देह दोहन का अधिकार! उर्फ ‘दास्ताने लापता’ : ( दूसरी क़िस्त कालाजल )

अरविंद जैन
स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने मह्त्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब 'औरत होने की सजा' हिन्दी में स्त्रीवादी न्याय सिद्धांत की पहली और महत्वपूर्ण किताब है. संपर्क : 9810201120
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रशीदा की तरह ही ‘दास्तान ए लापता’ ( मंजूर एहतेशाम, प्रथम संस्करण 1995) की अनीसा अपने मामू की वासना, यौन लिप्सा और यौन विकृतियां शान्त करने का साधन बनने को मजबूर है। दस साल की उम्र में (1953 में) अनीसा को मामूं के यहां रहना पड़ता है क्योंकि मां-बाप की अचानक मृत्यु हो जाती है। मामूं प्राइमरी स्कूल में टीचर हैं। ‘मुमानी मामूं को यौन सुख देने में समर्थ नहीं थी’ और ‘उन्हें सेक्स शब्द से ही घृणा हो गई थी’ इसलिए ‘मामूं का छूना तक गवारा नहीं रहा था।’ मामूं अपनी ‘उत्तेजना शांत करने के लिए’ जहां भी पहुंच सकते थे, अपना ‘मुंह मारते फिरते थे।’ समय और अनुभव ने मुमानी को बहुत कड़वा बना दिया था और मामू के पापों को गिनाते हुए अनीसा को ‘सावधान रहने की सलाह’ और मामूं के ‘भयानक प्लानों की चेतावनी’ देती रहती थी। उधर सचमुच मामूं अपने मनसूबे के तहत अनीसा को ‘धीरे-धीरे कल्टिवेट करते रहे’ और एक दिन मौका पाकर उन्होंने अपने ‘मन की मुराद’ भी पूरी कर ली। इसे उचित ठहराने के लिए या अनीसा को आत्महत्या की ओर जाने से रोकने के लिए या फिर  यौन हिंसा के बारे में बदली मानसिकता दर्शाने के लिए लेखक अनीसा ( सिगरेट और शराब पीती) का बयान यूं दर्ज करता है- ‘‘क्या कह कर याद करूं मैं अपने इस अनुभव को? घिन, नफरत, पाप यह सब तो शब्द हैं, कभी मजबूर होकर तो कभी मजबूर करने को दिमाग में आते हैं। ..उस पल का अपना रोमांच था और जो कुछ हुआ वह तय किया हुआ बहरहाल, मेरा नहीं था। नैतिक-अनैतिक जैसा कोई विभाजन मेरे दिमाग में होता भी तो मैं कर क्या सकती थी उस सूरतेहाल में?’’ मतलब ‘उस पल का रोमांच’ अनीसा की विवशता थी। थोड़ा आगे, बयान स्पष्ट करता है ‘‘मैं मामूं के टुकड़ों पर पल रही थी, मेरी पढ़ाई-लिखाई, कपड़े-लत्ते का खर्चा वह उठा रहा था, तो मेरा इतना दोहन करने का अधिकार भी उसका बनता था। ऐसा नहीं कि ऐसा बस, एक बार हुआ... जी नहीं। पूरे तेरह साल मैं मामूंके साथ रही और उनका एहसान उतारने को उन्होंने जब भी बुलाया, मैं बिना चूं-चरा किए उनके पास गई।’’ ( पृष्ठ-151)

पढ़ें: स्त्री  के सम्मान में  पढ़ा गया फातिहा:‘काला जल' (पहली क़िस्त)

 अगर इस तर्क से देखा जाए जो अनीसा के माध्यम से रचा-गढ़ा गया है, तो दुनिया के हर पिता या सौतेले पिता या संरक्षक को ‘इतना दोहन करने का अधिकार’ है या होना चाहिए। एक बार लेखक (नायक) को लगता है अनीसा से ‘हमदर्दी जताए या जिन्दगी को इस बहादुरी के साथ जीने के उसके हौसले की तारीफ और ताईद करे।’ मगर दूसरे ही क्षण सोचता है... ‘कहीं ऐसा तो नहीं कि यह सारी कहानी अनीसा की मनगढ़ंत और झूठी हो?’ ( पृष्ठ-151) और फिर  इसी नतीजे पर पहुंचता है कि ‘अनीसा एक छलावा और झूठ थी जिसे समझने में उससे बड़ी गलती हुई थी... सचमुच वह लड़की बहुत बड़ा धोखा थी।’’ ( पृष्ठ-154) क्या अनीसा का बयान लिख-लिखवा लिया गया है – किसी पुलिस अफसर की तरह? इसीलिए सब कुछ झूठ है झूठ।



सल्लो: कब्र में कितना अंधेरा है!
राजेन्द्र यादव के शब्दों में ‘सल्लो आपा हिन्दी उपन्यास के कुछ अविस्मरणीय चरित्रों में से एक है? या ‘मैं’ के किशोर-सेक्स की अभिव्यक्तियां... मगर ‘मैं’ यानी कथावाचक यानी बब्बन कमजोर चरित्र है, पहले वह मोहसिन के प्रभाव से आतंकित, आच्छन्न रहते हैं, फिर  सल्लो आपा के मुग्ध प्यार में...’’ ( पृष्ठ-घ) इस प्रश्न का कोई जवाब दिए बिना ही यादव जी आगे की यात्रा पर किसी दूसरी टेªन में सवार हो जाते हैं। कुछ दूर जाने के बाद उन्हें ‘अविस्मरणीय चरित्र’ यानी सल्लो आपा के बारे में लगता है. .. ‘‘सल्लो घर की चारदीवारियों से बाहर आना चाहती है – निषिद्ध  को अपना कर, यानी अश्लील पुस्तकें देखकर, लड़कों के कपड़े पहनकर, उनकी आदतें और अदाएं अपनाकर... और उसकी इस मासूम, स्वाभाविक छटपटाहट को जिसका अगला रूप रशीदा में है, ( संभवतः) गर्भपात के प्रयास में समाप्त कर दिया जाता है...’’ ( पृष्ठ-घ) न जाने क्यों, उन्हें सल्लो का अगला रूप रशीदा में नजर आता है और किस रूप में नजर आता है? खैर... ‘‘घर भर में सल्लो आपा का व्यक्तित्व सबसे अलग और अनूठा था। लंबा-छरहरा शरीर, सांवला रंग और हंसने से उस पर खिलते हुए कतार से जमे और छोटे-छोटे दांत तथा खूब तीखी नाक।’’ ( पृष्ठ-156) उसके ‘‘शरीर से एक महक उठकर धीरे-धीरे घेरने लगती, जिसका भरपूर एहसास तब होता जबकि वह उठती या हवा को काटती हुई एक झटके के साथ अचानक पास आ बैठती।’’ ( पृष्ठ-166) जिस्म... ‘‘मांसल और भरा हुआ।’’ ( पृष्ठ-25) और ‘सुपुष्ट कंधे, उभरे मांस वाली जवान पीठ।’’ (पृष्ठ-257) उसके कमरे की दीवारों पर ‘‘दो-तीन फिल्मी तस्वीरें एकाध भड़कीले कैलेंडर’’ टंगे रहते। ( पृष्ठ-257-58) ‘खराब ( गंदी) किताब’ की ‘वाहियात तस्वीरें’ देखते समय सल्लो का ‘सारा चेहरा लाल-गुलाल हो गया है, सीना जोर-जोर से उठ-बैठ रहा है, लेकिन ‘तोबा’ कहने के बावजूद, नजर है कि जैसे किताब के पन्नों में चस्पां होकर रह गयी है।’’ ( पृष्ठ-173) मगर कहती है, ‘‘जब तुम देख सकते हो तो मैं क्यों नहीं देख सकती?’’ (पृष्ठ-171) मरदानी पोशाक पहनने पर जब बब्बन प्रश्न करता है, तो सल्लो का जवाब है ‘‘तुम लोग रोज पहनते हो, मैंने सोचा कि लाओ, आज हम भी पहनकर देखते हैं।’’ ( पृष्ठ-250) सल्लो द्वारा सिगरेट पीने पर बब्बन स्वीकारता है ‘‘सच कहूं, मुझे भीतर धक्का लगा। अंग्रेज या विदेशी औरतों के विषय में सुन रखा था कि मरदों की तरह सिगरेट पीती हैं, लेकिन हिन्दुस्तानी और वह भी अपने की लड़की को इस तरह सिगरेट पीते देखूं, यह सपने से भी दूर की बात थी।’’ ( पृष्ठ-251) क्योंकि वह सपनों में ‘विवस्त्रा’ सल्लो का ‘जल भीगा शरीर’ तो देख सकता है, देख सकता है चोरी-छिपे गुसलखाने में नहाती सल्लो को, मगर उसे ‘सिगरेट पीते’ नहीं देख सकता। इन रूपों में देखते-सोचते-स्वीकारने पर ‘भीतर धक्का’ लगता है और सारे सवालों का एक ही जवाब मिलता है ‘‘ आपा के इस साहस (दुस्साहस) के पीछे क्या सस्ती फिल्मों का प्रभाव नहीं है?’’ ( पृष्ठ-253)

‘सस्ती फिल्मों’ और ‘गन्दी किताबों’ का प्रभाव सिर्फ सल्लो पर ही नहीं पड़ा है - बब्बन के अब्बा से अब तक पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस प्रभाव में रही है। पर्दे पर स्त्री को लगातार ‘बेपर्दा’ किया जाता रहा है क्योंकि पुरुषों के यौन मनोरंजन के लिए नग्न स्त्री की उत्तेजक देह छवियां सबसे अधिक मुनाफे का व्यापार है। अरबों-खरबों रुपये-डालर-पौंड का बाजार, जो मुख्यतया मर्दों के हाथ में है। सौंदर्य व्यवसाय की सबसे अधिक उपभोक्ता स्त्रियां है और यौन व्यवसाय के उपभोक्ता पुरुष। इस षड्यंत्र के दुष्चक्र में अधिकांश स्त्रियां शोषित हैं या जाने-अनजाने हुई शिकार। सल्लो इस षड्यंत्र की ही एक और शिकार है। चारों तरफ से बंद खंडहर में कैद सल्लो सांस लेने के लिए एक खिड़की खोलना चाहती है, परन्तु किले की दीवार तोड़ने की कोशिश में ही मारी जाती है। खंडहर भी तो ऐसा है जहां ‘न नयी इमारत बनती है और न पुरानी टूटती है।’’ ( पृष्ठ-10) सल्लो सचमुच बब्बन से बेहद प्यार करती है और इस दिशा में पहल भी, लेकिन बब्बन सल्लो के प्यार में मुग्ध होने के बावजूद ‘कमजोर, भीरू, संकोची और साहसहीन’ ही नहीं, बल्कि संस्कारों की सीलन और गहरे अपराध बोध से भी ग्रस्त रहता है। हीनभावना से उभर ही नहीं पाता। उम्र के सवाल पर मन ही मन विश्वासपूर्वक कहता है ‘‘मैं किस मानी में छोटा हूं और पुरुष नहीं हूं?’’ ( पृष्ठ-258) सल्लो के हर एक स्पर्श में ‘झनझनाती हुई सिरहन’- नशे सी लगती है। एक दिन...’’ अचानक अपनी ठोड़ी पर नरम हथेली की पकड़ महसूस हुई और कान पर दो गर्म-गर्म
होठ एक क्षण के लिए आ टिके। ऐसा करने से उनके (सल्लो के होठों तथा गालों के स्पर्श ने मेरे कानों को भी लमहे-भर के लिए तपा दिया था। सारे शरीर की रगों में एक झनझनाती हुई सिरहन उतर गई और जैसे नशे के बोझ से दोनों आंखें अपने-आप मूंद गयीं।’’ ( पृष्ठ-169) पुरुष ‘थोड़ी देर के लिए सब भूल गया’ मगर...
फिर  कुछ रोज बाद बब्बन ने देखा कि सल्लो के ‘‘चेहरे का रंग फूल-जासनी हो गया है, आंखें नहीं खुलती और मेरी पकड़ का विरोध करता हुआ हाथ निश्चल पड़ गया है। उसके क्षण-भर बाद उन्होंने दोनों हाथों से अपना चेहरा मूंद लिया और सामने झुक गयीं। कुछ क्षण वैसे भी निकल गए, फिर  धीरे-धीरे झुकता हुआ उनका धनुषाकार शरीर मेरे घुटनों के इतने निकट आया कि पहले मैंने हरारत महसूस की और फिर  एक अपरिचित, नरम-नरम तथा मांसल स्पर्श ने रोशनी की-सी तेजी से एकबारगी झकझोरकर, मुझे बिल्कुल अवश कर दिया।’’ ( पृष्ठ-272)



सल्लो के आत्मीय स्नेह, सम्मान और कुछ ‘स्पर्शों’ या ‘मांसल स्पर्शों’ के परिणामस्वरूप ही बब्बन ‘बेचैनी के मारे करवट बदलता’ रहता है और ‘चैबीसों घंटे, सल्लो आपा की तस्वीर आंखों के आगे’ तैरती रहती है - ‘कोई घड़ी खाली नहीं जाती जब उनकी निकटता की चाह न होती हो।’ ( पृष्ठ-273) बब्बन को गहरे लगता है ‘‘जैसे उनके बिना मेरी कोई सार्थकता ही न हो’’ ...मन करता है ‘‘सब छोड़-छाड़ कर उनके निकट जा बैठूं, वह बोलती जाएं, मैं सुनता रहूं, वह हंसी के मारे दोहरी हो-हो जाएं और मैं बिना बाधा दिए चुपचाप देखता रहूं।’’ ( पृष्ठ-273-274) बब्बन सोचता-समझता और महसूस करता है, परन्तु अपने को बाहर अभिव्यक्त नहीं कर पाता है। पारिवारिक तनाव, क्लेश और स्वभाव भी तो उसकी सीमाएं हैं। सब कुछ होने-जानने के बाद भी, बब्बन के दिल में सल्लो की अमिट स्नेह स्मृतियां बनी रहती है। इसकी अचानक और अप्रत्याशित मौत का विश्वास ही नहीं कर पाता। उसे लगातार यही लगता है कि ‘‘जरूर कोई साजिश करके लोगों ने उन्हें कहीं छिपा या भेज दिया है।’’ ( पृष्ठ-293) दूसरी तरफ सालों बाद भी वही अपराधबोध और प्रश्न ‘‘आपा को सोचते हुए मन लज्जा से क्यों भर जाता है? क्या मैं कहीं अपराधी हूं? यह क्या है कि उनकी स्मृति तक से मुंह छिपाया जाए या झटक-झटककर अपने को दूर-दूर रखने की कोशिश की जाए? और उसके मूल में क्या है? ईर्ष्या संजीदगी की कमी, हल्कापन या किसी ऐसे गुनाह का एहसास जो मेरे मस्तिष्क की परतों में पैबस्त है और मुझे बरसों से हाट करता रहा है?’’ ( पृष्ठ-269) ...‘‘क्या मेरे भीतर कहीं कोई अपराधी बैठा है जो आपा के बारे में फू पफी से रूबरू कुछ भी पूछने नहीं देता।’’ ( पृष्ठ-294) बब्बन की तकलीफ का कुछ अनुमान इन शब्दों से लगाया जा सकता है। ‘‘या अल्लाह, यह पीड़ा भी मुझे ही झेलनी थी कि उनके (सल्लो के) नाम से शबेबरात की फातिहा एक दिन मैं ही दूं और वह भी उसी घर में आकर जहां की दीवारों में उनकी पाजेब की आवाज मुंहबंद सोयी है।’’ ( पृष्ठ-268) बब्बन की पीड़ा में सल्लो की रूह बसी है और स्मृतियों में सारे कथासूत्र। बब्बन और सल्लो आपा के बीच सन्नाटे में संवाद की संभावनाएं और घरेलू सूनेपन में स्नेह और सहानुभूति के अंकुर पनपते हैं। दोनों एक-दूसरे के स्पर्श सुख के सपने भी देखते हैं और मनोकामना भी करते हैं। सल्लो के स्पर्शों के पीछे छिपी सांकेतिक भाषा को बब्बन, संपूर्णता में सही-सही नहीं समझ पाता। नहीं पहचान पाता देह और कामना के ‘रहस्यमय’ अर्थ। उसके लिए सब कुछ ‘रहस्यमय’ और ‘अस्पष्ट’ है - ‘पुरुष’ होने-समझने के बावजूद।

सल्लो न जीने से डरती है और न मरने से, जबकि बब्बन दोनों से डरता है। सल्लो को बब्बन से अपेक्षित ‘रिस्पोंस’ नहीं मिलता है तो शायद वह दूसरी दिशा में मुड़ (भटक) जाती है। धीरे-धीरे बब्बन को ( जगदल पुर छोड़ने से पहले) महसूस होता है ‘सभी मुझसे निर्लिप्त हैं, अपने-आपमें मस्त और व्यस्त, किसी का दुःख किसी को नहीं... मुझे पता नहीं था कि इसी घर में एक ऐसी वितृष्णा...’’ ( पृष्ठ-280) क्योंकि शहर छोड़ने के समाचार को सल्लो ने ‘तटस्थ भाव से परायों की तरह’ सुना और बिना किसी अफसोस या दुख के अनसुना कर दिया। दूसरी घटना यह हुई कि सल्लो के कमरे में बैठे हुए बब्बन को तकिये के गिलाफ में से (गिरा) एक पुर्जा मिल जाता है। उस समय बब्बन को लगता है ‘‘यह बहुत ही अच्छा हुआ कि मेरी आंखों के सामने से पट्टी हट गई और उस एक जरा-से पुर्जे में आपा को मैंने बिल्कुल साफ-साफ और सही-सही देख लिया, वरना शायद जगदलपुर
इतनी आसानी से नहीं छूटता।’’ ( पृष्ठ-280-281) सल्लो की मृत्यु का समाचार मिलता है तो स्मृतियां सामने आ खड़ी होती हैं. .. मरदाना लिबास, ‘‘सिगरेट, चाकलेटी पतलून और तकिये के गिलाफ से गिरी हुई चिट्ठी जो इतनी गिरी हुई थी कि शायद किसी दूसरे के सामने कभी पढ़ी नहीं जाती। आपा की अनायास मृत्यु क्या उसी की चरम परिणति थी?’’ ( पृष्ठ-284) सल्लो की मृत्यु के पीछे क्या कारण रहे-कोई नहीं जानता। अनुमान लगाया जा सकता है कि गर्भ गिराने के प्रयास में ही मौत हुई होगी। गर्भ किससे ठहरा? इस सवाल का भी स्पष्ट कोई जवाब नहीं मिलता। सिर्फ दो सूत्र या संकेत हैं। पहला सूत्र है चिट्ठी और दूसरा चाकलेटी पतलून। सल्लो के कमरे में टंगी चाकलेटी पतलून को देखते ही बब्बन का सिर घूमने लगता है। ‘‘एकाएक चिनगारी फूटने-जैसी एक पिछली स्मृति सहसा आ छिटकी और वैसी ही जलन के मारे मैं तिलमिला गया.. गत मुहर्रम की पांच और दस तारीखों को जिस युवक को सिगरेट पीते हुए बारहा आपा के इर्द-गिर्द देखा था, उसके शरीर पर भी ऐसी ही पतलून थी। यही चाकलेटी रंग और संभवतः यही कपड़ा... गए दिनों जिस मरदाना लिबास में सल्लो आपा मेरे घर आयी थी, वह कैसा था?’’( पृष्ठ-278) जाहिर है उस दिन सल्लो ने यही चाकलेटी पतलून पहनी हुई थी।

‘चाकलेटी रंग की पतलून वाले युवक’ के बारे में विस्तार से ( पृष्ठ-207 पर) पहले ही बताया जा चुका है। यहां भी शानी जी पतलून और चिट्ठी के आधार पर वैसे ही जांच-पड़ताल करते हैं जैसे पेटीकोट और बेलमोगरा के आधार पर मालती कांड की करते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि यहां ये सूत्र (सबूत) बब्बन को बाइज्जत बरी करने के लिए हैं- वरना ‘संदेह की सूई’ उसी के आस-पास घूमती रहती। बब्बन यानी कथावाचक यानी स्वयं लेखक। सल्लो का झूठ फूफी उसी दिन पकड़ लेती है, जिस दिन वह मरदाने लिबास में बब्बन के यहां से लौटती है और इसीलिए गुस्से में चिल्लाती हैं ‘‘हरामखोर, बदजात, कमीनी... कहां मरने गई थी? किसके साथ गई थी? कहां?’’ ( पृष्ठ-260) बब्बन के यहां इतनी देर नहीं रह सकती-फूफी जानती है। फूफी फिर कहती है ‘‘देख सल्लो, तू मुझको सच-सच बता, नहीं तो फिर आने दे तेरे अब्बा को, उनसे कहकर मैं तेरी खाल खिंचवाती हूं।’’ बब्बन की अम्मा का कहना है ‘‘मुझे पहले ही शक था कि सल्लो यही दिन दिखाएगी। एक-दो बार मैंने छोटी को इशारा भी
किया था कि वह उसे संभाले, पर उसने ध्यान नहीं दिया। मैं अब साफ-साफ क्या कहती?... ऐसी-वैसी खबरें तो मैंने जगदलपुर रहने के दौरान ही सुनी थी। जानती थी कि उस लड़की के रंग-ढंग ठीक नहीं, इसलिए मैंने कभी पसंद नहीं किया कि बब्बन वहां ज्यादा आए-जाए, लेकिन वह था कि रात-दिन वहीं घुसा रहता था। मैंने अपनी आंखों से देखा कि...’’ ( पृष्ठ-283) कथा का सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि ‘‘अफशां तो ब्याहता लड़कियां लगाती हैं’’ मगर गवाही के दौरान फूफी ने स्वीकार किया है ‘‘हां, जानती हूं, सल्लो कुंआरी ही मरी है, लेकिन... मेरे लाख मना करने, गालियां बकने और कई बार मारने-पीटने पर भी उसने मांग में अफशां भरना कभी नहीं छोड़ा था।’’ ( पृष्ठ-269) इसका साफ-साफ मतलब यह है कि सल्लो कुंआरी नहीं ब्याहता थी। किसकी ब्याहता थी - यह शायद सिर्फ सल्लो ही जानती थी। कुंआरी होती तो (मना करने, गालियां सुनने या मार-पीट के बावजूद) मांग में अफशां क्यों भरती? हो सकता है उसने चोरी छिपे ब्याह कर लिया हो और शायद उसी से गर्भवती (?) भी हुई हो। अगर नहीं, तो क्या सल्लो अपनी मांग में बब्बन के नाम का अफशां भरती थी? नहीं,... हां,... ऐसा भी तो हो सकता है वरना बब्बन बार-बार क्यों कहता है ‘‘क्या मेरे भीतर कहीं कोई अपराधी बैठा है...?’’ या ‘क्या मैं कहीं अपराधी हूं?’ या फिर  वो कौन से ‘गुनाह का एहसास’ है जो बब्बन को ‘बरसों से हाण्ट करता रहा है?’ मांसल स्पर्शों के संदर्भ में हुई ‘ग्लानि तो दो-एक दिन में कपूर की तरह गायब’ हो गई थी। ‘फिर वैसी कोई ( अपराध) भावना आती भी तो कच्चे मटके पर पड़ी बूंद की तरह फिसल कर निकल जाती’ थी। ( पृष्ठ-273)

सबूतों के अभाव में बब्बन को ‘संदेह का लाभ’ भले ही मिल जाए, मगर पूर्णतया निर्दोष तो नहीं ही ठहराया जा सकता। संभव है कथावाचक उपर्फ बब्बन ने अपने विरुद्ध सारे सबूत नष्ट कर दिये हों या जानबूझ कर सारा दोष (संदेह) चाकलेटी पतलून वाले युवक के मत्थे मढ़ने की कोशिश की हो - ताकि सारा मामला रहस्यमय बना रहे बब्बन की अम्मी की गवाही कि ‘उस लड़की के रंग-ढंग ठीक नहीं’ – विश्वसनीय नहीं कही-मानी जा सकती। फू फी भी इतनी नासमझ तो नहीं कि कुंआरी बेटी द्वारा रोज मांग में अफशां भरने के अर्थ-अनर्थ न जानती हो - ‘लाख मना करने, गालियां बकने और मारने-पीटने’  के बावजूद। फिर यह कौन है और क्यों कहे जा रहा है - हरामखोर, बदजात, कमीनी, कुतिया, रण्डी, बाजारू, हरामजादी, छिनाल, कुलटा और चरित्राहीन। सल्लो ने एक दिन बब्बन से कहा था कि ‘‘मरने से नहीं डरती, डर तो मुझे कब्र से बहुत लगता है।’’ बब्बन ने पूछा ‘कब्र से कैसे?’ तो सल्लो ने बताया ‘‘तुमने खुदी हुई कब्र नहीं देखी? कितनी छोटी और जरा-सी जगह में लोग मुरदे को अकेले डाल जाते हैं। सोचती हूं, तख्ते-मिट्टी के पटाव के बाद भीतर कितना अंधेरा हो जाता होगा, फिर  कीड़े, सांप और बिच्छू... हाय अल्लाह, मैं तो कभी दफन होना नहीं चाहती... इससे अच्छा तो यह कि मरने के बाद आदमी के शरीर को जला दिया जाये या दूर, किसी खुले मैदान में रख दिया जाए ताकि गिद्ध चील नोच खायें...’’ ( पृष्ठ-284) स्मृति में सहेज कर रखी सल्लो की वसीयत पढ़ने के बाद, बब्बन ने ‘सारी घृणा, क्रोध या ईर्ष्या भूल कर मन ही मन दुआ की थी कि खुदा सल्लो को बख्शे, उनकी रूह को सुकून दे और फूफी को मां होने के नाते सब्र...’’ ( पृष्ठ-284) कब्र से बंद घर ( परिवारों) में भी स्त्रिायां सचमुच कितनी ‘अकेली’ ( असुरक्षित और आतंकित) होती हैं - चारों तरफ सुरक्षा प्रहरी। ‘भीतर कितना अंधेरा’ और बाहर संबंधों के ‘सांप, कीड़े और बिच्छू’ हैं। रोज जिन्दा औरतें जल (जला दी) जाती हैं - बदनामी के डर या परिवार की प्रतिष्ठा के लिए। सरेआम स्त्री देह को ‘गिद्ध-चील’ नोचते-खसोटते रहते हैं। घरेलू हिंसा हत्या, दहेज हत्या, आत्महत्या, बलात्कार, यौन शोषण, मानसिक-शारीरिक उत्पीड़न और अन्याय या अत्याचार झेलती आधी दुनिया के लिए मौजूदा विवाह संस्था (घर-परिवार-संबंध) किसी कब्र या चिता से कम खौफनाक नहीं। मुझे लगता है कि ‘कालाजल’ में इस संवाद के बाद एक भी और शब्द की गुंजाइश शेष नहीं रह जाती। अंतिम अध्याय (सोलह) की सल्लो आपा संबंधी सामग्री को, इसी अध्याय में शामिल कर लिया जाता तो बेहतर होता। मोहसिन संबंधी सामग्री को किसी अन्य अध्याय में भी रखा जा सकता था। अगर सल्लो आपा की अलिखित वसीयत के साथ ‘कालाजल’ का समापन हो(ता) तो वास्तव में यह उपन्यास ‘युगों से चली आ रही आस्था और विश्वास’ की प्रार्थना छोड़ने और ‘पूर्वजों की अस्थियों से मुक्ति’ का घोषणा पत्र बन पाता। अपने समय की स्त्री संवेदना और उसके अस्तित्व तथा अस्मिता के सवालों को अतीत से भविष्य तक में देखते-समझते-परखते हुए शानी जिस विलक्षणता और सूक्ष्मता से स्पर्श करते हैं, वो अपने-आप में अभिव्यक्ति का अनोखा अनुभव है। ‘कालाजल’ पढ़ते हुए मुझे एक भी ऐसा कथाशिल्पी याद नहीं आ रहा, जिसने स्त्री को इस अन्तर बोध से जानने-समझने का प्रयास भी किया हो। इतने स्नेह, सम्मान और समानभाव से। अपने समय की तमाम सीमाओं का अतिक्रमण है - ‘कालाजल’।

‘डरता कौन है शानी से?’
छह फरवरी 1995 को जब ‘कालाजल’ का अमर कथाशिल्पी नहीं रहा तो मार्च 1995 के ‘हंस’ के संपादकीय (‘डरता कौन है शानी से?’) में राजेन्द्र यादव ने लिखा था- ‘‘शानी की यह यात्रा (बस्तर से दिल्ली वाया भोपाल) गुलशेर खां से शानी और फिर गुलशेर खां शानी बन जाने की यात्रा है यानी पहले वह मुसलमान था, फिर इस सांचे को तोड़कर लेखक बना, मगर धीरे-धीरे मुसलमान हिन्दी लेखक बन कर रह गया... ‘‘तुम अल्पसंख्यक होने की तकलीफ कभी नहीं समझ पाओगे?’’ दर्द से उसने न जानी कितनी बार कहा होगा, ‘उनका डर, उनकी असुरक्षा-भावना, दहशत से उनका एक-दूसरे से चिपका रहना, हमेशा शक और संदेह की तेज रोशनियों के बीच घिरे होने का अहसास...’’ और दूसरे ही पल गुस्से में तड़पकर ‘‘तीन पीढ़ियों से मैं मुसलमान हूं और वही बने रहना चाहता हूं। यह मुल्क, यह जबान, यह राष्ट्र सिर्फ उनके बाप का नहीं, मेरा भी उतना ही है जितना उन हरामजादों का। मैं उनकी शर्तों और कृपा पर यहां का नागरिक नहीं हूं। यों खत्म कर दूं मैं अपनी आइडेंटिटी...? सिर्फ इसलिए कि मैं अल्पसंख्यक हूं... मुझसे क्यों मांग की जाती है कि मैं हर बार अपने को वो साबित करूं जो वे चाहते हैं?’’ फिर  अगले ही क्षण भावुक होकर विगलित हो जाता, ‘‘कुछ कहो राजेन्द्र, आदमी साला न हिन्दू होता है, न मुसलमान। वह सिर्फ आदमी होता है।’’ शानी और गुलशेर खां के भयानक अंतर्विरोधों के बीच टक्करें मारते व्यक्ति की भीतरी यातना का नाम था ( है) शानी... एक सुलगता, सुरसुराता बम जो कभी भी साहित्य की दुनिया में विस्पफोट कर सकता था।’’ उन्होंने आगे लिखा है ‘‘...उसमें जगदलपुर के आदिवासी की जिजीविषा और पठान होने की आक्रामकता थी... अद्भुत भाषा का धनी था शानी... इतना जानदार और शानदार गद्य लिखने वाले हिन्दी में दो-चार से अधिक नहीं हैं... बहुत सख्त पसंदों और नापसंदों का व्यक्ति था शानी... गुस्सा और आवेश उसके स्थायी भाव। उद्दाम-संवेग संचारी भाव थे... अगर शानी न होता तो हम, आत्ममुग्धों, संस्कृति-धर्म की स्व-घोषित इकहरी महानताओं के शंखों-घोंघों में कैद जगद्गुरुओं को झकझोर कर कौन दिखाता कि बहुसंख्यकों के बीच अकेले और असुरक्षित होना क्या होता है। क्या हेाता है पाकिस्तान, बांग्लादेश और कुवैत में हिन्दू होकर रहना।’’ . ..अगर शानी न होता तो...!!!???!!!

‘अगर शानी न होता तो...?’
प्रख्यात आलोचक गोपाल राय के अनुसार ‘‘शानी से पहले प्रेमचन्द, यशपाल, वृन्दावन लाल वर्मा आदि ने अपने उपन्यासों में सीमित अनुभव के आधार पर मुस्लिम जीवन का अंकन किया था, पर यह विषय किसी ऐसे संवेदनशील और प्रतिभाशाली उपन्यासकार की प्रतीक्षा कर रहा था, जो खुद उस जीवन का अभिन्न अंग हो। शानी इस बात को बहुत शिद्दत के साथ महसूस करते थे कि हिन्दी उपन्यास में मुस्लिम जीवन का चित्रण बहुत कम हुआ है। कहा जा सकता है कि शानी ने इस अभाव को दूर करने की गौरवपूर्ण शुरूआत की।’’ ( हिन्दी उपन्यास का इतिहास, 2002, पृष्ठ-290) इसके बाद के उपन्यासकारों ने शानी की परम्परा को ही आगे बढ़ाया है। राही मासूम रजा, बदी उज्जमां, मंजूर एहतेशाम, नासिराशर्मा, अब्दुल बिस्मिल्लाह, मेहरून्निसा परवेज से लेकर असगर वजाहत तक ने ‘आधा गांव’ से लेकर ‘सात आसमान’ तक की लम्बी यात्रा तय की है। अगर शानी न होता तो ‘यहां तक का सफर कैसे हो पाता? शानी ने पिछड़े मुस्लिम समाज की परंपरा, जीवन दृष्टि और दर्शन तथा समसामयिक कटु यथार्थ और चिंताओं को ही अभिव्यक्ति नही दी, बल्कि उसकी विकृतियों और विसंगतियों को रेखांकित करके, भविष्य का पूर्वाभास और दिशा संकेत भी निर्धारित किये हैं। शानी सिपर्फ मील का पत्थर ही नहीं, बल्कि इस साहित्य यात्रा में ‘लाइट हाउस’ भी है, और रहेगा। मैं गर्व से कह सकता हूं कि मैंने भी शानी को देखा है। हालांकि सिर्फ दो-तीन बार, दूर से ही देखा है।

काला जल की कथाभूमि
‘कालाजल’ प्रख्यात कथाकार गुलशेर खान शानी का अद्वितीय और कालजयी उपन्यास है और एक प्रामाणिक ऐतिहासिक दस्तावेज भी। शानी जी के शब्दों में ‘इस उपन्यास ने मुझे वह सब कुछ दिया जिसकी मुझ जैसे लेखक को कल्पना भी नहीं थी। यश, मान, सम्मान, पैसा, असंख्य पाठकों का स्नेह और टेलीविजन पर प्रसारण के चलते अपार लोकप्रियता भी।’’ राजेन्द्र यादव के अनुसार ‘‘अपनी भाषा, विवरणों और वर्णनों की बारीकियों और सब मिलाकर क्लासिकीय औपन्यासिक तेवर के लिए ‘कालाजल’ हिन्दी के कुछ सर्वश्रेष्ठ स्वातंत्रयोतर उपन्यासों में से एक है।’’ प्रथम संस्करण की भूमिका में शानी ने लिखा था- ‘‘इस रचना की भूमिका के रूप में मुझे कुछ नहीं कहना है, सिवाय इसके कि जिस जीवन की विडम्बना या विभीषिका इसमें चित्रित है वह सायास, साग्रह या केवल वैशिष्ट्य के लिए नहीं- मेरी अपनी विवशता ही इसका कारण है। और किसी की निरूपायता या आंतरिक विवशता के लिए आपके मन में यदि थोड़ी सी भी संवेदना है, तो मैं विश्वास दिला सकता हूं कि इसे पढ़ते हुए यापढ़कर आपको कोफ़्त  नहीं होगी। अपनी ओर से मुझे इतना ही कहना चाहिए कि इसे  मैंने गंभीरतापूर्वक, पूरी निष्ठा, सच्चाई और ईमानदारी से लिखा है और इसकी सृजन प्रक्रिया के बीच मेरी मनःस्थिति उस प्रार्थनारत व्यक्ति की तरह रही है, जो अत्यन्त निश्छलतापूर्वक सिजदे में पड़ा हो - सभी से कटा हुआ, एकाग्र और तल्लीन!’’

 ‘नये संस्करण पर एक संवाद’ में हैरानी और अविश्वास से शानी को ‘‘यह सोचकर ताज्जुब-सा होता है कि आज से लगभग बत्तीस साल पहले जब यह उपन्यास लिखा तो मेरी उम्र सिर्फ अट्ठाईस बरस थी।’’ उन्होंने आगे लिखा है ‘‘शबेबरात की फातिहा की एक रात इस उपन्यास का बीज पड़ा था-बिल्कुल अनजाने में। उस रात फिर  मैं सो नहीं पाया था। फिर  वही क्या आने वाली कई रातें मेरे लिए हराम हो गई थीं। आज भी अपने पास सुरक्षित काला जल की हस्तलिखित पाण्डुलिपि पर नजर डालता हूं तो विश्वास नहीं होता। 27 अगस्त 1960 शनिवार की रात मैंने इसकी शुरूआत की थी और जब यह खत्म हुआ तो वह 3 नवम्बर 1961 की आधी से गुजरी हुई रात थी।’’ दुर्भाग्य कि ‘‘सन् 1962 से लेकर लगभग 1965 तक यह राजकमल प्रकाशन के पास स्वीकृत पड़ा रहा’’ और ‘‘सन् 1965 में अक्षर प्रकाशन के पहले सेट की धूम के साथ कालाजल बिल आखिर प्रकाशित हुआ।’’ तब तक ‘कथा-भूमि जगदलपुर कभी का छोड़ चुका था।’ रचनात्मक अनुभव के बारे में शानी जी बताते हैं ‘‘छोटी फूफी के पास बैठते ही न सिर्फ उनके आसपास की जिन्दगी बल्कि उनके पहले और बाद की दो पीढ़ियों का समाज अपने आप खिंच आया - मखनातीस की तरह। यह वह समाज था जिसे हिन्दी में इससे पहले अनदेखा किया जाता रहा था और जिसके बाद ही राही मासूम रजा का ‘आधा गांव’ जैसा उपन्यास आया। फिर तो मुस्लिम लेखक भी आए और मुस्लिम-अनुभव भी - उस झूठ को खोलते हुए कि हिन्दी साहित्य सिर्फ हिन्दू साहित्य नहीं है और यह कि केवल हिन्दू अनुभव भारतीय अनुभव की सीमा नहीं है। अगर ऐसा होता तो अमेरिकी साहित्य में हेमिंग्वे के साथ-साथ रिचर्ड राइट, राल्फ एलिसन, या जेम्स बाल्डविन और एलिस वाकर अपने अश्वेत-अनुभव के आक्रोश भरे लेखन के लिए और नोबेल पुरस्कार विजेता इसाक बाशेविस सिंगर अपने कोरम को यहूदी-अनुभव के लिए समाज में समादृत न होते।’’

कालाजल: ‘दुर्भाग्य की काली छाया’

 ‘आलोचना’ के संपादक परमानन्द श्रीवास्तव का विचार ( विश्लेषण) यह है कि ‘‘कालाजल आंचलिक उपन्यास के रूप में ऐसे अंचल का उदास वृतान्त है जिसमें जीवन एक निरंतर क्षय की ओर उन्मुख है। चीजें खत्म हो रही हैं और नया जैसा कुछ बनने नहीं जा रहा है। एक सीमित सिकुड़ा हुआ परिवार-वृत्त जो एक पूरे समाज का आख्यान न भी हो, एक खास दौर की पस्ती और हताशा को प्रत्यक्ष करता है। यहां न ‘गणदेवता’ - जैसा कोई देबू है, न ‘मैला आंचल’ - जैसा कमला-प्रशांत संबंध की स्वीकृति से जन्म लेनेवाला कोई भविष्य स्वप्न इस उपन्यास में जीवन का नकार तो नहीं है, पर जीवन के प्रति कोई आशावादी रूख भी नहीं है। यह मानवीय विफलताओं की ही महागाथा है, यदि इसे महागाथा कहने का आग्रह प्रबल हो। कभी-कभी ऐसी विफलताओं का इतिहास भी
हमें अवरूद्ध यथास्थिति से मुक्ति के लिए बेचैन करता है।’’ ( उपन्यास का पुनर्जन्म, पृष्ठ-136-37) दरअसल परमानन्द जी ‘कालाजल’ को ‘अभिशप्त पिछड़े अंचल के दो मुस्लिम परिवारों की कहानी’ मानते हैं, जिन पर ‘दुर्भाग्य की काली छाया’ पड़ी है और जिसमें ‘जीवन का निरन्तर क्षय’ हो रहा है। ‘कालाजल’ की समीक्षा करते समय यह नहीं भूलना चाहिए कि ‘‘जिस दृष्टि से जिस अनुभूति को, जिस जीवनानुभव को, जिस जीवन-तथ्य को,
कवि ( लेखक) उपस्थित कर रहा है, उसके समस्त समाजशास्त्राीय, ऐतिहासिक तथा सांस्कृतिक संदर्भ और
अर्थ आपके ध्यान में रहने चाहिए... लेखक के संवेदनात्मक उद्देश्यों को पहचान कर उसकी कलाकृति का विवेचन किया जाना चाहिए, तथा उसके संवेदनात्मक उद्देश्यों और अन्तरानुभवों को व्यापकतर मानवसत्ता के तथ्यों से  जोड़ना चाहिए।’’ ( मुक्तिबोध रचनावली, पांच, पृष्ठ-73)  क्या यह पिछड़ा अंचल सचमुच ‘अभिशप्त’ है? क्यों अभिशप्त है? क्या सिर्फ इसलिए कि इस पर, ‘दुर्भाग्य की काली छाया’ पड़ी है? ‘दुर्भाग्य से अभिशप्त’ है या सामाजिक-आर्थिक- राजनीतिक और धार्मिक कारणों से? क्या ‘कालाजल’ सिर्फ ‘दो मुस्लिम परिवारों की कहानी’ है? ‘पूरे समाज का आख्यान’ क्यों नहीं, कहा-माना जा सकता? ‘पूरे समाज का आख्यान’ और क्या हेाता है या होना चाहिए।

कालाजल: ‘विवाहेत्तर संबंधों की भरमार
डाॅ. हरदयाल की नजर में ‘कालाजल’ में केवल ‘बंधा-सड़ा जीवन’ है। उन्होंने लिखा है ‘‘इस उपन्यास में आंचलिक उपन्यासों की एक और प्रवृति हमें देखने को मिलती है-वह है विवाहेत्तर यौन-संबंधों की भरमार। मिर्जा करामतबेग पुलिस दरोगा बनकर बस्तर आये थे और तीस वर्ष की आयु तक अविवाहित थे। उनका विवाहेत्तर यौन-संबंध स्थापित हुआ बिट्टी रौताइन से। बाद में उन्होंने भेद खुल जाने पर नौकरी छोड़ दी, उससे निकाह कर
लिया। मिर्जा करामत बेग के देहावसान के बाद बिट्टी उर्फ बीदारोगन का यौन संबंध रज्जू मियां से स्थापित हुआ और बाद में उन्होंने निकाह कर लिया। रज्जू मियां ने अपनी सौतेली पूत्रवधु को भी अपनी वासना का शिकार बनाने की पूरी-पूरी कोशिश की, यद्यपि वे अपनी इस कोशिश में सफल नहीं हुए। रज्जू मियां एक अनाथ बच्ची मालती को ले आये, जब वह युवती हुई तो उन्होंने इसके साथ यौन संबंध स्थापित किया, वह गर्भवती हुई और उसे घर से निकालना पड़ा। रशीदा का चाचा उसके साथ बलात्कार करता रहता है और इससे मुक्त होने के लिए उसे आत्महत्या करनी पड़ती है।

सल्लो का यौन-संबंध भी सामाजिक दृष्टि से वैध नहीं है। सुनार की बीवी अतृप्त यौन-संबंधों के कारण से जल रही है। बब्बन के पिता के किसी स्त्री  के साथ विवाहेत्तर यौन-संबंधों के कारण उनका घर बरबाद हो जाता। इसमें कोई संदेह नहीं कि यौन-संबंधों का चित्रण शानी ने शालीनता की सीमा पार किये बिना किया है। उन्होंने इनमें से कुछ संबंधों की भावनात्मक कोमलता और कुछ संबंधों की क्रूरता को बड़ी संवेदनशीलता के साथ अंकित किया है, किन्तु प्रश्न उठता है कि आंचलिक उपन्यासकार विवाहेतर यौन-संबंधों से इतना अभिभूत क्यों है? क्या यह इस जीवन का यथार्थ है जिसका चित्रण आंचलिक उपन्यासों में हुआ है? मुझे लगता है कि हिन्दी के मध्यवर्गीय आंचलिक उपन्यासकार ने तिल जैसे यथार्थ को अपनी कुंठाओं के कारण ताड़ बना दिया है। ‘कालाजल’ के विवाहेतर यौन संबंधों के संबंध में यही सच प्रतीत होता है।’’ ( हिन्दी उपन्यास 1950 के बाद, 1987, नेशनल पब्लिशिंग हाउफस, पृष्ठ-51-52)



डाॅ. हरदयाल स्वीकारते हैं कि शानी ने यौन संबंधों का चित्रण ‘शालीनता’, ‘भावनात्मक कोमलता’ और ‘संवेदनशीलता’ के साथ अंकित किया है मगर ‘तिल जैसे यथार्थ को अपनी कुंठाओं के कारण ताड़ बना दिया है।’ क्या सिर्फ ‘आंचलिक उपन्यासकार ( ही) विवाहेतर यौन संबंधों से इतना अभिभूत हैं? अगर हां तो क्यों हैं? इस बेबुनियादी आरोप को सिद्ध  करने के लिए डा. हरदयाल के पास कोई प्रमाण, आधार या आंकड़ा नहीं। हिन्दी उपन्यासों का पूरा इतिहास वो जानबूझ कर भूल जाते हैं या सचमुच अनभिज्ञ हैं? भारतीय सभ्यता-संस्कृति के ऐतिहासिक अतीत से लेकर वर्तमान तक में, विवाहेतर ( प्रेम) संबंधों की ‘महागाथाओं’ की कैसे और
क्यों याद नहीं आ रही? शानी की शालीनता, भावनात्मक कोमलता और संवेदनशीलता को रेखांकित करने के बावजूद वे यौन संबंधों के चित्रण का कारण शानी की ‘अपनी कुंठाओं’ को मानते हैं। क्यों? क्या हैं शानी की ( यौन) कुंठाएं? कुछ तो बताएं डाक्टर साहब! चुप रहने से कैसे काम ( धंधा) चलेगा।’

कालाजल: आलोचक का दुराग्रह
आश्चर्यजनक है कि ‘हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास’ में बच्चन सिंह ‘कालाजल’ का उल्लेख तक नहीं करते। मात्र एक पंक्ति में जाने-अनजाने शानी भी शामिल हो जाते हैं। ‘‘यादव, शानी और कमलेश्वर भी श्रेणीबद्ध नहीं हैं।’’ ( पृष्ठ-523) इससे पहले ( पृष्ठ-522) ‘आधा गांव’ और ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया’ के बारे में एक-एक पैराग्राफ ( 18 पंक्तियां) लिखना नहीं भूलते। इसे हिन्दी साहित्य का ‘दुर्भाग्य’ कहें या विद्वान आलोचक का दुराग्रह? अनभिज्ञ तो नहीं ही कहाµ माना जा सकता, क्योंकि शानी के नाम से इतिहासकार अच्छी तरह परिचित हैं। खैर... जो विद्वान आलोचक-इतिहासकार ‘बेघर’ को ‘संभोगवादी उपन्यास’ और ‘सूरजमुखी अंधेरे के’ को ‘संभोग का पारदर्शी शीशा’ समझता हो, उनसे और क्या अपेक्षा की जा सकती है।

कालाजल: विभाजन, मुस्लिम और...
इसी क्रम में उल्लेखनीय है कि ‘विभाजन, इस्लामी राष्ट्रवाद और भारतीय मुसलमान’ ( तद्भव 5) नामक लम्बे लेख में वीरेन्द्र यादव के संदर्भ ‘आधा गांव’, ‘उदास नस्लें’, ‘आग का दरिया’ व 'धाको की वापसी’ तक ही सीमित रहते हैं और वे ( भी) ‘कालाजल’ का जिक्र तक नहीं करते। ‘भारतीय मुसलमान’ की उलझन व ‘भारत विभाजन की गुत्थी’ को समझने-समझाने के महत्वाकांक्षी प्रयास में वीरेन्द्र यादव ‘झूठा सच’ ( यशपाल), ट्रेन  टू पाकिस्तान ( खुशवंत सिंह), ‘तमस’ ( भीष्म साहनी), ‘आजादी’ ( चमन नाहल) व ‘दि आइस कैंडी मैन’ ( बप्सी सिधवा) तक की खोज-बीन तो करते हैं, मगर ( कालाजल) शानी कहीं नजर ही नहीं आते। हालांकि मैं खुद भी मानता हूं कि ‘कालाजल’ मूलतः भारत विभाजन को लेकर लिखा उपन्यास नहीं है। भारत विभाजन और भारतीय मुसलमान के अंतर्द्वन्द्व  संबंधी अध्याय को मैं ‘कालाजल’ का अनावश्यक अध्याय ही मानता हूं, परन्तु मेरा मानना
है कि इस संदर्भ में भी ‘भारतीय मुसलमान की उलझन और भारत की विभाजन की गुत्थी’ का मूल बीज ‘कालाजल’ में ही दबा है, जो बाद के उपन्यासों में विस्तार पाता है। इस विषय पर तमाम चिंताओं और चिंतन या उलझन और अन्तद्र्वंद की आधारभूमि ‘कालाजल’ ही है। ‘कालाजल’ में मोहसिन बब्बन से कहता है ‘‘तुम ताज्जुब न करना, अगर कहूं कि मुझे इस देश प्रेम में बिल्कुल विश्वास नहीं रहा। वह तो अम्मी की वजह से बंधा बैठा हूं। मेरा वश चले तो इसी पल यहां से भाग निकलूं...’’ ( पाकिस्तान, पृष्ठ-290) बब्बन को समझाता है ‘‘बल्कि मेरी मानो तो तुम्हें भी यही सलाह दूंगा। बब्बन तुम तो यहां बेकार पड़े हो। यहां जिन्दगी भर बीच के आदमी
बने रहोगे, न इधर के, न उधर के। तुम्हारे-जैसा आदमी वहां पता नहीं कहां-से-कहां पहुंच जाए...’’ मोहसिन बोलता रहता है ‘‘मैं जानता हूं तुम्हें लगता होगा कि मैं बक रहा हूं या यह कि मेरी बातों से साम्प्रदायिकता की बू आती है... पर अपने को अच्छी तरह टटोलकर देखो तो तुम खुद स्वीकार करोगे। क्या हम सब लोग यहां
लादे हुए मुगालते में नहीं जी रहे? और जिसे तुम राष्ट्रीयता और ईमानदारी समझ रहे हो, क्या वह सिर्फ मजबूरी नहीं है?’’ ( पृष्ठ-290) बब्बन हंसते हुए कहता है ‘‘...ऐसे ही ख्याल पूरी कौम को बदनाम करते हैं। छिः छिः, तुम तो यूं कह रहे हो, जैसे वहां कोई जादू का करिश्मा होता है।’’ बब्बन याद करता है ‘‘कुछ हमदर्दों ने दबी जबान में ( अब्बा को) समझाया तो बोले कि मरना-कटना होगा तो यहीं मर-कट जाएंगे, बुढ़ापे में मिट्टी खराब करने कहां जाएं? और उसी के साथ वाला वह दौर, जब हम सब शक की नजर से देखे जाते थे। स्कूल में लड़के हम लोगों को देखकर ताने कसते कि ‘भेजो सालों को पाकिस्तान, बांधों सालों को जिन्ना साहब की दुम से...’ और मुझे तब यह सोचकर रोना आता था कि लोग हमें  बेईमान क्यों समझते हैं। हमारा दोष क्या सिर्फ यही है कि हमने मुस्लिम परिवार में जन्म लिया है?’’ ( पृष्ठ-291) काफी बहस के बाद अन्ततः बब्बन ने कहा ‘‘चलो, अच्छा है, जाना ही चाहते हो तो, अभी न सही, फू फी को दफन करके चले जाना। लेकिन पाकिस्तान पहुंचने के बाद भी अगर तुम्हें लगा कि ठग गए, तो फिर  कहां जाओगे-अरब या ईरान ( पृष्ठ-291)

स्त्री  के सम्मान में पढ़ा गया फातिहा 

कालाजल’ निम्नमध्यमवर्गीय मुस्लिम समाज का पहला प्रामाणिक दस्तावेज है जिसमें उनकी त्रासदी, मानसिकता, संस्कृति और संकट अपनी संपूर्णता और गहनता में उद्घाटित होते हैं। यह अपने समय के समाज और संस्कृति में निरंकुशतावादी परिवार संरचना को देखने-समझने-परखने का दुःसाध्य रचनाकर्म है। अपने समाज में स्त्रियों की ( यौनार्थिक) स्थिति को रेखांकित करने की सृजनशीलता का ही परिणाम है- ‘कालाजल’। लिंग पूर्वाग्रहों ( दुराग्रहों) से मुक्त और मानवीय संवेदनाओं से भरा-पूरा हुए बिना, ‘कालाजल’ की कल्पना तक असंभव है। स्त्री पात्रों की आत्मा में गहरे उतरने और उनकी पीड़ा को अपनी ही पीड़ा मानने-स्वीकारने की सहजानुभूति, दुर्लभ ही नहीं बल्कि अकल्पनीय सी लगती है। उपन्यास में चारों तरफ से बंद परिवार-परंपरा और संस्कारों में कैद स्त्री  द्वारा सांस लेने की भयावह छटपटाहट है। अदृश्य हत्यारे आसपास ही चक्कर काट रहे हैं और दूर-दूर तक पितृसत्ता के हिंसक प्रेतों का आतंक, भीतर-बाहर उनका पीछा करता ( घूमता) रहता है। ( यौन) हिंसा की शिकार स्त्रियों की आत्मा की शांति ही नहीं, बल्कि गरिमा और
सम्मान में पढ़ा गया फातिहा है - ‘कालाजल’।

समाप्त 
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