हमें खत्म करने के पहले वे लोकतंत्र को खत्म करेंगे

स्त्रीकाल संपादकीय टीम 

चाहे कोई भी संघर्ष हो-जाति के खिलाफ, ब्राह्मणवाद के खिलाफ, पितृसत्ता के खिलाफ, तानाशाही के खिलाफ- वह  तभी तक जारी रह सकता है, जबतक लोकतंत्र पर कोई खतरा नहीं है या आपके सवाल करने और अपनी बात कहने या अपने लिए हक़ हासिल करने के लिए शांतिपूर्ण संघर्ष करने की आजादी बची हो. पिछले कई महीनों से इसी आजादी पर सत्ता के प्रत्यक्ष और परोक्ष घटक हमले कर रहे हैं. पिछले कई महीनों से निरंतर तनाव की स्थिति राज्यसत्ता और उसके सहयोगी अंगों, संगठनों और समूहों के द्वारा बनाई जा रही है. जिम्मेवार पदों पर बैठे लोग ‘सवाल’ न करने की चेतावनी दे रहे हैं. हुक्मरानों और ब्राह्मणवादी पितृसत्ता का हित ही राष्ट्र हित बताया जा रहा है. यह एक खतरनाक माहौल का संकेत है. यह लोकतंत्र के खात्मे का संकेत है, जिसके पहले चरण से हम गुजर रहे हैं- अघोषित आपातकाल और उच्चवर्गीय, उच्चवर्णीय पितृसत्ताकों के स्वर्ग का निर्माण काल है यह- इनके अलावा जिस किसी भी गैर ब्राह्मण , गैर-उच्च वर्गीय -वर्णीय पुरुष -समूह को या किसी भी स्त्री-समूह को अपने ‘अच्छे दिन’ आने का भ्रम हो रहा है, तो वह छलावे में है, वे दिवास्वप्न’ देख रहे हैं, वे किसी निश्चित उद्देश्य के लिए किये जा रहे है यज्ञ की आहुति भर हैं, बलि के पात्र भर हैं.



हमने जो कुछ भी हासिल किया है पिछली  शताब्दियों में वह निरंतर आधुनिकता की ओर अपनी उन्मुखता और लोकतंत्र के अपने चुनाव के कारण ही. स्त्रियों, दलितों,पिछड़ों,आदिवासियों, सभी वंचितों के हक़ के लिए संघर्ष और हासिल की पृष्ठभूमि है लोकतंत्र. अभी उसी पर प्रत्यक्ष-परोक्ष प्रहार हो रहे हैं और जनता के एक बड़े वर्ग की सहमति भी इस प्रहार में शामिल कर ली गई है. इसका ताजा उदाहरण है एनडीटीवी इंडिया पर एक दिन का प्रतिबंध. जब मौजूदा दौर के कई सता पोषित चैनल उन्माद, अंधविश्वास, घृणा और छद्मराष्ट्रवाद के नाम पर हिंसक चेतना का निर्माण कर रहे हैं, एक ख़ास चैनल पर यह हमला सवाल करने वालों को सत्ता के द्वारा दिया जाने वाला संकेत भी है, हम सब का गला घोटा जाने वाला है, सबको  चुप कराया जायेगा- यह जबरन चुप्पी हमारी अंतिम पराजय की ओर ले जायेगी- जहां स्त्रियों, दलितों, वंचितों के सारे अधिकार उर्ध्वमुखी सत्ता के लिए छीन लिए जाते हैं –यही उनकी कल्पना का स्वर्ग है.



हमें उनकी कल्पना के इस स्वर्ग की जगह लोकतंत्र को बचाये रखने के लिए जी –जान लगा देना चाहिए, जरूरी है वंचितों की लड़ाई के लिए. एनडीटीवी पर एक दिन के प्रतिबंध की हम भर्त्सना करते हैं. स्त्रीकाल के पाठकों को छोड़ जाते हैं एनडीटीवी के पक्ष के साथ, जो उनके द्वारा अपने हिन्दी चैनल पर एकदिन के प्रतिबंध के बाद जारी किया गया है और चीफ एडिटर, इंडियन एक्सप्रेस, राजकमल झा, के एक महत्वपूर्ण भाषण के साथ, जो रामनाथ गोयनका अवार्ड के मौके (3 अक्टूबर) पर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने, उन्होंने दिया. कहते हैं कि उस समय प्रधानमंत्री के चेहरे पर बेचैनी साफ़ देखी जा सकी, लेकिन दूसरे ही दिन उनकी सरकार ने मीडिया के एक दूसरे हाउस को प्रतिबंध का एक नोटिस थमा दिया.  सुनें  वीडियो लिंक में राजकमल झा और देखें हुक्मरानों के चेहरों की प्रतिक्रया...


एनडीटीवी का पक्ष: 

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का आदेश प्राप्त हुआ है. बेहद आश्चर्य की बात है कि NDTV को इस तरीके से चुना गया. सभी समाचार चैनलों और अखबारों की कवरेज एक जैसी ही थी. वास्तविकता  में NDTV की कवरेज विशेष रूप से संतुलित थी. आपातकाल के काले दिनों के बाद जब प्रेस को बेड़ियों से जकड़ दिया गया था, उसके बाद से NDTV पर इस तरह की कार्रवाई अपने आप में असाधारण घटना है. इसके मद्देनजर NDTV इस मामले में सभी विकल्पों  पर विचार कर रहा है.




राजकमल चौधरी का पक्ष 

आपके शब्दों के लिए बहुत आभार. आपका यहाँ होना एक मज़बूत सन्देश है. हम उम्मीद करते हैं कि अच्छी पत्रकारिता उस काम से तय की जाएगी जिसे आज की शाम सम्मानित किया जा रहा है, जिसे रिपोर्टर्स ने किया है, जिसे एडिटर्स ने किया है. अच्छी पत्रकारिता सेल्फी पत्रकार नहीं परिभाषित करेंगे जो आजकल कुछ ज़्यादा ही नज़र आ रहे हैं, जो हमेशा आपने आप से अभिभूत रहते हैं, अपने चेहरे से, अपने विचारों से जो कैमरा को उनकी तरफ रखते हैं, उनके लिए सिर्फ एक ही चीज़ मायने रखती है, उनकी आवाज़ और उनका चेहरा. आज के सेल्फी पत्रकारिता में अगर आपके पास तथ्य नहीं हैं तो कोई बात नहीं, फ्रेम में बस झंडा रखिये और उसके पीछे छुप जाइये. आपके भाषण के लिए बहुत बहुत शुक्रिया सर, आपने साख/भरोसे की ज़रूरत को अंडरलाइन किया. ये बहुत ज़रूरी बात है जो हम पत्रकार आपके भाषण से सीख सकते हैं. आपने पत्रकारों के बारे में बहुत अच्छी बातें कही जिससे हम थोड़ा नर्वस भी हैं. आपको ये विकिपीडिया पर नहीं मिलेगा, लेकिन मैं इंडियन एक्सप्रेस के एडिटर की हैसियत से कह सकता हूँ कि रामनाथ गोयनका ने एक रिपोर्टर को नौकरी से निकाल दिया जब उन्हें एक राज्य के मुख्यमंत्री ने बताया कि आपका रिपोर्टर बड़ा अच्छा काम कर रहा है. इस साल मैं 50 का हो रहा हूँ और मैं कह सकता हूँ कि इस वक़्त जब हमारे पास ऐसे पत्रकार हैं जो रिट्वीट और लाइक के ज़माने में जवान हो रहे हैं, जिन्हें पता नहीं है कि सरकार की तरफ से की गयी आलोचना हमारे लिए इज़्ज़त की बात है.

वीडियो में 1 घंटे 34वें मिनट  पर देखें राजकमल झा का भाषण और देखें नेताओं के चेहरे की प्रतिक्रया



इस साल हमारे पास इस अवार्ड के लिए 562 एप्लीकेशन आयीं. ये अब तक की सबसे ज़्यादा एप्लीकेशन हैं. ये उन लोगों को जवाब है जिन्हें लगता है कि अच्छी पत्रकारिता मर रही है और पत्रकारों को सरकार ने खरीद लिया है.अच्छी पत्रकारिता मर नहीं रही, ये बेहतर और बड़ी हो रही है. हाँ, बस इतना है कि बुरी पत्रकारिता ज़्यादा शोर मचा रही है जो 5 साल पहले नहीं मचाती थी.

Blogger द्वारा संचालित.