पितृसत्ता के बदलते स्वरूप

डिम्पल
महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय , वर्धा,रिसर्चर ( स्त्री अध्ययन ) M.phil,संपर्क: dimpledu1988@gmail.com
लैंगिक वर्चववादी समाज में स्त्री-पुरूष के अधिकारों को लेकर द्वंद्व घर और बाहर दोनों क्षेत्रों में बना हुआ है . आधुनिक कहलाने व बनने की होड़ में वे केवल उन्हीं बातों को अपना रहे हैं, जिनसे उनके हित जुड़े हुए, बाकि को नजरअंदाज करते जाते हैं.   वे  ठीक से न तो आधुनिकता को ही ग्रहण कर पाते हैं और न ही परम्परा का दामन ही पूर्णत: छोड़ पाते हैं,  ऐसे में द्वन्द्ता का प्रश्न बना हुआ है- जिसका प्रभाव स्त्री – पुरूष के संबंधों पर भी देखा जा सकता हैं. यही कारण है कि आज भी महिलाओं के संबंध में घर व बाहर काम करने को लेकर बंधी भूमिकाओं में ज्यादा बदलाव नहीं आए हैं . इस पितृसत्तात्मक समाज में पुरूष अपने जीवन में समय व स्थिति के अनुसार बदलावों के नाम पर लीपापोती करने का प्रयास बखूबी कर रहा है, लेकिन महिलाओं को समान अधिकार तथा हक़ देने से अभी भी बच रहा है, जिसके विभिन्न पहलुओं पर चर्चा करना अनिवार्य हो जाता है .

पुरुष समाज की जेंडरगत अवधारणा में व्यवस्थित व्यवस्था के अंतर्गत अधिकारों की समानता को लेकर भयाक्रांत भी हैं,  जिसे कही न कही वह अपने एकाधिकारों को छिनने के रूप में भी देखता है, जिससे महिलाओं की यौनिकता , प्रजनन तथा कार्य क्षमता पर नियंत्रण के नए रूप इस व्यवस्था में सामने आ रहे हैं, जैसे सुपर मॉम, सुपर पत्नी आदि के कॉन्सेप्ट . अत: हम कह सकते हैं कि इस बदलते परिवेश व भूमिकाओं में महिलाओं पर स्त्रियोचित आदर्श के लबादे को इस कदर थोपा जा रहा. जिस पर समय समय पर विभिन्न प्रतिरोधी अभिव्यक्तियां भी सामने आयी हैं , अत: इस स्थापित पितृवत व्यवस्था में स्त्री –पुरूष संबंधों में द्वन्द्ता के प्रश्न दोनों के बीच मौजूद हैं, क्योंकि वह खुद को निर्धारित भूमिकाओं से इतर नहीं देख व समझ पा रहे हैं,  कारण घर – परिवार में स्त्री को स्त्री व पुरूष को पुरूष बनाने की प्रक्रिया उनकी संस्कार रुपी परवरिशों में शामिल की जाती हैं.   ऐसे में यदि कोई इस स्थापित व्यवस्था की व्यवहारिकी से इतर व्यवहार या अधिकारों की मांग करता है तो ऐसे में उसके प्रति समाज की हेय  दृष्टि काम करती हैं . महिलाओं के संदर्भ में अक्सर कहा जाता हैं कि पानी सर से ऊपर उठ चुका हैं इनमें शर्म लिहाज नहीं बची और तो और उन्हें  चरित्रहीन ,पथभ्रष्ट , घर तोडू कहा जाता है. कई बार उन्हें पुरूषों की होड़ करने वाली औरत या ज्यादा हो तो मर्दाना महिला तक की संज्ञा दे दी जाती है, ऐसे में महिलाओं की खुद की पहचान कहां ?

समाज में मनुवाद की ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक जड़े घुन की तरह इस तरह से रच बस गयी हैं कि इस बदले हुए परिवेश में वह नए रूप में हमारे समक्ष आ रही हैं, जिसे हम जाति , वर्ग , लिंग , क्षेत्र , भाषा , धर्म आदि के आधार पर भी समझ सकते हैं. महिलाओं पर महिलाओं द्वारा पैट्रिआर्की  के तहत नियंत्रण आदि को समझते हुए भी इसके विभन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला जा सकता है.

आज का पुरूष अपने लिए पढी -लिखी स्त्री की चाह तो रखता है, परंतु अपने हितों और शर्तों के अनुसार. ऐसे में महिलायें भी खुद को पुरूषों से कमतर देखने व समझने के अनुकूलन में ढल जाती हैं. समाज में जेंडर के आधार पर स्त्री व पुरूष के मन व मस्तिष्क को संरचनागत ढाँचे के अनुसार उनकी मनोवैज्ञानिकी तैयार करने की पूरी प्रक्रिया चलती है. यही कारण है कि इस बदलते परिवेश में पुरूष आज भी महिलाओं के प्रति बंधी बंधाई पारम्परिक रूढ़िवादी परिपाटियों से खुद को मुक्त नहीं कर पाता है,  न ही महिलायें ही खुद को पूर्णत: मुक्त कर पायी हैं . ऐसे में यदि कोई महिला या पुरूष इस स्थापित व्यवस्था से इतर जाने का प्रयास करता है तो उन्हें अन्य उदाहरणों द्वारा सचेत किया जाता हैं .ऐसे में समाज में व्याप्त विभिन्न ठेकेदार इस व्यवस्था को यथावत् बनाए रखने हेतु कई हथकंडो का सहारा लिया करते हैं, जैसे खाप पंचायत आदि .


पुरुष समाज की जेंडरगत अवधारणा में व्यवस्थित व्यवस्था के अंतर्गत अधिकारों की समानता को लेकर भयाक्रांत भी हैं,  जिसे कहीं न कहीं  वह अपने एकाधिकारों को छिनने के रूप में भी देख रहा है, जिससे महिलाओं की यौनिकता , प्रजनन तथा कार्य क्षमता पर नियंत्रण के नए रूप इस व्यवस्था में सामने आ रहे हैं, जैसे सुपर मॉम, सुपर पत्नी आदि के कॉन्सेप्ट . अत: हम कह सकते हैं कि इस बदलते परिवेश व भूमिकाओं में महिलाओं पर स्त्रियोचित आदर्श के लबादे को इस कदर थोपा जा रहा. जिस पर समय समय पर विभिन्न प्रतिरोधी अभिव्यक्तियां भी सामने आयी हैं  अत: हम कह सकते हैं कि ऊपर से नीचे तक व्यवस्था के अंतर्गत रची -गढ़ी साजिशों व रणनीति के तहत यह सब किया गया है. यही कारण हैं कि आज इतिहास में His Story से Her Story की बात सामने आती हैं

घर से  राज्य तक महिलाओं के अधिकारों के संबंध में लैंगिक हेजेमनी की स्थिति को विभिन्न तरह की संस्थाओं के संस्थानीकरण (विद्यालय ,कानून, विवाह, रीति-रिवाज़ तथा धार्मिक संस्थायें आदि व्यवस्थायें) द्वारा इसे बनाए रखने के उपक्रम के रूप में भी समझा जा सकता हैं .
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