तुम्हें बदलना ही होगा: उपन्यास में विमर्श

विवेक कुमार यादव
शोधार्थी,हिन्दी विभाग, दिल्ली विश्वविघालय,मो० 9599871810, ईमेलः—vivekk1906@gmail.com

सुशीला टाकभौरे का उपन्यास ‘तुम्हें बदलना ही होगा’ दलितों, स्त्रियों और दलित-स्त्रियों के संघर्ष की कहानी कहता है. शिक्षण संस्थाओं में दलितों के साथ होने वाले भेदभाव को उजागर करता यह उपन्यास दलित जीवन के महत्वपूर्ण पहलुओं पर प्रकाश डालता है. सुशीला टाकभौरे के बारे में अनिता भारती कहती हैं कि “सुशीला टाकभौरे दलित महिलाओं को संघर्ष की आदर्श स्थिति में दिखाती हैं. वे पुरुषों से किसी मायने में कम नहीं है. वे स्वाभिमानी हैं. लड़ाकू हैं. किसी भी अत्याचार को खामोशी से न सहकर तर्क-वितर्क करती हुई, मुँह तोड़ जवाब देती हुई, डंडा उठाकर अपराधियों से भिड़ जाती हैं.”

उत्तर-आधुनिकता के शुरू होने के साथ ही नयी तकनीकों तथा मुक्ति आन्दोलनों-दलित, स्त्री एवं आदिवासी ने सत्ता, समाज और संस्कृति की मूलभूत संरचनाओं, प्रक्रियाओं और विचारधाराओं को जो चुनौती दी उससे सब कुछ विभेदित, विघटित एवं विकेन्द्रित हो गया. ब्राह्मणवादी सत्ता, पितृसत्ता और पूँजीवादी सत्ता के वर्चस्व को चुनौती मिलने लगी. एक के बाद एक मृत्यु की सूचना मिलने लगी. ईश्वर, इतिहास, पाठक, मनुष्य, आधुनिकता, कला, विचारधारा, लेखक और साहित्य सभी के मृत्यु की घोषणाएँ होने लगीं. कुछ भी निश्चित, परिपूर्ण, अंतिम, शाश्वत और सार्वभौमिक नहीं रह गया. जो हाशिये पर थे, बहस के केन्द्र में आ गये.

हाशिये के लोगों ने पहले से स्थापित सत्ताओं के खिलाफ संघर्ष किया. परिणाम स्वरूप नई प्रकार की सत्ताओं का उदय हुआ जो पहले से कम क्रूर है. उपन्यास में भी एक जगह सुशीला टाकभौरे ने यह बात कही है “पहले का प्रगतिवादी, प्रयोगवादी और जनवादी चर्चा पर केन्द्रित आधुनिक काल, अब अपने उत्तर-आधुनिक काल के रूप में महिला विमर्श और दलित विमर्श पर बोलने और बोलते रहने पर मजबूर हो गया है क्योंकि अब इनकी चर्चाएँ, अपने देश की सीमाओं को पार करके, विश्व स्तर पर हो रही हैं.”

तुम्हें  बदलना ही होगा’ उपन्यास में धीरज कुमार और महिमा भारती नाम के दो चरित्रों के माध्यम से दलितों और स्त्रियों के शोषण और उनके प्रतिरोध को दर्शाया गया है. पूरे कथानक में मनुवादी सवर्ण मानसिकता के लोगों का बोलबाला है. आर्थिक रूप से सम्पन्न लोग गरीबों और मजदूरों का शोषण करते दिखते हैं. दिल्ली जैसे बड़े शहर में भी जातिगत भेदभाव की उपस्थिति को दर्शाया गया है. “वे आमने-सामने तो इन लोगों के साथ सम्मान से बातें करते, मगर उनका यह व्यवहार दिखावटी है. वे उनसे छुआछूत मानते हैं.”  दलित जाति के लोगाें को किराए पर घर न मिलने की समस्या पर काफी जोर दिया गया है. दिल्ली में महिमा के चाचा हों या महाराष्ट्र में धीरज कुमार, दोनों ही जगहों पर इस भेदभाव को महसूस किया गया है.

देश में कानून और आरक्षण व्यवस्था होने के बावजूद दलितों, पिछड़ों को रोजगार से महरूम रहना पड़ता है. “उनका (ब्राह्मणवादी) यथाशक्ति प्रयत्न यही रहता है कि संस्था के टीचिंग और नॉनटीचिंग सभी लोग ब्राह्मण ही हों मगर सरकारी कानून के रहते वे ऐसा नहीं कर सकते. किसी तरह छोटी-बड़ी चालाकी के साथ वे अपना प्रयोजन सिद्ध करते रहते हैं.....हर वर्ष यह बहाना दिखा दिया जाता है कि उचित कैन्डीडेट नहीं मिला.”  संविदा पर अपने उम्मीदवार रख लिए जाते हैं. ओबीसी के पद कुछ समय तक खाली रहने पर सामान्य में तब्दील कर दिए जाते हैं. इस प्रकार पिछड़ों और दलितों को नौकरियों से दूर रखा जाता है.

तुम्हें बदलना ही होगा’ उपन्यास में ज्ञान की शक्ति को महत्वपूर्ण बताया गया है. पढ़े-लिखे होने की वजह से ही महिमा अपने अधिकारों के प्रति जागरूक है. तभी तो वह शांति निकेतन महाविघालय प्रबन्धन की कोशिशों के बावजूद भी प्रोफेसर की नौकरी लेती है. धीरज कुमार अपने परिवार का पालन-पोषण करते हैं साथ ही दलित बच्चों को शिक्षित और जागरूक करते हैं.


चमनलाल जैसे पैसे और रूतबे वाले पुरुष वातानुकूलित कमरों में बैठकर महिलाओं की समस्या पर चर्चा करते हैं. आश्चर्य और विडम्बना यह है कि इस चर्चा में कोई स्त्री भाग नहीं लेती या उसे भाग नहीं लेने दिया जाता. पुरुष स्त्रियों की समस्याओं पर बात करते दिखते हैं किन्तु वे समस्याओं को अपने कार्यक्षेत्र के आधार पर परिभाषित करते हैं. कोई इतिहास पढ़ने पर नारी सबलीकरण की सम्भावना जताता है, कोई स्त्रियों को जलने से बचने के उपाय बताकर, कोई उनकी स्थिति सुधारकर, कोई वृक्षारोपण करके, कोई पुरुषों द्वारा अपनी बहन बेटियों की रक्षा करके उनको सबल बनाने की बात करता है.  तमाम गैर सरकारी संगठन महिला सशक्तिकरण के नाम पर सरकारी पैसा लेकर ऐशो आराम में खर्च करते हैं. खानापूर्ति के लिए मीटिंग करते हैं. इन मीटिंगों में महिलाएँ केवल खाने और पीने का इन्तजाम करती हैं. “घर की महिलाएँ, रसोईं और दावत की व्यवस्था संभालने में लगी हैं.”

लैंगिक सत्ता का बोलबाला पूरे उपन्यास में दिखता है. “जिनका पुत्र होता है, वे माता-पिता स्वर्ग ही जाते हैं.”  “लड़की का क्या है, उसे अपनी ससुराल ही जाना है. बाद में लड़के ही साथ रहेंगे.”  “लड़कियाँ ही हों, पुत्र न हों, तब उनका पति अपनी बेटियों और पत्नी की जिम्मेदारी भूलकर, पुत्र पाने के लिए दूसरा विवाह कर लेता है.”  लड़कों को लड़कियों से बेहतर मानने की प्रवृत्ति आज भी समाज में देखने को मिलती है. उपन्यास जहाँ उत्तर-आधुनिकता की बात करता है तो आज के समय में स्थिति पहले से बेहतर हुई है. सुशीला टाकभौरे ने केवल धीरज कुमार को महिलाओं के मुद्दे पर संवेदनशील दिखाया है और उसकी वजह उनका दलित होना दिखाया है. उन्होंने दलितों में मानवेतर गुण दिखाया है. ऐसा वास्तव में नहीं होता कि दलित पुरुष स्त्रियों का शोषण नहीं करता या उसके भीतर कोई बुराई नहीं होती. कौशल्या बैसन्त्री ने अपनी आत्मकथा दोहरा अभिशाप’ में यह दिखाया है कि कैसे दलित-स्त्री समाज में दलित होने की वजह से और घर के अन्दर स्त्री होने की वजह से शोषित है.

उपन्यास में यह दिखाने का प्रयत्न किया गया है कि सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था में जो बदलाव आये हैं वे जागरूकता से कम डर की वजह से ज्यादा है.आंबेडकर लोगों की नजरें, उनके (ब्राह्मणवादी) आस-पास मौजूद है. वे अब अपनी पहले की गलती दोहराने में डरने लगे हैं.”  गैर दलितों द्वारा दलितों के अधिकारों की वकालत करने पर सुशीला टाकभौरे इसे षड्यन्त्र की तरह देखती हैं. “शोषित वंचितों के बढ़ते आन्दोलनों को शांतिपूर्ण ढंग से रोकने के लिए, हम स्वयं उनके आंदोलनों का नेतृत्व करें. उन्हें अपने ढंग से समझाने-बहलाने के लिए उनके हित सम्बन्धी कार्यों को अपने हाथों सम्पन्न करें. इससे समाज की पुरानी व्यवस्था भी बनी रहेगी और हमारी समाज सेवा से हमारा सम्मान भी बढ़ेगा.”  हजारों वर्षों तक इसी तरह की चालाकियों से ठगे जाने के बाद इतनी जल्दी विश्वास नहीं पनप सकता. दलितों का यह अविश्वास फिर से ठगे जाने के भय से उत्पन्न हुआ है.
स्त्रियों के आन्दोलन के विषय में भी उनका विश्लेषण यही रहता है. पुरुषों के बहकावे में आकर “वे (स्त्रियाँ) अपने शुभचिन्तक पुरुष वर्ग के प्रति अति कृतज्ञता के साथ अति विनम्र बनती जा रही हैं.”  जिस तरह औरत के औरतपन को पुरुष जैविक रूप में और इसी तरह मानसिक रूप में नहीं लांघ सकता उसी तरह गैरदलित दलित के अनुभव संसार में जैविक ढंग से प्रवेश नहीं पा सकता.  स्त्री और दलित विमर्श का एक वर्ग हमदर्दी को संदेह की नजर से देखता है. धीरज कुमार को जातिगत भेदभाव झेलना पड़ता है. महिमा भारती स्त्री होने की वजह से लैंगिक भेदभाव का सामना तो करती ही हैं साथ ही दलित होने की वजह से सवर्ण स्त्रियों द्वारा भी शोषित होती हैं. महिमा के कॉलेज की महिला सहकर्मी उसे कहती है. “यह मायावती बहनजी की बहन, हमारे बीच रहकर, हमारी ही नाक काट रही है.”  वर्ण व्यवस्था को ईश्वर द्वारा बनाई बताकर उसे न बदलने की सिफारिश ब्राह्मणवादी लोग करते हैं. “ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र को अलग बताने वाली वर्ण व्यवस्था हमारे हिन्दू धर्म की पहचान है. इसे बदलने की बात क्यों की जा रही है.”  धर्मपालन की आड़ में ही ब्राह्मणवादी सामंती ताकतों ने दलितों के साथ अमानवीय व्यवहार किया, स्त्रियों को सती होने के लिए विवश किया.



तुम्हें बदलना ही होगा’ उपन्यास के शुरू में ही लेखिका ने दलितों की बदलती स्थिति का जिक्र किया है. उनके अनुसार “वर्णवादी पुराणपन्थी देश अब शिक्षा और वैज्ञानिक प्रगति से जुड़कर आधुनिक बनता जा रहा है. लोग पुराने रीति रिवाजों को बदलने और पुरानी रूढ़ियों, परम्पराओं को तोड़ने की बातें करने लगे हैं. वर्ण भेद और जाति भेद का विरोध करने के लिए दलित लोग सड़कों पर उतरने लगे हैं.”  प्रतिरोध के स्वर पूरे उपन्यास में जगह-जगह दिखाई देते हैं. कॉलेज के पद पर अन्य किसी का अप्वाइंटमेंट होने पर महिमा अपने दो साथियों के साथ मिलकर इस भेदभाव और अन्याय का विरोध करती है और कॉलेज प्रशासन को अपना फैसला बदलने पर मजबूर करती है. जाति के आधार पर पहचान कराये जाने पर महिमा कहती है, “मैडम, मेरा परिचय सिर्फ जाति से नहीं, मेरे व्यक्तित्व और कृतित्व से है.”  छात्र नेता बसन्त तिवारी ने धीरज को आन्दोलन न चलाने की धमकी दी तो धीरज ने विरोध किया और कहा. “तुम्हारी आर्थिक समानता का आन्दोलन तुम्हारे लिए है, हमारे लिए नहीं है. हमारी लड़ाई हमें स्वयं लड़नी है.”

सेनेटरी इंस्पेक्टर द्वारा अपने माता-पिता को शोषित होता देख धीरज ने उनसे नौकरी छुड़वा दी और उन्हें लेकर आपने साथ चला गया. चमनलाल के बहुत कहने पर भी महिमा अपनी नौकरी नहीं छोड़ती और अपनी आर्थिक स्वतन्त्रता पर कोई आँच नहीं आने देती. चमनलाल की लाख कोशिशों के बावजूद महिमा कमेटी की मीटिंग में आती है और अब तक चले आ रहे घूँघट करने के संस्कार को ठुकराते हुए पुरुषों की बेतुकी दलीलों का विरोध करती है.

सुशीला टाकभौरे ने उपन्यास में चरित्रों का निर्माण किया है. महिमा गरीब दलित घर की लड़की है जो अपने चाचा—चाची के साथ रहकर, कष्ट झेलते हुए अपनी शिक्षा पूरी करती है. बाहर उसे जातीय भेदभाव भुगतना पड़ता है जबकि घर के भीतर उसके चाचा—चाची उसका शोषण करते हैं, उससे घर के सारे काम करवाते हैं.  धीरज कुमार के बारे में बहुत विस्तार से न बताकर उनके पढ़ाई के दौरान और नौकरी के लिए भटकते वक्त हुए कष्टों को दिखाया है. दोनों ही चरित्रों के माध्यम से लेखिका ने यह दिखाने का प्रयत्न किया है कि अभावों में जीकर सफल होने वाले व्यक्ति के मन में अपने आस पास के अपने जैसे लोगों के प्रति सहानुभूति और कर्तव्य का भाव होता है. वे जिस जलालत से गुजरते हैं वे नहीं चाहते कि उनके जैसे और लोग भी वैसे ही कष्ट झेलें.

दोनों ही चरित्रों का कार्यक्षेत्र शिक्षा जगत रहा है. हालाँकि दोनों ने वापस अपने मूल निवास जाकर लोगों को अधिकारों और शिक्षा के प्रति जाग्रत किया. बड़े-बड़े शहरों में पढ़े लिखे लोगों द्वारा निचली जाति के गरीबों और स्त्रियों का शोषण होता दिखाया गया है. इन तमाम शोषण दमन एवं भेदभाव का दोनों ने प्रतिरोध किया और अपने अधिकारों को हासिल किया. उपन्यास के अन्त में लेखिका ने दोनों ही दलित पात्रों का विवाह सवर्ण से कराकर बाबा साहब अम्बेडकर के रोटी-बेटी के सम्बन्ध को साकार होता दिखाया है. अन्तर्जातीय विवाह को सामाजिक विषमता मिटाने के एक महत्वपूर्ण हथियार की तरह दिखाया गया है.

उपरोक्त सभी उत्तर-आधुनिक विशेषताओं के रहते हुए भी उपन्यास में समय का सहज प्रवाह नहीं दिखता. इसमें जीवन नहीं बल्कि विमर्श चलता है. बात—बात पर भाषणबाजी और नारेबाजी की गई है. घटनाओं को बेमतलब ही अतिनाटकीय बनाया गया है. जैसे “महिमा ने क्रोध से जलते हुए वाक्य-बाणों का निशाना साधते हुए हुंकार भरी. साथ ही अपने सिर को हल्का सा झटका दिया. एक ही झटके में उनका जूड़ा खुल गया और लम्बी बनी केश राशि उनके कन्धों और पीठ पर फैल गयी. महिमा के इस रौद्र रूप को देखकर उपस्थित लोग हर्षित हो गये. धीरज कुमार ने प्रसन्नता के साथ नारा लगाया नारी शक्ति जिन्दाबाद....नारी शक्ति आगे बढ़ो हम तुम्हारे साथ है....नारी सबलता जिन्दाबाद.....”  धीरज कुमार के विषय में सारी जानकारी होने के बाद भी चमनलाल धीरज की जाति कैसे नहीं पता लगा पाये, जबकि वे महाविघालय में ट्रस्टी भी है? शादी से पहले ही महिमा एक सक्रिय महिला थी. वह अपने अधिकारों के प्रति सजग थी. तो चमनलाल के साथ विवाह होने के पश्चात, चमनलाल के घर में अधिकार और सम्मान के लिए प्रतिरोध करने में इतना अधिक समय क्यों लग गया? हनुमान नगर और रघुजी नगर जैसे नाम पॉप कल्चर वाले मेट्रोपोलिटन शहरों में फिट न बैठने वाले लगते हैं.

लेखिका ने पूरे उपन्यास में सभी विपरीत विचारधारा वालों के बड़ी सहजता से हृदय परिवर्तन कराये हैं. दलितों को, स्त्रियों को उनके अधिकारों के लिए समझाने में महिमा या धीरज को ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी. एक या दो बार के समझाने पर ही लोगों ने उनकी बात मान ली. धर्म को लेकर या संस्कृति को लेकर जो आस्था लोगों के मन में होती है उसे बदलने में दशकों लग जाते हैं. जितनी आसानी से दलित पात्रों ने पाण्डे जी, शर्मा जी आदि को मारा-पीटा है और उनकी बेइज्जती की है वह वास्तविक जीवन में निहायत ही अस्वाभाविक और बनावटी लगता है.
चमनलाल और उनके पूरे परिवार का हृदय परिवर्तन होने के लिए महिमा और धीरज का भाषण ही काफी हो गया. जो सत्ता हजारों सालों से शोषण करती रही है. जिसको बदलने के लिए फुले, आंबेडकर आदि व्यक्तियों ने लम्बी लड़ाई लड़ी और वो लड़ाई आज भी जारी है. उसको बदलने में लेखिका ने बहुत जल्दबाजी दिखा दी. यह सहज, स्वाभाविक और वास्तविक नहीं लगता. उपन्यास की भाषा सरल एवं प्रवाहमयी है. जगह-जगह अंग्रेेजी के शब्दों का प्रयोग है जैसे पोस्ट, फ्लैट, अपार्टमेंट, टीचिंग, नॉनटीचिंग, कैन्डीडेट, मैनेजमेंट, ऑफिस, कॉलेज, टेन्डर, कैन्टीन, सर्वेन्ट, क्वार्टर, परमानेन्ट आदि.
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