सौ के नोट दिखाते लंपट और परेशान महिलायें

आइये समझते हैं नोटबंदी को लेखिकाओं और महिला सामाजिक कार्यकर्ताओं की नजर से:

सरकारें फैसला लेती हैं, स्थितियाँ बदलती हैं या सुधरती हैं, फैसला जनहित में कहलाता है लेकिन औरत की दुनिया इन सबसे कैसे प्रभावित हो सकती है या होती है, इस पर कम ही विचार किया जाता है.  औरत की दुनिया वैसे भी राजनीति की दुनिया से बड़े फासले पर स्थित है, दोनों में न्यूनतम संबंध है. आज मेरी कामवाली हंसी -हंसी में नए नोट पर कई व्यवहारिक टिप्पणियाँ कर रही थी. इन टिप्पणियों में छिपे कड़वे सच को हम जैसे वेतनभोगी, व्यापारी, सफेदपोश वास्तव में नहीं समझ सकते क्योंकि हमने बैंक जाकर कम से कम दस हज़ार रूपए का इंतजाम लाईन में लगकर या रसूख़ के बल पर कर लिया है, कुछ को शायद अन्य वजहों से जाने की भी जरूरत न पड़ी हो.

हम सब इस फैसले का राजनीतिक आकलन कर रहे हैं, लेकिन ग़रीब आदमी इस फैसले की कड़वी परिणितियों को झेल रहा है. मैं कल बैंक से पैसे लेकर आई थी और मैंने उसमें से दस, सौ-सौ के नोट अपनी कामवाली को दे दिए ताकि उसका ख़र्च चल सके. लेकिन छह-सात लोगों के परिवार में हज़ार रूपए कितने दिन चलेंगे? उसे भी शहर से ही आटा-नमक ख़रीदना है.


इस राजनीतिक फैसले का औरत के जीवन के लिए जो काला पक्ष हो सकता है, उसे उसके मुंह से सुनकर मैं दंग रह गई, सपने में भी नहीं सोचा था कि एक नतीजा यह भी हो सकता है, जिस पर कोई सरकार कभी ध्यान नहीं देगी ! उसने बताया कि दो-तीन दिन से उसके मुहल्ले में शाम को शराब पीकर लोग गाड़ियाँ लेकर खड़े होते हैं और आती जाती, बातचीत करती परेशान कामवालियों से पूछते हैं कि दो -तीन सौ खुले रूपए हम देंगे, कितना खुला चाहिए?
भले मानुष! इस घटना का मतलब समझने में आपको परेशानी तो नहीं हो रही या समझ नहीं रहे ?
सुधा सिंह ,प्रोफ़ेसर दिल्ली विश्वविद्यालय 

"शासन का घूँसा किसी बड़ी और पुष्ट पीठ पर उठता तो है पर न जाने किस चमत्कार से बड़ी पीठ खिसक जाती है और किसी दुर्बल पीठ पर घूँसा पड़ जाता है ."
परसाई यूँ ही परसाई नहीं हैं!
संज्ञा उपाध्याय, लेखिका  और असिटेंट प्रोफ़ेसर, दिल्ली विश्वविद्यालय 

बलिदान ,संयम और त्याग की बात वो कर रहे है जिनके पास डेबिट क्रेडिट और तमाम तरह के कार्ड है और जिनके बच्चे विदेश में बैठे है और जिनके पास महीने भर का राशन है.
अनिता भारती, लेखिका 

स्त्रियों का मजाक बनाने के बजाय सोच कर देखिये उन्होंने किस तरह खुद की ख्वाहिशों में कतरब्योंत करके , इतना दिमाग लगा कर ये पैसे बचाये होंगे. जरुरत पड़ने पर अपने पिटारे से हमें ही निकाल कर देती हैं ....ये उन्हें स्वाभिमान और सुरक्षा देता है ..उनकी मदद करें ...आपके लिए होगा काला धन उनका ये इमोशनल धन है. आज के नवभारत टाइम्स के इस लेख में इसी धन की बात है.
अनीता मिश्रा, लेखिका महिलाओं के पास बचत के धन का मजाक उडाये जाने पर 


आजकल हमारे कुछ अम्बेडकरवादी सरकार के नोटबदली को बाबासाहेब की उस बात से जोड़ रहे है कि उन्होंने कहा था कि भ्रष्टाचार रोकने के लिए हर दस साल में नोट बदलने चाहिए . क्या ये सही वक्त है याद दिलाने का? जब पूरा देश एक मुस्किल से गुजर रहा है. क्या बाबा साहेब ने ये भी कहा था कि यह सब अचानक कर देना चाहिए ?मुझे लगता है किस इस मुश्किल समय बाबासाहेब को कोट नहीं करना चाहिये हमारा बडबोलापन ही हमे ले डूबता है . हमे अपनी तकलीफों को और बढ़ाना नहीं चाहिए .हमे धैर्य से शान्ति से मुस्किल समय से गुजरना है, मजे ले ले कर मजाक न करे .
रजनी तिलक ,लेखिका सामाजिक कार्यकर्ता

कोइ बुलेट ट्रेन में सफर कर रहा है तो कोई दिन भर बैंको में लाइन लगा कर .लेकिन सफर दोनों कर रहे है ...कोई मौज में है तो कोई घर चलाने की जद्दोजेहद में
ताहिरा हसन, सामाजिक कार्यकर्ता 

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