पहली महिला राष्ट्रपति नहीं सेक्सिस्ट राष्ट्रपति: अमेरिकी जनादेश


दुनिया के सबसे ताकतवर माने जाने वाले मुल्क ने अपना राष्ट्रपति चुन लिया है और इस तरह विवादों में रहने वाला, महिलाओं को देह मात्र मानने वाला शख्स अमेरिकी लोकतंत्र का कर्ता-धर्ता बन गया है. डोनाल्ड ट्रंप का चुना जाना अमेरिकी समाज की पितृसत्तात्मक सोच की बेहद मजबूत बुनियाद का प्रतीक है, जिसकी जड़ें भारत में भी कम मजबूत नहीं है, ट्रंप के लिए भारत में हो रहे यज्ञों और उनके पक्ष में उठ रही आवाजें इसका प्रतीक हैं. भारत के सोशल मीडिया में सक्रिय अश्लील और आक्रामक स्त्री-दलित-वंचित और अल्पसंख्यक विरोधियों से ट्रंप के समर्थक भी कम नहीं हैं. एक खबर- विश्लेषण के अनुसार उनके समर्थकों ने इस साल की शुरुआत में ही पत्रकार मेगन केली को ट्वीट करते हुए गालियों की बौछार कर दी थी- बीच, व्होर, बिम्बो, कंट जैसी गालियों से उनपर हमला बो दिया था, ऐसा इसलिए कि ट्रंप ने केली के शो में जाने से यह कहते हुए मना कर दिया था कि ‘वह ( ट्रंप) केली को पसंद नहीं करते.


अमेरिका की मोदी परिघटना

भारत की घटनाओं से साम्य रखती इन घटनाओं और हमलों के बीच रिपब्लिकन पार्टी के डोनाल्ड ट्रंप डेमोक्रैट उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन को हराकर अमेरिका के राष्ट्रपति बन गये हैं. इसके राजनीतिक मायने ठीक-ठीक वही हैं, जो 2014 की गर्मी में भारत में सत्ता परिवर्तन के राजनीतिक मायने थे, यानी मनमोहन सिंह की हार और नरेंद्र मोदी की जीत. इससे ज्यादा वाम-दक्षिण जैसी कोई बायनरी नहीं बनती. मई 2014 के मई में आये चुनाव परिणाम के साथ भारत की राजनीति ‘दक्षिण’ से और दक्षिण की ओर बढ़ी है- अमेरिका का चुनाव परिणाम उसकी आंतरिक राजनीति को वही खीच कर ले जा रहा है. लेकिन ट्रंप की जीत का विशेष मायने यह है कि अमेरिका के व्हाईट हाउस में पहली महिला नहीं जा सकी. नस्लवाद के खिलाफ एक सन्देश तो अमेरिकियों ने 2008 में दे दिया था- ब्लैक बराक ओबामा को राष्ट्रपति चुनकर, लेकिन वे इसे पुरुषवाद के खिलाफ जनादेश तक विस्तार नहीं दे सके. ऐसा मैं सिर्फ टोकन के तौर पर नहीं कह रहा हूँ- ओबामा से नस्लवादी नफरत करने वाले अमेरिकियों की कोई कमी नहीं है, लेकिन बहुमत नस्लावाद से ऊपर गया. ऐसा 2016 में नहीं हो सका, अमेरिकी जनता ने महिलाओं को गालियाँ देने वाले, उनका उत्पीडन करने वाले सेक्सिस्ट ट्रंप को अपना प्रतिनधि चुन लिया.

अमेरिकी प्रतिभा पाटिल

यदि हिलेरी क्लिंटन चुन ली गई होतीं तो जनादेश महिलाविरोधी आचरणों के खिलाफ एक सन्देश होता, और यह महत्वपूर्ण होता. देश की पहली महिला राष्ट्रपति होने का भी एक अर्थ सन्दर्भ है, हालांकि भारत ने देखा है कि उसकी पहली महिला राष्ट्रपति कहीं से भी स्त्रीवादी नहीं थी, बल्किन बाबाओं-माताओं और भूत-प्रेत में विश्वास करने वाली स्त्रीविरोधी सोच की पतिव्रता स्त्री भर थीं. अमेरिका में भी हिलेरी के होने से स्त्रीवाद की कोई जीत का जश्न नहीं होने वाला था. बल्कि हिलेरी भी प्रतिभा पाटिल की तरह ही आत्मा-संवाद (मरे हुए व्यक्ति से) करने में अपनी महारत की दावेदार रही हैं, उनका दावा राष्ट्रपति फ्रेंकलीन रूजवेल्ट की पत्नी एलेनार रूजवेल्ट से बात करने की रही है, जबकि प्रतिभा पाटिल का दावा ‘ब्रह्मकुमारी माता’ से बात करने की रही है.
व्हाईट हाउस की होड़ में पहली महिला स्त्रीवादी थीं


हिलेरी क्लिंटन निश्चित ही आधिकारिक तौर पर पहली महिला राष्ट्रपति जरूर होतीं, लेकिन व्हाईट हाउस की आंतरिक सत्ता संभालने की पत्नीवत भूमिका से आगे बढ़कर शासन-प्रशासन और राजनीतिक निर्णयों में अगुआई करने का एक श्रेय एडिथ विल्सन को जाता है, जो अपने राष्ट्रपति पति वुडरो विल्सन के बीमार होने के बाद 17 महीने तक देश की सत्ता की बागडोर संभाली. कुछ विश्लेषक उन्हें भी अमेरिका की पहली महिला राष्ट्रपति मानते हैं. हालांकि ऐसा आधिकारिक तौर पर नहीं कहा जा सकता, क्योंकि यह महज संयोग था, राष्ट्रपति की शारीरिक अक्षमता की स्थिति में अमेरिकी संविधान तब बहुत स्पष्ट प्रावधान नहीं रखता था. हालांकि अमेरिकी की पहली महिला राष्ट्रपति होने की होड़ में महिलायें पहले भी आगे आती रही हैं, लेकिन रिपब्लिकन और डेमोक्रैट जैसी बड़ी पार्टी से पहली अधिकारिक उम्मीदवार, हिलेरी क्लिंटन ही रही हैं, जो जीततीं तो कीर्तिमान रचतीं.

अमेरिकी इतिहास में पहली राष्ट्रपति पद की पहली महिला उम्मीदवार विक्टोरिया वुडहल रही हैं, जिन्होंने 1872 में चुनाव लड़ा था. विक्टोरिया वुडहल महिला अधिकार और श्रमिक अधिकार के लिए सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता थीं. हिलेरी क्लिंटन की ऐसी कोई पृष्ठभूमि नहीं है, लेकिन उनकी जीत जरूर एक स्त्री एक पक्ष में जनादेश होती, क्योंकि ट्रंप के महिलाविरोधी आचरण, उनके सेक्सिस्ट रिमार्क और उनके द्वारा महिलाओं का ‘तथाकथित उत्पीडन’ इस बार चुनाव में मुद्दा बन गया था.


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हिलेरी क्लिंटन बनाम डोनाल्ड ट्रंप: सामाजिक पृष्ठभूमि

गौरतलब है कि एक और मामले में अमेरिकी चुनाव भारत के 2014 के चुनाव से साम्य रखता है, वह साम्य बनता है, दोनो उम्मीदवारों की सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर. एक ओर पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की पत्नी हिलेरी क्लिंटन थीं, जिनके पास सपष्ट राजनीतिक विरासत है और प्रशासनिक अनुभव भी, दूसरी ओर व्यवसायी और 19 सालों से सौन्दर्य प्रतियोगिताओं के मालिक अराजनीतिक पृष्ठभूमि वाले ट्रंप- यहाँ राजनीतिक जुमले में चाय जैसा ही कोई संयोग था.

पति को संतुष्ट नहीं कर पाई, अमेरिकी जनता को क्या संतुष्ट करेगी: 

ट्रंप अपने पूरे करिअर में महिला विरोधी हलके रिमार्क के लिए कुख्यात रहे है. वे महिलाओं की देह, चेहरे और व्यक्तिव को लेकर सेकसिस्ट रिमार्क देते रहे हैं, अमेरिका की कई बड़ी महिला हस्तियों ने उनपर यौन शोषण के आरोप लगाये, जिसकी संख्या चुनाव प्रचार के दौरान बढ़ती ही गई. सीमा का उल्लंघन तो तब हुआ, जब उनके ट्वीटर हैंडल से हिलेरी के बारे में ट्वीट हुआ कि, ‘ जो पति को संतुष्ट नहीं कर पाई, वह अमेरिकी जनता को क्या संतुष्ट करेगी,’ हिलेरी के बारे में यह रिमार्क उनके पति और पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन और मोनिका लिवेन्स्की के प्रसंग में किया गया था, मोनिका लिवेन्स्की ने क्लिंटन पर यौन शोषण का आरोप लागाया था. अपने विरोधियों के खिलाफ अश्लील ट्वीटर पोस्ट को दुबारा शेयर करने वाले ट्रंप ( हालांकि वे शेयर करने के बाद अपनी ओर से उसे स्वीकारने या अस्वीकारने का कोई कमेन्ट नहीं देते) के खुद के ऐसे अश्लील और सेक्सिस्ट रिमार्क की लम्बी फेहरिश्त है, जो ऑडियो, वीडियो की शक्ल में भी सोशल मीडिया में वायरल हैं. वे एक वायरल ऑडियो में एक विवाहिता के साथ सेक्स करने की बात अश्लील तरीके से कहते हुए सुने जा सकते हैं.
स्त्रियों के शरीर और खासकर यौन अंगों के बारे में बात करना उनका पसंदीदा काम है, ऐसा आरोप अमेरिका की कई बड़ी हस्तियों ने लगाया है, और ऐसा करते हुए वे सार्जनिक टीवी शो और अपने साक्षात्कारों में भी देखे गये हैं.

सुनें पूरी बातचीत: मैंने उस विवाहित स्त्री को फक किया

तो सवाल है कि क्या अमेरिकियों ने स्पष्ट सन्देश दिया है की वे पहली स्त्री को तो व्हाईट हाउस  भेजने के लिए तैयार नहीं ही हुए हैं, बल्कि उससे भी आगे बढ़कर एक स्त्रीविरोध शख्स को देश की बाग़डोर सौपने में उन्हें कोई दिक्कत नहीं है.

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