबकि हम निजी जीवन में वैसे ही लिजलिजे, बिना रीढ़ की हड्डी के रहते हैं और इन बड़ी घटनाओं की प्रक्रिया की शुरूआती प्रक्रिया को नज़रंदाज़ करते हैं।

#NotAllMen जैसे हैशटैग ट्रेंड करवाने वाले ये कौन लोग हैं, जो औरतों/लड़कियों पर बढ़ती यौन हिंसा की घटनाओं के बीच पुरुषों के बचाव के स्वर बुलंद कर रहे हैं? आख़िर किस से बचा रहे हैं ये ख़ुद को? उन औरतों/लड़कियों से जिन पर यौन हमले होते हैं? या उन औरतों से जो इन हमलों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा रही हैं? 2014 में जब देश के 31 प्रतिशत वोटरों ने मौजूदा सरकार को चुना तो ज़्यादातर लोगों का तर्क था कि ये बहुमत की सरकार है, उस हिसाब से जब ज़्यादातर पुरुष महिला विरोधी होते हैं तो ये हैशटैग चला कर क्या साबित करना चाहते हैं?

इस बीच बहुत से सुझाव देने वाले भी आगे आ रहे हैं जिनके हिसाब से औरतों को अब सेल्फ़ डिफेंस सीखना चाहिए ताकि वो ऐसे मुश्किल भरे पलों में आत्मरक्षा कर सकें| इसी के साथ दिल्ली से ख़बर आती है कि लाइटर और माचिस को दिल्ली मेट्रो की निषिद्ध सूची से हटा दिया गया है और औरतें अब साथ में एक चाक़ू लेकर चल सकती हैं| इन सब सुझावों और ताज़ा घटनाक्रम से एक बात तो साफ़ है कि औरतें इस देश में सुरक्षित नहीं हैं और मुझे ये बताने की कोई ज़रूरत नहीं है कि किनसे| क्या अब भी उस हैशटैग को चलाने वाले कहेंगे कि नहीं सारे पुरुष नहीं बस कुछ ऐसे होते हैं, मतलब ये समाज और सरकार उन कुछ लोगों के सामने इतनी निरीह हैं कि उन्हें औरतों को ख़ुद को बचा सकने के तरह तरह के तरीके सोचने पड़ रहे हैं|


सेल्फ़ डिफेंस के इन हिमायतियों से मेरा एक सवाल है कि मास मोलेस्टेशन और गैंग रेप जैसे हादसों में आपका ये सुझाव किस तरह से कारगर है, या आप ये चाहते हैं कि औरतें/लड़कियां इसे अपनी किस्मत मान कर चुप बैठ जाएं? आंकड़ों की मानें तो 80 फ़ीसदी से ज़्यादा हादसों में अपराधी उस औरत/लड़की के जानने वाले होते हैं, उस हिसाब से देखें तो जिस घर को इन औरतों/लड़कियों के लिए सबसे सुरक्षित स्थान माना जाता है वही उनके लिए सबसे असुरक्षित है| अमेरिका के एक ग़ैर लाभार्थी संगठन The Rape, Abuse & Incest National Network (RAINN)  के अनुसार वहां हुए सिर्फ़ 46 फ़ीसदी रेप केस दर्ज़ किए जाते हैं, इससे आप उस मानसिकता को समझिए जिसके दबाव की वजह से ये केस दर्ज़ नहीं किए जाते | दो साल पहले प्रजा फाउंडेशन के जुटाए आंकड़ों से सामने आया कि 2011 से 2015 के बीच रेप के मामलों में 390 फ़ीसदी और मोलेस्टेशन के मामलों में 347 फ़ीसदी का इज़ाफ़ा हुआ और ज़्यादातर संगठनों के साथ साथ सरकार का भी ये मानना है कि अधिकतर केस रिपोर्ट ही नहीं होते हैं, तो आप बस अंदाज़ा लगाइए कि असल आंकड़े कितने डरावने होंगे|

लेकिन कहते हैं न कि आप एक तर्क देंगे तो सौ कुतर्क सुनने को तैयार रहें, उसी कड़ी में कुछ लोगों का ये कहना होता है कि जब लड़कियां सामने ही नहीं आती हैं तो कार्रवाई कैसे और किस पर हो| यहाँ मैं जुलाई 2012 में सीतापुर में घटे उस हादसे का ज़िक्र करना चाहूंगी जिसमें एक मामले की जांच कर रहे दरोगा और निगरानी करने वाला चौकीदार ही उस लड़की का बारी बारी से रेप करते रहे| ऐसे में आखिर शहरी इलाके तो जाने दीजिए, ग्रामीण या कस्बाई भारत में कोई महिला केस भी दर्ज कराने कैसे जाए? आंकड़े उठा कर जांचिए, पुलिस से लेकर अदालत तक स्त्री-पुरुष अनुपात क्या है?
मेरा क़ातिल ही मेरा मुंसिफ़ है
क्या मेरे हक़ में फ़ैसला होगा

अगर किसी का ये मानना है कि पुलिस की ये प्रवृति सिर्फ़ गाँव-कस्बे तक सीमित हैं तो उनको बता दूं कि 2015 में दिल्ली के कनॉट प्लेस जैसे एक भीड़भाड़ वाले इलाके में भरी दोपहर एक सड़क चलती लड़की को ज़बरदस्ती चूमने वाली घटना को दर्ज़ कराने गई उस लड़की का पुलिस द्वारा भी उत्पीड़न किया गया| पुलिस ने उससे उसकी कंप्लेंट सिर्फ़ इसलिए दो बार लिखवाई क्यूंकि उनके हिसाब से उसकी कंप्लेंट “साफ़” नहीं थी क्यूंकि वो पुलिस अधिकारी मानता था कि ज़बरदस्ती चूमना किसी तरह का मोलेस्टेशन नहीं| दरअसल हमारे समाज में पुरुषवाद से जातिवाद, जातिवाद से साम्प्रदायिकता और साम्प्रदायिकता से भ्रष्टाचार तक का संस्थानीकरण हो चुका है।


इन परिस्थितियों में भी इस तरह के एक हैशटैग का ट्रेंड करना चोर की दाढ़ी में तिनका ही है, इस प्रकार के हैशटैग या मानस के समर्थकों में पहली श्रेणी उन लोगों की है जो ऐसे हैशटैग चला कर एक मुद्दे को अपने केंद्र से भटकाने की साज़िश रचते हैं| ये लोग अपने निजी जीवन में भयानक रूप से महिला-विरोधी मानसिकता से ग्रस्त होते हैं और इनकी गालियों से लेकर इनके द्वारा साझा की गई सामग्री, रिश्तों में इनके बर्ताव सबके केंद्र में औरतों के प्रति हिंसा और नीचता साफ़ दिखती है| दूसरी श्रेणी वाले इनके कुछ साथी वो हैं, जो शायद हिंसक नहीं लेकिन कंडीशनिंग के असर से पितृसत्ता इनके अन्दर इस कदर बैठी हुई है कि औरतों का आवाज़ उठाना इन्हें अपने आधिपत्य पर चुनौती सा लगता है और ये बचाव की मुद्रा से शुरू होकर अचानक आक्रमक मुद्रा में आ जाते हैं| औरतों के उठाए हुए सवाल इन्हें इनकी ईमानदारी पर निजी सवाल लगते हैं और अंततः ये पहली श्रेणी वालों के साथ जाकर खड़े हो जाते हैं| इनका साथ देने वाली कुछ औरतें भी होती हैं, जिन्हें अपने अधिकारों के बारे में कोई जानकारी नहीं और जागरूकता के अभाव में ये उसी पुरुषवादी सोच के साथ जाकर खड़ी हो जाती हैं जो कभी इन्हें जागरूक होने भी नहीं देना चाहती|

दरअसल ये दिक्कत किसी व्यक्ति या वर्ग विशेष की न होकर एक पूरी मानसिकता और कंडीशनिंग की है जो हमें हमारे परिवार, समाज, धर्म और जाति से मिलती है| जब हम कहते हैं कि हमारी लड़ाई पुरुषवाद से है तो हम पुरुषों के ख़िलाफ़ नहीं उस मानसिकता, उस कंडीशनिंग के ख़िलाफ़ लड़ रहे होते हैं, जिसने उसे जन्म दिया| धर्म में अखंड आस्था रखने वालों को क्यूँ उन धार्मिक किताबों में लिखे औरतों पर हुए अत्याचार दिखाई नहीं देते? क्यों औरतों को पूजनीय कहकर उन्हीं के साथ मानसिक और शारीरिक हिंसा की जाती है? घर से लेकर दफ़्तर, सार्वजनिक स्थानों, मंच और लगभग सभी जगह कैसे लैंगिक इस कदर हावी हो गया कि हमें पता भी नहीं चलता और हम औरतों पर बेहूदी टिप्पणियां, चुटकुले, गालियां कहते, सुनते और नज़रंदाज़ करते जाते हैं?

जिन लोगों को औरतों का आवाज़ उठाना बेहद ख़ल रहा है वो बताएं कि घर से लेकर बाहर औरतें कहीं सुरक्षित नहीं तो ये किनकी वजह से है? किनसे उनकी सुरक्षा को ख़तरा है? क्यों साल दर साल रेप और मोलेस्टेशन की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं? क्यूं सिर्फ़ औरतों को सेल्फ़ डिफेंस सीखने की ज़रूरत है? क्यूँ पुरुषों में इस मसले को लेकर स्वीकारोक्ति नहीं है कि उन्हीं के बीच रहने वाले उनके पुरुष साथी ही औरतों की सुरक्षा के रास्ते का सबसे बड़ा रोड़ा है?


मैं नहीं जानती कि आप में से कितने लोग इमानदारी से ख़ुद से ये सवाल करेंगे और उनके जवाब खोजेंगे, अभी तो मुझे ये सोचना पड़ रहा है कि मैंने ये लिखा क्यूँ?
वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होती,
हम आह भी भरते हैं तो हो जाते हैं बदनाम

इला जोशी मूलतः उत्तराखंड से हैं, स्कूली पढ़ाई अंबाला से, एमबीए की डिग्री दिल्ली से ली और नौकरी मुंबई खींचकर ले गई। एक प्रिंटिंग हाउस के अंतरराष्ट्रीय सेल्स विभाग में कार्यरत। संपर्क: mailjoshiila@gmail.com
Blogger द्वारा संचालित.