शिवमूर्ति की कहानियाँ :स्त्री प्रश्न

रेणु चौधरी
जे.एन.यु.में शोधरत है
renu.jnu14@gmail.com

शिवमूर्ति हमारे समय के महत्वपूर्ण कथाकार हैं ये महानगर जीवन के नहीं ग्रामीण जीवन के कथाकार हैं. उनकी कहानियों में ग्रामीण परिवेश से जुड़ी स्त्री-जीवन की समस्याएँ चित्रित हैं. शिवमूर्ति की कहानियों में ग्रामीण जीवन की विषमताएँ और अंतर्विरोध अपने नग्न यथार्थ के रुप में अभिव्यक्त हुआ है. जहाँ जाति व्यवस्था की गहरी जड़ें मानवीय संबंधों को छिन्न-भिन्न करती दिखाई देती है. जहाँ स्त्री, दलित को गहन यातनाओं और विवशताओं से लगातार जीना पड़ता है. ‘कसाईबाड़ा’, ‘अकालदण्ड’, ‘तिरिया चरित्तर’ आदि कहानियों में इस यथार्थ को स्पष्टता के साथ देखा जा सकता है. इन कहानियों की स्त्रियाँ विमली, शनिचरी के साथ समाज, कानून, सरकारी तंत्र का व्यवहार और हथकण्डे ग्रामीण जीवन का कटु यथार्थ सामने ला कर रख देते हैं. ‘कसाईबाड़ा’ कहानी में  शनिचरी की हत्या कर ग्राम-प्रधान उसकी ही बेटी को वेश्या बनने पर विवश कर देता है. इसी प्रकार ‘तिरिया चरित्तर’ कहानी की नायिका विमली के साथ उसका ससुर ही अमानवीय कार्य करता है, गाँव, देश, समाज की बात तो छोड़ ही दीजिए. स्त्रियाँ घर में भी सुरक्षित नहीं हैं. इस पितृसत्तात्मक समाज में पुरुष अपने को श्रेष्ठ दिखाने के लिए जीवन-भर के लिए उसके चरित्र ही नहीं माथे पर भी दाग टांक देता है. ‘अकालदण्ड’ की सुरजी या फिर ‘केशर-कस्तूरी’ की केशर, इनके साथ जो कुछ भी घटित होता है वे पितृसत्तात्मक  समाज की क्रूरतम विकृतियाँ हैं, जिन्हें शिवमूर्ति यथार्थवादी ढंग से प्रस्तुत करते हैं. ये सभी कहानियाँ आजादी के बाद के भारतीय गाँव की कहानियाँ है. जहाँ विकास के नाम पर गाँव का दोहन तो हुआ ही, लेकिन निचली पायदान पर खड़ा व्यक्ति, व्यक्ति नहीं रह पाता है. जीवन इतना विषाक्त हो जाता है कि साधारण जन के लिए सांस लेना भी दूभर है. पंचायती राज के नाम पर स्त्रियों और दलितों का शोषण आम बात हो गयी है जिसे शिवमूर्ति अपनी कहानियों में पुरजोर ढंग से उठाते हैं.

शिवमूर्ति शोषण के विरूद्ध कहीं भी ‘लाऊड’ नहीं होते. शोर का प्रतिरोध शोर नहीं, एक धीमी सी चुप्पी होती है. शिवमूर्ति की कहानियाँ बिना ‘लाऊड’ हुए, धीमे से अपना असर पाठक के मन में पैदा करती हैं. पाठक उनकी कहानियों से सीधे जुड़ जाता है. वे शिल्प और भाषा के जंगल में पाठकों को नहीं छोड़ते, बल्कि उनके साथ स्वयं एक यात्री बनकर सफर करते हैं. जंगल के सुख-दुख, यंत्रणा-यातना, भय-डर को भोगते हैं. समाज में जिस प्रकार स्त्री की छवि पहले थी, शिवमूर्ति उसी रुप में उसे देखते हैं तथा स्त्री-जीवन को एक नई वास्तविकता के साथ चित्रित करने की कोशिश करते हैं. शिवमूर्ति ने अपनी कहानियों में उन सामाजिक समस्याओं को केन्द्रीयता दी है जो भारतीय समाज का अभिन्न अंग होते हुए भी प्रत्येक भारतीय के जीवन की समस्याएँ हैं. स्त्री सदियों से जिस पीड़ा एवं दंश को झेलती रही है, शिवमूर्ति ने उसके विविध पक्षों को अपनी कहानियों में बहुत ही मार्मिक ढंग से उकेरा है. दरअसल शिवमूर्ति को अपने समय और समाज की बुनियादी विसंगतियों का तीखा एहसास है जिसके कारण वे रचना में एक संघर्ष खड़ा करते हैं.शिवमूर्ति ने अपनी कहानियों में स्त्री-जीवन के हर एक पहलू को चित्रित किया है. उन्होंने स्त्री-जीवन की प्रत्येक समस्याएँ, उनमें विद्यमान साहस, त्याग, करूणा, दृढता और संयम जैसे उच्च मानवीय गुणों के साथ-साथ ईर्ष्या-द्वेष, रुढिवादिता, धर्मभीरुता अंधविश्वास जैसी दुर्बलताओं का भी जीवंत चित्रण किया है.


 शिवमूर्ति स्त्री-जीवन के जिस यथार्थ को अपनी कहानियों में लेकर आते हैं, वह आजादी के बाद के सामाजिक परिवेश का स्वरुप है. आजादी के पहले वैश्विक परिदृश्य पर कई नारीवादी आंदोलन हो चुके थे. इन आंदोलनों का प्रभाव साहित्य पर भी पड़ने लगा था. हिन्दी में महिला कथाकारों का एक वर्ग भी उभर चुका था, जो स्त्री के सामाजिक, आर्थिक और निजी जीवन को कहानी का विषय बनाने लगी थी. महिला कथाकारों की रचनाओं में स्त्री-जीवन को स्त्री चेतना की दृष्टिकोण से चित्रित किया जाने लगा था. ‘‘स्वतंत्रता-प्राप्ति के पश्चात् नारी घर से बाहर आकर सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक क्षेत्रों में भाग लेने के बाद भी परंपरागत संस्कारों से पूर्णतया अलग नहीं हो पायी है. भारत की सामाजिक व्यवस्था में आये परिवर्तनों ने नारी के व्यक्तित्व के विकास में कतिपय आधार तो बदले किन्तु पारिवारिक दृष्टि से नारी आज भी परिवार का केन्द्र बिन्दु है और पुरुष परिवार का अधिकारी.’’1
शिवमूर्ति की कहानियों की मूल शक्ति है उनकी अपने आस-पास की रोजमर्रा के यथार्थ को जानने की तीव्र संवेदनीय दृष्टि. उन्होंने अपनी कहानियों में समाज के निचले पायदान या हाशिए के समाज के स्त्री-जीवन का यथार्थ चित्रण किया है. शिवमूर्ति की कहानियों में स्त्री और ‘दलित स्त्री’ का स्वरुप विशेष रुप से विद्यमान हैं. वह उनकी समस्याओं से पाठक को रुबरु कराते हैं. समाज में चली आ रही कुरीतियों पर से वह पर्दा हटाते हैं. ‘कसाईबाड़ा’, ‘अकालदण्ड’ और ‘सिरी उपमा जोग’ कहानियों में हर रुप से स्त्री दमित है. उसका शोषण हो रहा है और ये शोषण करने वाले कुछ गाँव के लोग हैं या कुछ अपने परिवार के लोग हैं. शिवमूर्ति की कहानियों में स्त्री-अस्मिता और जाति का सवाल अहम मुद्दा है. ‘सिरी उपमा जोग’ एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है, जिसने दो शादियाँ की है. जब वह कुछ नहीं था, तब उसकी ग्रामीण पत्नी ने उसका साथ दिया. लेकिन जैसे ही वह अफसर बन जाता है तो पत्नी उसे जाहिल और गवाँरु लगने लगी| ऐसी स्थिति में मानवीय संवेदना को खत्म होते शिवमूर्ति ने दिखाया है.
पितृसतात्मक समाज में यौन शुचिता स्त्री की सबसे बड़ी पूँजी मानी जाती है. ‘भरतनाट्यम’ कहानी की स्त्री पात्र ऐसे समाज की कड़ी निंदा करते हुए सारे नैतिकता के बंधनों को तोड़ देती है. स्त्री की गुलामी एक दिन में नहीं, बल्कि एक लम्बी ऐतिहासिक प्रक्रिया के दौरान कायम हुई है. आधुनिक समाज में भी यही पुरुष सत्तात्मक व्यवस्था कायम है. ऐसी स्थिति में यह तय करना कठिन हो जाता है कि स्त्री के मुक्ति किससे चाहिए. शिवमूर्ति की कहानियाँ इस यथार्थ को खोजने के क्रम में अन्य कई तरह के स्त्री प्रतिरोधों को सामने लाती है. केशर-कस्तूरी कहानी में केशर के मौसा जब उसके पति को गैर जिम्मेदार बताते हुए उसके दूसरे विवाह का प्रस्ताव रखते हैं, जिसके पीछे सिर्फ यह कारण है कि वह कमाता नहीं है, तो केशर उनका खुल कर विरोध करती है. यह सिर्फ उस समाज के लिए नहीं है, बल्कि पूरी व्यवस्था के लिए चुनौती है. वह पूछती है कि क्या कमाना ही मनुष्य का जीवन आधार है? केशर अपने पिता के घर जाने से भी इनकार कर देती है.

शिवमूर्ति एक मात्र ऐसे कथाकार हैं, जिनकी कहानियों की अधिकतर नायिकाएँ ही कहानियों की नायक हैं. जहाँ वे केन्द्र में नहीं है, वहाँ भी उनकी भूमिका कम महत्वपूर्ण नहीं है. अधिकतर पुरुष पात्र या तो लम्पट होते हैं या भ्रष्ट. अगर कहीं वे सकारात्मक भूमिका में आते भी हैं तो ऐसा लगता है कि स्त्री पात्रों को और मजबूत करने के लिए आए हैं. दलित चिंतक और आलोचक ओमप्रकाश वाल्मीकि कहते हैं ‘‘उनकी कहानियाँ नायिका प्रधान हैं. ‘तिरिया चरित्तर’, ‘सिरी उपमाजोग’ ‘कसाईबाड़ा’, ‘तर्पण’ आदि में स्त्री की वेदना, उसका संघर्ष, अपमान, प्रताड़ना, कामवासना, पारस्परिक रिश्तों की जकड़न, पारिवारिक विघटन सभी कुछ गहरी वेदना के साथ अभिव्यक्त होते हैं.’’2 यह वेदना वही अनुभव कर सकता है, जो गहरे रुप में स्त्रियों से जुड़ा हो. यह जुड़ाव वहाँ से आता है, जहाँ संवेदनशीलता होती है.

 शिवमूर्ति एक संवेदनशील कथाकार एवं व्यक्ति है. उनकी स्वीकारोक्ति भी है ‘पता नहीं मेरा अवचेतन मन स्त्रियों को ही मेरी कहानियों के मुख्य पात्र के रुप में क्यों चुनता है. शायद स्त्री की पीड़ा, उनके द्वारा घर बाहर दोनों जगह झेला जाने वाला अन्याय, इसका कारण है.’ अर्थात शिवमूर्ति यह मानते हैं कि स्त्रियाँ दोहरी मार को झेलती है. एक तो घर में दूसरा बाहर यानि समाज में.’ इन दोनों स्थितियों को 1984 ई. में ‘सारिका’ में प्रकाशित कहानी ‘सिरी उपमा जोग’ की नायिका का एक पात्र बड़ी बेबाकी से प्रस्तुत करता है ‘‘सरब सिरी उपमा जोग’, खत लिखा लालू की माई की तरफ से, लालू के बप्पा को पाँव छूना पहुँचे...आगे समाचार मालूम हो कि हम लोग यहाँ पर राजी-खुशी से हैं और आपकी राजी-खुशी भगवान से नेक मनाया करते हैं. आगे, लालू के बप्पा को मालूम हो कि हम अपनी याद दिलाकर आपको दुःखी नहीं करना चाहते, लेकिन कुछ ऐसी मुसीबत आ गई है कि लालू को आपके पास भेजना जरुरी हो गया है. लालू दस महीने का था, तब आप आखिरी बार गाँव आए थे. उस बात को दस साल होने जा रहे हैं. इधर दो-तीन साल से आपके चाचाजी ने हम लोगों को सताना शुरु कर दिया है. किसी न किसी बहाने से हमको, लालू को और कभी-कभी कमला को भी मारते-पीटते रहते हैं. जानते हैं कि आपने हम लोगों को छोड़ दिया है, इसलिए गाँव भर में कहते हैं कि ‘लालू’ आपका बेटा नहीं है....|’’3 यह पूरा पत्र पढ़कर एक झटके में यह समझा जा सकता है कि स्त्रियाँ एक ही जीवन में कितने जीवन के दुखों को झेलती है. लालू के बप्पा अर्थात नायक ए.डी.एम बनकर उसी जिले में आया है जहाँ दस साल पहले वह पत्नी और अपने दोनों बच्चों को छोड़कर गया था. आज उसी के चाचा उसकी पत्नी को एवं बच्चों को मारते-पिटते हैं ताकि जो थोड़ी- बहुत जमीन जायदाद पर उनकी पत्नी एवं बच्चे लालू का हक हैं, वे भी खत्म हो जाए. वैसे तो यह कहानी 1984 की है, लेकिन आज तीस साल बाद भी गाँव में कुछ नहीं बदला है. आज भी स्त्रियाँ इसी नारकीय जीवन को जीने के लिए अभिशप्त है. सदियों से स्त्रियों की स्थिति समाज में दोयम दर्जे की रही है, इसे शिवमूर्ति ने बहुत ही बारीकी से देखा है.

शिवमूर्ति बार-बार अपने साक्षात्कारों में गाँव की स्त्रियों की जीवंतता के बारे में, उनके परिश्रम और जीवन के प्रति उनके सकारात्मक लगाव को उद्धृत करते हैं. ‘सिरी उपमा जोग’ में भी वे दिखलाते हैं कि लालू की माँ कितनी मेहनती, जिंदगी के प्रति आस्थावान और आत्मविश्वास से जुड़ी है. नायक याद करता है ‘‘बहुत गरीबी के दिन थे, जब उनका गौना हुआ था. इंटर पास किया था उस साल. लालू की माई बलिष्ठ कद-काठी की हिम्मत और जीवट वाली महिला थी, निरक्षर लेकिन आशा और आत्मविश्वास की मूर्ति. उसे देखकर उनके मन में श्रद्धा होती थी उसके प्रति. इतनी आस्था हो जिंदगी और परिश्रम में तो संसार की कोई भी वस्तु अलभ्य नहीं रह सकती. बी.ए. पास करते-करते कमला पैदा हो गई थी. उसके बाद बेरोजगारी के वर्षों में लगातार हिम्मत बँधाती रहती थी. अपने गहने बेचकर प्रतियोगिता परीक्षा के शुल्क और पुस्तकों की व्यवस्था की थी उसने. खेती-बारी का सारा काम अपने जिम्मे लेकर उन्हें परीक्षा की तैयारी के लिए मुक्त कर दिया था. रबी की सिंचाई के दिनों में सारे दिन बच्ची को पेड़ के नीचे लिटाकर कुएँ पर पुर हाँका करती थी. बाजार से हरी सब्जी खरीदना सम्भव नहीं था,लेकिन छप्पर पर चढ़ी हुई नेनुआ की लताओं को वह अगहन-पूस तक बाल्टी भर-भर कर सींचती रहती थी, जिससे उन्हें हरी सब्जी मिलती रहे. रोज सबेरे ताजी रोटी बनाकर उन्हें खिला देती और खुद बासी खाना खाकर लड़की को लेकर खेत पर चली जाती थी. एक बकरी लाई थी वह अपने मायके से, जिससे उन्हें सबेरे थोड़ा दूध या चाय मिल सके. रात को सोते समय पूछती, अभी कितनी किताब और पढ़ना बाकी है, साहब वाली नौकरी पाने के लिए.’’4 लेकिन यही नायक जब नौकरी पाता है तो धीरे-धीरे लालू की माँ के साथ उसका व्यवहार बदलने लगता है. जिस स्त्री का संग-साथ पाकर वह लताओं की तरह आसमान की बुलदिंयों की तरफ बढा. जिससे कमला और लालू जैसे फूल से बच्चों का जन्म हुआ. उसी के गँवारपन पर वह खीजने लगता है. उसकी देह से उसे भूसे जैसी गंध आने लगती है. धीरे-धीरे वह उससे दूर होता है और फिर सारे संबंध तोड़कर जीवन की दौड़ में दौड़ने लगता है.


बेरोजगारी के दिनों पर शिवमूर्ति की दो कहानियाँ ‘भरतनाट्यम’ और ‘सिरी उपमा जोग’ है, तो साथ में ‘केशर-कस्तूरी’ में भी केशर के बहाने उसका कुछ दंश देखने को मिलता है. ‘सिरी उपमा जोग’ अफसर बन जाने के बाद, बेरोजगारी और अपने परिवार को याद करने की अर्थात संघर्ष के दिनों को याद करने की कहानी है तो ‘भरतनाट्यम’ पीड़ा को भोगते हुए लिपिबद्ध करते जाने की. इन दोनों कहानियों में स्त्रियाँ अहम् रोल निभाती हैं.‘सिरी उपमा जोग’ में लालू की माई अपने अफसर बनने वाले पति में होने वाले परिवर्तन को पहले ही भाँप लेती है. तभी तो कहती है ‘‘मैं तो शहर में आपके साथ रहने लायक भी नहीं हूँ.’’5 क्योंकि गाँव की यह हिम्मती और जीवट वाली भोली-भाली महिला यह आगे ही भाप लेती है कि अफसर के साथ एक देहाती महिला का निर्वाह नहीं हो सकता. वह सिर्फ उनके दुःखों की साथी है. उन्हें हौसला और ढाँढ़स बंधा सकती है. उन्हें आगे बढ़ने के लिए हिम्मत दे सकती है. खुद उनके साथ आगे नहीं जा सकती है. वह जानती है कि उसका पति शहर में शादी कर चुका है. इस बात को वह सहज ढंग से स्वीकार भी कर लेती है. वह चिट्ठी लिखती है ‘‘कमला नई अम्मा के बारे में पूछती है. कभी ले आइए उनको गाँव. दिखा-बता जाइए कि गाँव में भी उनकी खेती-बारी, घर-दुवार है. लालू अब दौड़ लेता है. तेवारी बाबा उसका हाथ देखकर बता रहे थे कि लड़का भी बाप की तरह तोता-चशमा होगा. जैसे तोते को पालिए-पोसिए, खिलाइए-पिलाइए, लेकिन मौका पाते ही उड़ जाता है. पोस नहीं मानता. वैसे ही यह भी...तो मैंने कहा, बाबा, तोता पंछी होता है, फिर भी अपनी आन नहीं छोड़ता, जरुर उड़ जात है, तो आदमी होकर भला कोई कैसे अपनी आन छोड़ दे? पोसना कैसे छोड़ दे? मैं तो इसे इसके बापू से भी बड़ा साहब बनाऊँगी....’’6 तो यह है उसकी जीजिविषा. वह अपनी आन नहीं छोड़ना चाहती. मनुष्य होने की आन. जबकि नायक अपराधबोध ग्रस्त होकर स्वयं स्वीकार करता है कि ‘‘क्या मिला उसको उन्हें आगे बढ़कर? वे बेरोजगार रहते, गाँव में दोनों सुख की नींद सोते. तीनों लोकों का सुख उसकी मुट्ठी में रहता. छोटे से संसार में आत्मतुष्ट हो जीवन काट देती. उन्हें आगे बढ़ाकर वह पीछे छूट गई. माथे का सिंदूर और हाथ की चूड़ियाँ निरंतर दुःख दे रही हैं उसे.’’7 जबकि शहर की पत्नी जरा भी सहिष्णुता नहीं दिखलाती. वह एकदम लालू की माई की उलट है.
‘भरतनाट्यम’ भी बेरोजगारी और बेरोजगार युवा ज्ञान की कहानी है. यह कहानी भी पिता, पुत्र और पत्नी के इर्द-गिर्द ही घूमती रहती है. कहानी की शुरुआत ही होती है बाप के डाँटने से. यह कहानी टूटते हुए मूल्यों की है. पिता के प्रति सम्मान और प्रेम का भाव गायब है. शिक्षा-व्यवस्था के प्रति नाराजगी है. जीवन में आदर्शों के खत्म होते चले जाने की दास्तान है. बेरोजगारी का दंश है और सबसे बड़ी बात कि एक स्त्री के अंदर लड़के की चाहत के फलस्वरुप नैतिकता के सारे बंधन तोड़ कर निकल जाने का साहस है. यह साहस कहानी को एक नया आयाम देती है. यहाँ एक नये ढंग का सामाजिक यथार्थ प्रकट होता है.यह कहानी कई स्तरों पर चलती है. कई छोटी-छोटी कहानियाँ मिलकर एक लम्बी कहानी बन पड़ी है. यह कहानी पति-पत्नी के संबंधों की है. उनके आपसी समझ और प्रेम की है. पत्नी पढ़ी-लिखी नहीं है. इसकी वजह से वह अपनी तरफ से कुछ बातों को तय करती है, जैसे गाँव की महिलाएँ करती है. जैसे लड़का न होने के लिए वह एक्स और वाई क्रोमोजोम के बदले इसमें विश्वास करती है कि ‘‘यदि पति तगड़ा है तो लड़का होगा, पत्नी तगड़ी है तो लड़की.’’8 और इस बात को सिद्ध करने के लिए अपने जेठ-जेठानी का उदाहरण भी देती है. वह अपने पति को चोरी से दूध भी पिलाती है ताकि ‘‘अधिक स्वस्थ होकर मैं उसे एक बेटा दे सकूँ.’’9 इतना ही नहीं एक दिन घर को खाली पाकर उन्हें(जेठ) अपने साथ संबंध बनाने के लिए तैयार भी कर लेती है और पकड़े जाने पर स्वीकार भी करती है कि ‘‘उनकी कोई गलती नहीं है. मैं ही उनका हाथ पकड़कर मंडहे से लिवा लाई थी, बेटा पाने के लिए’’10 और अंत में वह खलील दर्जी के साथ कलकता भाग जाती है, बेटा पाने की आस में.

कहानी में चाहे जितनी भी कहानियाँ हो. यह कहानी एक स्त्री की सदियों से दबाए गए इच्छा को बिना किसी स्त्री विमर्श के हमारे सामने प्रस्तुत करती है कि स्त्री की देह और उसकी इच्छा पर उसका अधिकार होना चाहिए. उसका भाग जाना और जेठ से शारीरिक संबंध बनाना सामाजिक रुप से अनैतिक हो सकता है लेकिन एक स्त्री के नजरिए से देखा जाए तो यह कहीं से भी अनैतिक नहीं है. उसकी परवरिश ही ऐसी है. उसे अपने ससुराल में लड़की पैदा किए जाने के लिए बार-बार लांक्षित होना पड़ता है. इसके लिए उसके पति को भी लांक्षित होना पड़ता है. जबकि वह मानती है कि इसमें उसका कोई दोष नहीं है. सारा दोष पति का है. यह मानने के पीछे उसके अपने तर्क है. किसी भी ग्रामीण पृष्ठभूमि की स्त्रियों के यहाँ समाज में लड़के का क्या महत्व है? यह किसी उत्तर भारत के व्यक्ति से पूछ कर देखिए. लड़के को लेकर उनकी क्या मानसिकता है, यह कहानी उसके कई परतो को भी खोलती है. वह स्वयं इस मामले में पत्नी को मौन समर्थन देता हुआ सामने आता है. वह कहता भी है ‘‘चली गई, चलो, जहाँ भी रहे, सुखी रहे....लेकिन भागना ही था तो एक दिन पहले भाग जाती. मैं टूटने से बच जाता...घूस देने से...पथभ्रष्ट होने से...पता मालूम होता तो ये ब्रेजियर, ब्लाउज वगैरह पार्सल कर देता...लिखता कि बेटा होने पर खबर करे. मैं खिलौने लेकर आऊँगा.’’11 अर्थात वह पत्नी के इस कृत्य को कहीं से भी गलत नहीं पाता है. बल्कि उसे ‘सर्पोट’ ही करता है. नहीं तो क्या कारण है कि वह खिलौने लेकर आने की सोचता है. कहीं न कहीं उसके मन में भी लड़के की चाहत है. और होती क्यों नहीं? वह भी तो उसी के बहाने अपने पिता से लांक्षित होता रहता है. जब तब संपति से बेदखल कर दिए जाने की घोषणा के साथ.


ज्ञान पढ़ा-लिखा नौजवान है. वह नसबंदी के फायदे नुकसान जानता है. तीन-तीन बेटियों के पैदा होने के बाद भी वह अपनी नसबंदी नहीं कराता. जबकि कायदे से तो उसे दो बेटी के बाद ही नसबंदी करा लेना चाहिए था. कहीं न कहीं वह खुद बेटे की हसरत को अपने अंदर दबाए बैठा है. इसलिए वह अपनी पत्नी को रंगे-हाथों पकड़े जाने के बाद भी उस पर गुस्सा नहीं होता. बल्कि उसके न रहने पर अपने आलम्बन के छूट जाने का भय उसे सताता है. वह अपने लिए स्वयं तर्क देता है ‘‘इस तरह के छिटपुट यौन-संबंधों को मैं गम्भीरता से नहीं लेता. इसे मेरा दमित पुंसत्व कहिए या लिबरल आउटलुक. मैं पाप-पुण्य, जायज-नाजायज, पवित्र-अपवित्र और सतीत्व-असतीत्व के मानदंडों से भी सहमत नहीं हूँ. माँगकर रोटी खा ली या कामतुष्टि पा ली एक ही बात है. प्राचीन काल की नियोग प्रथा को मैं आज के युग में भी उतना ही उपयोगी मानता हूँ. मैं भयभीत हुआ था तो सिर्फ इस बात से कि इन दिनों मैं जिस हताशा और निपट एकाकीपन की अँधेरी गुफा में फँसा हूँ, वहाँ पत्नी ही एकमात्र ऐसा आलम्ब है, जिसके आँचल में मुँह छिपा लेने पर घड़ी-दो घड़ी सुकून मिल जाता है. यह आलम्ब भी छूट गया तो झेल नहीं पाऊँगा. पैर उखड़ जाएँगे और मैं डूब जाऊँगा.’’12 यानी पत्नी के आँचल का बने रहना उसके लिए बहुत जरुरी है ताकि वह टूटने से बच जाए. वास्तव में कहानियाँ कहीं आसमान में पैदा नहीं होती. वह इसी संसार की उपज होती हैं. ऐसी घटनाएँ एक नहीं कई है जो समाज में घटित होती है. शिवमूर्ति इस घटना को वहाँ से लेते हैं और अपनी कहानी में डाल देते हैं.

1987 की ही उनकी एक और कहानी है जो हंस में प्रकाशित हुई थी. शीर्षक है-‘अकालदण्ड’. इसकी नायिका का नाम है-सुरजी. कहानी तो अकाल के बारे में है. लेकिन कहानी के केन्द्र में है सुरजी और सुरजी की गोरी चमड़ी और दप-दप जलती रुप राशि, सुरजी जवान है. सुंदर है. बलिष्ठ है. आकर्षक है. इस अकाल में भी उसकी देहष्ठि निरोग है और इसी देह का तो रोना है. यह देह न होता तो स्त्रियाँ कितने आत्याचारों से बच जाती. सुरजी हो या विमली (तिरिया-चरित्तर की नायिका या रुपमती, (कसाईबाड़ा की नायिका की बेटी) या सुगनी या अन्य नायिकाएँ, सभी सेक्रेटरी, अपने ससुर, गाँव के प्रधान या अन्य पुरुष पात्रों की कुदृष्टि की शिकार होती है. जो शिकार होने से बच जाती हैं, उन पर उन्हीं के नजदीकी लोग लांछन या चरित्रहीनता का अरोप लगाकर समाज में बदनाम करवा देते हैं. कहीं इसका कारण जमीन-जायदाद है तो कहीं कुछ. स्त्रियाँ हमेशा सतायी जाती हैं. जो स्त्रियाँ प्रतिवाद करती हैं, उन्हें कहानी के पुरुष पात्र किसी न किसी प्रकार दबाकर मजा चखाना चाहते हैं. इस अभियान में वे सफल होते भी दिखते हैं.

सुरजी प्रतिरोध करती है. ‘सिक्रेटरी बाबू’ सुरजी के प्रतिरोध को किसी भी हालात में स्वीकार में बदलना चाहते हैं. छल, बल और कल किसी भी तरीके से. पहले तो वह सुबह-सुबह सुरजी को पकड़ता है. उसे प्रलोभन देता है. फिर उसके घर में घुसकर उसके साथ जबरदस्ती करना चाहता है. वहाँ भी सफल नहीं होता तो रंगी बाबू को ढाल बनाकर सुरजी पर आक्रमण करता है. लेकिन यहाँ प्रतिरोध अपने चरम पर होता है और सुरजी हंसिए से उनकी देह का नाजुक हिस्सा अलग कर देती है. सुरजी प्रतिरोध के चरम पर एक दिन में नहीं पहुँचती. पहले तो वह इस हादसे के बारे में किसी से नहीं कहती . सोचती है ‘‘सिक्रेटरी के खिलाफ इस गाँव में बोलने वाला कौन है? उल्टे अपने ही ‘पत-पानी’ से हाथ धोना पड़ेगा.’’13 सुरजी एक सामान्य ग्रामीण महिला है. उसे अपनी ‘मरजाद’ का पता है. उसे यह भी पता है कि सिक्रेटरी और रंगी बाबू दोनों रंगे सियार है. एक सांपनाथ तो दूसरा नागनाथ. लेकिन सुरजी या गाँव की स्त्रियाँ या कहीं की भी स्त्रियाँ तब तक प्रतिरोध पर नहीं उतरती जब तक उनकी सहनशक्ति उनके साथ होती है. कोई भी स्त्री प्रतिरोध पर तभी उतरती है, जब उसके बच निकलने के सारे दरवाजे बंद हो जाते हैं. नहीं तो जो सुरजी ‘‘बूढ़ी न होती तो वह कब की अपने मायके निकल गई होती.’’14 सोचती है. वह सेकरेटरी बाबू का नाजुक हिस्सा काटने की हिम्मत ही नहीं कर पाती क्योंकि इतना तो वह भी जानती है कि इसके बाद बचे रहना मुश्किल ही होगा.


शिवमूर्ति की कहानी ‘तिरिया चरित्तर’ में भी स्त्री-जीवन का यथार्थ चित्रण हुआ है. महेश कटारे कहते हैं कि ‘‘तिरिया चरित्तर’ की विमली जो बड़ी हिम्मत और जतन से स्वयं को अपने अनदेखे पति के लिए सुरक्षित रखती है, अपने ही ससुर के धार्मिक कपट और वासना का शिकार हो, दण्ड भोगती हैं, किन्तु वह प्रतिरोध भी करती है. यही प्रतिरोध उसे प्रेमचंद की धनिया, नागार्जुन की उग्रतारा या रांगेय राघव की गजल से जोड़ता है.’’15 यह कहानी बहुत ही प्रमाणिक ढंग से पितृसत्तात्मक समाज के व्यवहार पर रोशनी डालती है. इस कहानी में पंचायत के बीभत्स स्वरुप को दिखाया है. यह वही पंचायत है जिसके बारे में प्रेमचंद ने एक आदर्श छवि प्रस्तुत करते हुए ‘पंच-परमेश्वर’ जैसी कहानी लिखी थी. कहानी के पात्र जुम्मन के माध्यम से कहलवाते हैं ‘‘...आज मुझे ज्ञात हुआ कि पंच के पद पर बैठ कर न कोई किसी का दोस्त होता है, न दुश्मन. न्याय के सिवा उसे और कुछ नहीं सूझता. आज मुझे विश्वास हो गया कि पंच की जबान से खुदा बोलता है.’’16 लेकिन आज पंचायत का यह रुप बदल गया है. ससुर द्वारा बहू का बलात्कार और उस पर ससुर के पक्ष में पंचायत का यह फैसला हमारे समय की कई महत्वपूर्ण घटनाओं की याद दिलाता है. यह फैसला किसी खाप पंचायत के फैसले से कम नहीं मालूम होता है. यह फैसला इस बात की ओर इशारा करता है कि हमारा समाज आज भी स्त्री के प्रति किस कदर मध्यकालीन नैतिकता के हिंसक व्यवहार से भरा है. ‘तिरिया चरित्तर’ के संदर्भ में स्त्रियों को लेकर जो लोगों के मन में अवधारणाएँ बनी हुई है. शिवमूर्ति इस कहानी के माध्यम से उसे पूरी तरह से तोड़ते दिखाई पड़ते हैं. इस कहानी के माध्यम से यह सिद्ध करने की कोशिश करते हैं कि सिर्फ स्त्री का ही चरित्र निकृष्ट एवं दोयम दर्जें का नहीं हो सकता है, बल्कि एक पुरुष का भी चरित्र स्त्री के बरक्स लम्पट या चरित्रहीन हो सकता है.

शिवमूर्ति पुरुष को तिरियाचरित्र से युक्त दिखाकर भारतीय परंपरा के उस वर्चस्व को खारिज करते हैं जो सदियों से स्त्रियों के प्रति बना हुआ है. स्त्रियाँ ही सिर्फ ‘त्रिया-चरित्र’ नहीं करती. पुरुष भी करते हैं और जब पुरूष करता है तो वह कितना नीचे गिर जाता है, इसे ही दिखलाने की कोशिश ‘विसराम’ के रुप में शिवमूर्ति करते हैं.आज विमर्श के युग में जिस प्रकार से स्त्रियाँ सामने आकर मुखर हो रही हैं, उसके कुछ अंश शिवमूर्ति की कहानियों में 80 के दशक में ही झलक रहे थे. शिवमूर्ति ही नहीं उस दशक के कथाकारों में संजीव, ममता कालिया, चित्रा मुद्गल आदि कहानीकार स्त्रियों की मुक्ति की पैरवी लगातार अपनी कहानियों में करते रहे. लेकिन इनकी अधिकतर नायिकाएँ पढ़ी-लिखी और शहरी जीवन से निकलकर आती है. वे नौकरीपेशा है. वे स्त्रियों की मुक्ति की अवधारणा को समझती हैं. उस पर विचार-विमर्श करती है. शिवमूर्ति की कहानियाँ एकदम इसके उलट हैं. वे अनपढ़ हैं. गरीब हैं. गाँव की हैं. इससे पहले अमरकांत, शेखर जोशी, काशीनाथ सिंह, रेणु और प्रेमचंद के यहाँ स्त्रियाँ हैं, जो अपनी मुक्ति की बात तो करती है पर इतने मुखर ढंग से नहीं. प्रेमचंद से शिवमूर्ति तक आते-आते हिन्दी कहानी में प्रतिरोध की संस्कृति का अग्रगामी विकास हुआ. इस विकास को गति देने में शिवमूर्ति की कहानियों का विशेष महत्व है.

शिवमूर्ति ने स्त्री-जीवन की समस्याओं को बहुत ही करीब से देखा है और उसके मार्मिक पहलू को बड़ी ही ईमानदारी के साथ अपनी कहानियों में अभिव्यक्त किया है. शिवमूर्ति की कहानियों की स्त्रियाँ ग्रामीण समाज की है, जहाँ शिक्षा का अभाव है. ग्रामीण समाज की स्त्रियाँ आज भी शिक्षा से वंचित है. वह चारदीवारी में रहने के लिए अभिशप्त है. कब तक किसी को बांधकर रखा जा सकता है. आज ग्रामीण समाज की स्त्रियाँ हो या शहरी समाज की सभी अपने अधिकारों के प्रति सजग हो गई है. अगर ऐसा न होता तो ‘कसाईबाड़ा’ की शनिचरी परधान के खिलाफ अनशन नहीं करती, कहीं न कहीं उसके अंदर यह चेतना आयी है. वह गलत और सही का फैसला करने लगी है. वह पुरूष के हथकंडे को समझ गई है. वह जान गई है कि देवता का मुखौटा पहने, ये सारे राक्षस है जो उनकी बहू-बेटियों को खाने के लिए आगे बढ़े आ रहे हैं. उनके लिए सारे रिश्ते-नाते बेमानी हो गए हैं. वे गाँव की लड़कियों को ‘सामूहिक विवाह’ के नाम पर बेच देते हैं. उस पैसे से मकान बनवाते हैं. जो उनका विरोध करता है, उन्हें रातों-रात गायब करवा देते हैं. विरोध की आवाज को बंद करवाने के उनके पास हजारों तरीके है. साम, दाम, दण्ड, भेद किसी भी तरीके से. बस उनके भोग की संस्कृति चलती रहे और दुनिया चुप रहे. पुरूषवादी मानसिकता के साथ-साथ यह ‘सत्ता’ की संस्कृति भी है. सत्ता बहुत ही क्रूर होती है. वह अपने विरोधियों को कुचलने के लिए उनकी हत्या तक करवा देती है.


शिवमूर्ति अपनी कहानियों में इस मानसिकता और संस्कृति के खिलाफ खड़े होते हैं. यह समाज आज भी पुरुषवादी समाज है. पुरुष इतनी जल्दी अपनी सत्ता को नहीं छोड़ सकता, इसलिए स्त्री आज भी शोषण का शिकार ज्यादा हो रही है. इस शोषण में समाज के साथ-साथ उसके घर-परिवार वाले भी शामिल है. शोषण सिर्फ शारीरिक और आर्थिक मोर्चे पर ही नहीं हो रहा है. मानसिक शोषण भी शोषण का एक तरीका है. ‘सिरी उपमा जोग’ कहानी के बहाने शिवमूर्ति इस तरफ इशारा करते हैं किस तरह लालू की माई शारीरिक के साथ-साथ मानसिक रूप से लालू के दादा के द्वारा सताई जा रही है.शिवमूर्ति का सारा लेखन इस स्त्री शोषण के खिलाफ एक परचम की तरह खड़ा है. वे स्त्रियों के सम्मान तथा उनके हक-अधिकार के लिए लगातार अपनी कलम चलाए जा रहे हैं. स्वाधीनता आंदोलन के समय में किसी ने प्रेमचंद से पूछा था कि आप कमरे में रहकर किस तरह देश की आजादी की बात कर सकते हैं. प्रेमचंद ने उत्तर दिया था- अपनी कलम के द्वारा. स्त्रियों की मुक्ति के संदर्भ में शिवमूर्ति वही काम करते हैं. शिवमूर्ति प्रेमचंद की उसी परंपरा के लेखक एवं कथाकार है, जो स्त्रियों को भोग्या नहीं बल्कि अपनी तरह इंसान समझते हैं.शिवमूर्ति की कहानियों में अभिव्यक्त स्त्री-जीवन की जब हम बात करते हैं तो कहीं न कहीं शिवमूर्ति अपने समकालीन कहानिकारों से अपनी एक अलग पहचान बनाते हैं. शिवमूर्ति की कहानियों की स्त्री पात्र कर्मठ और जीवंत हैं. वे अपने समकालीन कथाकारों से इस मायने में भी अलग है, क्योंकि इन्होंने अपनी कहानियों में उत्पीड़ित समाज के सवालों को अपने कथासाहित्य का विषय बनाया है. जो कि उनके समकालीन कथाकारों में नहीं दिखाई पड़ता है. इनकी कहानियों की स्त्रियाँ ज्यादातर निम्न वर्ग या दलित वर्ग की हैं जो सदियों से हाशिए पर रही हैं. जिसका शोषण कहीं भी और कोई भी करता रहा है. इसी हाशिए के समाज को अपने समय का सबसे बड़ा प्रश्न मानकर शिममूर्ति ने अपनी कहानियों में अभिव्यक्त करने की कोशिश की है.

सन्दर्भ ग्रन्थ –
1.डॉ  गणेश दास – स्वातंत्र्योतर हिंदी कहानी में नारी के विविध रूप, पृष्ठ सं -११
2. संपादक, ऋत्विक- लहमी,अक्टूबर- दिसम्बर, पृष्ठ सं ४२
3. शिवमूर्ति – केशर-कस्तूरी पृष्ठ सं -62
4. वही, पृष्ठ सं ६३-६४
5. वही, पृष्ठ सं-65
6. वही, पृष्ठ सं-67
7. वही, पृष्ठ सं -67
8. वही, पृष्ठ सं- 88
9. वही, पृष्ठ सं 88
10. वही, पृष्ठ सं- 89
11. वही, पृष्ठ सं-92
12. वही, पृष्ठ सं 89-90
13. वही, पृष्ठ सं-27
14. वही, पृष्ठ सं-28
15. संपादक –किशन कालजयी- संवेद , फरवरी- अप्रैल २०१४ पृष्ठ सं 119
16. उदृत, पृष्ठ सं 108




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