यह जनता है


फिदेल कास्त्रो

जब हम जनता की बात करते हैं तो हमारा मतलब उन आरामतलब रईसों और देश के दकियानूस तत्वों से हरगिज नहीं होता जो किसी भी जालिम सरकार, किसी भी तानाशाही निरंकुशता का स्वागत करने व हाकिमे-वक्त के सामने नाक रगड़ने के लिए तत्पर रहते हैं जब तक कि वह अपने माथे को रगड़-रगड़कर चूर नहीं कर लेते. जब हम संघर्ष की बात करते हैं तो जनता से हमारा मतलब उस विशाल जनसमूह से होता है, जिसके साथ वादे सभी लोग करते हैं और जिसे धोखा भी सभी लोग देते हैं, जनता की मुराद उन लोगों से है जो बेहतर, ज्यादा सम्मानपूर्ण तथा न्यायपूर्ण राष्ट्र, की रचना की इच्छा करते हैं. जो न्याय प्राप्ति के लिए वंशानुगत ढंग से प्रेरित होते हैं, क्योंकि पीढ़ी-दर-पीढ़ी उनको न्याय से वंचित रखा गया है और उन्हें मज़ाक का खिलौना बनाया गया है. हम जनता उन लोगों को कहते हैं जो अपने जीवन के सभी पहलुओं में भारी बुद्धिमतापूर्ण परिवर्तनों के लिए कटिबद्ध हैं और उस परिवर्तन को लाने के लिए अपने जीवन की आखिरी सांस तक का बलिदान करने को तैयार हैं. इसका अर्थ है वे किसी वस्तु में या किसी व्यक्ति में और विशेष रूप से स्वयं अपने ऊपर विशवास रखते हैं.


अपना उद्देश्य बयान करने के सिलसिले में ईमानदारी, सच्चाई या वफादारी की पहली शर्त यह है कि ठीक वही बात करें जो दूसरे नहीं करते, इसका अर्थ है, बिलकुल सफाई के साथ निडर होकर बात करें. बड़े बड़े बातूनी और पेशेवर राजनीतिज्ञ जो हर बात में तथा हर समय सही होने का दंभ भरते हैं, हमेशा ही आवश्यकता से हर बात के बारे में हर किसी के साथ धोखाधड़ी करते है. क्रान्तिकारियों को अपने विचार साहस के साथ निडर होकर पेश करने चाहिए. हमें अपने सिद्धांतों की परिभाषा तथा अपने इरादों का इजहार इस प्रकार करना है ताकि दोस्त व दुश्मन किसी को भी कोई धोखा न हो. अपने संघर्ष के लिए हम जिस जनता पर भरोसा करते हैं उसमें ये लोग शामिल हैं:

(क) छः लाख बेरोजगार क्यूबावासी जो बिना किसी काम के इधर-उधर मंडरा रहे हैं. जो ईमानदारी से अपनी रोजी कमाने की कामना करते हैं और चाहते हैं कि इसके लिए उन्हें देश छोड़कर बाहर न जाना पड़े.

(ख) पांच लाख कृषि मजदूर जो दयनीय झोपड़ियों में अपनी जिन्दगी काटते हैं, साल में चार महीने काम करते हैं और बाकी दिन फाकामस्ती करते हैं. अपने बच्चों के साथ मिलकर मुसीबत के पहाड़ काटते है, जिनके पास खेती करने के लिए अपनी एक इंच जमीन भी नहीं हैं और जिनके करुनामय जीवन पर पत्थर ह्रदय वाले लोग भी द्रवित हो जायेंगे.

(ग) चार लाख औद्योगिक मजदूर और कर्मचारी, जिनके अवकाश प्राप्ति के बाद के लिए रक्षित कोष का नियमित रूप से गबन किया जाता है, जिनको हर प्रकार की सुख सुविधाओं से वंचित रखा जाता है, जिनके आवास सूअरवाड़ों से भी बुरी स्थिति में रहते हैं, जिनका वेतन मालिकों के हाथ से निकलकर महाजन की तिजोरी में चला जाता है. जिनका भविष्य है, वेतन कटौती और नौकरी से बर्खास्तगी. जिनके भाग्य में अनवरत रूप से काम करते जाना और आराम के लिए कब्र में लेट जाना लिखा है.

(घ) एक लाख छोटे किसान जो ऐसी जमीन पर काम करते हैं, जीते और मरते हैं जो उनकी अपनी नहीं है. वह निराशाभरी निगाहों से उसी प्रकार उस जमीन को देखते हैं, जैसे मोसेज ने एक जमीन के टुकड़े पर टकटकी बांधे अपने प्राणों का त्याग कर दिया था क्योंकि उसे वह जमीन देने का वादा किया गया था, किन्तु जमीन दी नहीं गयी थी. जिन्हें सामंती युग के गुलामों की तरह अपनी उपज का एक बड़ा भाग अपने सामंती स्वामी को अदा करना पड़ता है. उन्हें अपनी जमीन से प्यार करने, उसमें सुधार करने, उसे सुन्दर बनाने, उसमें देवदार या नारंगी का कोई पेड़ लगाने का भी अधिकार हासिल नहीं है, क्योंकि उनके सर पर यह खतरा मंडराया करता है कि कब भूस्वामियों के कारिंदे आ जायें और उन्हें जमीन से बेदखल कर दें.

(ङ) तीस हजार शिक्षक और प्रोफेसर जो भावी पीढ़ियों के सुन्दर भविष्य के लिए पूर्ण रूप से निष्ठावान हैं और समर्पित हैं और जिनके साथ अत्यधिक अनुचित रूप से सलूक किया जाता है.
(च) बीस हजार छोटे दुकानदार और व्यापारी जो कर्जों के बोझ से दबे हुए हैं, संकट से तबाह हैं और जिन्हें तिकड़मी और घूसखोर अधिकारियों के कोप का भाजन बनना पड़ता है.

(छ) दस हजार युवा व्यवसायी-डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, पशु चिकित्सक, स्कूल शिक्षक, दंतकार, फार्मेसिष्ट, पत्रकार, चित्रकार, मूर्तिकार आदि जो स्कूलों से डिग्रियां लेकर निकलते हैं, काम करने की आकांक्षा और आशा लेकर और जिन्हें ठोकरें खाने के बाद पता चलता है कि वे तो अंतिम छोर तक पहुंच गये हैं, जहां सारे दरवाजे उनके लिए बंद हैं तथा कोई भी आदमी उनकी दारुन गाथा को सुनने के लिए तैयार नहीं है.


यही जनता है, और यही वे लोग हैं, जिन्होनें मुसीबतों के पहाड़ों को झेला है, इसीलिए असीम साहस के साथ संघर्ष करने में पूर्णरूप से सक्षम हैं.

यही वे लोग हैं जिनके जीवन की राहों में विश्वासघात और मिथ्या आश्वासनों के कुटिलतापूर्ण चौके बिछाये जाते रहे हैं. इनसे हम यही नहीं कह सकते थे कि ‘हम तुम्हें यह देंगे’ बल्कि हमने कहा, ‘यह सुन्दर भविष्य तुम्हारा है, अपनी पूरी शक्ति के साथ इसे प्राप्त करने का संघर्ष करो ताकि स्वतन्त्रता और प्रसन्नता तुम्हारे कदमों को चूम ले.’
(‘इतिहास मुझे सही साबित करेगा’ से लिया गया)
समय के साखी, वर्ष 8, मई – जून 2016

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