कुंडली-मिलान शादी के अमरत्व की गारंटी देता है क्या?

तेजपाल सिंह तेज (जन्म 1949) की गजल, कविता, और विचार की कई किताबें प्रकाशित हैं- दृष्टिकोण, ट्रैफिक जाम है, गुजरा हूँ जिधर से आदि ( गजल संग्रह), बेताल दृष्टि, पुश्तैनी पीड़ा आदि (कविता संग्रह), रुन-झुन, खेल-खेल में आदि ( बालगीत), कहाँ गई वो दिल्ली वाली ( शब्द चित्र), दो निबन्ध संग्रह  और अन्य. तेजपाल सिंह साप्ताहिक पत्र ग्रीन सत्ता के साहित्य संपादक और चर्चित पत्रिका अपेक्षा के उपसंपादक रहे हैं. आपने अधिकार दर्पण का भी संपादन कार्य किया है. हिन्दी अकादमी (दिल्ली) द्वारा बाल साहित्य पुरस्कार ( 1995-96) तथा साहित्यकार सम्मान (2006-2007) से सम्मानित.  आजकल स्वतंत्र लेखन में रत हैं.

शादी की कहानी कोई नई नहीं है. शादी ना ही कोई नया रास्ता है. चाहे-अनचाहे सभी इस रास्ते से गुजरते हैं. कुछ चाहकर और कुछ न चाहकर भी.....कुछ कम उम्र में तो कुछ चढ़ी उम्र में....किंतु कमाल का सच ये है कि इस रास्ते में आई बाधाओं के किस्से चुटकलों के जरिए तो सुनने/पढ़ने को खूब मिलते हैं, किंतु इन चुटकलों के सच को कोई भी पति अथवा पत्नी व्यक्तिश: स्वीकार नहीं करता. क्यों......? लोक-लज्जा का डर, पुरूष को पुरुषत्व का डर, पत्नी को स्त्रीत्व का डर...... डर दोनों के दिमाग में ही बना रहता है... इसलिए पति व पत्नी दोनों आपस में तो तमाम जिन्दगी झगड़ते रहते हैं,  किंतु इस सच को सार्वजनिक करने से हमेशा कतराते हैं.
एक समय था कि जब शादी के मामले में लड़के और लड़की की इसके अलावा कोई भूमिका नहीं होती थी कि वो दोनों आँख और नाक ही नहीं अपितु साँस बन्द करके माँ-बाप अथवा दूसरे सगे-संबन्धियों की इच्छा के अनुसार शादी के लिए तैयार हो जाएं. इसके पीछे समाज का अशिक्षित होना भी माना जा सकता है. किंतु जैसे-जैसे समाज में शिक्षा का व्यापक प्रचार और प्रसार हुआ तो नूतन समाज के विचार पुरातन विचारों से टकराने लगे, अब शादी के मामले में लड़के और लड़की की इच्छाएं भी पुरातन संस्कृति के आड़े आने लगी हैं. फलत: पिछले कुछ दशकों से यह देखने को मिल रहा है कि शादी के परम्परागत पहलुओं के इतर शादी से पहले लड़के और लड़की को देखने का प्रचलन जोरों पर है. पहले यह उपक्रम केवल शहरों-नगरों तक ही सीमित था किंतु आजकल तो यह उपक्रम दूरस्थ गाँवों तक पहुँच गया है.


यहाँ एक सवाल का उठना बड़ा ही जायज लगता है कि शादी के उद्देश्य से लड़के और लड़की की पंद्रह-बीस मिनट की मुलाकात में लड़का लड़की और लड़की लड़के के विषय में क्या और कितना जान पाते होंगे, कहना कठिन है. सिवाय इसके कि एक दूसरा, एक दूसरे की चमड़ी भर को ही देख-भर ले. दोनों एक दूसरे की नकली हंसी को किसी न किसी हिचकिचाहट के साथ दबे मन से स्वीकार कर लें. इस सबका कोई साक्षी तो होता नहीं है. अगर हो भी तो उनका इस प्रक्रिया में कुछ भी कहने का कोई अधिकार यदि होता है तो वह केवल लड़के और लड़की को केवल शादी के लिए तैयार करना होता है. इसके अलावा और कुछ नहीं. अमूनन देखा गया है कि शादी के बन्धन में बन्धने जा रहे जोड़े को दूसरी मुलाकात का मौका प्राय: दिया ही नहीं जाता. धार्मिक बाधाएं इस सबके सामने खड़ी कर दी जाती हैं. हमको इस धार्मिक उपक्रम ने इस हद तक कमजोर और कायल बना दिया है कि हम सारा समय लड़के और लड़की की कुंडलियाँ मिलाने में गवां देते हैं

व्यापक दृष्टि से देखा जाए तो यह कतई सच है कि प्रथम दृष्टि में, आजकल लड़के और लड़की को शादी से पूर्व मिलने का मौका तो अवश्य दिया जाता है, किंतु उसके बाद उन्हें फोन पर भी बातचीत करने का मौका न दिए जाने तक की कवायद होती है. यह बात अलग है कि आज के संचार के विविध माध्यमों और नई-नई तकनीकी संचार युक्तियों के युग में लड़का–लड़की चोरी-छिपे फोन, वाटसेप, इंटरनेट या फिर फेसबुक के जरिए बराबर बात करते रहते हैं किंतु हम बच्चों को शादी से पूर्व एक से ज्यादा बार मिलने का मौका ही नहीं देते. और न ही  बच्चों के माता-पिता ही  दोबारा ऐसा कोई मौका लेने का प्रयास करते हैं.  बस! घड़ी-भर का मिलना पूरे जीवन का बन्धन बना दिया जाता है. यह कहाँ तक उचित है?


सच तो ये है कि शादी जीवन का एक अकेला ऐसा सौदा है जो एक-दो दिन की मुलाकात में ही तय मान लिया जाता है जबकि एक टी.वी. या फ्रिज जैसी दैनिक उपयोग की चीजें खरीदने की कवायद में सप्ताह, हफ्ता ही नहीं, यहाँ तक की कई-कई महीने तक लग जाते हैं.... कौन सी कम्पनी का लें? इसकी क्या और कितने दिनों की गारंटी है?....... इसका लुक औरों के मुकाबले कैसा है?... न जाने क्या-क्या...... न जाने कितने मित्रों से इसकी जानकारी हासिल की जाती हैं..... इतना ही नहीं, सब्जी तक दस दुकानों की खाक छानने के बाद  भाव-मोल करने के बाद ही खरीदी जाती हैं....किंतु लड़का-लड़की के बीच जीवन-भर का रिश्ता बनाने में जान-पहचान के बजाय बच्चों की शिक्षा के स्तर और उनकी आमदनी के विषय में ही ज्यादा सोचा जाता है...............और कुछ नहीं.
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जहाँ तक कुंडलियों के मिलान का सवाल है, यह एक ढोंग है,  अन्धविश्वास है, जो सदियों से होता आ रहा है और पता नहीं भविष्य इस परिपाटी को कब तक ढोने को बाध्य होगा.  यहाँ यह सवाल उठता है कि  क्या ये कुंडली-मिलान रिश्तों के अमरत्व की कोई गारंटी देता है. क्या कुंडली-मिलान वाले जोड़ों के बीच कभी कोई दरार नहीं पड़ती? क्या उनका जीवन-भर मधुर साथ बना रहता है? क्या उनके जीवन में कोई प्राक्टतिक बाधा नहीं आती?  जैसी कि  कुंडली मिलाते समय आशा की जाती है......व्यापक रूप से ये भामक मानसिकता है, ऐसा करने से कभी भी किसी दम्पति को आशातित शांति शायद कभी नही और कतई नहीं मिलती. यह उपक्रम अपने को स्वय धोखा देने के बराबार है. मुझे लगता है कि इसके इतर यह अच्छा होगा कि लड़के और लड़की की जन्मकुंडली के बदले उनकी चिकित्सीय कुंडलीयों  का मिलान भी किया जाना चाहिए. खुशवंत सिंह की पुस्तक ‘दिल्ली’ में उद्धृत  महात्मा शेख सादी के इस बयान से जाना जा सकता है – “यदि औरत बिस्तर से बेमजा उठेगी तो बिना किसी वजह के ही मर्द से बार-बार झग़ड़ेगी|”  किंतु ये एक ऐसा सत्य है जिसे कोई भी पुरुष अथवा औरत मानने वाला  नहीं है ...... किंतु ऐसा होता है. रिश्तों की खटास में यह भी एक और सबसे बड़ा कारण है. इस कारण के बाद आता है.......दौलत का सवाल.... श्रंगारिक संसाधनों की उपलब्धता....... गहनों की अधिकाधिक रमक........आदि.... आदि. पुरुषों के मामले में दहेज का लालच....और न जाने क्या-क्या. क्या लड़के और लड़्के के माता-पिता द्वाराइस ओर कुंडलियाँ मिलाते समय ध्यान दिया जाता है?  अमूनन नहीं...
नवभारत टाइम्स – 06.02.2015 में छपे एक सर्वे के जरिए यह तथ्य सामने आया है कि ज्यादातर दम्पत्तियों के बीच शादी वाला प्यार शादी होने के पहले दो सालों में ही फुर्र हो जाता है .... कुछ का तीन सालों बाद ...... और जिनका बचा रहता है ....... इनके सामने  किसी न किसी प्रकार की सामाजिक मजबूरी ही होती है. .... ये पहले कभी होता होगा कि पति-पत्नी बुढ़ापे में एक दूसरे के मददगार बने रहते थे..... आज समय इतना बदल गया है कि बुढ़ापा आने से पहले ही सारा खेल बिगड़ जाता है......


अधिकाँश मामले में औरतों के पति पत्नी के जीवित रहते ही मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं. फलत: पत्नियों को ऐसा पीड़ा भरा असहाय जीवन जीना पड़ता है जिसकी कल्पना करना भी दूभर होता है. एक उपेक्षित जीवन जीना.......और वहशी आँखों की किरकिरी बने रहना....... विधवाओं की  नियति हो जाती है.  कुछ लोग कह सकते हैं कि विधवा की देखभाल के लिए क्या उसके बच्चे नहीं होते. इस सवाल का उत्तर वो जीवित विधुर और विधवा अपने गिरेबान में झाँककर खोजें कि मृत्यु के बाद उनके स्वयं के बच्चे उनका कितना ध्यान रखते हैं? दान-दहेज की बात के इतर इस ओर कभी किसी का ध्यान शायद ही गया हो. लगता तो ये है कि इसके कारणों को खोजने का प्रयत्न भी शायद नहीं किया गया जो अत्यंत ही शोचनीय विषय है. मुझे तो लगता है कि समाज में ये जो प्रथा है कि लड़का उम्र के लिहाज से लड़की से प्रत्येक हालत में कम से कम पाँच वर्ष बड़ा होना ही चाहिए, इस प्रकार की सारी विपदाओं के लिए जिम्मेदार है. शायद आप भी इस मत से सहमत होंगे कि उम्र के इस अंतर को मिटाने की खास आवश्यकता है. लड़का-लड़की की उम्र यदि बराबर भी है तो इसमें हानि क्या है? या फिर शादी के एवज पारस्परिक रिश्तों को क्यूँ न स्वीकृति प्रदान की जानी चाहिए......... विछोह तो आगे....पीछे होना तय है ही........भला धुट-घुटकर जीवन यापन करने की बाध्यता शादी ही क्यों हो?

इस सबसे इतर, नवभारत टाइम्स दिनांक 23.05.2015 के माध्यम से अनीता मिश्रा कहती हैं कि शादी सिर्फ आर्थिक और शारीरिक जरूरतों को पूरा करने भारत का माध्यम नहीं है. लड़कियों को ऐसे जीवन साथी की तलाश रहती है जो उन्हें समझे. उनकी भावनात्मक जरूरतें भी उनके साथी के महत्तवपूर्ण हों. वे  फिल्म ‘पीकू’ में एक संवाद का हवाला देती हैं.......   “ शादी बिना मकसद के नहीं होनी चाहिए. फिल्म की नायिका का पिता भी पारम्परिक पिताओं से हटकर है. वह कहता है, ‘ मेरी बेटी इकनामिकली, इमोशनली और सेक्सुअली इंडिपेंडेंट है, उसे शादी करने की क्या जरूरत?’ मैं समझता हूँ कि यह तर्क अपने आप में इमोशनल जरूर है. फिर भी यह आम-जन का ध्यान तो आकर्षित करता ही है.

अनीता जी आगे लिखती है कि यहाँ एक सवाल यह भी है कि विवाह संस्था को नकारने का कदम स्त्रियां ही क्यों उठाना चाहती है. शायद इसके लिए हमारा पितृसत्तात्मक समाज दोषी है. वर्तमान ढांचे में विवाह के बाद स्त्री की हैसियत एक शोषित और उपयोग की वस्तु की हो जाती है. आत्मनिर्भर स्त्री के भी सारे निर्णय उसका पति या पेशंट के परिवार वाले ही करते हैं. शादी होने के बाद (कुछ अपवादों को छोड़कर) उसका पति मालिक और निरंकुश शासक  की तरह ही व्यवहार करता है. ऐसे में स्त्री के लिए दफ्तर की जिन्दगी और घरेलू जिन्दगी में तालमेल बिठाना मुश्किल हो जाता है. कहा जा सकता है कि ज्यादातर स्त्रियों को दफ्तर में काम करने के बाद भी घर में एक पारम्परिक स्त्री की तरह खुद को साबित करना होता है. किसी भी स्त्री को जब सफलता मिलती है तो यह भी जोड़ दिया जाता है कि उसने करियर के साथ सारे पारवारिक दायित्व कितनी खूबी से निभाए. जबकि पुरुषों की सफलता में सिर्फ उनकी उपलब्धियां गिनी जाती है.


यहाँ यह सवाल उठना भी लाजिमी है कि शादी समाज की एक जरूरी व्यवस्था रही है किंतु आजादी चाहने वाली लड़कियां शादी को एक बन्धन की तरह देखती हैं. फिर मानव समाज की दृष्टि से एक सामाजिक व्यवस्था के तौर पर विवाह का विकल्प क्या है? क्या यह बेहतर नहीं होगा कि बदलते परिवेश में स्त्री शादी का विकल्प खुद खोजे? जाहिर तौर पर अब तक पुरुषों की आर्थिक स्वनिर्भरता और सक्षमता ने केवल उन्हें ही निर्णय लेने का अधिकार दे रखा था. अब अगर महिलाएं भी इसी हैसियत में पहुँचने के बाद अपनी जिन्दगी की दिशा तय करने वाला फैसला खुद लेने लगी हैं तो इसमें गलत क्या है? फिर क्यों न आत्मनिर्भर, जागरूक और सक्षम महिला को शादी करने, न करने का फैसला खुद लेने दिया जाए?
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