अस्ति कश्चित् वाग्विशेषः रामटेक पर दलित युवक

डा .कौशल पंवार
  युवा रचनाकार, सामाजिक कार्यकर्ता ,  मोती लाल नेहरू कॉलेज , दिल्ली विश्वविद्यालय, में संस्कृत  की  असिस्टेंट प्रोफ़ेसर संपर्क : 9999439709

अगर तुम जातियां खत्म न कर सको, तो अपनी जातियों पर इतना गर्व करना कि दूसरे जातियों के लिए लोग खुद जातियों को खत्म करने की आवाज उठाने लगे—डा. बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर.

अभी पिछले दिनों नागपुर जाने का अवसर मिला तो नागपुर से रामटेक जाने की इच्छा भी पूरी हुई, एक संस्कृत की शोधार्थी होने के नाते कालिदास का वह स्थान देखने की इच्छा हुई, जहां पर उन्होंने अपनी सुप्रसिद्ध महाकाव्य मेघदूत लिखा, जिसमें  प्रेमी बादलों के माध्यम से अपनी प्रेयसी के लिए संदेश भेजता है. ऐसे कवि के बारे में जानने का समझने का अवसर खोना नहीं चाहा, जिसे भारत का शेक्सपीयर कहा जाता है. इस यात्रा के दौरान ऐसे एक अनजान शख्स  से मुलाकात हुई, जिसे आपको भी मिलवाने का मन है.

मैं, अर्चना गौतम और भदंत चन्द्रकीर्ति  सुबह ही राम टेक के लिए निकल गये थे, महाकालिदास संस्कृत विश्विद्यालय देखने और रामगिरी पर्वत पर जाने का मन था. हम सुबह जल्द ही महाकालिदास संस्कृत विश्वविद्यालय पंहुच गये थे, तब तक विश्वविद्यालय खुलने का समय नहीं हुआ था और गेट-कीपर ने द्वार खोलने से मना कर दिया. हमने बहुत विनती की कि हम बाहर से ही एक बार देखना चाहते हैं, और दिल्ली से आये हैं, संस्कृत पढाते हैं, पर वे नहीं माने. हम बड़बड़ाते हुए वापस चौराहे की ओर बढ़ गये. वहां पर आकर पोहा और चाय पीने का इच्छा हुई. सुबह नाश्ता करके नहीं निकले थे तो अब भूख भी लगने लगी थी, देखा पास में ही गर्म- गर्म ब्रेड पकौड़ा, पोहा और चाय बन रही थी, उसकी तरफ बढ गये थे. यह देखकर भी अच्छा लगा कि वहां महिला काम कर रही थी.  हमने हल्के से मुस्कराकर उससे संपर्क बनाया, उससे चाय और पोहा मांगा, उसने भी उसी मुस्कराहट से स्वागत किया. खोके के पिछवाड़े ही एक मेज और दो चार प्लास्टिक  की चेयर रखी हुई थी, हम तीनों वहीं जम गये थे, महिला पोहा परोसने लगी तो मैने केवल पोहा मांगा, क्योंकि उसमे डाले जाने वाली ग्रेवी में मिर्ची थी. मैने दो प्लेट चाय के साथ पोहा लिया. स्वादिष्ट था, खाते- खाते उनके साथ हल्की- फ़ुलकी बातें भी होने लगी थी, दो चार आदमी भी वहीं आ गये थे, उनमे एक नौजवान लड़का और एक दस एक साल का लड़का और  था, एक और  आदमी शायद वह उस छोटे लड़के का बाप होगा, बैठ गये थे. हमने उनसे कालिदास के बारे में कुछ जानकारी लेने चाही, लेकिन उनको इस बारे में कुछ ज्यादा नहीं पता था. वह नौजवान राम नाम का गमछा कंधे पर डाले था, बातूनी भी था, आधी- अधूरी जानकारी उसे थी. भन्ते जी ने उससे पूछा की यहां पर क्या है देखने के लिए, उसने तपाक से कहा कि एक विद्वान आदमी की मूर्ति  लगी है.जो बहुत ही ज्यादा पढा - लिखा है, मैने पूछा कितना पढा है , उसने जवाब में कहा कि बहुत ही ज्यादा जो आंबेडकर  और गांधी से ज्यादा पढा हुआ है. हम उनके मुंह से ये शब्द सुनकर दंग रह गये.  अर्चना ने उसे थोड़ा सा टोका कि तुम ये गमछा  और इतनी अंगूठी क्यों पहने हो? ताबीज भी पहने हुए था तो उसने उससे इसका कारण जानना चाहा. नौजवान ने तपाक से कहा कि अपनी -अपनी श्रद्धा है, कोई सिख को मानता है, कोई ईसाई, कोई मुसलमान, और  भन्ते जी को देखते हुए-कोई बुद्ध को मानता है. मैने आगे बहस न हो और कुछ ओर जानकारियां उससे ली जाये , सोचकर बात को टालते हुए अर्चना की ओर चुप रहने का इशारा किया, मैने पूछा- “तुम कितना पढे हो”  तो बताया- हम तो कुछ नहीं पढे, पर पढे लिखों से कम भी नहीं (हंसकर कहा) हम अब उससे ओर भी बहुत कुछ जानना चाहते थे, उससे पूछा की आप बाबासाहेब आंबेडकर को कैसे जानते हो, तो उसने कहा सुना है कि वे पढे लिखे थे. कालिदास के बारे में उसने बताया कि एक राम का मन्दिर है पहाड़ी पर . वहीं पर कुछ है. तो हमने फ़िर से उसे उसी विद्वान व्यक्ति के बारे में जानना चाहा तो उसने बताया की आप लोग जाकर देख लीजिए. हमने बहुत सारी बातें करते हुए अपना नाश्ता कर लिया था, पर मैं उस नौजवान में एक अलग तरह का स्वाभिमानी व्यक्तित्व देख रही थी. उसका अल्हड़पन से बात करना, बेहिचक बाते करना, मन को अच्छा लग रहा था, मैने उससे यूं ही पूछ लिया कि तुम करते क्या हो, और उसने बड़े अन्दाज से कहा-“साफ़ सफ़ाई का धन्धा करता हूं”, बस इतना सुनना था कि मैं आवाक रह गयी. इतना स्वाभिमान, अपने काम पर गर्व मैं पहली बार सुन और देख रही थी, ऐसा नहीं था कि वह यह काम करता है तो कोई महान काम कर रहा है, परन्तु उसके काम से उसे कितना सुकून  है वह यह दिखा रहा था. उसने कितने आसान शब्दों में कह दिया था. बस...... आगे कुछ और पूछने की हिम्मत नहीं हुई, मैं इधर-उधर देखने  लगी थी. पर उसके चेहरे को देखकर लगा ही नहीं कि वह बाते नहीं करना चाहता. उसने बताया कि वह इलाहबाद का रहने वाला है, वहां उनके साथ बहुत छुआछूत किया जाता है, इसलिए हम लात मारकर यहां नागपुर में आ बसे थे, उसके पिता जी आये थे, और उसका जन्म भी यहीं पर हुआ, इसलिए वह मराठी बहुत अच्छे से बोल रहा था, अर्चना और भन्ते जी ने कहा कि ‘अरे! ये तो अपना ही है, आप तो हमारे अपने हैं.’ यह सुनकर उसका वहां से उठकर जाने का मन नहीं हुआ. हमने भी उसे अपने साथ पहाड़ी पर जाने के लिए कहा तो पहले तो उसने नानुकर की पर उसका भी मन साथ में जाने का ही था, शायद हर रोज के काम से वह भी अपना समय इसमे निकालना चाह रहा था, और भी बहुत सी बातें हुई उसके साथ, पर उसके जातीय गर्व से एक सहानुभूति भी बनी कि जैसे किसी को भी अपनी जाति में पैदा होने का गर्व होता है, उसे भी वही था. उसने अपने आपको किसी से कम नहीं माना.

पढाई के बारे में बात की तो उसने कहा-‘नहीं पढ पाया फ़िर जब समझ बनी तो तब तक टाईम निकल चुका था, अब पढकर क्या करना, मतलब अब तो मस्ती के दिन हैं , शादी करके घर बसाने के दिन है, अब कैसे पढाई होगी !’ भन्ते जी ने अर्चना की ओर इशारा करके कहा कि ‘देखो ये तो अभी भी पढ रही है, तुम भी पढ सकते हो.’  पर उसने जैसे हैरानी से हम तीनों की ओर देखा और मानो एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल दिया था.  मैने उससे उसका नाम पूछा तो उसने ‘अमरूत’ बताया, मेरी हंसी छूट गयी उसका नाम सुनकर, मैने कहा खाने वाला अमरुद! वह मेरे चेहरे की ओर देखने  लगा था. भन्ते जी ने कहा, ‘ मराठी में बोला है , अमृत है.’ मुझे भला सा लगा था वह, कैसे एक नौजवान, जो दूसरा काम भी तो कर सकता है, पर यहीं धन्धा क्य़ूं, क्या इसलिए ही हरियाणा और लगभग उत्तरी भारत में सफ़ाई पेशे से जुडी जातियों की यही उनकी जजमानी होती है और विरासत जो वह पीढी दर पीढी ढोता चला जा रहा है. वह हमारे साथ जाना चाहता था. हमने भी उसे साथ ले लिया, उसने भी चौड़ा होकर कहा कि मैं आप सब को सब कुछ दिखाऊंगा. हम अब रामटेक के उस चौराहे को पार करके रामगिरी, जिसे आज रामगढ कहा जाता है चल पड़े. वहां वह सब रास्तों के बारे में बताता हुआ जा रहा था. एक स्थान पर जो उंचाई से नीचे की तरफ झांकने से दिखायी दिखाई दे रहा था, बताया की यहां पर अस्थियां प्रवाहित की जाती है यहां पिन्ड़ दान करने से स्वर्ग मिलता है, पुण्य मिलता है, इसलिए लोग अपने मृतक का यहां पर पिण्ड दान करते हैं.

तस्वीरों को लेते हुए हम ऊपर कालिदास संग्राहलय में पंहुच गये थे, पर वह गाड़ी के साथ ही रुक गया था, मानो संकेत दे रहा हो , ‘  बड़े बडे लोग अन्दर जाये मैं क्या करुंगा? ‘ हमने वहां कालिदास की आदमकद तस्वीर देखी. चारों तरफ़ हरियाली ही हरियाली. बीच में गुम्बद के अन्दर लगी कालिदास की आदमकद तस्वीर..उसी गुम्बंद में एक व्यक्ति योग कर रहा था, जैसे ही हम अन्दर जाने को हुए तो उसे देखते ही वापिस मुड़ गये. थोड़ी देर इन्तजार किया, लेकिन वह बाहर नहीं निकला. समय के अभाव में हम इन्तजार नहीं कर सकते थे इसलिए अंदर चले गये, बिना उसकी तरफ़ देखे ही मैने उससे कुछ जानकारी लेना चाही. तस्वीर की ओर इशारा करके जब उससे पूछा कि “ये कौन है”, उसने ना में सिर हिलाया, नहीं पता. उसके बारे में उन्हें कुछ नहीं पता था पर अपनी शेखी बघारते हुए अपने योग के गुर दिखाने के लिए तैयार हुआ तो मुझे थोडी झेंप सी हुई, क्योंकि उसने छोटा सा कच्छा पहना था,  मैने चलो कहा तो भन्ते जी मुझे देखकर समझ गये कि मैं यहां ओर उसे देखते हुए नहीं खड़ी रह सकती हांलाकि अर्चना योग दिखाने के लिए कह चुकी थी पर मुझे अच्छा नहीं लग रहा था तो हम लोग वहां से निकलकर उस ओर गये जहां पर कालिदास द्वारा रचित मेघदूत, अभिज्ञानशांकुतलम, विकर्मोवर्शीयम, रघुवंशम् आदि खुदे हुए थे- चारो तरफ़ गोलाकर दिवार पर. वहां पर हम सब ने कुछ फोटो ली. अर्चना ने बताया कि पूरी किताब ही अंकित है उस दिवार के पीछे. मैने सभी की तस्वीरें ली, ताकि अपने विद्यार्थोयों को सब दिखाई जा सके.


संग्राहलय देखने के पश्चात हम राममन्दिर की ओर बढ गये थे, देखने की उत्सुकता थी कि  जो रामायण में लिखा है, उन जगहों में कितनी सच्चाई है, बस इसी कारण हम सब- मैं, अर्चना और भदंत जी उस ओर आ गये थे. ऐसा माना जाता है कि यहां पर राम अयोध्या से निर्वासित होने के बाद वनवास काटने के लिए घूमते हुए अगस्त मुनि के आश्रम में रुके थे. वहां पर वराह अवतार की एक प्रतिमा भी देखी , पर वहां पर इसका औचित्य हम नहीं समझ पाये थे. और भी बहुत कुछ देखा. काफ़ी देर तक हमने चर्चा की कि बहुत सारे प्राचीन बौद्ध विहारों को बिगाड़कर मन्दिर की शक्ल दे दी गयी है. कुछ तस्वीर भी ली. जब मैने अमृत से फ़ोटो लेने के लिए अपना आईपैड़ पकड़ने के लिए कहा तो उसने झिझकते हुए अपना हाथ आगे बढाने की बजाय हमारे ड्राइवर भाई को बोल दिया, मैं उसकी मनोदशा समझ रही थी. इस सफ़र के दौरान दिमाग में चल रहा था मेरी अपनी बिताई जिन्दगी के वो पल जिनसे मैं गुजर चुकी थी, जिससे यह नौजवान गुजर रहा था. मैने अगली जगह पर फोटो लेने के लिए अपना आइपैड़ उसी को जानबूझकर दिया. उसने इसे लेने से पहले हाथों को अपनी मैली कुचैली पैंट से ऐसे रगड़े कि कहीं ये उसके हाथों से गन्दा न हो जाये. मेरे भीतर उसे देखकर कुछ टूट  सा रहा था, और इससे पहले मेरी आंखों की नमी को कोई भांपता, मैने चशमा लगा लिया था और पूरी यात्रा के दौरान वही मेरा सुरक्षा कवच बना रहा. बचपन की भोगी पीड़ा, अपमना, हर चीज का अभाव- कुछ पाने की लालसा सब आंखों के आगे छाता जा रहा था. कैसे मेरे समुदाय के लोग अपनी जिन्दगी को मल और गन्दगी को ढोते हुए बीता देते है, सदियां बीत गयी, आजादी के बाद भी कितना परिवर्तन आया अभी तक............

 मैं बार-बार इन सब से बाहर निकलने की कोशिश कर रही थी. अपना ध्यान मैने मन्दिर को देखने में लगा लिया था. मुख्यधारा के साहित्य में कितनी सच्चाई है और क्या प्राचीनकाल में बने इन मन्दिर में बौद्ध विहारों के निशान  भी मिलते है, इन सब का विश्लेषण करने के लिए हमने देखने का मन बना लिया था, हालांकि मन्दिर बहुत उंचाई पर था, अर्चना और  अमृत और हमारा ड्राइवर नीचे ही रुक गये. मैं और भन्ते जी गये. राम मन्दिर कहे जाने वाले इसमें सीता की रसोई नाम से बने मन्दिर को हमने देखा, ऐसा माना गया है कि  जब सीता, राम और लक्षमण के साथ थी तो यहां पर भोजन तैयार करती थी. कौशल्या के मन्दिर को भी देखा, जब कौशल्या, सीता राम और लक्षमण को अयोध्या वापिस लौटने के लिए कहने आयी थी, लक्षमण के मन्दिर को देखा. राममन्दिर कहलाने वाले इस मन्दिर की स्थाप्य कला, मूर्ति कला को देखकर मन गदगद हो रहा था, भव्य था - इसमे कोई शक नहीं. चारों तरफ़ बन्दर ही बंदर थे, हरी-भरी हरियाली के बीचों बीच पहाड़ी पर बने इस मन्दिर को देखने के बाद बहुत से प्रश्नों ने जन्म ले लिया था. दुख हुआ यह देखकर की मन्दिर में विधवा और बूढी औरतें राम के नाम पर जाप करती हुई अपना वैधव्य और जीवन के अन्तिम क्षण काट रही थीं. मन्दिर में जगह -जगह पर अलग- अलग एंगल बनाकर बैठे आर्ट के विद्यार्थियों के द्वारा मन्दिर को अपनी ड्राइंग सीट पर उतारा जा रहा था, ये छात्र नागपुर विश्वविद्यालय के आर्ट विभाग के छात्र अपने शिक्षकों सहित वहां पर थे. यहां पर बड़ी मात्रा में बन्दर भी थे.


अब हम लोग वापिस लौट रहे थे तो हमने भूने हुए सिंघाड़े और बेर लिये, जो स्वादिष्ट थे. अपनी गाड़ी में बैठकर हम लोग वापिस रामटेक की ओर आ गये थे. हरिभरी हरियाली, शुद्ध हवा एक सुखद अहसास भर रही थी, अमृत ने जोर से चिल्ला कर कहा-“मैड़म यहां से फोटो लीजिए न एक बार”, गाड़ी रोक कर, मैने उसे हल्के से डांटा भी , ‘  भन्ते जी नाराज हो जायेंगे’.  पर वह नहीं माना और रुकने के लिए कहता रहा. लापरवाह था, अपना मन-मौजी भी तो था. थोड़ी सी खुशी अगर इसे मिल रही है तो क्यूं  न दी जाये, मैने उसकी बात मानकर गाड़ी रुकवाकर कुछ तस्वीरे वहीं पहाड़ी से ली. वह पूरे रास्ते वहां के बारे में बाते करता रहा, बातुनी बहुत था. हम लोग अब नीचे की ओर आ गये थे. रामटेक के उसी चौराहे पर, जहां से दायीं ओर मुड़कर चले तो कुछ फ़्लांग पर महाकवि कालिदास संस्कृत विश्वविद्यालय और दूसरी ओर बस्ती थी. मैने फ़िर से विश्वविद्यालय देखने की इच्छा जताई तो सब ने कहा- “चलो, एक बार ओर चल पड़ते है”, अब तो विश्वविद्यालय का द्वार खोल ही देंगे, हम लोग इस पर बात कर ही रहे थे कि वह नौजवान तपाक से बोला- “क्या मतलब, उन्होंने गेट नहीं खोला था? वह जानने को उत्सुक हुआ, तो हमने उसे सुबह के बारे मे सब बता दिया, कि कैसे उन्होने विश्वविद्यालय का गेट खोलने से मना कर दिया था. तैस मे आकर उसने कहा- ‘अरे..........!  ऐसे वह ....कैसे कर सकता है, मै अभी देखता हूं उसको. ‘ मैं मन ही मन हंस रही थी अपने लोगों की दबंगी पर, निडरता पर, बुलंद हौसलों पर कि कैसे हर वक्त लड़ने-भीड़ने के लिए तैयार रहते है हर समय, गलत चीज का विरोध करने के लिए तुरंत तैयार, भले ही सामने वाला चलाकी से उन्हें फ़सा ही रहा हो. मैं भी ऐसा ही करती थी. परन्तु जैसे- जैसे समझ आने लगा कि कैसे लोग धूर्तता  से हम लोगों को आगे करके मरवा देते है. ज्यादातर यहीं तो हो रहा है. हर जगह पर इनका इस्तेमाल किया जाता है और ये भी अपने छोटे छोटे स्वार्थों से अपना इस्तेमाल होने देते है. सब का सामना करने को तैयार. ये कभी नहीं होता कि दो अक्षर पढकर थोड़ा सी बुद्धि भी रखे. खैर हम लोग विश्वविद्यालय की ओर चले पड़े. वही हुआ जो नौजवान ने कहा था. वह नीचे उतरा और उनकी तरफ़ गया, पता नहीं उसने क्या कहा कि गेट कीपर ने झट से गेट खोल दिया विश्वविद्यालय का . भन्ते जी ने भी ,’ कहा आपकी तो बड़ी चलती है.’ मुझे पता नहीं खुशी हुई या दुख. हम लोग अन्दर चले गये. कालिदास का स्टैच्यू प्रांगण  में ही लगा था. बहुत उंच्चा, उस पर परिचय के साथ उनके ग्रंथों की चर्चा भी अंकित थी. अन्दर से कोई आया और उन्होने बिना  इजाजत के तस्वीरें  लेने से मना कर दिया, थोड़ा बुरा लगा और हम लोग बाहर आ गये.रामटेक के उसी चौराहे पर जहां पर हमने अमृत को लिया था, वहीं पर छोड़ दिया. उसे बाय- बाय कहा और हम लोग नागपुर की ओर बढ गये.

रास्ते भर बाबा साहेब के कहे शब्द याद आते रहे कि ‘अगर जातियां खत्म न हो तो अपनी जाति पर गर्व करो.’ क्या अमृत वही तो नहीं कर रहा था! जहां एक तरफ़ हमारी इसी कौम से निकले बड़े बड़े अधिकारी भी ये कहने का साहस नहीं जुटा पाते कि वह सफ़ाई कर्मी का बेटा या बेटी है, और ये हमारी जाति है. अपना नाम तक बदल कर रख देते हैं  और सरनेम भी बदलकर गुप्ता, शुक्ला, यादव और भी नाम अपने टाइटल बना कर रख लेते है ऐसे में इस नौजवान ने कितनी आसानी से अपना पेशा बता दिया था. उसे भी अपना काम और अपनी जात पर उतना ही गर्व था जितना किसी और  को होता है.

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