इश्क और आंदोलन का गवाह मेरा कमरा

निवेदिता
पेशे से पत्रकार. सामाजिक सांस्कृतिक आंदोलनों में भी सक्रिय .एक कविता संग्रह ‘ जख्म जितने थे’. भी दर्ज कराई है. सम्पर्क : niveditashakeel@gamai
वर्जीनिया वूल्फ की किताब  ‘ A Room of One's Own’ का प्रकाशन 1929 में हुआ था, उसका केन्द्रीय स्वर है कि एक स्त्री का अपने लेखन के लिए अपना कमरा होना चाहिए, अपने निजी को सुरक्षित रखने के लिए भी अपना कमरा, इसके लिए उसकी आर्थिक स्वतंत्रता जरूरी है. अपने कमरे की अहमियत के इस सवाल के साथ ही अपने अतीत को देख रही  है पत्रकार , एक्टिविस्ट और साहित्यकार  निवेदिता .. 

राम पाठशाला जा
राधा खाना पका
राम आ बताशा खा
राधा आ झाडू लगा
भईया अब सोयेगा
जाकर बिस्तर बिछा
अहा! नया घर है
राम देख ये तेरा कमरा है
ओह मेरा?
ओ पगली
लड़कियां हवा,धूप, मिट्टी हैं
उनका कोई घर नहीं होता.

अनामिका की कविता हमसब के जीवन की कविता है. हर स्त्री चाहती है घर का कोई कोना उसका हो . बचपन से ही मेरे सपनों में एक कमरा आता था. जिसकी मिट्टी की दीवार होती है और दीवार में एक बड़ी खिड़की . खिड़की के सामने हरिश्रृगांर के पेड़ से झरते सफेद फूल. मुझे नहीं मालूम ये सपना मेरे भीतर कैसे रचा बसा . शायद बचपन में नानी का कमरा देखकर . नानी हमेशा अपनी बड़ी गृहस्थी की गाड़ी को खींचते-खींचते बेदम दिखी. यूं तो उसका अपना कमरा नहीं था. बेटे-बहू और बेटियों और उनके बच्चों के लिए ही कमरे पूरे नहीं पड़ते थे तो वह अपने लिए कमरा कैसे लेती.

कभी -कभी लगता है कि धर्म ने स्त्रियों का चाहे जिनता नुकसान किया हो इस समाज में उसके लिए हवा,पानी और थोड़ी आजादी का जुगाड उसे उसी माध्यम से होता है. नानी का कभी कोई कमरा था ही नहीं पर कभी कभी पूजा -पाठ के नाम पर उसे वो कमरा मिल जाता था, जिस कमरे में भगवती रहती थी. मैं अक्सर सुबह उठ कर नानी के लिए फूल चुनती थी. तीरा,मीरा, गुलाब, चंपा, चमेली और लाल सुर्ख उडहूल का फूल. फूलों से जब नानी भगवती को सजाती थी तो लगता था कि जैसे पूरा कमरा सूर्ख हो गया है. नानी रामायण का पाठ करती. सीता गौरी पूजा के लिए बाग में आयी. राम ने उसकी पायल की झंकार पर नजरें उठायी उसकी नजरें सीता के चेहरे पर ऐसी जमी जैसे चांद चकोर को देखता है. मैं मंत्रमुगध हो सुनती रहती. पूजा के अंत में वो भगवती से कहती....‘हे भगवती सब के नीके राखब’ उसने कभी अपने लिए कुछ नहीं  मांगा. वही समय था जब वह कमरा नानी का होता. जिस कमरे में एक बड़ा सा पलंग था और सामने बड़ी सी खिड़की. खिड़की के बाहर फूलों से लदे गाछ. पूजा के बाद का कुछ समय नानी का होता था. वह अपनी कमर सीधी करती. उसके लंबे घने केश ऐसे दिखते जैसे नदी की लहरें हों. उसे मैंने कभी रंगीन साड़ी में नहीं देखा. गांव में रिवाज था कि अगर आपने बेटियां ब्याह दी तो आपके सजने-संवरने के दिन गये. नानी ने अपने कमरे को कभी ठीक से जिया नहीं पर वो कमरा मेरे जेहन में अबतक समाया हुआ है.

कभी आंखें बंद करती हूं मेरी सारी आरजुएं सारे आदर्श, सारे पछतावे जगमगाते हैं. मैं जानती हूं एक स्त्री के लिए उसका कोना कितना जरुरी है.  अपना कमरा नहीं होने का भय मुझे कितने दिनों तक डराता था. सारी-सारी रातें जगी रहती थी. इस डर से नींद में गयी नहीं की कई हाथ मेरे बदन पर रेंगेंगे. हम 6 भाई-बहनें हैं. पिता अच्छी सरकारी नौकरी में थे. पर हमलोग हमेशा अभाव में ही रहे. वे बेहद ईमानदार और उसूल के पक्के इंनसान हैं. हमारा परिवार संयुक्त परिवार था. घर रिश्तेदारों से भरा रहता. पिता पर पूरे परिवार की जिम्मेदारी थी. कई बार मेरी मां को अपने पास इसलिए नहीं रख पाते की आंदोलन और दूसरी जिम्मेदारियों की वजह से अपना परिवार रखना उनके लिए मुशिकल था. मां अक्सर नानी के पास रहती थी. उसे वहां सुविधा होती थी. बच्चे छोटे थे . मैं और मेरे भाई को पापा ले आये थे. हमारी पढ़ाई का नुकसान हो रहा था.


बचपन में मैं बेहद शमीर्ली और कमसुखन थी. मेरी समृतियों में मेरी बहुत सी रातें दुःख,शर्म और भयानक डर से भरी है. मैं जानती हूं आज भी समाज की बहुत सारी बच्चियों की रातें भयावह  हैं. हमलोग जहां रहते थे उस मकान में काफी लोग रहते थे. सब उम्र के. मेरी उम्र 9,10 साल की रही होगी. हमारे घर दो कमरे का था. बाहर बड़ा सा बरामदा था. काफी लोगों के रहने से हमारे लिए कोई कमरा नहीं था. अक्सर बरामदे में मसहरी लगा दी जाती थी, जिसपर मैं और मेरा भाई सोते थे. रात जैसे-जैसे गहरी होती मैं डरती. दीवार से लगी चौकी पर मैं भाई से चिपट कर सोती ताकि  कोई मुझे हाथ नहीं लगाए. रात की खामोशी मेरे गहरे दुख से भींग जाती. मसहरी के अंदर हाथ घुसते . मेरे बदन को टटोलते. मैं भाई से चिपट जाती. मैं चीखना चाहती थी पर मेरे शब्द गूंगे हो जाते.मुझे लगता हजारों बरस से मरी हुई रुहें मिलकर मुझे चारों और से घेर रही हैं. नोेंच रही हैं.  मैं मर रही हूं. मैं भाई को इतनी जोर से भींच लेती की वो हडबडा कर उठ जाता क्या हुआ क्या हुआ? अंधेरे में वे हाथ धीरे-धीरे गायब हो जाते. वर्षो तक ये हाथ मेरा पीछा करते रहे. मैं बेहद अकेली , बेहद कमजोर बेहद डरी रहती थी. बहुत मुशिकल से मैं अपने डर को जीत पायी. आज भी जब कहीं जाती हूं तो मेरी निगाहें बच्चियों पर रहती हैं की कहीं कोई हाथ उसकी मासूमियत का कत्ल तो नहीं कर रहा है. बहुत बाद में जब मुझे मेरा कमरा मिला तो रात से मेरी दोस्ती हुई. उंचे गर्द- आलूद दरख्त और छत पर बरसती हुई चांदनी रात को जीया मैंने.

दरअसल स्त्री के हिस्से उसके कमरे का होने का मतलब है, वह निजी स्पेस की मांग कर रही है. और हमारे पुरुषवादी समाज में स्त्री का अपना कुछ नहीं है. उसकी हैसियत आज भी गुलामों वाली है. दिलचस्प यह है कोई गुलाम भी इतने लंबे समय के लिए और ना ही पूरी तरह गुलाम होता है, जितनी कि पत्नी. आमतौर पर गुलाम के कार्य निर्धारित होते हैं, अपने हिस्से का काम पूरा करने के बाद वह अपनी दुनिया का खुद मालिक होता है. पर स्त्री का अपने समय पर अपना नियंत्रण नहीं है.हर स्त्री इन बातों को अपने निजी अनुभवों से समझ सकती है. मुझे याद है कि जब मां हमारे साथ रहने लगी तो हमसब के जीवन में थोड़ी स्थिरता आयी. पर कमरे कम थे और लोग ज्यादा. कई बार मां को भी अपना कमरा छोड़ना पड़ता था. मां के कमरे में बड़ी सी  चौकी थी. उस चौकी से सटे पापा का बिस्तर . मां और मेरे चार छोटे भाई बहन साथ सोते थे. हमारे घर की औरतें दूसरी औरतों के अनुपात में ज्यादा खुली  हुई और बेहतर जीवन जी सकने की स्थिति में थीं. फिर भी कमान पिता के हाथों में ही था.  मां चारों बच्चों को रात भर देखती. वे नींद में कुनमुनाते या बिस्तर गीला करते या रात को रोते सब मां ही संभालती . सारे दिन की थकी-मांदी मां रात को भी बच्चों को सीने से लगाए रखती. कई बार अगर वे जोर-जोर से रोते तो पिता की नींद उजट जाती वे कहते उन्हें चुप कराइये. वे खुद नहीं उठते.


एक जिदांदिल ,संवेदनशील और अपने बच्चों के प्यारे पिता होने के बावजूद वे पितृसत्ता की  जाल से पूरी  तरह मुक्त नहीं थे. पर मुक्ति की कोशिश में जरुर लगे थे. काफी समय बाद जब मैं दसवीं में पढ़ रही  थी तो मुझे अपना कमरा मिला. जो लगभग कबाड़ा घर था. पुराने टीन के बक्से , अनाज का बोरा और बहुत सारे फालतू सामान. उसी कमरे को मैं और चचेरी मेरी बहन जोना ने मिलकर दुरुस्त किया. पढ़ने के लिए एक टेबुल आया. और कहीं से पुराना एक लैंप मिल गया. मेरे कमरे के बाहर खुला गलियारा था. बाहर खुला  मैदान और सड़कें.  जिसके दोनों किनारे उंचे-उंचे दरख्तों के घने झुंड थे रात को मुक्कमल खामोशी तारी रहती थी. मेरे लिए ये सबसे सुन्दर समय होता था. रात को डायरी लिखना या रंग को कागज पर उकेरना या कोई किताब पढ़ना. मेरे घर में किताबें हमेशा से रहीं. किताबों से मुहब्बत शायद इसलिए हुई. किताबों के साथ जीया, और खोज -खोज कर उन स्त्रियों को पढ़ा जिन्हें पढ़ने की मनाही थी.  उन्हीं दिनों हमने 'गुनाहों का देवता' पढ़ा. 'आपका बंटी' पढ़ा. 'अन्ना केरोनिना' पढ़ा.

आज सोचती हूं मेरे जैसे प्रगतिशील घरों में भी स्त्री लेखन से जुड़ी कम ही किताबें मौजूद थीं. जब हमलोग बड़े हुए तब हमारा घर सभी लिखने वाली स्त्रियों की किताबों से भर गयीं. मां को जरुर मैंने कई बार ‘बा’ कमला नेहरु और महादेवी वर्मा को पढ़ते हुए देखा. मेरी मां को स्कूली शि़क्षा नहीं मिली थी पर उसे किताबों से बेहद लगाव था. घर, गृहस्थी के कारण उसे पढ़ने की कम ही फुरसत मिलती. जब भी समय मिलता वह किताबें लिए बैठ जाती. हमारे घर में चाहे अभाव जितना हो, किताब खरीदने में पिता कभी कोताही नहीं करते. आज भी मां , पापा का घर किताबों से भरा पड़ा है. कितनी बातें और कितने किस्से. ये किस्से मेरे कमरे का हिस्सा है. उसी कमरे में  कितने इश्क परवान चढ़े, कितने दिल टुकड़े हुए. कितनी किताबों के पात्र बाहर निकलकर बतियाते रहे. कितनी किताबें दिल में धंस गयीं, कितनी किताबों से मुहब्बत हुई. हमारे कमरे की खिड़की कई खिडकियों तक झांकती थी. कई खिड़कियों की निगाहें जमी रहती थीं.  कई बार पूरी की पूरी रात हमलोग निहारते काट देते थे. हमारे जमाने का इश्क जरा दूर-दूर का था. आंखों आंखों में था. पुराने फिल्मी गीतों की तरह-पल भर को अगर तू मुंह फेरे ओ चंदा मैं उनसे प्यार कर लूंगी, बातें हजार कर लूंगी. राजेन्द्र नगर के बाद जब हमलोग गदर्नी बाग रहने गए तो वह बडा घर था जहां पहली बार मुझे मेरा पूरा कमरा मिला. और तकिया भी. उसके पहले तक कभी तकिया गायब तो कभी कमरा दखल होता रहता था. मेरे कमरे में ढ़ेर सारी किताबें थीं और बहनों के नृत्य के साजों सामान. मेरे पास दो सफेद चादर थी और सफेद कपडा, जिसे मैं पढ़ने के मेज पर बिछाती थी.


मेरा कमरा इश्क और आंदोलन का गवाह था. कितनी बहसें और वैचारिक टकराव यहीं से उपजे. कितने दिल मिले और बिछडे. मेरी गहरी दोस्त शींरी यही आयी थी इसी कमरे में उसका दिल टूटा था. इसी कमरे से अंतिम बार अपने प्रेम को विदा कहा था. मैं उसे जार-जार रोते देखती रही थी. मेरा एक दोस्त घंटों मार्क्सवाद  की धज्जियां इसलिए उड़ाता ताकि उसे मेरे पास देर तक बैठने का मौका मिले . मैं बहस में उलझी रहूं. यहीं चन्द्रशेखर के साथ खूबसूरत दिन गुजरे. हमारा प्यारा चंदू किताब लिए घंटों बैठा रहता और पापा के डर से हमलोग पढ़ने के समय धीरे-धीरे बातें करते रहते. सब्ज और सुनहरा मेरा कमरा इस कदर दिल फरेब था जैसे आकाश में बाग लगा हो. हमारे कमरे से लगे सूर्ख छतों वाली कोठियों के पास घने झुरमुट में अक्सर मुहल्ले के लडके टकटकी निगाहें लगाये खडे रहते. जिस कमरे में चार लड़कियां हो उस कमरे की रौनक होगी ही. अक्सर रात में जब चन्द्रशेखर होता तो हम छत पर खड़े होकर तारे निहारा करते. कविताएं पढ़ते. कमरे के बाहर बादल गुच्छे के गुच्छे तैरते. रात ऐसी होती जैसे दूर पहाड़ों पर आबशार तेजी से गिर रहे हैं. अगर मेरे पास ये कमरा नहीं होता तो शायद दुनिया इसतरह नहीं होती. कितनी हंसीन और पवित्र यादें बावस्ता हैं. मुझे लगता है हर स्त्री के पास उसका कमरा होना चाहिए. या एक कोना, जो उसका हो. जहां वह जिन्दगी के कुछ पल अपने लिए जीएं. जहां वह कह सके ये मेरा कमरा है इसका रंग, इसकी खूशबू और इसकी दीवारों पर मेरा इतिहास दर्ज है.

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