स्वर्णलता ठन्ना की कविताएँ

स्वर्णलता ठन्ना
युवा कवयित्री स्वर्णलता ठन्ना फिलहाल विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन में शोधरत हैं . संपर्क :swrnlata@yahoo.in

सजा

समाज के ढकोसलों
उठते प्रश्नचिन्हों से
झुलसती
उठती उँगलियों की
नोंक पर स्वयं के होने की
असह्य पीड़ा
और
जिस्म को भेदती
नजरों के तीरों से
आहत हो जाती है
उसकी आत्मा
तो छिप जाना चाहती है वह
हसरतों की ओट में
छीजता जाता है
उसके भीतर कहीं कुछ
अनजाने सायों की आहट
और
जानी-अनजानी
सूनेपन की दस्तक से
हो जाती है वह सतर्क
और बह आती है
सन्नाटे में डोलती
हवा के साथ
धरती के निषिद्ध
कहे जाने वाले
कोनों में
ढ़ूँढने अपने लिए
कोई महकता फूल
जो सुनहरी कोमल
धूप छिटकने पर
खिलता है
अपने सप्तपर्ण के साथ
जिसके खिलते ही
गाती है नन्हीं गौरैया
फुदकती हुई
उसकी खोज में
डोलती रहती है
वह कई दिन
झरती हुई कलियों
और
बादलों का लिहाफ ओढ़े
निषिद्ध कोनों में
और उभर आता है
उसका नाम
सरगोशियों से
सभ्य कही जाने वाली
दुनिया में
अपराधी की तरह
और अन्ततः
ढूँढ़ लिया जाता है उसे
खूबसूरत वादियों में
खुशी, उमंग और
उल्लास के साथ
खिलखिलाते हुए...
और
डाल दिए जाते हैं
उस पर
लिहाज की चट्टानों के
अनगिनत टुकड़ें
बरसों से सूखे झरने पर
छिटक जाती है
कुछ रक्त की बूँदें
और वो गुलाबी चेहरा
ओढ़ लेता है
खामोशी का आँचल
वीरान हो जाता है
धरती का हर कोना
ढुलक जाते हैं
सूखे दरख्तों के आँसू
शिशिर सहम कर
ओढ़ा देता है उसे
बर्फ का कफन
कुछ दिनों की
जिंदगी के साथ
खेल लेती है
मौत अपना दाँव
और जीतकर ले जाती है
गुलाबी चेहरे की रंगत
अपने साथ...
मिलती है उसे
अवयव की सुकोमल
सुन्दरता के साथ
लड़की बन
अपने अनुसार
जीने की सजा...।

 तैयार हूँ मैं

दुख को काजल बना कर
आँखों में
गहराई से आंज लिया
कस कर
बालों को बाँध लेने के बाद भी
उलझन रूपी लटें
चेहरे के चारों ओर
बिखरी हुई थी
बड़ी मुश्किल से
उन्हें कानों के पीछे
दबा कर
उलाहनों और
तानों से बनी
साड़ी को
कंधें पर जमा लिया
रस्मों की जंजीरें
गले में दोहराते हुए
चमकने लगी
और परिधियों के घुंघरू
पायल की बेड़ियों के साथ
रूनझुन बजने लगे
नाजुक सी कलाई पर
मर्यादाओं के
कंगन चढ़ा
दर्पण के समक्ष
खड़े होकर
मैंने देखा
मैं पूरी तरह से
तैयार हूँ
हर परिस्थिति से
जूझने के लिए
हर मुश्किल का
सामना करने के लिए..

चाँद

चाँद तुम अपने
सौंदर्य ,नूर
सादगी ,उज्ज्वलता
और
रुपहले अक्स की
परतों में छिपे
कितनी स्वछन्दता से
घूम लेते हो
इस विशाल नीलगगन में
शायद इसलिए
क्योंकि पुकारे जाते हो
तुम पुल्लिंग  में
अन्यथा
इस सौंदर्य के साथ
यदि पुकारा जाता तुम्हें
स्त्रीलिंग में
तो झेल रहे होते
निरपराध होकर भी
प्रस्तर होने का शाप
या बिताते अपना जीवन
परित्यक्त होकर
वन में
करने अपने सतीत्व की रक्षा
स्वाहा करते स्वयं को
और इन सब से
बच गए होते तो
बलात्कृत होकर
जीवन भर झेलते
अपमानों के दंश
और तब
ये सौंदर्य ,चमक ,
आभा और स्त्रीत्व
अभिशाप बन जाते...
तुम्हारे लिए ...।
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