अपराधी बादशाह जो बन बैठा

मधुलिका बेन पटेल 
केन्द्रीय विश्वविद्यालय तमिलनाडु में हिंदी विभाग में पढ़ाती हैं संपर्क :ben.madhulika@gmail.com
अपने जीवन के लगभग 29 वर्ष बिताने के बाद मैं इतना तो समझ गयी थी कि अपराधी बादशाह की भूमिका में होता है और सच अपराधी की तरह. मुक्तिबोध की कविता ‘‘भूल गलती’ की ये पंक्तियां याद आ रही थी -
भूल गलती/
आज बैठी है जिहरबख्तर पहन कर
 तख्त पर दिल के चमकते हैं खड़े हथियार उसके दूर तक 
आँखें चिलकती हैं
नुकीले तेज पत्थर-सी 
खड़ी हैं सिर झुकाए सब कतारें..’’.

जो अपराधी था उसी के जिम्मे न्याय की कलम पकड़ा दी गयी थी. जो सच था, उस से दलीलें माँगी जा रही थी. साँप, घड़ियाल एकजुट हो गए थे. व्यवस्था की कुर्सी पर बैठा व्यक्ति गिरगिट से भी ज्यादा तेज गति से रंग बदल रहा था. अपनी सफेद शर्ट के नीचे लड़कियों की हड्डियाँ छुपाए फिरता था. यह एक ऐसा समय था जब ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का नारा जोर पकड़ रहा था. ऐसे ही समय में बेटियाँ सरेआम जुल्मों से लहूलुहान थी. आखिर न्याय की कलम बादशाह बन बैठे अपराधी के हाथ में जो थी. जुल्मों का अध्याय दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा था और मनुष्य सभ्य और शिक्षित हो रहा था. ऐसे में एक सवाल बार-बार मेरे मन में दस्तक दे रहा था कि यह कैसी सभ्यता है, जिसके हर पन्ने  पर खून के दाग लगे हुए हैं ?

उस दिन समाचार पत्र जनसत्ता (26.09.2016) मेरे  सामने था. तीन खबरें महिलाओं से संबंधित थी. एक-राजधानी और दिलवालों की दिल्ली में किशोरी बच्ची से बलात्कार के मामले में डाक्टरों ने अहम सबूत भ्रूण को कूड़े में फेंक दिया था. दो- चंड़ीगढ़ के रोहतक में सामूहिक बलात्कार  के बाद महिला ने खुदकुशी कर ली. तीन-तीन तलाक के मामले में महिलाओं ने की सुप्रीम कोर्ट से विरोध की अपील.यह वही समय था, जब पाकिस्तान, बांग्लादेश समेत 21 मुस्लिम देशों में इसे समाप्त कर दिया गया था. मेरे हिंदुस्तान में महिलाओं और वंचितों के मामलों में धार्मिक न्याय प्रणाली अभी भी अपनाई जा रही थी. आजादी के बाद देश का संविधान लागू हो चुका था और संविधान की धज्जियाँ उड़ाने का सिलसिला भी.छोटी से बड़ी हर व्यवस्था में अपराधी बादशाह जो बन बैठा है’यही पंक्ति बार-बार मेरे दिमाग में घूम रही थी.छेड़ी गई, सताई गई, जिबह की गई औरतों का कोई हिसाब न था. पीढ़ियाँ की पीढ़ियाँ गुजर गई थीे. आदिमानव से जानवर तक का सफर सामने था. ताज्जुब की बात यह थी कि इसमें मानव कहीं न था. हिंसक जानवर और नरभक्षी मानव एक में गड्डमड्ड हो गए थे. एक रंग...एक सुर...जो अलग थे, वे नरभक्षी मानवों द्वारा भक्ष लिए गए.

नरभक्षियों ने नाखून काट लिए थे. गले में टाई, बदन पर सूट आ गया था. और सबसे अहम बात, उनके हाथों में संगीने, छुरे, चाकू और एसिड जैसी नवनिर्मित चीजें आ गई थी. जिसमें स्त्रियों का समाज गल- गल कर अपने खून के धब्बे इतिहास पर छोड़ रहा था. जुल्मों के पृष्ठ लम्बे हो रहे थे. द्रौपदी की साड़ी की तरह. और हरबार दरिन्दों का समाज साड़ी के भीतर कुछ खोजते हुए नन्हीं-मुन्नी बच्चियों के नन्हें फ्राॅक के नीचे भी कुछ खोजने लगा था. उनका वहशीपन पिताओं, जेठ, ससुर, देवर, भाइयों, पड़ोसियों, समेत हर रिश्तों में घुल कर बजबजाती नालियों की तरह बह रहा था.


आज से ठीक 4 वर्ष पूर्व 13 जून 2012 को बी.बी.सी. हिन्दी न्यूज के सर्वे के अनुसार- 19 देशों की सूची में हिन्दुस्तान सबसे नीचे पायदान पर था- औरतों की स्थिति के मामले में मेरे देश की तुलना सऊदी अरब जैसे देश से की गई थी....कहाँ मेरी शस्य श्यामला भूमि ...कहाँ सऊदी अरब....मेरा देशभक्त मन आहत हो गया.‘यत्र नार्यस्तु पूज्न्ते, तत्र रमन्ते देवता’ और ‘माँ का स्थान सबसे ऊँचा’सरीखी पंक्तियाँ सूखती नदियों की तरह मुरझा गई थी. और आँखों के सामने नाचने लगा-‘माँ माने सिर्फ डेटाॅल का धुला’, ‘इनकी तरह करोड़ों माँ भरोसा करती हैं सिर्फ कोलगेट पर’, ‘टेस्ट में बेस्ट...मम्मी और एवरेस्ट’.

मैं भी न...क्या चार साल पहले के सर्वे की बात छेड़ दी. भाड़ में जाए बी.बी.सी. स्त्रियों के मामले में हमारा तो गौरवशाली इतिहास रहा है. जितना त्याग और समर्पण हमारे देश की स्त्रियों में है, उतना है किसी देश की स्त्रियों में ?जितना अत्याचार हमारे देश की स्त्रियाँ सहती हैं, उतना किसी अन्य देश की नहीं. इसलिए तो भारतीय नारी सहनशील मानी जाती है. किसी अन्य देश की नारी है क्या इस मामले में इतनी सहनशील ? मैत्रेयी, गार्गी, सती सीता, सावित्री...अरे इतना पीछे क्यूं ? आज ही साक्षी मलिक को ही देख लो, पहलवानी में ओलम्पिक में जीत कर आई है. पी टी उषा, कर्णममल्हेश्वरी, मैरी काॅम, साइना नेहवाल, सानिया मिर्जा समेत खिलाड़ियों को देख लो....इतिहास और वर्तमान का यह चेहरा सामने आते ही मन गदगद हो गया. अरे मारो गोली‘पंजाब केसरी’ की खबर को. इसी साल जनवरी में आस्ट्रेलिया में रह रहे भारतवंशी की बेटी यहाँ आना चाहती थी. सुनते ही उनके पिता का मुँह सूख गया. कहने लगे ‘हमारी मातृृभूमि में स्त्रियाँ सुरक्षित नहीं’. छी!छी!!छी!!!लगता है राजा कृृष्णा मेनन की फिल्म ‘एयरलिफ्ट’ नहीं देखी. अन्त में अपना देश ही काम आता है बच्चू.

अरे देखा न तसलीमा नसरीन का ...कर दी बगावत पुरुषों के अत्याचारों से. कैसे अपनी मातृभूमि से 1994 ई. में चुपचाप भागना पड़ा. और तो और बंगाल सरकार ने भी तो कर दी उसकी किताब बैन. राज्य से बाहर भी निकाल दिया. दिल्ली में नजरबन्द कर दिया गया था उसे. औरत चाहे कहीं की हो, अगर एक देश के पुरुषों को ललकार सकती है, तो दूसरे देश में भी तो वैसे ही पुरुष होते हैं. उनको भी ललकार सकती है. उसका देखा देखी दूसरी औरतें करने लगी तो ? वे भी बगावत पर उतर आई तो ? क्या होगा उस सभ्य समाज का, जो मुँह पर शहद लपेटे आँखों से हलाहल विष उगलता रहता है. हमारे यहाँ की तो यही रीत है औरतों के इनकार के बदले फेंक दो एसिड उसके चेहरे पर. जीवन भर कोसती रहेंगी खुद को. इसी सितम्बर की 27 तारीख कोमुआ ‘नव भारत टाइम्स’ ने बुलन्दशहर की खबर छाप दी-‘रेप पीड़िता पर चार दबंगों ने तेजाब फेंका’. धत् बुलन्दशहर का लगभग 1200 बरस के गौरव पर पानी फिर गया.वेस्ट यूपी की ‘छोटी काशी’ के नाम से मशहूर है यह शहर.राजा अहिबरन ने इसे दिल वालों की दिल्ली के आसपास ही बसा दिया था....लो अब, इसकी वजह से काशी भी बदनाम, दिल्ली भी बदनाम. छींटें तो आसपास पडेंगे ही न.फिर कहने सुनने वाली क्या बात है आज से तीन साल पहले ही एसिड अटैक कानूनन अपराध घोषित कर दिया गया है. सुप्रीम कोर्ट ने तो इसकी बिक्री पर भी रोक लगा रखी है. उसी समय की बात है जब नई दिल्ली, नरेला की रहने वाली प्रीती राठी पर अंकुर नारायणलाल पंवार ने तेजाब फेंक कर उसकी हत्या कर डाली थी-राम! राम! बड़ा ऐतिहासिक फैसला हुआ था उस समय, अंकुर की फाँसी का. जुल्मों के इतिहास में अपराधी को फाँसी! ऐसा कभी-कभार ही देखने को मिलता है. ग्रह नक्षत्रों की दिशा बदल गई होगी शायद. वरना सरकार, घूसखोर आला अमला अपने काले चरित्र पर चूने का दाग कैसे लगने देता.


ये पेपर वाले भी न अक्सर चूहों की तरह जड़ खोदने का काम कर ही जाते है. अपने देश का तो छोड़ो विश्व भर के आँकड़े जुटा लिए.पूरे विश्व में हर साल 1500 एसिड अटैक के  मामले होते है. इनमें 1000 से अधिक मामले भारत में होते हैं. लगता है खबर छापने वाला और खबर लाने वाला दोनों देशभक्त की जात से बिलांग नहीं करते थे.खैर... एसिड अटैक के हर मामलों के पीछे प्रेम संबंध हो ऐसा नहीं. कुछ लोग बेटियाँ जनने पर भी तेजाब फेंक दिया करते हैं. 1994 ई. में मुंबई में जो दुर्घटना अनमोल और उनकी माँ के साथ घटी उसे आज भी भुलाया नहीं जा सकता. क्योंकि अनमोल उसका दंश आज भी भुगत रही हैं. कितने लोग हैं, जो शीरोज कैफे (आगरा) को जानते हैं ? जिसे एसिड अटैक की शिकार हुई लड़कियाँ चलाती हैं. ..और कितने लोग हैं, जो आगरा जाने पर इस कैफे को चुनते हैं ?

‘बढ़ रहा है इण्डिया, डिजिटल बन रहा है इण्डिया’ के बीच हैदराबाद में इसी 8 अक्टूबर को महज 13 साल  की बच्ची की 68 दिन के व्रत के बाद मृत्यु हो गई. सबसे ताज्जुब की बात यह है कि उस व्रत समारोह में सांसद की पत्नी भी गई थी और उस बच्ची  की मृत्यु यात्रा को ‘शोभा यात्रा’ का नाम दिया गया. उसमें 600 लोग शामिल हुए. किसी की भूख से हुई मृत्यु शोभा यात्रा कैसे बन सकती है ? मेरे समझ से बाहर है. फिर तो हमारे देश में भूख के कारण हो रही आत्महत्याओं पर अधिक से अधिक ‘शोभा यात्रा’ निकालने के अवसर मिलेंगे.

लोग जश्न का कोई मौका नहीं छोड़ते. हत्याओं पर जश्न. क्या करें इतिहास में ही खोट है. बार-बार वर्तमान में आ धमकता है.मार्च 2016 को गाजीपुर में एक स्त्री की हत्या हुई. 23 जुलाई ’16 की खबर के अनुसार महोबा में जुँड़वा बच्चियों की हत्या हुई, 26 अगस्त को हरियाणा (मेवात) में दो लड़कियों से गैंग रेप की घटना घटी. अक्टूबरकी दर्दनाक खबर थी दिल्ली के विकासपुरी इलाके की, जहाँ 11 महीने और तीन साल के मासूमों के साथ रेप की घटना घटी. अकेले उत्तर प्रदेश में 2014 और 2015 में रेप की कुल घटनाएँ 12,542 थी.अगस्त 2016 की विश्वरत्न श्रीवास्तव की रिपोर्ट के अनुसारमहिलाओं पर अत्याचार के मामलों में महाराष्ट्र में 26,693 घटनाएँ,दिल्ली में 15,265, असम में 19,139 घटनाएँ हुईं. पूरे भारत में तो निसन्देहऔर आहत करने वाले आँकड़े होंगे.नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो (2015) के अनुसार आपराधिक मामलों में जोधपुरका प्रथम स्थान था. यहाँ रेप दर 13.4 थी. दूसरा स्थान दिल्ली का, रेप दर 11.6, तीसरे स्थान पर ग्वालियर, रेप दर 10.4, चौथे स्थान पर भोपाल, रेप दर 7.1, पाँचवा स्थान नागपुर, रेप दर 6.6 और छठाँ स्थान दुर्ग-भिलाई का.यहाँ रेप दर 7.9 रही.

10 मई 16 की ताारीख की खबर - बलिया में दहेज  के लिए एक स्त्री  को जला कर मार डाला गया. 1 सितम्बर 16 की खौफनाक खबर-रामपुर इलाके की 20 वर्ष की युवती की दहेज के लिए हत्या कर दी गई. 2013 में किए गए आकलन के हिसाब से भारत में 1 घंटे में 1 महिला की मौत होती है. 2016 की रिपोर्ट के मुताबिक हर महीने दहेज के लिए 700 औरतों की हत्या होती है. पिछले 3 सालों में भारत में 24,771 हत्याएँ की गईं.राजनीतिक पार्टियों की बंदरनुमा उछल कूद के बीच अकेले उत्तर प्रदेश में 7048 मृत्यु, बिहार में 3830 और मध्य प्रदेश में 2252 मौतें, सिर्फ दहेज के लिए. घरेलू हिंसा के मामलों में नृत्य, संगीत एवं चलचित्रों की सुव्यवस्थित परंपरा वाले नगरपश्चिम बंगाल में 61,259 घटनाएँ, शौर्यपूर्ण गाथाओं के लिए प्रसिद्ध राजस्थान में 44,331 और ‘भारत का धान का कटोरा’ कहे जाने वाले आंध्र प्रदेश में 34,835 घटनाएँ सामने आईं.आँकड़े जुटाते-जुटाते थक जाएगें. ये घटनाएँ जैसे रोजमर्रा की चीजें हो गई हों. एक सिलसिला चल पड़ा है. जो बच गए उनकी किस्मत. जैसे सरपट दौड़ती गाड़ियों के बीच बिना किसी एक्सीडेंट के घर आ गए हों.

क्यों महिलाएँ रात में निकलने पर डरती हैं, सारी पुलिस व्यवस्था के बावजूद. मुझे बरसों पहले पढ़ी गई वह घटना याद आ रही है, जिसमें एक लड़की ने कहा था कि हिन्दुस्तान में उसे गुण्डों से ज्यादा पुलिस से डर लगता है.कोई नहीं जानता, कब क्या घटित हो जाए. जैसे दहशत के साये में जी रहे हो. आदमखोर के युग में. यहाँ आदमी ही आदमी का भक्षक है. आदमी ने सारी चीजें भक्ष ली हैं.दलित, स्त्री, आदिवासी, जानवर, कीड़े-मकोड़े, पेड़, पौधे,पत्थर, पहाड़ फूल, नदियाँ सब.आदमी की अपरिमित इच्छाओं के बीच हर चीज हजारों तरीके से नोची-खसोटी गई है.22 जुलाई 2014 को @topyapshindi पर सन्तोष शांडिल्य की रिपोर्ट के मुताबिक स्त्रियों की महिमामयी स्थिति पर गर्व करने वाले देश में उनकी खरीद फरोख्त के लिए अनेक कुख्यात स्थल हैं. संगम के लिए प्रसिद्ध नगरी प्रयागराज में मीरागंज, बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी में शिवदासपुर, मुजफ्फरपुर(बिहार) में चतुर्भुजस्थान, कोलकाता में सोनागाछी, देश की वाणिज्यिक राजधानी मुम्बई में कमाठीपुरा, देश की राजधानी दिल्ली में जी. बी. रोड, नागपुर (महाराष्ट्र) में गंगा जमुना, गणपति के प्रसिद्ध मन्दिर स्थल बुधवार पेठ (पुणे)आदि जगहों पर बड़ी जिस्म मंडी लगती है. यहाँ बच्चियों को भी बड़ी बेदर्दी से बेचा जाता है. उस समय न बाबा भोले काम आते हैं न कालभैरव और न ही कोई गणपति बप्पा मोरया. आदमखोर की चालें सब पर भारी.मुझे तसलीमा नसरीन की पुस्तक ‘औरत के हक़’ में की रूलाने वाली पंक्ति याद आ रही, जिसे बगैर लिखे मैं आगे नहीं बढ़ सकती-‘‘बाजार में इतना सस्ता और कुछ नहीं मिलता जितनी सस्ती मिलती हैं लड़कियाँ’’जहाँ एशिया का सबसे बड़ा रेड लाइट एरिया मौजूद हो वहाँ के लोगों को स्त्रियों की दशा का बखान करते समय नाले में डूब मरना चाहिए. और देश के नेताओं को मरने के लिए भी धरती का कोई हिस्सा देना मुनासिब न होगा. क्योंकि वे जल, जंगल, जमीन, और जिन्दगी के हंता है.‘कौशल भारत और कुशल भारत’ के नारे के बीच खून की नदियाँ बहती हैं, बच सको तो बचो.
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