अंजना वर्मा की कविताएँ

अंजना वर्मा
प्रोफेसर एवं अध्यक्ष,हिंदी विभाग नीतीश्वर महाविद्यालय,मुजफ्फरपुर,पाँच कविता संग्रह, दो गीत संग्रह, एक लोरी संग्रह, दो कहानी संग्रह, एक दोहा संग्रह, एक यात्रा वृत्त, तीन बाल साहित्य तथा दो समीक्षा पुस्तक कुल 17 किताबें प्रकाशित,ईमेल आईडी anjanaverma03@gmail.com


बची हुई लडकियाँ
      
गर्भ के हत्यारों से बची हुई लडकियाँ
सहमी हुई देख रही हैं दुनिया को
कैसे वे बच पायेंगी ?
आग और आघातों से
तेजाब की बरसातों से
दरिंदों के दाँतों से

गर्भ से लेकर जीवन के आखिरी पडाव तक
मौत की दहशत में जीती हैं लडकियाँ
और अगर बच गयीं तो
क्या नहीं करती हैं लडकियाँ ?
सूरज बनती हैं चाँद बनती हैं
कभी धरती तो कभी आसमान बनती हैं
जरूरत पडने पर घमासान बनती हैं

बची हुई लडकियों के पंख जब उगने लगते हैं
तो उन्हें अपने डैनों को बचाने के लिए भी
हर पल जूझना पडता है
क्यों कि हर कोई
उनके दो पंख नोच लेना चाहता है
अपनी खिलती हुई देह को भी देखकर
मुरझाना पडता है
भीतर ही भीतर घुलने लगती है स्याही
उनकी गुलाबी उमंग में
क्योंकि सबकी नजरें नापने लगती हैं
उनकी काया के वलय को
आँखों के कँटीले फीते
लपेटने लगते हैं अजगर की तरह

दो भेदती नजरों से सामना होते ही
वे बन जाना चाहती हैं कछुआ
काश ! वे कछुआ होतीं
तो खतरा देखते ही छिप जातीं अपने खोल में
पर ऐसा संभव नहीं
और वयःसंधि की गली छोडकर भी
भाग जाना संभव नहीं

हत्या के प्रयासों से बच गयीं युवतियाँ
बच्चे जन रही हैं
बना रही हैं बटलोही में भात
खुद लपटों में सिंकती हुई
सेंक रही हैं रोटियाँ
तृप्त कर रही हैं हर मुँह को
भर रही है  सबके पेट
सिल रही हैं दुनिया के फटे कपडे
हर हाल में फटा सिलने का दायित्व
उन्हीं पर आ जाता है
आखिर क्यों ?

इस सवाल को अँकुरने से रोकना है
दुनिया कमर कसकर
खुरपी लेकर खड़ी है
ऐसे सवालों की निकौनी के लिए
ऐसे भी
सिलना उन्हीं को आता है

चली आई थी राधा एक रात
रोती - बिलखती अपनी माँ के पास
आधी जली हुई साडी
औऱ झुलसे हुए बाल
किरासन तेल से भींगा बदन
रो -रोकर अपनी माँ को
ये सब दिखाने के बाद भी
वह उछाल दी गयी थी गेंद की तरह
उसी पाली में जहाँ से भागी थी
भेडिये के गठबंधन में
बँधे रहने को मजबूर
और जीने को लाचार
यातना के देश में
और मौत की कोठरियों में
जिन्दगी रचती हैं ये युवतियाँ

गोद में लिये अपने लाल
अपनी रुलाई को  हँसी में
रूपान्तरित करती रहती हैं ये युवतियाँ
सज - धजकर अपने आदमखोरों के लिए
व्रत करती हुई
उनके लिए मनौतियाँ माँगती हुई
गीत और प्रार्थनओं से
काल कोठरियों में भी भर देती हैं गुंजार
उनके बिना सूनी हो जाएगी यह दुनिया
और पसर जाएगा चारो ओर अखंड सन्नाटा

जीवित रखती हैं वे संपूर्ण पृथ्वी को
कीटों, चिडियों और मगरमच्छों
और बाघ -शेरों तक की दुनिया
इनसे रहती है आबाद
हत्यारे तक को दुलारती है तो कोई स्त्री ही
किसी भी संबंध में

सृजन का अँधेरा
           
एक शिशु को जन्म लेने के बाद
मिलती है यह रोशनी की दुनिया
तब वह जीना शुरू करता है
सूरज के उजाले में
वही आधार है जीवन का
हमारी साँसों का मालिक वही
रात-दिन का निर्माता
पूरी सृष्टी को गढने वाला
लेकिन सूरज की रोशन दुनिया से
अलग है कोख की अँधेरी कोठरी
माँ गढती है अपने शिशु को
कला - कक्ष के अंधकार में
यह अँधेरा सृजन का अँधेरा है
जो बडा है रोशनी से
जिसे यह नहीं मिलता
उसे सूरज भी जिन्दगी का उजाला दे नहीं सकता
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