बिहार और जातिवाद का इतिहास ‘दिनकर’ की कलम से:

डॉ.रतन लाल
एसोसिएट प्रोफेसर इतिहास विभाग हिन्दू कॉलेज दिल्ली विश्वविद्यालय
संपर्क : lalratan72@gmail.com.

भारत में जब चुनाव या किसी अन्य गतिविधि की चर्चा होती है तब निःसंदेह जातिवाद की चर्चा अवश्य होती है, ऐसा लगता है कि जाति और राजनीति एक दूसरे के पर्याय हों. हालाँकि सत्ता और संसाधन का कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं जो इससे अछूता हो. लेकिन सबसे मज़ेदार बात यह है कि जातिवाद की राजनीति करने को तोहमत सिर्फ दलित और पिछड़ों पर ही थोप दिया जाता है और बाकी सवर्ण जातियों को सर्वग्राही, सर्वमान्य, और पूरे समाज का नेता मान लिया जाता है. यहाँ ध्यान रखने की जरुरत है कि यदि ‘जाति’, ‘जाति’ में अंतर है तो ‘जातिवाद’ और ‘जातिवाद’ - सवर्णवाद और पिछड़ा या दलितवाद – में भी अन्तर है और यह दोनों ‘वाद’ एक दूसरे के विपरीत भी हैं.

यदि बिहार की ऐतिहासिक-सामाजिक पृष्ठभूमि को खंगालें तो बड़े-बड़े ‘सवर्ण’ राजनैतिक-साहित्यिक ‘शूरवीर’ जातिवाद की ज़मीन बनाते दिख जायेंगे. एक बार जब जातिवाद की ज़मीन तैयार हो गई तो उसकी बदौलत सवर्ण तबका पीढ़ी-दर-पीढ़ी सत्ता और संसाधन की मलाई खाता रहा. अस्सी और नब्बे के दशक में जब दलित-पिछड़ों में सामाजिक-राजनीतिक चेतना का सन्चार होता है और सत्ता के समीकरण बदलने लगते हैं तब वर्चस्वशाली सवर्ण लोगों को अचानक राजनीति में ‘जातिवाद’ दिखने लगता है।

‘दिनकर’ – रामधारी सिंह ‘दिनकर’ – भारत के बौद्धिक जगत के एक चर्चित और प्रसिद्द नाम. यह लेख, रामधारी सिंह दिनकर – अधिकारी, ‘राष्ट्रकवि’, साहित्यकार, प्रोफेसर, वाईस-चांसलर, राजनेता सब कुछ थे – के लेखन द्वारा बिहार की राजनीति को समझने का प्रयास है. यह अध्ययन, ‘दिनकर की डायरी’ और ‘दिनकर रचनावली’ खंड, -14 के अध्ययन पर आधारित है. ‘दिनकर की डायरी’ में तो उनके व्यक्तिगत अनुभवों, और खाली क्षण में उनके लिखे गए उनके विचारों का संकलन है. दिनकर के व्यक्तिगत विचार और दर्शन को समझने के लिए ये दोनों स्रोत काफी महत्वपूर्ण हैं. विशेष रूप से पत्रों के संकलन का अध्ययन महत्वपूर्ण है.

हिंदी जगत अपने उद्भव काल से ही सवर्ण जातीयता का अड्डा रहा है और अपने-अपने वर्चस्व के लिए इनके आपसी संघर्ष की गाथा भी सर्वविदित है. आज़ादी से काफी पहले, 12 सितम्बर 1939 को दिनकर लिखते हैं, “...बिहार में कायस्थ, राजपूत और भूमिहार की फीलिंग बड़े जोरों पर चल रही है और साहित्य क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं बच रहा है. इसका दुःख है. इस फीलिंग की कुछ डंक मुझे भी लग रही है अन्यथा मैं अपने जीवन को कुछ दूसरा रूप देने में समर्थ हो सकता था.”

अब देखिए दिनकर-गुप्त-बेनीपुरी कथा, जिसकी चर्चा दिनकर द्वारा सूर्यनारायण व्यास को लिखे गए पत्र (14.8.53) में मिलती है. दिनकर उस समय राज्य-सभा सदस्य थे और उनके बारे में अफवाह फैलाई गई कि वे मंत्री बनने के लिए नौकरी छोड़कर दिल्ली आए हैं. दिनकर लिखते हैं, “...इस प्रवाद को फ़ैलाने में सर्वाधिक हाथ पितृवत, परम श्रद्धेय राष्ट्रकवि श्री मैथिलीशरण जी को है. वे संसद में आ गए, यह उनका जन्मसिद्ध अधिकार था, मैं गरीब क्यों आया, इसका उन्हें क्रोध है. सच कहता हूँ, जन्म भर गुप्त जी पर श्रद्धा सच्चे मन से करता रहा हूँ. हृदय को चीरकर देखता हूँ तब भी यह दिखलाई नहीं पड़ता कि उनका मैंने रंच भर भी अहित किया हो, स्तुति में लेख लिखा, विद्वानों के बीच उनकी ओर से लड़ा, एक कांड को लेकर ब्रजशंकर जैसे निश्छल मित्र से रुष्टता मोल ली, यूनिवर्सिटी में उनकी किताबें कोर्स में लगवाता रहा, अभी-अभी एक किताब कोर्स में लगवा दी. दिल्ली में भी कम सेवा नहीं की मगर फिर भी यह देवता कुपित है और इतना कुपित है कि छिप-छिपकर वह मुझे सभी भले आदमियों की आँख से गिरा रहा है. मेरे एक पत्रकार मित्र का यह कहना है कि प्रबंध-काव्य लिखकर तुम गुप्त जी के मित्र नहीं रह सकते क्योंकि इससे उनके व्यापार पर धक्का आता है. अस्तु.”


इसी पत्र में दिनकर आगे लिखते हैं, “बेनीपुरी भी नाराज़ थे क्योंकि वे खेत चरना चाहते थे और मुझसे यह उम्मीद करते थे कि मैं लाठी लेकर झाड़ पर घूमता रहूँ, जिससे कोई खेतवाला भैंस को खेत से बाहर नहीं करे. और भी एक-दो मित्र अकारण रुष्ट हैं. और यहाँ की विद्वान मंडली तो पहले जाति पूछती है. सबसे दूर, सबसे अलग, आजकल सिमटकर अपने घर में घुस गया हूँ. बिहार नष्ट हो गया है, इसका सांस्कृतिक जीवन भी अब विषाक्त है. अब तुम जाति की सुविधा के बिना यहाँ न तो कहीं कोई दोस्त पा सकते हो, न प्रेमी, न प्रशंसक और न मददगार. जय हो यहाँ की राजनीति की! और सुधार कौन करे? जो खड़ा होगा, उसपर एक अलग किस्म की बौछार होगी. मेरा पक्का विश्वास है कि बुद्ध यहाँ नहीं आए थे, महावीर का जन्म यहाँ नहीं हुआ था. यह सारा इतिहास गलत है. साहित्य का क्षेत्र यहाँ बिलकुल गन्दा हो गया है. ‘पंडित सोइ जो गाल बजावा’ भी नहीं, यहाँ का साहित्यकार अब वह है जो ‘टेक्स्ट-बुक’ लिखता है. बेनीपुरी रूपए कमाते-कमाते भी थक गया, आजकल मूर्च्छा से पीड़ित रहता है. चारों ओर का वातावरण देखकर मैं भयभीत हो गया हूँ. चारों ओर रेगिस्तान है, चारों ओर ‘कैक्टस लैंड’ का प्रसार है.”

अब जरा कॉलेज के वातावरण का हाल देखिए, “वहां भी जातिवादियों का जाल था, वहां भी अपमानजनक बातें सुनने में आईं, वहां भी इर्ष्या-द्वेष और मालिनता का सामना करना पड़ा. साथ ही, यह भी भासित होता रहा कि कविता की सबसे अच्छी कब्र कॉलेज ही है. कविता को बचाने के लिए वहां से भागने को तो पहले ही तैयार था. जब कांग्रेस का ऑफर आया, मैं नौकरी छोड़कर संसद में आ गया. अब मैथिलीशरण और अर्थाभाव, ये दो संकट झेल रहा हूँ और बाहर तो लोग अब भी काफी अमीर समझते हैं.”   इस समय तक दिनकर 45 वर्ष के हो चुके थे और उनके विचारों में परिपक्वता देखी जा सकती है. बिहार और साहित्य जगत में फैले जातिवाद को लेकर अब वे इतने दुखी महसूस कर रहे थे कि वे आक्रोश में इतिहास को ही नकार रहे थे, “मेरा पक्का विश्वास है कि बुद्ध यहाँ नहीं आए थे, महावीर का जन्म यहाँ नहीं हुआ था. यह सारा इतिहास गलत है.”

जाति के प्रश्न पर दिनकर के समझ की व्यापकता और ‘आक्रोश’ उम्र के पचासवें में देखी जा सकती है. सन 1961 में दिनकर राज्य सभा के सदस्य थे. 4 मार्च 1961 को दिनकर ने श्री रामसागर चौधरी नाम के एक व्यक्ति को पत्र लिखा, “सच ही, मैं आपको नहीं जानता तब भी आपका 28.2.61 का पत्र पढ़ कर दुखी हुआ. यह लज्जा की बात है कि बिहार के युवक इतनी छोटी बातों में आ पड़े. मैं जातिवादी नहीं हूँ. तब भी अनेक बार लोगों ने मेरे विरुद्ध प्रचार किया है और जैसा आपने लिखा है, अब वे ऐसी गन्दी बातें बोलते हैं. लेकिन तब मैं जातिवादी नहीं बनूँगा. अगर आप भूमिहार वंश में जन्मे या मैं जनमा तो यह काम हमने अपनी इच्छा से तो नहीं किया, इसी प्रकार जो लोग दूसरी जातियों में जनमते हैं, उनका भी अपने जन्म पर अधिकार नहीं होता. हमारे वश की बात यह है कि भूमिहार होकर भी हम गुण केवल भूमिहारों में ही नहीं देखें. अपनी जाति का आदमी अच्छा और दूसरी जाति का बुरा होता है, यह सिद्धांत मानकर चलने वाला आदमी छोटे मिजाज का आदमी होता है. आप लोग यानी सभी जातियों के नौजवान – इस छोटेपन से बचिए. प्रजातंत्र का नियम है कि जो नेता चुना जाता है, सभी वर्गों के लोग उससे से न्याय की आशा करते हैं. कुख्यात प्रान्त बिहार को सुधारने का सबसे अच्छा रास्ता यह है कि लोग जातियों को भूलकर गुणवान के आदर में एक हों. याद रखिए कि एक या दो जातियों के समर्थन से राज नहीं चलता. वह बहुतों के समर्थन से चलता है. यदि जातिवाद से हम ऊपर नहीं उठे तो बिहार का सार्वजानिक जीवन गल जाएगा.”

व्यक्तिगत सुझाव और जातिय संबंधों में सत्ता के खेल की व्याख्या करते हुए दिनकर आगे लिखते है, “आप सोचेंगे, यह उपदेश मैं आपको क्यों दे रहा हूँ? किन्तु आपने पुछा, इसलिए आप ही को लिख भी रहा हूँ. आज आप पीड़ित हैं, अपने आपको दुखी समझते हैं. आपके विरुद्ध जिनका द्वेष उभरा है, कल उनका क्या भाव था? शायद अपने को वे उपेक्षित अनुभव करते थे. इसलिए, स्वाभाविक है कि उनका असंतोष व्यक्त हो रहा है. और उपाय भी क्या था? इसलिए आपको धीरज रखने को कहता हूँ, उच्चता पर आरूढ़ रहने को कहता हूँ.”
जातीय राजनीति की वर्गीय चरित्र और सीमाओं की चर्चा करते हुए दिनकर लिखते है, “जाति-नाम का शोषण करके मौज मारनेवाले चन्द लोग, जो कुछ करते हैं, उसकी कुत्सा उस जातिभर को झेलनी पड़ती है, यह आप लोग समझ रहे हैं? यही शिक्षा कल उन्हें भी मिलेगी, जो आपको केवल इस लिए डस रहे हैं कि आप भूमिहार हैं. तो इससे निकलने का मार्ग कौन सा है? केवल एक मार्ग है. नियमपूर्वक अपनी जाति के लोगों को श्रेष्ठ और अन्य जातिवालों को अधम मत समझिए. और यह धर्म उस समय तो और भी चमक सकता है जब आदमी जांच की कसौटी पर हो.”

इस पत्र को पढ़ने पर कुछ बातें झलकती हैं. पहली बात तो यह है की श्री रामसागर चौधरी, दिनकर के स्वजातीय – भूमिहार – थे. चौधरी साहब को किसी गैर-भूमिहार से कोई परेशानी थी, इसलिए मदद के लिए उन्होंने अपने स्वजातीय सांसद श्री दिनकर को पत्र लिखा. ऐसा लगता है कि चौधरी साहब ने जाति के आधार पर दिनकर से मदद मांगी, इसीलिए दिनकर व्यथित थे और उन्हें लिखना पड़ा, “मैं जातिवादी नहीं हूँ.” दूसरी महत्वपूर्ण बात, जिस समय यह पत्र लिखा गया उस समय बिहार में श्रीबाबू (श्रीकृष्ण सिंह) मुख्य-मंत्री थे और वे भी जाति से भूमिहार थे. अब प्रश्न उठता है कि क्या श्रीबाबू की राजनीति शैली ऐसी हो चुकी थी कि बिहार उसी समय कुख्यात हो गया था. लगता है दिनकर को, श्रीबाबू की रुढ़िवादी जातिवादी राजनीति से क्षुब्ध होकर, लिखना पड़ा, “कुख्यात प्रान्त बिहार को सुधारने का सबसे अच्छा रास्ता यह है कि लोग जातियों को भूलकर गुणवान के आदर में एक हों. याद रखिए कि एक या दो जातियों के समर्थन से राज नहीं चलता. वह बहुतों के समर्थन से चलता है. यदि जातिवाद से हम ऊपर नहीं उठे तो बिहार का सार्वजानिक जीवन गल जाएगा.”
आधुनिक बिहार के इतिहास में राजनीति में जातिवाद के जन्म का श्रेय बिहार के पढ़े-लिखे और ‘समझदार’ सवर्णों को जाता है. लेकिन सत्ता के गलियारे में वर्चस्व को लेकर के.बी. सहाय और महेश प्रसाद सिन्हा में जातीय गुटबंदी सर्वविदित थी, जिसका परिणाम यह हुआ कि दोनों 1957 के विधान सभा चुनाव में हार गये. लेकिन चुनाव हारने के बावजूद, श्रीबाबू ने महेश प्रसाद सिन्हा को तो राज्य खादी बोर्ड का चेयरमैन बनाया, परन्तु सहाय को कुछ नहीं बनाया गया. यही नहीं उनके कैबिनेट और अन्य महत्वपूर्ण पदों पर दलितों की संख्या अपर्याप्त थी एवं पिछड़ी जातियों महिला तथा आदिवासी नदारद. यही कारण था कि दिनकर ने लिखा, “याद रखिए कि एक या दो जातियों के समर्थन से राज नहीं चलता. वह बहुतों के समर्थन से चलता है. यदि जातिवाद से हम ऊपर नहीं उठे तो बिहार का सार्वजानिक जीवन गल जाएगा.”

जीवन के छठे दशक में जाति के प्रश्न पर दिनकर के विचारों की परिपक्वता और व्यापकता और अधिक बढ़ती गई और अब उनके विचारों में आक्रोश के साथ व्यंग भी दीखता है. वे अपनी डायरी में लिखते हैं, “सरदार पटेल की 96वीं जयंती का सभापतित्व करने को साहित्य सम्मलेन-भवन गया. मुख्यमंत्री भोला पासवान शास्त्री भी आए हुए थे. प्रायः सभी वक्ता एक ही जाति के थे. अधिक श्रोता भी उसी जाति के थे. सोचकर हंसी आती है कि स्वामी सहजानंद और बाबू श्रीकृष्ण सिंह भूमिहार बनकर जी रहे हैं. अनुग्रह बाबू के नामलेवा राजपूत हैं और सरदार पटेल की जयंती बिहार में कुर्मी बंधु मनाते हैं. बिहार गर्त में गिरता जा रहा है. कहाँ जाकर रुकेगा इसका पता नहीं चलता.”

अपने स्वजातीय बंधुओं से ही हुए उत्पीड़न की व्यथा वे इन शब्दों में व्यक्त करते हैं, “मैं भी अपनी पोती के लिए लड़का खोज रहा हूँ. कोई सीधे मुंह बात ही नहीं करता. पहले समाज में ऐसे लोग थे, जिन्होंने मुफ्त लड़के देकर, मेरा उपकार किया था. मगर अब वे लोग समाज से लुप्त हो गए हैं. नई पीढ़ी के भूमिहार केवल अर्थ-पिशाच हैं. मैं भी जात से बाहर जाने को तैयार हूँ. दूसरा विकल्प यह कि लड़की क्वाँरी रह जाय. और क्या कर सकता हूँ? पहले लोग सोचते थे दिनकर कंगाल नहीं है, उसके पास कीर्ति है, उसे शरण मिलनी चाहिए. अब ऐसी बात कोई नहीं सोचता. ऐसी भ्रष्ट जाति से बाहर निकलने का रास्ता मिले तो इससे अच्छा और क्या होगा. मगर कोई रास्ता तो मिले. 9 लड़कियों की शादी कर चुका हूँ. रामसेवक की तीन लड़कियां और हैं. कम से कम दो की शादी करके मरना चाहता हूँ. मुझे लगता है, भगवान ने मुझे 11 लड़कियों के ब्याह के लिए भेजा था. वह काम पूरा हो जाए तो समझूँ मेरे अवतार का कार्य पूरा हो गया....असल में भूमिहार ही नहीं सारा प्रान्त सड़ गया है.”
जातिवाद के दंश से शिक्षा का भी क्षेत्र नहीं बच पाया. बुद्धिजीवियों की भूमिका की चर्चा करते हुए दिनकर लिखते हैं, “असली स्थिति यह है कि जनता चाहती है कि मनीषी ऐसा हो कि वह राजा और प्रजा, दोनों को डांट सके. जब तक मनीषी इस धर्म का पालन करता है, तब तक जनता उसके साथ रहती है. स्वराज्य के पूर्व तक मनीषियों का इस देश में बड़ा सम्मान था, क्योंकि मनीषी शासकों के खिलाफ़ आवाज़ उठाते थे. मगर अब मनीषियों का आदर बहुत कम हो गया है. जो मनीषी लेखक और कवि हैं, वे कला की सेवा तो करते हैं, लेकिन समय के जलते प्रश्नों पर अपना विचार व्यक्त नहीं करते. स्पष्ट ही यह सुरक्षा की राह है और जो सुरक्षा खोजता है, जनता उसकी खोज नहीं करती. हमलोग सुरक्षा की खोज में ही मारे गये हैं.”

राजनीति, अफसरशाही और मनीषियों के सम्बन्ध और उभरते चाटुकारिता और घुटनाटेक संस्कृति की चर्चा करते हुए दिनकर लिखते हैं, “आज तो स्थिति यह है कि जिस समाज में हम जीते हैं, उसका प्रोप्रेइटर राजनीतिज्ञ है, मैनजर अफसर है और मनीषी मजदूर है. कुछ मनीषी अध्यापक और प्राध्यापक हैं, कुछ लेखक, कवि और पत्रकार हैं. मगर वे हमेशा चौकन्ने और सतर्क रहते हैं कि कहीं कुछ ऐसी बात मुंह या कलम से न निकल जाय, जिससे सरकार या विश्वविद्यालय के अधिकारी नाराज़ हो. जिस समाज के मनीषी असुरक्षा से इतने शंकित और भयभीत हों, उस समाज का नेता राजनीतिज्ञ ही रहेगा. सरस्वती और लक्ष्मी में बैर है, यही सिद्धांत ठीक था. हमने इस बैर को बुझाने की कोशिश की, यही हमसे बड़ी भरी भूल हो गयी.”

ध्यान देने की जरुरत है, जिन मनीषियों की चर्चा दिनकर यहां कर रहे हैं, वे कौन लोग थे इसका अंदाज़ा आप लगा सकते हैं.बहरहाल, दिनकर के जीवन के जिस चार दशक की यहाँ चर्चा की गई है, उसमें जाति के सम्बन्ध में दिनकर दिनकर के विचारों को स्पष्ट रेखांकित किया जा सकता है.अपने निजी जीवन में अपने स्वजातीय बंधुओं से इतने सताए गए की उन्हें लिखना पड़ा “नई पीढ़ी के भूमिहार केवल अर्थ-पिशाच हैं.” लेकिन जाति और धर्म में सत्ता के खेल को दिनकर चुनौती नहीं दे पाए.गौरतलब है कि उनके मित्र राहुल संकृत्यायन तो काफ़ी पहले ही हिन्दू धर्म को त्याग कर बौद्ध बन गए, लेकिन दिनकर न तो अपने धर्म का त्याग किया और न जाति का ही!

दिनकर एक बहुयायामी व्यक्तित्व रहे हैं – शिक्षक, साहित्यकार, ऑफिसर, नेता, वाईस-चांसलर, प्रकाशक इत्यादि. जाति-व्यवस्था में सत्ता का खेल है, दिनकर इस बात को समझते थे. लेकिन जाति व्यवस्था के प्रति उनका प्रतिरोध निजी पत्रों में ही दीखता है. महाकाव्य के पठन में कर्ण दिनकर का नायक है, लेकिन सार्वजानिक जीवन में (जहाँ तक हमें ज्ञात है) दिनकर ने जाति-व्यवस्था में सत्ता के खेल पर खुलकर प्रहार नहीं किया: यहीं दिनकर का द्वन्द दीखता है. ज्ञान का विमर्श, तर्क का विमर्श होता है और समीक्षा का उद्देश्य होता है – पाठ की उलझनों का पर्दाफ़ाश करना. जिस तरह से एक पाठ के असंख्य पठन हो सकते हैं, उसी तरह से एक बहुयायामी व्यक्ति के व्यक्तित्व और कृतित्व का भी असंख्य पठन हो सकता है. हम चाहे जो कहें लोग तो अपने ढंग से पढ़ेंगे ही, और व्यक्तित्व और कृति दोनों के पाठ वक़्त के साथ बदलते रहे हैं, बदलते रहेंगे। जैसे महाभारत का पुनर्पाठ शिवाजी सावंत और दिनकर ने किया, उसी तरह दिनकर का पाठ हम अपने ढंग से कर सकते हैं। और, यह पठन सिर्फ प्रारंभ बिंदु है.


अब यहां ध्यान देने की जरुरत है कि देश की आज़ादी की लड़ाई सभी वर्गों के लोगों ने लड़ी थी और कुर्बानियां भी दी थीं. लेकिन आज़ादी के शीघ्र बाद ही सत्ता की हिस्सेदारी से राजपूतों, ब्राह्मणों, कायस्थों तक को खदेड़ दिया गया और सिर्फ एक ‘जाति’ विशेष का ही वर्चस्व बना रहा, दलित और पिछड़ों की कौन कहे? बिहार को सड़ने के रास्ते पर कौन ले गया? बिहार की राजनीति में जातिवाद को जन्म किसने दिया? क्या इतिहास से यह सवाल पूछना लाजिमी नहीं है? जातिवादी राजनीति और उसके पोषण के लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जा सकता है? आज़ादी के बाद भी जिस तरीके से बहुसंख्यक जनता, विशेष रूप से दलितों पर जो अमानवीय अत्याचार हुए, उसकी आवाज़ उठाना या उनके हकों की वकालत करना जातिवाद था? यक़ीनन नहीं. आज जिस तरह से राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक सत्ता का संकेन्द्रन कुछ व्यक्तियों एवं जातियों में हो रहा है, यह प्रश्न आज भी प्रासंगिक है.
सनद रहे, इस पूरे विमर्श में स्त्री नदारद है.

  सन्दर्भ सूची
1.नन्दकिशोर नवल, तरुण कुमार (सं.), रामधारी सिंह दिनकर रचनावली – 14, लोकभारती प्रकाशन,नई    दिल्ली, 2011. पृष्ठ 136. 
2. वही, पृष्ठ 527.
3. वही, पृष्ठ 527-528.
4.वही, 528
5.वही, पृष्ठ 528.
6.वही, पृष्ठ 211.
7.वही, पृष्ठ 211.
8.वही, पृष्ठ 212. 
9. दिनकर की डायरी, पृष्ठ 245, 31 अक्टूबर 1971.
10. दिनकर रचनावली खंड, -14, पृष्ठ 50.
11. दिनकर की डायरी, 1 मई, 1972, पृष्ठ 304.
12. वही, पृष्ठ 305.


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