उपासना झा की कवितायें


प्रेम  में,

प्रेम  में,
देह की देहरी लांघ
आम्रपाली बन जाना
क्या कठिन था
कठिन था बुद्ध सा
सत्पात्र मिलना।

प्रेम में,
देह से उठती लपट को
शीश नत स्वीकार करना
क्या कठिन था
कठिन था नल सा
आह्लाद मिलना

प्रेम में,
आत्मा का लीन होना
प्रिय के चुंबनों में
क्या कठिन था
कठिन था पुरु सा
उन्माद मिलना

उस नगर की सब स्त्रियाँ चरित्रहीन थी

उस नगर की सब स्त्रियाँ चरित्रहीन थी
उनकी भौहें तनी रहती थी मान से
उनके होंठो पर तिरता नहीं था मंद हास्य
कोनों में नहीं दबी रहती थी मृदु भंगिमाएं
कंठ से खिल कर फूटता था अट्टहास
ग्रीवा में बाँध रखती थी लिप्सायें
उनके वसनों में घूमता रहता था बसंत
देखा नहीं कभी उन रक्तिम ऋतुओं का अंत
उनकी सभ्यता वक्षों को ढकने भर नहीं थी,
न था उनका सम्मान केवल उनकी जंघा भर
कमरधनी में हिलोरें लेती थी
उनतक उछली कई अतृप्त वासनाएं
वे कुटिल, पतित और श्रीहीन थीं
उस नगर की सब स्त्रियाँ चरित्रहीन थीं..

उनको पा लेने की इच्छायें लिए पुरुष
जाति, धर्म, गति, वर्ग से च्युत होकर
सभी संकीर्ण बन्धनों से मुक्त होकर
सृष्टि से श्रेष्ठत्व के मोह में आत्ममुग्ध
आते थे सहज ही उधर होकर कामदग्ध
अपने नियमों पर धरा को भोगते थे
हवा को, दिशा को, मेघ को टोहते थे
अपने बनाये सिक्कों की खनखन में
स्त्री को, जीवन को, यौवन को तोलते थे।
उस नगर के वही थे पालक और दाता
स्त्रियाँ थीं पतित पुरुष थे त्राता
उस नगर की स्त्रियाँ प्रेम से विहीन थी
उस नगर की सब स्त्रियाँ चरित्रहीन थीं।

उदासी के दिनों में प्यार

जब तय था कि समझ लिया जाता
मोह और प्रेम कोई भावना नहीं होती
रात को नींद देर से आने की
हज़ार जायज वजहें हो सकती हैं
ज़रा सा रद्दोबदल होता है
बताते हैं साईन्सगो,
हार्मोन्स जाने कौन से बढ़ जाते हैं
इंसान वही करता है
जो उसे नहीं करना चाहिए
गोया कुफ़्र हो

जब दीवार पर लगे कैलेंडर पर
दूध और धोबी का हिसाब भर हो तारीखें
उन तारीखों का रुक जाना
क्या कहा जायेगा
साल के बारह महीने एक सा
रहनेवाला मौसम अचानक
बदल जायेगा तेज़ बारिश में,
जब ऐसी बरसातों में वो पहले
भीग कर जल चुकी थी,

जब मान लिया जाना चाहिए
कि ज्यादा पढ़ना दिमाग पर करता है
बुरा असर
ये तमाम किताबें और रिसाले
वक़्त की बर्बादी भर हैं
जो इस्तेमाल किया जा सकता था
पकाने-पिरोने-सजाने-संवारने में
और बने रहने में तयशुद

जब समझ लिया गया था
चाँद में महबूब की शक़्ल नहीं दिखती
न प्यार होने से हवाएं
सुरों में बहती हैं
न धूप बन जाती है चाँदनी
न आँसू ढल सकते हैं मोतियों में
न जागने से रातें छोटी होती है
उस उम्र में अब ऐसा नहीं होना था

उन उदासी से भरे दिन-दुपहरों में
हल्दी और लहसन की गंध
में डूबी हथेलियों वाली
औरत को उसदिन
महसूस हुआ कि उसके पाँव
हवा में उड़ते रहते हैं।
उसने कैलेंडर पर एक और
कॉलम डाला है-
रोने का हिसाब....

तितलियाँ फिर उड़ेंगी

तिनका-तिनका नीड़ की तलाश में
कतरा-कतरा चैन जोड़ती..
भूल जाती हैं तितलियाँ
की उनको उड़ना भी आता है..

जोड़ते रहने की ख्वाहिश में..
खुद को तोड़ती जाती हैं..
भूल जाती है दुनिया के रंगों को..
और उनसे भी ख़ूबसूरत अपने परो को.

कतर दिए जाते हैं पर उनके..
नोंच डाले जाते हैं रंग उनके..
फूलों की बस्ती से बेदखल की जाती है..
भूल जाती हैं की उनको लड़ना आता है

हर क्षण खंडित होती उनकी आत्मा में..
अब भी सपनें है आसमानों के
लाख पहरे हो..लाख दीवारें
कौन रोक पाया है उड़ानों को..

तितलियाँ ख़ोज लेंगी अपना रास्ता.
नोंचे हुए...मटमैले परों को..
समेटना और उठना भी उनको आता है..
तितलियाँ फिर उड़ेंगी..

 लड़कियों का घर 

कौन सा घर होता है लड़कियों का..
जहाँ चलना सीखा और ये भी की..
ठीक से चलो एक दिन अपने घर जाना है..
जहाँ बचपन के खिलौने भी..
गुड्डे-गुड़िया हुआ करते हैं..
उनकी शादी, डोली और विदाई..
और उनसे समय बचे तो..
उसकी अनकही तैयारियां..

क्यों बोये जाते हैं...अनगिन
लड़कियों के मन में सेमल के फ़ूल..
जो देखने में इतने सुन्दर...
और रस-गंध हीन होते हैं...
हर लड़की के जीवन की एकमात्र
उपलब्धि अपने घर जाना
क्यों बनाया जाता है..

हल्दी...मेहन्दी...और आलते
से रचे हाथों और पैरों से..
जब आती हैं लड़कियां दुल्हन बनके
'अपने घर' अपना असली घर छोड़ के..
वही अपना घर जो कभी अपना नहीं होता
जहाँ एक छोटी सी कमी काफी है
बाप के घर वापिस भेजने के लिए..

अब भी लडकियाँ जलाई जाती हैं..
अपने घरों में...और जो मरती नहीं
वो रोज़ जलती हैं अपनी ही आग में
और जो स्वीकार नहीं करती मरना..
वो बन जाती है.. किस्सा और तमाशा
उनका ऐसा कोई घर नहीं होता..

भागी हुई लड़की 

हर रोज़ रात को भाग जाती हूँ मैं घर से..डायरी लिखते-लिखते..
उन बहुत सी लड़कियों की तरह जो भागती हैं मन ही मन..
यकीन करो घर से भागने वाली लडकियाँ भी होती है....
वैसी ही जिनकी तुम घरों में कल्पना करते हो तुलसी को जल देते..
साहसी से एक कदम ज्यादा दुस्साहसी..
वही लडकियाँ जो प्रेमिका भी हो सकती हैं..पत्नी भी...वेश्या भी..
मैं इंतज़ार करती हूँ..तुम्हारा ख्यालों में तय की उसी जगह पर..
किसी रात तुम नहीं आते..तो मैं बेचैन होकर उस धुंधली रौशनी में बार-बार देखती हूँ राह..
और थक कर लौट आती हूँ...
निराश प्रेमिका की तरह..
तुम आ जाते हो कुछ रातों में..तो गले लगकर कहती हूँ की आज मत जाओ.. तुम्हारी मानिनी पत्नी की तरह..
जिस पुरुष ने कभी ये अनुभव किया हो...किसी स्त्री का पृथ्वी हो जाना..अपने लिए..उसने प्रेम को जाना है..
और कुछ रातें तुम होते हों मुझसे पहले..अपनी जरूरतो की राह मेरे दुपट्टे तक बनाते..
और मेरे होंठो पर होती है वही बाज़ारी मुस्कान..
मैं रोज़ रात को डायरी बंद करके होती हूँ ये तीन औरतों..
और सुबह वापिस सूरज के जागते ही..
मैं होती हूँ वही मस्तमौला लड़की..
राज़ छिपाती..बिना बात हँसती..
रात होने और फिर भागने का इन्तजार करती..
(आलोक धन्वा की भागी हुई लड़कियों को समर्पित)

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