स्वयं सिद्धा !

रंजना गुप्ता
दो कविता संग्रह(रजनी गन्धा,परिंदे),एक कहानी संग्रह(स्वयं सिद्धा) प्रकाशित! निजी व्यवसायी, स्वतंत्र लेखन! संपर्क : ranjanaguptadr@gmail.com

सुष्मिता आज ऑफिस जाने के मूड में नही थी ! उसने लिहाफ को उठा कर फिर से मुहँ ढक लिया ,जैसे उसे नींद आ ही जाएगी ! लेकिन थोड़ी ही देर में लिहाफ के श्वेत श्याम धब्बे उसे बैचैन करने लगे !उसे ऐसा प्रतीत हुआ, जैसे ये धब्बे उसकी पूरी जिंदगी पर छा जाना चाहते है ,घबरा कर उसने बिस्तर छोड़ दिया ,और कारीडोर में टहलने लगी !उसने पूरब की ओर देखा ,सूरज की लालिमा चारो दिशाओं में सुनहरी आभा के रूप में फैलने लगी थी !सुष्मिता का निश्चय बड़ा अटल होता है ,आज वह एक बार भी फैक्ट्री नही जाएगी ,वर्कर्स को जो करना है करे !वैसे भी वे उसकी सुनते नही ,उन्हें जो करना होता है वे वही करते है !उसने कई बार देखा है ,जब वह अचानक पहुँचती है ,तो मंडली लगा कर बैठे उसके कारीगर बीडी फूँक रहे होते है ,उनके मुहँ दबा -दबा कर हँसने और फुसफुसा कर बात करने का ढंग बताता है ,कि वे उसकी अनुपस्थिति से बहुत मौज में है ,जैसे ही ऑफिस में सुष्मिता के आने की आहट होती है ,वे तुरंत सभा समाप्त कर ,अपनी-अपनी मशीनों पर बैठ जाते है !और ऐसे मनोयोग से मशीनें चलाने लगते है ,नीचे के कारीगर इतनी तल्लीनता से माल की कटाई -छटाई में जुट जाते है ,जैसे उनके जैसी कार्य कुशलता ,कर्मठता और व्यस्तता कही और के कारीगरों में या फैक्ट्री में ,पाई ही नहीं जाती है !सुष्मिता का व्यवहार अपने वर्कर्स के साथ बेहद मानवीय और सौहार्द्य पूर्ण है ,वह बड़ी सह्रदयता से उनके सुख दुःख में साझीदार बनती है ,पर वे उसकी इस संवेदन शीलता को उसकी कमजोरी समझते है , जबकि उसके सारे कारीगर प्राय: एडवांस पर ही रहते है ,तब भी उनकी यह कामचोरी की आदत ...

उफ़ वह उब चुकी है ..उसके वर्कर्स अपनी कार्य क्षमता को बहुत संभाल-संभाल कर खर्च करते है,चाहे जितना अनिवार्य कार्य चल रहा हो ,उन लोगो का इससे ज्यादा मतलब नही रहता !चाहे मार्केट में सुष्मिता की प्रतिष्ठा और उसकी कम्पनी की धज्जियाँ उड़ जाये ,चाहे उसका पैसा लेट लतीफी की वजह से डूब जाये ,उन्हें तो बस अपनी प्रतिमाह की सैलरी ,वह भी नियत समय पर ,और अधिक से अधिक ओवर टाइम बनाने से मतलब !एडवांस तो हर समय चाहिए ,वरना काम छोड़ने की धमकी !और धीमी कार्य प्रणाली तो उनकी यूनियन बाजी का जैसे पहला सबक ही है !

पन्द्रह -बीस वर्कर्स की इस छोटी सी यूनिट से काम निकलवाने में सुष्मिता को पसीने आ जाते है !सुष्मिता अत्यंत शिष्ट -सुसंस्कृत ,और सुशिक्षित ,मृदु भाषी महिला उद्यमी है ! वह नारी स्वतंत्रता की सही अर्थो में जीवित पर्याय है ! उसने महिला पॉलिटेक्निक से डिग्री लेकर एक प्रोजेक्ट तैयार किया था ,जिसके फाइनेंस हेतु जब उसने बैक के अधिकारियो से संपर्क किया तो ,बैंक अधिकारियो की प्रतिक्रिया अत्यंत सकारात्मक रही ,उन्होंने उसके प्रोजेक्ट की जम कर सराहना की ,और इस तरह उसे बड़ी आसानी से फैक्ट्री शुरू करने के लिए लोन उपलब्ध हो गया !पिता के खाली पड़े प्लाट पर उसने फैक्ट्री की आधार शिला रखी ! बड़े जोश और उमंग के साथ उसने अपना उद्योग शुरू किया था ,यह फैक्ट्री उसके पिता का सपना थी ,वह अपने दिवंगत पिता की इकलौती वारिस थी ,उनके बाद उसका अपना कोई नही बचा था ,माँ का देहांत बहुत पहले ही हो चुका था ,पिता के लाख जिद करने के बावजूद उसने विवाह नही किया था ! उसे डर था,कि विवाह के पश्चात् ,वह पिता के प्रति अपने दायित्वों को शायद पूरी तरह निभा नही सकेगी !वह कर्तव्य जो भारतीय समाज में एक पुत्र का पिता के लिए माना जाता है ,वह पुत्री होकर भी पिता के लिए अत्यंत सहजता से उन्ही कर्तव्यो का निर्वाह तभी शायद कर सकी थी !उसके पिता सदैव करते थे ,कि नौकरी करके तुम अपनी आजीविका तो आसानी से कमा सकती हो ,लेकिन एक उद्योग मनुष्यों के एक पूरे समूह को रोजगार देता है ,उद्योग धंधे में तुम अपने साथ-साथ ही दूसरे पचासों व्यक्तियों की जीविका भी आसानी से चला सकती हो !उद्योग किसी सामाजिक संगठन की तरह बेहद कल्याणकारी वह व्यावसायिक संगठन है ,जो कितने ही घरो में चूल्हे जलाने का माध्यम बनता है ,पिता की इस राष्ट्रीय सोच को सुष्मिता ने अपना कैरियर बना लिया !उसके पिता आदर्शो की प्रति मूर्ति थे ,कुछ-कुछ अति मानव जैसी उनमे कई विशेषताएँ एक साथ मौजूद थी ! सच्चाई ईमानदारी की तो वे जीती जागती मिसाल थे ! वे उससे प्राय: कहा करते थे , कि तुम कभी अन्याय का साथ नही देना ,किसी पर अन्याय नही करना !हर बुराई के लिए जम कर लड़ना सीखो ,लेकिन कभी किसी बुराई के लिए अपनी अच्छाई को दांव पर नही लगाना !


 माँ के सरल निश्छल वात्सल्य ने उसके ह्दय को आकार दिया ,तो पिता के दृढ़ विचारो ने सुष्मिता के सम्पूर्ण व्यक्तित्व को एक कवच रूपी सांचे में ढाल दिया था ,सुष्मिता में इसी कारण एक अदभुत जीवनी शक्ति थी ,जो उसे जल्दी टूटने नही देती थी ,आत्म विश्वास तो उसमे कूट-कूट कर भरा था ,डरना वह जानती नही थी ,अध्यवसायी पिता की उस अध्यवसायी पुत्री ने ,विवेकानंद से लेकर टॉलस्टॉय ,भारतीय दर्शन से लेकर पाश्चात्य विचारकों तक ,वैचारिक अध्ययन का कोई क्षेत्र नही छोड़ा था !लेकिन अंत में एक मात्र गीता ही उसकी सर्व प्रिय पुस्तक रही !पर हित और पर कल्याण की भावना को ,उसने अपने व्यवसाय तक में गूँथरखा था !पैसे के लिए बात-बात पर बिक जाने वाली व्यापारिक बुद्धि से वह कोसो दूर थी !विरासत में मिले संस्कार उसे व्यावसायिक असफलता दिलाने में ,अत्यंत अहम् भूमिका रखते थे !वह सुष्मिता जिसे बाजार वाद ,और धन की कुरूप लालसा का ,चश्मा पहन कर देखना ,बिलकुल असंभव था !उसे उसके ही अनपढ ,गंवार लेकिन पेशेवर चालक बुद्धि के कारीगर प्राय: चकमा देते रहते थे !लेकिन पैसा कमाने की होड़ में आदमियत को रौंद कर ,आगे बढना सुष्मिता को मंजूर नही था !धन के साथ-साथ धर्म कमाने की ,नैतिक सॊंच ही उसकी इस कार्य क्षेत्र में ,सबसे बड़ी बाधा बन गयी थी !कभी -कभी बाजार वाद के कठोर शिकंजे में फंस कर ,बेबस होकर वह फैक्टी बंद करने की सोचती ,लेकिन अपने पिता के सपने को एक लक्ष्य की भांति देखने वाली सुष्मिता ,फैक्ट्री में ताला तब तक नही डाल सकती थी,जब तक उसके एक भी कारीगरको ,उससे रोजी रोटी मिलती रहे !आजकल वह प्राय:अनमनस्क सी रहने लगी थी !वह अपने उदार ह्रदय के किसी कोने में ,ईर्ष्या के एक नन्हे पौधे को लगातार पनपता हुआ देख रही थी !वह उस पौधे को जड़ से उखाड़ फेंकना चाहती थी ,लेकिन वह बेशर्म पौधा उसके सिद्धान्तों की हरी -भरी सृष्टि का ही जीवन रस पीकर ,बढता ही जा रहा था ! इसका कारण वह धीरे -धीरे समझने लगी थी !

उसकी फैक्ट्री के सामने ही ,स्थित चाय समोसे की छोटी सी दुकान ,कुछ ही सालो में किस तरह शहर की प्रतिष्ठित मिठाई की दुकान में बदल गयी ,और देखते ही देखते ,नगर निगम की जमींन पर अवैध कब्जा करके बैठा ,वह करतार नाम का व्यक्ति कैसे रातों रात कालोनी के धनाढयो में शुमार हो गया ,वह यह सारा खेल चमत्कृत होकर देखती ही रह गयी ,उसे याद है ,थोड़े दिनों पहले अपने गंदे अंगौछे से नाक साफ करता ,हुआ और उसी हाथ से बना-बना कर समोसे ढेर करता हुआ ,यह आदमी सदैव उसके मन में जुगुप्सा जगाता रहता था ,उसके समोसे छोले खाकर बीमार पड़ते लोगो के कारण उसकी करतार से आये दिन झड़प होती रहती !और वह छोटा सा पहाड़ी नौकर तो क़डाही को जैसे साफ करके रखता ,सड़क का आवारा कुत्ता उसे चाट कर फ़िर से साफ़ कर देता ,उसे और भी बहुत कुछ याद है ,नगर निगम की गाड़ी ,थाने का दरोगा ,जब तब करतार को तंग करते थे !रोज उसकी झोपड़ी नुमा दुकान उजडती और अगले दिन ही फिर बन जाती !


धीरे -धीरे समय बीतने लगा ,अब करतार की उन्ही नगर निगम के अधिकारियों से हँस-हँस कर बाते होने लगी थी !वह थाने का दरोगा भी ,उसके यहाँ से मिठाईयों के बड़े-बड़े टोकरे ,अक्सर घर ले जाने लगा !करतार का कद धीरे-धीरे बढ़ रहा था ! यहाँ तक कि सुष्मिता स्वयं को उसके सामने बौना पाने लगी थी ,वह लगातार सुरसा के मुहँ की भांति फैलता हुआ सौ योजन तक फ़ैल चुका था !और सुष्मिता ,वह तो उसके सामने बिंदु भर रह गयी थी !आज उसके दुकान की शानदार चार मंजिला भव्य इमारत शहर की मुख्य सडक पर बन कर तैयारहो गयी थी ,उसका उद्घाटन करने ,शहर के मेयर आ रहे थे !अपने पान से रंगे गंदे दांतो को निकले हुये ,वह दो दिन पहले सुष्मिता को भी आमंत्रित करने आया था ! एक हिकारत भरी नज़र उसकी फैक्ट्री पर डाल ,अत्यन्त धूर्तता पूर्वक हाथ जोड़ कर उसी भांति मुस्करा रहा था ,जैसे नेता वोट माँगने के लिए जनता के सामने ढोंगी मुद्रा में खडा रहता है ,सुष्मिता उसकी विषैली हँसी को अभी तक भूल नही पाई थी !अपने ही बनाये आदर्शो का तिलिस्म आज उसे ,बिखरता नजर आरहा था !वह स्वयं को पहली बार कटघरे में खड़ा पा रही थी ! इस अंतरतम के विद्रोह का चेहरा उसे बिल्कुल अजनबी लग रहा था !मन एक अनजानी सी ग्लानि से विचलित हुआ जा रहा था !आज वह अपनी ही निष्ठा ,ईमान दारी ,और सत्य परकता को जितना कोस सकती थी ,कोस रही थी !लेकिन थोड़ी ही देर बाद थक हार कर बैठ गई ,और वह कर भी क्या सकती थी ?अपने जीवन मूल्यों को बदलना या उनसे समझौता करना ,उसके बस की बात तो थी नही !यह वह अच्छी तरह समझती थी !तभी फोन की घंटी बज उठी !
'बिटिया आपका फोन है ! अचानक विचारों के सतत प्रवाह को ईश्वर काका की आवाज ने टोक दिया
!यह ईश्वर काका भी .....

पापा के समय से ही वह उसके साथ है !और आज भी उसी समर्पित भाव से उसकी देख भाल करते है !उससे भी बढ़ कर पितृ तुल्य स्नेह देते है !उन्ही के कारण वह घर से निश्चिन्त होकर फैक्ट्री का कार्य भार संभालती है !ढेरसारे पेड़पौधों से भरा ,विस्तृत पृष्ठ भूमि में संजोया ,यह छोटा सा घर उसे सही मायने में सन्तुष्टि और चैन देता है !दुनिया की चालबाजियों ,मायावी द्वन्द फंदों से अब वह उकता चुकी है ! लेकिन बंदी के कगार पर खड़ी उसकी फैक्ट्री .....ओह ...तनाव के कारण उसका सर दुखने लगा था !

उसने आखिर इतना गलत फैसला लिया ही क्यों ? उसे तो किसी यूनिवर्सिटी ,में प्रोफ़ेसर आदि होना चाहिए था !या फिर किसी पत्रिका का संपादक जैसा ही कुछ ...जहाँवह स्वयं को वास्तविक रूप में अभिव्यक्त कर सकती थी !उमड़ते विचारों को स्थायित्व दे सकती थी !आज उसे रह -रह कर पिता की शिक्षा पर भी क्रोध आ रहा था .... भला सच्चाई और ईमानदारी से कहीं आज के जमाने में सफलता मिल सकती है ? वातावरण में चारों और बिखरी घुटन और हताशा उस पर पूरी तरह हावी होने लगी थी ! 'बिटिया आपका फोन है ,आपने बात नही की ....'
थोड़ी ही देर बाद उसके लिए नाश्ता लेकर लौटे ,ईश्वर काका ने फोन का रिसीवर अलग रखा देखा तो आश्चर्य से पूछ बैठे ,पहले तो कभी इतना सोंच में डूबा सुष्मिता को उन्होंने नही देखा था !
..'जरुर कोई बड़ी बात है ....'

ईश्वर काका के माथे पर उभर आई बुढापे की लकीरों में ,चिंता की लकीरे भी सम्मलित हो गयी ! ..उन्होंने चुप चाप फोन का रिसीवर ठीक से रखा ,और बिना कुछ कहे वापस किचन में चले गए !सुष्मिता का अनकहा दुःख वे भली भांति समझते थे ..लेकिन उसके अड़ियल और जिद्दी स्वभाव को भी बचपन से जानते थे ! थोड़ी ही देर में फोन की घंटी फिर से बजी ,इस बार सुष्मिता ने स्वयं ही फोन उठाया ,'हेलो ..,मालकिन ..मालकिन ..' 'हाँ ..हाँ..बोलो किशन ...' 'आज आप आई नही ...करतार की नई बिल्डिग पर इनकम टैक्स वालों की रेड पड़ गयी है .....हेलो...हेलो...' लेकिन तब तक बिना कुछ कहे ,बिना कुछ सुने ,सुष्मिता ने फोन रख दिया था ! वह इस ख़बर से जैसे जड़ हो गयी !और पुन:उसी मुद्रा में कुर्सी पर बैठ गयी !


खिड़की से आती मन्द बासंतिक हवा ,और खिली -खिली धूप ने जैसे उसके चेहरे से ,चिन्ता परेशानियाँ, और कशमकश के बादलों को किनारे हटाना शुरु कर दिया ,थोड़ी ही देर में उसने स्वयं को ,फिर उसी उर्जा से परिपूर्ण कर लिया ,और अपने सोये हुए सबेरे को जगा कर उठ खड़ी हुई ! 'ईश्वर काका ,मेरा बैग कहाँ है? मुझे ऑफिस पहुँचना है ,जल्दी करो ...'अचानक उल्लास से भीगा स्वर सुन कर ,ईश्वर काका निहाल हो गये !अपनी प्यारी बिटिया की निर्णयात्मक दृढता ,और उन्मुक्त जिजीविषा को उन्होंने तुरंत पहचान लिया !उनके माथे की लकीरों में अब प्रभु से प्रार्थना की कपँकपाहट उभरने लगी थी !अगले ही पल सुष्मिता की गाड़ी सड़क पर दौड़ रही थी !दूर समुन्द्र की उछलती चमकती लहरों में बार -बार उसको अपने पिता का चेहरा,दिखाई दे रहा था !जो उससे कह रहे थे ,कि' झूठ और बेइमानी की आयु जितनी विद्युत रेखा के समान चकाचौंध भरी होती है ,उतनी ही क्षणिक और विनाश कारी भी होती है ,जो स्वयं तो जलती ही है , साथ में दूसरों का घर भी जला देती है !
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