पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण और स्त्री की आजादी विशेष संदर्भ-मैत्रेयी की कहानी “पगला गयी है भागवती”

आदित्य कुमार गिरि
शोधार्थी,कलकत्ता विश्वविद्यालय,ईमेल आईडी-adityakumargiri@gmail.com

पुंसवादी समाज ने एक ऐसी व्यवस्था बनाई है जिसके तहत स्त्रियों को दूसरे दर्जे का प्राणी मान लिया गया है.वह निर्विवाद रूप से पुरुष के अधीन और उसके बनाए नियमों को मानने को बाध्य है.मानो पुरुषसत्ता निरपेक्ष और निर्दोष हो.पुरुषसत्ता को चुनौति देने वाली स्त्री संदेह से देखी जाती है.इस समाज ने ऐसी व्यवस्था निर्मित की है जहाँ स्त्री की आजादी का प्रश्न न सिर्फ बेमानी है बल्कि अस्वाभाविक भी है. इस पितृसत्ता ने स्त्री के प्रति जो नजरिया प्रस्तुत किया है उसके समाज की संरचना ही ऐसी बनाई गई   जहाँ स्त्री के अधिकार गैर जरूरी लगते हैं.हमने अबतक स्त्री के नजरिए से सामाजिक संरचना को देखने की कोशिश नहीं की है.पुरुषवादी एकांगी दृष्टिकोण से पूरे समाज  को देखते और मूल्यांकित करते रहे हैं.एक पूरा समाज जिसमें आधी आबादी स्त्रियों की है.उनके नजरिए से देखने से अबतक के सारे मानक बदल भी सकते हैं,इसकी कभी कल्पना भी नहीं की.पितृसत्ता ने सामाजिक और आर्थिक दोनों ही तरह से स्त्रियों को अधीन बनाए रखा है.जब जब स्त्री उस दायरे से बाहर निकलने की कोशिश करती है या तो मार दी जाती है या पागल करार दी जाती है.उसके अस्तित्त्व को उसके चरित्र और चरित्र को भी यौन-शुचिता से जोडकर देखा जाता है और इस समूचे दृष्टिकोण का स्रोत है पुंसवाद.

स्त्री केवल एक वस्तु है और वस्तुएँ मालिक के मन के हिसाब से रखी जाती हैं.वह दास है और पुरुष उसका मालिक.इस दास को गुलाम बनाए रखने के लिए पितृसत्ता ने शरीरबल के साथ ही साथ मानसिक बल का भी प्रयोग किया है जिसके तहत स्त्री की सामाजिक,पारिवारिक और धार्मिक हैसियतें तय की गयी हैं.इसने स्त्री को पूरी तरह न सिर्फ ‘आइसोलेट’ किया है बल्कि उसे पिछडा भी बना दिया है.

भारतीय समाज तो इस दृष्टि से और भी ज्यादा ‘विलक्षण’ है.इसने स्त्री की गुलामी के लिए तमाम तरह तामझाम बना रखे हैं.स्त्री की भूमिका तय कर रखी है.वह शादी से पूर्व पिता के अधीन होती है और शादी के बाद पति के और इस बीच कहीं अगर विधवा हो गई तब तो वह हर तरह से अमानवीय यातनाओं की अधिकारिणी हो जाती है.ऐसी स्त्री की केवल और केवल उपेक्षा की जा सकती है लेकिन वह भी उपेक्षा जैसी उपेक्षा न होकर एक यातनागृह में कैद एक कैदी की सी जिन्दगी का अभिशाप होती है.उसके सारे सपने,उसकी आकांक्षाएँ खत्म कर दी जाती हैं.असल में उसके अंदर कोई स्वप्न है या उसकी कोई इच्छा है ऐसा जानने या समझने की कोशिश ही नहीं की जाती.मैत्रेयी पुष्पा इसी समझ और दृष्टिकोण के विरुद्ध आवाज उटाती हैं.

मैत्रेयी पुष्पा की कहानी ‘पगला गई है भागवती’ स्त्री की आजादी के संदर्भ में पुरुष सत्तात्मक दृष्टिकोण के अंतर्विरोधों को प्रकट करने वाली कहानी है.पुरुष समाज ने स्त्री के लिए जो मानदंड बनाये हैं मैत्रेयी उसकी पड़ताल करती हैं.पुरुष ने अपने लिए जो मानदंड बनाये हैं,स्त्री को उस दायरे से बाहर रखा है.इस समाज ने स्त्री के लिए नियमों की जकड़बंदी कर रखी है.स्त्री की हदें पुरुष तय करता है.मैत्रेयी ने इस कहानी में स्त्री की इसी त्रासदी को प्रकट किया है और साथ ही पुरुषसत्तात्मक नजरिए की समस्याओं का चित्रण भी किया है.पुरुषसत्तात्मक नजरिये के अंतर्विरोधों में मौजूद तत्त्व असल में स्त्री विरोधी मानसिकता का परिणाम है.स्त्री इस व्यवस्था में घुट रही है,तड़प रही है.उसकी पीड़ा में उसकी घृणा भरी है.वह यह मानने को तैयार नहीं कि उसे गुलाम बनाकर रखा जाए.

मैत्रेय पुष्पा अपनी कहानियों के माध्यम से स्त्री की बुनियादी समस्याओं को तो उठाती ही हैं लेकिन साथ ही पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण से उपजी परिस्थितियों के प्रति रोष भी व्यक्त करती हैं.उनकी ‘स्त्री’ उन संरचनाओं से जूझती है और इसी बीच एक विकल्प की ओर भी जाती है.उन्होंने अपनी तमाम कहानियाँ इसी पैटर्न पर लिखी है.उनकी स्त्री विलक्षण स्त्री है.वह पुरुषसत्तात्मक व्यवस्था के प्रति बेहद अर्थपूर्ण तरीके से खडी होती है.वह शुरुआत में चाहे जैसे हो लेकिन अंत तक ‘विद्रोही’ जरूर हो जाती है.मैत्रेयी ऐसे स्त्री पात्रों की परिकल्पना जानबूझकर करती हैं जिनका पुरुषसत्ता से सीधे साबका हो.उनकी स्त्री एक अलग सोच और ‘स्टैंड’ वाली स्त्री होती है.वे स्त्री के बेचारी रूप की पक्षधर नहीं.उनकी स्त्री चाहे जिस सामाजिक स्तर की हो लेकिन उसमें अपना ‘स्व’ होता है.वह पितृसत्ता के नियम की तरह जरूरी बना दिए गए मानकों के विरुद्ध किसी वैचारिक की सी खडी होती है.


पितृसत्ता ने स्त्री विरोधी कर्म को इतने गहरे स्थापित कर दिया है कि स्त्री की समझ और उसके फैसले और यहाँ तक कि उसकी पसंद-नापसंद तक पुरुष निर्मित नियमों के आलोक में है.पुरुषसत्ता स्त्री को गुलाम बनाए रखने के लिए रीति रिवाजों और नियमों का जाल बिछाता है,उसने स्त्री की आजादी और उसकी भूमिका की जदें तय कर दी हैं उसके बाहर स्त्री गई और वह कुल्टा,कुलच्छनी या पागल ठहरा दी जाती है.एक ‘नॉर्मल’ स्त्री अर्थात पुरुष निर्मित नियमों को सिर झुकाकर मानती और जीती स्त्री

मैत्रेयी जैसी ‘स्त्री’ की परिकल्पना करती हैं,कथा में उनका विरोध सहज और स्वाभाविक लगता है. वह उस घोर स्त्री विरोधी वातावरण में भी अपने ‘स्व’ की तलाश कर लेती हैं.उन विलक्षण स्त्री पात्रों के कारण ही पुरुषवादी संरचना अटपटी लगने लगती है.कथा के आरंभ से ही मैत्रेयी की ‘स्त्री’ उस संरचना की व्यर्थता और शोषक चरित्र को ‘एक्सपोज’ करती चलती हैं. वह अपने निर्णय के लिए किसी पर आश्रित नहीं या ऐसी परिस्थितियाँ तैयार हो जाती हैं जहाँ ‘बलात’ या ’जोर’ का सांस्थानिक ‘एक्सपोजर’ होता है.

पितृसत्ता ने स्त्री को चाहरदीवारी में कैद कर रखा है,सिर्फ शरीर के स्तर पर ही नहीं बल्कि मानसिक रूप से भी.उसने अपनी मान्यताओं को स्त्री का स्वभाव बनाने का कुचक्र रचा है.स्त्री उस कुचक्र में दबती रही है.घुटती रही है.पर मैत्रेयी की स्त्रियाँ उस दायरे से बाहर अपना संसार रचती हैं.किसी भी प्रकार के सामंती ‘एटीट्यूड’ को बर्दाश्त नहीं करतीं.वे अपने लिए रास्ता बनाती है.सामंती मूल्यों से अपनी असहमति व्यक्त करती हैं.केवल असहमति नहीं उसके प्रति घृणा व्यक्त करती हैं.इस कारण मैत्रेयी की कहानियाँ असल में प्रतिरोध की कहानियाँ हैं.वह यथास्थिति की विरोधी हैं.वे नये मूल्यों की तलाश की कहानियाँ हैं.

‘भागवती’ की खेलने-कूदने की उम्र में शादी हो जाती है,उसी उम्र में वह विधवा भी हो जाती है.समाज का क्रूर चरित्र तब और भयंकर रुप में सामने आता है कि ‘इतेक लम्बी जिन्दगी,फिर अपनी जात बिरादरी में दूसरे ब्याह की रसम रीत?’1

भागवती’ विधवा हो जाती है.वह भी तब जब उसने अपने पति का मुँह तक नहीं देखा था,तब जब उसे पति और शादी का मतलब ही नहीं मालूम था.वह अभिशप्त है इस व्यवस्था में जीने के लिए.मैत्रेयी ने इसे बहुत मार्मिक ढ़ंग से व्यक्त किया है ‘आँसू काढ़ जनमजली.आदमी नहीं रहौ और तें उजबक –सी हेर रही.किसी जनाने ने उसके सिर पर थप्पड़ दे मारा.’2


वह पुनर्विवाह नहीं कर सकती.असल में वह क्या करेगी,क्या नहीं इसका निर्धारण वह कर ही नहीं सकती.उसके जीने मरने तक का फैसला वह नहीं कर सकती.समाज ही यह निर्धारित करेगा कि उसे कैसा जीवन जीना है.वह केवल विधवा नहीं होती उसका पूरा व्यक्तित्व ही वैधव्य को महसूस करता है.‘समय के अन्तराल ने बता दिया कि वह विधवा हो गयी.तब से आज तक उसका तन,उसका मन,सम्पूर्ण अस्तित्व विधवा है.‘ 3

उसके खाने-पीने,रहने-सहने सब पर वैधव्य का कब्जा हो चुका है.वह पूरी तरह से यह नरक भोगने के लिए अभिशप्त है.बल्कि अभिशप्त कर दी जाती है.अब वह अभागी है.स्त्री का सारा भाग्य उसके पति के साथ बँधा है.वह भाग्यशाली या दुर्भाग्यशाली अपने पति की स्थिति के कारण होती है.उसका सुख-दुख,आशा
आकांक्षा,इच्छा-अनिच्छा कुछ भी मायने नहीं रखता.वह केवल पुरुष की सहधर्मिणी है.उसका अलग अस्तित्व कल्पना के बाहर की चीज़ है.उसका श्रृंगार,उसकी जिन्दगी,उसकी हँसी सबकुछ उसके पति से जुड़ी है.
पितृसत्ता ने स्त्री की ऐसी हालत कर दी है कि वह जहन्नुम जी रही है.सुधा सिंह ने अपनी पुस्तक ‘ज्ञान का स्त्रीवादी पाठ’ में स्टुअर्ट मिल की पुस्तक के हवाले से लिखा है “स्त्रियों के विवाहित जीवन की स्थिति और दासों की स्थिति में एक मूलभूत अंतर है वह यह कि कुछ तरह के दास प्रथाम में एक दास अपने मालिक को कानूनन बाध्य कर सकता है कि वह उसे बेच दे जबकि इंग्लैंड के तत्कालीन कानून व्यवस्था में बेवफाई के अतिरिक्त किसी प्रकार का दुर्व्यहार एक पत्नी को उसके उत्पीडक से स्वतंत्र नहीं कर सकता.एक स्त्री की स्थिति इसलिए भी विचित्र है कि विवाह की अंतिम व्यवस्था के तहत उसके सुखपूर्ण जीवन के लिए एक ही बात हो सकती है कि उसे अच्छा मालिक मिले.लेकिन अगर ऐसा नहीं हुआ तो उसे चुनाव का दूसरा अवसर नहीं मिलता.परिवार जो है वह राजनीतिक तानाशाहों का ही एक रूपक है और इसका विरोध उसकी ताकत के साथ किया जाना चाहिए जैसा राजनीतिक तानाशाही का किया गया.राजनीतिक तानाशाही के विरुद्ध कहा जाने वाला ऐसा कोई शब्द नहीं जो परिवार की तानाशाही पर न लागू होता हो.”4

मैत्रेयी ने भागो के बहाने हिन्दू समाज में स्त्री के वैधव्य के नारकीय जीवन का चित्र उकेरा है.विधवा हर तरह से उपेक्षित जीव होती है.उसे न सजने धजने का अधिकार है और न किसी शुभ कर्म में शामिल होने का.5

 वह दुनिया से कटी एक ‘अछूत’ की सी जिन्दगी जीने को अभिशप्त कर दी जाती है.यह एक ऐसा प्रपंच है जो स्त्री को मानसिक रूप से भी गुलाम और निष्क्रिय कर देता है.विधवा खुद ही अपने उत्साह को मार देती हैं और ख्याल रखने लगती हैं कि वे गलती से भी किसी शुभ मुहूर्त में न चली जाएँ.इस अवधारणा ने स्त्री के मन को निष्क्रिय कर दिया है.नरेश की शादी के जलसे के समय भागो के सजने सँवरने की उदासीनता के पीछे अनुसुइया को लेकर उसके मन की वेदना तो जिम्मेदार है ही लेकिन साथ ही उसका ‘वैधव्य’ और उसे लेकर बुने ‘जंजाल’ से बनी मानसिकता भी मुख्य वजह है.


घर में ‘स्त्री’ के पैदा होने को दुर्घटना की तरह देखा जाता है.उसे गंदगी समझकर फेंक दिया जाता है.उसके जीने मरने को लेकर कोई चिंता नहीं होती है.बल्कि उसके मरने को स्वाभाविक क्रिया समझा जाता है.‘मोड़ी जनमी है,मरी भई.द्वारे खबर कर दो.’7

हाँ उसके बच जाने पर दुख जरुर मनाया जाता है.जिज्जी ने भी बेटी को मरा जानकर राहत की साँस ली,पर भागवती के कहने पर कि “जिज्जी,ओ जिज्जी,मरी नहीं है बिटिया.तेरौ कौल.फिकवा न दिओ.“8  जिज्जी पर जैसे पाला पड़ गया हो.वह दुखी हो जाती है.जैसे ‘बेटी खत्म हो जाने से मिली विश्रान्ति में किसी ने खलल डाली हो.’9
मैत्रेयी ने अपनी लगभग हर कहानी में लडकी के जन्म के समय के “दुख” को चित्रित किया है.लडकी का जन्म लेना भारतीय समाज में कितना ‘अशुभ’ है इसका रूपक वे लगभग हर कहानी में बनाती हैं.बेटी हुई है.अतः वह अशुभ है.वह त्याग के योग्य है.वह भागो जिसे हर ‘शुभ’ से दूर रखा जाना चाहिए उसे अनुसुइया दे दी जाती है क्योंकि अनुसुइया एक अशुभ ‘वस्तु’ है.अतः उसका लालन पालन भी ‘अशुभ’ स्त्री ही करेगी.दायी भागो से कहती है “अब भागो,ते ही पाल लै,जा मोडी को.”10

भागो के जीवन का शून्य उस नवजात शिशु को पाकर भर जाता है.अनुसुइया नाम भी उसी ने दिया.‘भागो क्या जाने,उसे तो बिटिया सपने में सोचा हुआ वरदान लगी.बाँहों में सहेज ली.रूई के फाये को गुड के गु के घोल में डुबो डुबोकर बच्ची को चटाती रही.उसके बाद बकरी का दूध,गाय का दूध,माँ की रिक्तता पाटने का समर्थ्य भर करती रही.बच्ची जब कभी गाय बकरी के दूध से बीमार होने लगती तो भागो जिज्जी से विनती करती ‘जिज्जी पिवा दो दूध.हाँ हाँ जिज्जी.बिटिया भूख से तलफ रही.पिवा दो तनिक.’’11

इस वर्णन से दो चीजें निकलकर आती हैं पहला,स्त्री के प्रति पुरुषवादी समाज को घोर स्त्री विरोधी नजरिया और दूसरा,भागो अनसुइया के बहाने अपने जीवन की रिक्तता को पूर्ण करने की कोशिश करती है.विधवा उपेक्षित भागो के जीवन में अनुसुइया उसके शून्य को भरने वाली कारक बनकर आती है.


मैत्रेयी पुष्पा की चिंता केवल यहीं तक नहीं रहती.वे स्त्री की समस्याओं को सम्पूर्णता में देखती हैं.उन्होंने पुरुषसत्तात्मक समाज के दृष्टिकोण को खंगाला है.वे पुरुष की स्त्री विरोधी मानसिकता को प्राणघातक बताती हैं.अनुसुइया की मृत्यु असल में हत्या है.उसकी हत्या उसके पिता ने की.पुरुष ने की.पुरुषसत्तात्मक समाज की मान्यताओं ने की.उसका अपराध केवल इतना है कि उसने प्रेम किया.जिससे प्रेम किया उससे विवाह किया.पुरुष का अहम् इसे स्वीकार नहीं कर सकता.वह स्त्री के प्रेम करने को पाप की तरह देखता है.पाप,पुण्य के फेर में स्त्री को डाल देता है.स्त्री के लिए उसने यह नियति बना दी है.स्त्री का रहन-सहन तक पुरुष द्वारा संचालित होगा.उसने स्त्री को अपनी चेरी बना लिया है.

मैत्रेयी पुष्पा पुरुष समाज के इस घृणात्मक रवैये का पर्दाफाश करती हैं.जीजा ने जिन कारणों से अनुसुइया को जहर खाने के लिए बाध्य किया,नरेश के लिए वही कारण उत्सव मनाने का सबब हो जाता है.इस दृष्टिकोण का सबसे बड़ा अंतर्विरोध यही है कि यह दृष्टिकोण पुरुष और स्त्री को अलग-अलग देखता है.स्त्री के लिए उसने तमाम बंदिशें बना रखी हैं.


यह ऐसी व्यवस्था है जो स्त्री और पुरुष को अलग अलग खाँके में रखती है.एक ही तरह के कर्म के लिए स्त्री अपमान और पुरुष सम्मान का अधिकारी होता है.स्त्री केवल एक ‘देह’ है जिसपर पुरुष का अधिकार है.उसका मालिकाना हक पुरुष के पास है.वह सिर्फ भोग के लिए है.उसका पूरा अस्तित्त्व केवल और केवल पुरुष केन्द्रित है.वह न सपने देख सकती और न अपने तरीके से जी सकती है.उसकी नियति पुरुष के हाथों लिखी गई है.वह कब विधवा हो गई और किस नियम के तहत दुनिया से काट दी जाएगी इन सबपर उसका बस नहीं.वह उनमें और उन्हें जीने को अभिशप्त है.

नरेश की शादी के समय भागवती का अनुसुइया के संबंध में सोचना उस अंतर को व्यक्त करता है.मैत्रेयी ने ‘बायनरी अपोजिशन’ के माध्यम से नरेश और अनुसुइया को रखकर उस तनाव को ‘क्रिएट’ किया है. अनुसुइया की स्मृत्तियों को लेकर भागो द्वारा ‘डिटेलिंग’ उसके अन्तस् की तीव्रता को व्यक्त करता है.


मैत्रेयी ने गाँवों में हो रहे बदलावों को चार बिन्दुओं के माध्यम से दिखाया है
1.’गाँव में बिजली आ गयी है.‘-गांवों में बिजली तो आ गई लेकिन स्त्री को लेकर नजरिया नहीं बदला.
2.’गाँवों में रह रहे दलितों में चेतना का जन्म हो चुका है.‘–मठोले की जनी का प्रसंग यह बताता है कि दलित अब जाग चुके हैं.उनके अंदर स्वाभिमान का जन्म हो चुका है.
3.’नरेश ने कोर्ट में शादी की है.‘–लेकिन फिर भी स्वीकार्य है.क्यों,क्योंकि वह बेटा है.नरेश की पत्नी शादी के समय चार महीने के पेट से है.फिर भी स्वीकार्य है.क्यों,क्योंकि वह बेटा है.लेकिन अनसुइया चूँकि बेटी थी इसलिए उसके प्रेम को स्वीकार न कर उसे जहर देकर मार दिया गया था.नरेश को ठाकुर साहब कुलदीपक के रूप में देखते हैं.इसलिए उसकी ‘हाँ’ में ‘हाँ’ मिलाना उनकी मजबूरी और अवसरवादिता तो है ही साथ ही पुरुषवादी समाज की प्रो पुरुष दृष्टि भी है.यहाँ पुरुष की उन्हीं गलतियों को सिर माथे पर रखा जाता है जबकि स्त्री कुलच्छिनी हो जाती है.
4.’बहू के सजने धजने के दृश्य के माध्यम से रपुरानी और नई दुल्हन का फर्क तो बताया ही है साथ ही गाँव समाज से हो रहे परिवर्तन की ओर इशारा भी किया है’- परन्तु यहाँ भी स्त्री की साज सज्जा या खूबसूरती की अहमियत पुरुषवादी समाज के अनुरूप है.अर्थात बहु सुंदर है,शहर वाली है इन सभी रूपकों का प्रयोग ठाकुर माधो सिंह की इज्जत और शान की बढोत्तरी के लिए है.

मैत्रेयी ने भागो को एक विलक्षण रूप दिया है.भागो सोचती अनुसुइया के बारे में है लेकिन उसकी पीडा पूरी स्त्री समाज की पीडा होती है.उसकी खुद की भी पीडा होती है.अपने समय वह इस समाज से लड नहीं सकी थी.उस कमी को इस बार पूरा कर रही है.अनुसुइया के लिए लडना,सिर्फ अनुसुइया के लिए लडना नहीं है.
नरेश के ब्याह के बाद के जलसे की डिटेलिंग के पीछे एक शून्य की ओर इशारा है.वह शून्य खुद भागो के जीवन की त्रासदी तो है ही,अनुसुइया की पीडा तो है ही लेकिन साथ ही पूरे स्त्री समाज की भी पीडा है.

कोर्ट में हुई शादी के बरअक्स जितने सवाल12 होंगे सब स्त्री से होंगे,ठाकुर माधो सिंह से नहीं.यह स्त्री के सामंती संरचना से जोडकर रखने के षडयंत्र का पर्दाफाश है.स्त्री उस संरचना से जोड दी गई है.स्त्री की गुलामी को सांस्थानिक कर दिया गया है.वह पूरी तरह से जकडी हुई है.मैत्रेयी परत-दर-परत उस स्त्री विरोधी संरचना को खोलती हैं.


भागवती का जीजा पर पत्थर13 चलाना उस पुरुष सत्तात्मक समाज पर पत्थर चलाना है जिसने स्त्री के लिए संसार को नरक बना दिया है.मैत्रेयी ‘भागवती की घृणा’ में असल में पूरे स्त्री समाज की घृणा का रुपक प्रस्तुत करती हैं.भागवती की अपने जीजा और जिज्जी के प्रति जो घृणा है वह असल में स्त्री की पुरुषसत्तात्मक समाज के प्रति घृणा है जिसे वह पत्थर मारकर लहूलुहान कर देती है.गालियाँ देती है.अपना विरोध दर्ज करती है.मैत्रेयी इसी मायने में प्रतिरोध की लेखिका हैं और साथ ही निर्माण की भी.वह निर्माण  स्त्री के लिए होगा.उसके लिए नये समाज का होगा.जहाँ स्त्री आजाद होगी,उसका शोषण नहीं होगा.

संदर्भ ग्रन्थ

1. पुष्पा,मैत्रेयी,ललमुनिया,प्रथमर संस्करण,1,किताबघर प्रकाशन,नई दिल्ली.पृ 97
2. वही पृ 97
3. वही पृ 97
4. सिंह,सुधा,’ज्ञान का स्त्रीवादीपाठ’,प्रथम संस्करण 2008,ग्रन्थ शिल्पी(इंडिया)प्राइवेट लिमिटेड,दिल्ली.
    पृ 31
5. पुष्पा,मैत्रेयी,ललमुनिया,प्रथम संस्करण,1,किताबघर प्रकाशन,नई दिल्ली,पृ 97
6. वही पृ 98-99
7. वही पृ 99
8. वही पृ 99
9. वही पृ 99-100
10. वही पृ 100
11. वही पृ 100
12. वही पृ 101
13. वही पृ 104

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