दुर्गी छिनार नहीं रही…

नवल किशोर कुमार 
पत्रकार-साहित्यकार, 'अपना बिहार' वेब पोर्टल के संपादक. संपर्क :8578001501 nawal.buildindia@gmail.com. 
दुर्गी सचमुच पूरे गांव की दुर्गा है. तीखे नैन नक्श, उन्नत उरोज और मांसल बाहें-कुदरती सुंदरता की मूर्ति. सबकुछ है उसके पास, नहीं है तो केवल वह जिसके साथ बियाह के बाद वह भोजपुर से मगध के इस गांव में आयी थी. दुर्गी किसी को कुछ नहीं कहती न ही रोना रोती है. पूछने पर अपने हाथ में पड़े घट्ठे दिखाते हुए कहती है कि ‘मरद नहीं है तो का हुआ, हम हैं. कोई निस्तनिया हमरा हाथ लगा के त दिखाये.’ अक्सर गांव के पुरबारी टोला के भूमिहार के लौंडे ताना मारते हैं. दुर्गी हसिया दिखाकर नपुंसक बना देनेवाली गाली देती है.सुबह से लेकर रात तक खटना और जीना यही तो कहानी है दुर्गी की. वैसे दुर्गी की कहानी यही नहीं है कि उसका मरद परदेस में है. दो साल पहले वह आरा के इटारहा के ब्रह्मबाबा के पास गयी थी. जाते समय बखोरापुर की काली माई का आशीर्वाद भी लिया था दुर्गी ने. इटाहरा के ब्रह्मबाबा ने कहा था उसका मरद एक दिन जरुर लौटेगा. वहीं ब्रहमबाबा के पेड़ के पास सिंदूर चढाने के बाद भर मांग लगाकर लौटी थी दुर्गी. तब बगल वाले नारायण चमार की मां नेउसे ताना भी मारा था, “का हे रमेशवा बहु, बाबा कुछ कहलथुन कि कहिया ले लौटतव तोर दुलहवा”.दुर्गी ने कुछ नहीं कहा चुपचाप अपने घर चली गयी. ऐसे मौकों पर दुर्गी किसी से कुछ भी नहीं कहती. का जाने किसी की नजर लग जाये. वैसे भी ई जीवन में उसे कुछ तो मिला नहीं. फ़िर भी जिए जा रही है बेचारी. लेकिन दुर्गी खुद को बेचारी नहीं मानती. और वो माने भी क्यों. आखिर धर्मनाथ मिसिर की पोती और आरा के जाने माने पंडित सिद्धेश्वर मिसिर की बेटी इतनी जल्दी हार माने भी तो क्यों और कैसे.

उसे आज भी याद है जब उसने रमेश यादव को पहली बार देखा था. सांवला सा रंग बिल्कुल रामचंदर या फ़िर किशन भगवान के जैसन. सिद्धनाथ मिसिर ने उसे अपने घर में नौकरी दी थी. जहां जाते रमेश को साथ ले जाते. खूब मेहनत करता था रमेश. पंडित जी भी खूब खुश रहते. रमेश की खासियत थी. जब कोई काम न होता, पंडित जी के घर के बाहर बथानी में पड़ा रहता. एक बार तो दुर्गी ने उसे गौमाता के साथ बात करते पकड़ लिया था. वह कोई बिरहा गा रहा था और जवाब में गौमाता भी उसका साथ दे रही थी. उस दिन पहली बार रमेश ने दुर्गी को देखा था. एकदम सचमुच की मिस्टर इंडिया वाली श्रीदेवी के जैसी लग रही थी दुर्गी. बाद में मैट्रिक की परीक्षा के दौरान रमेश ने दुर्गी की खूब मदद की. दुर्गी का मौसेरा भाई चिट बनाता और रमेश उसे पहुँचाने स्कूल की चाहरदीवारी छड़पता. यही से शुरु हुई दुर्गी और रमेश की प्रेम कहानी. दुर्गी को आज भी याद है वह दिन, जब पहली बार उसने रमेश को छुआ था. उस दिन भूमिहार टोले के लोगों से सिद्धेश्वर मिसिर की भिड़ंत हो गयी थी. मामला जमीन का था. लाठी पैना भी खूब चला था. मिसिर जी को तो कुछ नहीं हुआ रमेश जख्मी हो गया था. बाहर बथानी में सोया था, माथा में मुरेठा बांध के.

दुर्गी तब उसके पास पहुंची थी. बोली, ‘दवाई ले लिए हो कि नहीं. रमेश ने कहा कि नहीं लेकिन सब ठीक हो जाएगा. हाथ से खून बह रहा था. दुर्गी तब दौड़कर घर के अंदर गयी और नाखून पालिश ले आयी. नाखून पालिश का रंग रमेश के बदन पर खिल रहा था. तब पहली बार रमेश ने दुर्गी का हाथ हौले से दबाया था. दुर्गी तब खूब घुमक्कड़ थी. उसने जिद ठान ली थी कि इस बार पूजा करने आरण्य मंदिर ही जाएगी. मिसिर जी और मिसिराइन समझाकर हार गये तब उन्होंने रमेश के साथ जाने की इजाजत दी. वही आरण्य देवी से दुर्गी ने रमेश को मांग लिया और जब लौटी तो पूरे गांव में बवाल मच गया. अरे सुनते हो मिसिर जी की बेटी ने रमेशवा से बियाह कर लिया. कौन रमेशवा? अरे वही कोईलवर के रामधनी गोप के बेटवा. आजकल मिसिर जी के यहां बेगारी करता है. बेगारी करते-करते बेटिये को पटा लिया. मिसिर जी को पहले ही खबर मिल चुकी थी. गांव की सीमा पर खड़े हो गये दोनाली बंदूक लेकर. गांव के भूमिहारों के लड़के भी बड़े ताव में थे- साली पंडिताइन होके गोवार से कैसे बियाह कर लेगी. भुमिहार-बाभन में ओकरा मन लाय क कोई नहीं मिला.दुर्गी जानती थी कि ऐसा ही कुछ होने वाला है. इसलिए रमेश के साथ सीधे वह पटना आयी और फ़िर रमेश के घर गयी. रमेश के परिवार में केवल बाबूजी थे. पहले एमसीसी के साथ थे, लेकिन रमेश को उससे कोई मतलब नहीं होता था.रामधनी गोप बहु को देखकर खुश हुए और घर के दरवाजे पर चार नाल बंदूक खड़ी कर दी. दुर्गी को अब भी याद है अकेले उसके ससुर  ने 100 राऊंड फ़ायरिंग की थी, तब जाकर उसका घर बसा था. शादी के बाद दुर्गी दो बार गर्भवती भी हुई. लेकिन किस्मत को मंजूर नहीं था. पहली बार 4 महीना और दूसरी बार तो डेढ महीने में ही धुलैया कराना पड़ा था. फ़िर इसी बीच रमेश कमाने दिल्ली चला गया. जाना तो दुर्गी भी चाहती थी कि दिल्ली जाये और खूब घूमे. रमेश की भी यही तमन्ना थी. लेकिन तब दुर्गी उम्मीद से थी. इसलिए अकेले जाना मजबूरी ही थी.


आज दुर्गापूजा है. दुर्गी भी नौ दिनों का व्रत रखती है. कलश स्थापना वाले  दिन गणेश पंडित के यहां से कलश और दीया लेकर आयी. बिहटा स्टेशन के पास लगे बाजार से उसने पूजा का समान भी खरीदा और साथ में पकाने के लिए 2 सेर चावल, पाव भर दाल और दस रुपए का करुआ तेल. बाजार से शकरकंद भी लिया था उसने. रास्ते में शिवचंद्र बहु मिल गयी. देखते ही उसने दुर्गी को टोका, ‘दीदी, कोई चिट्ठी पत्री आई दिल्ली से?” दुर्गी ने कोई जवाब नहीं दिया. वह जल्दी से जल्दी घर जाना चाहती थी, दरवाजे पर गोबर की गंध ताजा थी , लेकिन कुत्तों ने अपने पांव के निशान बना दिये थे. दुर्गी के मुंह से निकला – “मोछकबरा कुत्तवन सब के खाली इहें देखल है.“ सामान अपनी घर के पूजा वाले कमरे में दुर्गा माता के चरणों में रखकर दुर्गी फ़िर से दरवाजा और आंगन लीपने लगी. पंडित जी आने वाले थे और दुर्गी को अभी मुंह धोना और नहाना बाकी था.बाबाजी आ गये तब कलश स्थापना का कार्यक्रम शुरू हो गया. बगल के भोला गोप, हरलाखी रजक, कायथ टोला वाले श्रीवास्तव जी सब पहुंच चुके थे. दुर्गी भी नहाकर और एकरंगा कपड़ा पहनकर पूजा के लिए तैयार हो गयी थी. लेकिन उसे लाज भी आ रही थी. बिना ब्लाउज और साया के साड़ी पहनना और गांव के बड़े-बुजुर्ग के सामने होने में लाज तो आयेगी ही. फ़िर सोची धर्म का काम है, इसमें कैसी लाज.

पूजा के बीच ही भूमिहार टोला के लौंडे आ गये. एक ने दुर्गी की ओर इशारा किया और कहा कि छिनार सब का यही काम है. संयोग ही था कि उस समय पूजा चल रहा था और वहां बैठे लोग चुप रहे. दुर्गी को इन सबकी आदत हो गयी थी. गाय और भैंस के लिये चारा लाने के दौरान कई बार उसपर आरोप लगे. मिथिलेश यादव के साथ उसकी कहानी आज भी गांव में लोग चटखारे लेकर सुनाते हैं. महिलायें भी कहती है कि गांव के बाहरस्कूल वाले खंडहर में दोनों ने खूब गुलछर्रे उड़ाये. देखो तो कैसी साधुआइन बनी फ़िरती है. साबून से चेहरा चमका लेने से मन के अंदर का मैल थोड़े न साफ़ होता है. जब से रमेश दिल्ली गया है दुर्गी तो एकदम छिनार हो गयी है. कूरियर कंपनी का मालिक फ़ेड्रिक डिसूजा गोवा का होने के बावजूद हिन्दी और बिहार की भोजपुरी अच्छे तरीके से बोल लेता है. रमेश डिसूजा का दाहिना हाथ बन गया है. पगार 8 हजार हर महीने मिल जाती है. उसी में वह 4 हजार अपनेउपर खर्च करता है और शेष पैसे वह दुर्गी को भेज देता है. उसे केवल एक बात का मलाल है. दुर्गी दिल्ली नहीं आना चाहती है. जाने क्यों गांव में ही पड़ी रहती है.पिछले साल सावन में जब रमेश गांव आया था तब गांव वालों ने दुर्गी के त्रिया चरित्र के बारे में खूब बताया था. रमेश का मन खट्टा हो गया था.लेकिन वह दुर्गी से प्यार भी करता है. इसलिए कुछ कह नहीं सकता. घर में ‘माला डी’( गर्भ निरोधक दवा) का टेबलेट देख उसका माथा भी ठनका था. लेकिन उसने दुर्गी से कुछ भी नहीं पूछा.


रक्षाबंधन के एक दिन बाद अचानक ही रमेश ने थैला लिया और आरा स्टेशन पहुंच  गया. रास्ते में गांव के लक्ष्मण सिंह मिल गये तो उनसे कहलवा दिया कि हम दिल्ली वापस जा रहे हैं.दुर्गी जब घास का गट्ठर लिए घर आयी. उसे विश्वास था कि रमेश आज की रात तो उसे भरपूर प्यार करेगा. बहुत दिन हुए उसकी छाती से लगकर सोये हुए. उसकी मूछें दुर्गी को तकलीफ़ नहीं देती थी. वह तो खुद कहती थी कि जिसके मुंछ नहीं है वह कैसा मरद. पड़ोस की एतवारी फ़ुआ ने उसे रमेश के चले जाने की सूचना दी. दुर्गी के सारे सपने पल भर में बिखर गये. धम्म से बैठ गयी धरती पर. थोड़ी देर बाद घर के अंदर गयी. खटिया पर जाकर लेट गयी. आंखों से आंसू की धार बह रही थी. सोचने लगी रमेश अब पहले जैसा नहीं रहा. वह चाहे तो मुझे भूल सकता है लेकिन मैं कैसे भूल जाऊं. वही तो मेरी जिंदगी है.गांव के मधेसर सिंह सबसे अमीर आदमी थे. पूरे इलाके में उनकी इज्जत थी.दुर्गी भी उन्हें बाप जैसा मानती थी. उस दिन मधेसर सिंह ने दुर्गी को बुलवाया था. मुड़िकटवा पईन के पास वाली जमीन बेच दो. मैं अच्छे पैसे दे दूंगा और फ़िर तुम चाहो तो मैं एक पक्का मकान भी दे सकता हूं. यह कहते कहते मधेसर सिंह उसके करीब आ गये. उसने दुर्गी के कंधे पर हाथ रखकर कहा अगर मंजूर हो तो शाम में चली आना. मेरा बेटा बैरिस्टर है. कागजात बना देगा. दुर्गी के मन में अफ़सोस हुआ कि वह अपना हंसिया क्यों भूल गयी. अगर होता तो साले की गर्दन काट देती. मन मसोसकर चली गयी.

 घर जाकर उसने रमेश की तस्वीर से कहा कि जमीन नहीं बेचूंगी. फ़िर चाहे कुछ भी हो जाये.दीया-बाती की बेला हो रही थी. दुर्गी ने एक ढिबरी बाहर के बथानी में जलाया. तभी मधेसर सिंह आता दिखा. उसका मन जोर से धड़का. अंदर गयी और अपना हंसिया, कुदारी और बरछी निकालकर कमरे में एक जगह छिपा दिया. मधेसर सिंह के साथ कुछ लोग और थे. वे बाहर ही रहे. दुर्गी समझ चुकी थी. मधेसर सिंह जबरदस्ती करेगा. इसलिए पहले से तैयार थी.गांव में हल्ला हो गया. दुर्गी ने मधेसर सिंह का लिंग काट दिया. थाना के लोग पहुंचे. मधेसर सिंह दुर्गी के कमरे में छटपटा रहा था. दुर्गी एक कोनेमें हाथ में हंसिया लिये खड़ी थी. दारोगा विश्वजीत सिंह ने दुर्गी से कुछ भी नहीं कहा. मधेसर सिंह को उठाया और अस्पताल भेज दिया.मधेसर सिंह के नपुंसक  होने की जानकारी रमेश को भी मिल गयी. वह जल्द से जल्द अपने घर आना चाहता था. उसके मालिक डिसूजा ने एडवांस देते हुए सलाह दी कि अपनी वाइफ़ को दिल्ली ले आए . रहने का इंतजाम मैं करवा दूंगा.पूर्वा एक्सप्रेस में वह जैसे-तैसे चढ गया. पूरी रात जेनरल बोगी के बाथरुम के बाहर बैठा रहा रमेश. सुबह पांच बजे के करीब आरा स्टेशन पर वह उतरा. उसके पैर घर जाना नहीं चाहते थे. सोच रहा था कि वह गांव वालों को क्या मुंह दिखायेगा. पुलिस उससे जाने कैसे-कैसे सवाल करेगी. रास्ते में भूमिहार टोला का नवेन्दू मिल गया. उसी की मोटरसाइकिल पर बैठ वह गांव पहुंचा. जानकारी मिली कि दुर्गी को थाना ले जाया गया है.रमेश को देख दुर्गी का चेहरा खिल उठा था. उसे विश्वास था कि रमेश उसे यहां से जरुर ले जाएगा. लेकिन दारोगा जिद पर अड़ा था. इसने गांव के सबसे प्रतिष्ठित व्यक्ति का लिंग काटा है, इसकी सजा तो उसे मिलेगी.

फ़िर बात हुई कि 20 हजार रुपए दिये जाने पर मामले को दूसरे तरीके से लिखा जा सकता है कि मधेसर सिंह ने पीड़िता के घर मे घुसकर इज्जत लूटने की कोशिश की और बचाव में पीड़िता ने उसका लिंग  काट लिया. पैसे नहीं दिये जाने की स्थितिमें केस पहले से तैयार था-‘दुर्गी कलंकिनी है’. पहले तो मधेसर सिंह को प्यार में फ़ंसाया और फ़िर ब्लैकमेल करने लगी. पैसे नहीं दिये जाने पर उसने उसे हमेशा-हमेशा के लिए नामर्द बना दिया.रमेश ने बटुआ में देखा तो कुल 4000 रुपए थे. सब निकाल वह दारोगा के पैरों में लोट गया. दुर्गी यह सब अपनी आंखों से देख रही थी. बाद में दारोगा ने दुर्गी को जाने की इजाजत दे दी. दोनों लौट रहे थे. थाना के बाहर एक रिक्शा पर एक साथ. दुर्गी रमेश के हाथो को जोर से पकड़ना चाहती थी वही रमेश मारे शर्म के धरती में धंसा जा रहा था.सिधेसर मिसिर भी परेशान थे. दो बेटियों की शादी नहीं हो रही थी. दुर्गी के कारण पूरे इलाके में उनकी नाक पहले ही कट चुकी थी. फ़िर नये मामले के कारण तो वे किसी से आंख मिलाकर बात भी नहीं कर पाते थे. मिसिराइन ने तो घर के बाहर निकलना ही बंद कर दिया. दोनों बेटियां सुलक्षणा और सुपर्णा ने भी कालेज जाना छोड़ दिया था. आखिर कितना सुन सकती थी कि इनकी बहन ने एक भूमिहार का लिंग  काट लिया है. लेकिन मन ही मन मिसिर जी खुश भी थे. उन्हें गर्व था कि उनकी बेटी ने सचमुच दुर्गा का अवतार लिया है. वे चाहते थे कि दुर्गी घर आकर रहे. रमेश भी रहे. लेकिन फ़िर डरते कि सुलक्षणा और सुपर्णा की शादी कैसे हो पायेगी. इसलिए मन मसोसकर रह गये.उस दिन पहली बार मिसिर जी ने गांव के दो लौंडों भरपेट मारा. दोनों ने मिसिर जी की बेटी को छेड़ा था.


हालांकि बाद में पंचायत में मामला शांत हुआ. लेकिन मिसिर जी ने ठान लिया था कि अब जीवन ऐसे नहीं जिया जा सकता. लोहा को लोहा ही काटता है. भूमिहार सब कुत्ते की पूंछ की तरह हैं. ये कभी नहीं सुधरेंगे. उस दिन पहली बार लाल झंडे के लोग रात में उसके घर आये थे.रमेश ने अपना फ़ैसला सुना दिया था. इस बार वह अकेले नहीं जाएगा. मामला शांत होते ही दुर्गी भी दिल्ली जायेगी. घर में ‘माला डी’ वाली बात का उसने जिक्र तक नहीं किया. दुर्गी दो राहे पर खड़ी थी. घर छोड़ेगी तब भूमिहार टोला के लोग सब जमीन हड़प लेंगे और नहीं गयी तब जीना हराम करते रहेंगे.दुर्गी ने रमेश से कहा – मुझे अपने साथ ले चलो, लेकिन पहले यहां की सारी जमीन संपत्ति बेच दो. इनके रहते घर छोड़ना मुमकिन नहीं है. रमेश को यह सलाह अच्छी लगी. लेकिन सवाल यही था कि उसकी जमीन कौन खरीदेगा.दुर्गी ने जवाब दिया कि मिथिलेश यादव बड़े पैसा वाला है. वह खरीद लेगा और वह मुंहजोर भी है. भुमिहार टोला के लोग केवल उसी से डरते हैं. मिथिलेश यादव का नाम सुन रमेश का मन खट्टा हो गया था. लेकिन वह दुर्गी पर इल्जाम लगाये भी तो कैसे. कहीं अगर बात झुठ निकली तब दुर्गी क्या सोचेगी. होसकता है ‘माला डी’ की गोली उस समय की हो जब शुरु-शुरु में उसने लाकर दियेथे. आखिर उसने भी तो प्यार के लिए अपने मां-बाप और जाति समाज सबको छोड़ा था. यह ख्याल आते ही दुर्गी पर उसे दुगना प्यार आया, उसने दुर्गी को उस रोज जी भरकर प्यार किया- मन ही मन सोचता – खटियातोड़ प्यार!

रमेश मिथिलेश यादव के घर पहुंचा. दुआ सलाम के बाद तय हुआ कि पूरी जमीन और घर के बदले वह 4 लाख रुपए दे सकता है. रमेश जानता था कि जमीन का भाव आसमान छू रहा है और मिथिलेश आधा से अधिक कीमत दे रहा है. दुर्गी को इससे ऐतराज नहीं था. उसका कहना था कि चार लाख रुपए में दिल्ली में रहने के लिए एक मुट्ठी जमीन तो मिल ही जाएगी. उस दिन आरा के रजिस्ट्री ऑफिस  में दुर्गी और रमेश दोनों भूमिहीन हो गये थे. पैसे बैंक में जमा हो चुके थे. दुर्गी के हाथ के कुछ बकाये शेष थे. उन्हें चुकाने के बाद दोनों ने तय किया कि अगली पूर्णिमा वाले दिन वे गांव को हमेशा-हमेशा के लिए छोड़ देंगे. इस बीच दोनों ने निर्णय लिया कि दिल्ली जाने से पहले मिसिर जी के घर जाया जाए. फ़िर मालूम नहीं कब मुलाकात हो न हो. संदूक से चमचम लाल साड़ी, भर हाथ चुड़ी और भर मांग सिंदूर सजा जब दुर्गी रमेश के साथ बाहर निकली तो देखने वालों की आंखें फ़टी की फ़टी रह गयी. गांव से बाहर निकलने पर एक टेम्पो रिजर्व कराया रमेश ने. वह भी पूरे 300 रुपए में. दुर्गी को यह अच्छा नहीं लगा. अगर ऐसे ही पैसे खर्च हो गये तब दिल्ली में जमीन कैसे खरीदा जा सकेगा.

टेम्पो पर सवार हो दुर्गी अपने दुल्हा के साथ पहली बार नैहर जा रही थी. दो सेर ‘सिरनी’ लिया था रमेश ने अपने ससुराल के लिए. नैहर में नजर पड़ते ही मिसिर जी घर से बाहर निकल गये. मिसिराइन कोने में बैठकर रोने लगी. दुर्गी की आंखों से आंसू बह निकले. लंबे समय के बाद मिसिराइन ने उसे गले लगाया था. बाहर बथानी में रमेश चौकी पर आंखें मुंद मानों खतरे के टल जाने के सपने देख रहा था. उसकी आंखों के सामने मधेसर का चेहरा और दुर्गी का साहस पीपड़वाले भूत के जैसे नंगा नाच कर रहा था. थोड़ी देर बाद मिसिर जी आये. रमेशने पांव छूकर आशीर्वाद लिया जाना चाहा. मिसिर जी भी अपने दामाद को गलेलगाना चाहते थे. लेकिन “कुजात” का ख्याल आते ही रुक गये. सुलक्षणा औरसुपर्णा भी बहनोई के साथ ठिठोली करना चाहती थीं, लेकिन शायद इसके लिए मौका अनुकूल नहीं था.मधेसर सिंह की नामर्दगी और दुर्गी की वीरता पटना में चर्चा का विषय  बन चुका था. अखबारों ने दुर्गी को दुर्गा का अवतार माना था. टेलीविजन चैनलपर बार-बार खबरें आ रही थीं.


दलितों पिछड़ों की राजनीति करने वाले एक नेताने दुर्गी के सम्मान में एक कार्यक्रम का आयोजन भी किया था. “अब तो जागोबहनों” नामक संस्था की पूरी टीम दुर्गी से मिलना चाहती थी.अहले सुबह मिसिर जी ने रमेश को समझाया. देखो मेरी बेटी ने तुमसे बियाह कर जो किया है उसका दंश हम झेल रहे हैं. सुलक्षणा और सुपर्णा के लिए वर ढूंढना मुश्किल हो गया है. अब मधेसर सिंह की घटना से पूरा समाज थू-थू कर रहा है. तुम ही बताओ मैं क्या करूं. तुम दोनों घर छोड़कर चले जाओ. वर्ना इस उमर में जाति समाज से अलग होकर नहीं जी सकता. मेरे पास कुछ रुपए हैं.उन्हें रखो.दरवाजे की ओट से दुर्गी तब सब सुन रही थी. उसने वहीं से कहा कि बाबू पैसा रहने दिजिये. हम लोग चले जायेंगे. रमेश तब खामोश ही रहा. फ़िर थोड़ी देर बाद दुर्गी दरवाजे के बाहर खड़ी थी. रमेश के हाथों में हाथ डाले सबके सामने. मिसिर जी और मिसिराइन सहित पूरा गांव देख रहा था. गांव की औरतें बोल रही थीं, ‘कुजात आदमी से बियाह के बाद सचमुच छिनार हो गयी है दुर्गी.अब उसे तो तनिक भी लाज नहीं आती.‘घर और जमीन की राजिस्ट्री हो चुकी थी. दुर्गी और रमेश कल की सुबह हमेशा-हमेशा के लिए गांव छोड़कर चले जायेंगे. भूमिहार टोले में कई लड़के बात कर रहे थे. मधेसर बाबू का बदला कैसे लिया जाय. कल तो वह छिनार चली जाएगी. आज की रात ही धावा बोलना होगा. मधेसर सिंह का बेटा समरेन्द्र भीखूब ताव में था. वह अपने घर दोनाली बंदूक ले आया. कोई कट्टा तो कोई भाला. कुल 9 लोग थे. योजना यह थी कि दुर्गी के सामने ही उसके भतार के पिछवाड़े गोली मारेंगे. फ़िर बाद में योजना यह बनी कि पहले उस छिनार को मजा चखायेंगे.सब निकल पड़े. गांव का पूल पार करने के समय ही गांव की महिलाओं ने उन्हें देख लिया. वे सब शौच के लिये पईन पर आयी थीं. चन्द्रदीप यादव की मेहरारु लगभग दौड़ते हुए दुर्गी के घर गयी

 रमेश ने हिम्मत से काम लिया. मिथिलेशयादव और उसके अन्य साथी भी गांव की सड़क पर हरवे हथियार से लैस खड़े थे.मिथिलेश ने रमेश को कहा कि तु लोग गांव से चल जा. हमनी सब देख लेम उस ससुरन के. दुर्गी भी यही चाहती थी लेकिन रमेश के माथे पर तो खून सवार था.गांव में हड़कंप मचा था. भूमिहार टोले के लौंडों को इस बात का गुमान था कि हथियार केवल उनके पास ही हैं और कोई मारे डर के बोलेगा नहीं. इसलिए गांव की सीमा में पहूंचते ही सबने राम इकबाल पासी की दुकान पर बैठकर पहले दारू पिया और फ़िर पैसे मांगने पर राम इकबाल के सामने ही दो फ़ायरिंग किया. रामइकबाल कुछ न बोल सका. मन तो उसका कर रहा था कि गला हसूलिये से उतार दें साले की. लेकिन सब संख्या में 20 से अधिक थे.उधर दुर्गी अपना सामान बांध रही थी. उसे जल्दी थी. बहुत दिनों के बादउ सने रमेश को फ़िर से पाया था. वह उसे खोना नहीं चाहती थी. लेकिन रमेश गांव वालों के साथ मैदान में कूद चुका था. सामने से भूमिहार टोले केहमलावर आते दिखायी दिये. पहली फ़ायरिंग भूमिहारों ने किया. जवाब में रमेशने एक साथ 4-4 हवाई फ़ायरिंग की. भूमिहार सहम गये. तबतक गांव के दलित टोले के लोगों ने गांव को घेर लिया था.आवाज आयी, मारो स्सालों को. गोलियां चलने लगीं. मिथिलेश यादव ने 3 को मौत के घाट उतारा था, वही रमेश ने भी 2 लोगों को गोली मारी थी.

इस लड़ाई में यादव टोला का एक नौजवान भी मारा गया. थोड़ी ही देर में लाशों का ढेर लग गया था. दलित टोले के 4 लोगों को गोलियां लगी थीं, लेकिन वे जिंदा थे. दो भूमिहार भी जीवित ही थे. यादवों ने योजना बनायी कि सबको मार दिया जाय और लाशों को यही पईन में पत्थर बांध कर बहा दिया जाय लेकिन ऐसा नहीं हो सका. दारोगा विश्वजीत सिंह पूरे पलटन के साथ गांव में आ चुका था. पूरे इलाके में खबर आग की तरह फ़ैली कि यादवों ने एक साथ 18भूमिहारों को मार गिराया है. खबर मिलते ही आरा से पुलिस की पांच गाड़ियां पहुंच  गयीं. फ़िर अगले दिन प्राथमिकी दर्ज करायी गयी. एक प्राथमिकी मधेसर सिंह की पत्नी की ओर से तो दूसरी प्राथमिकी दुर्गी ने कराया था.मामले को लेकर राजनीति उफ़ान पर थी. प्रदेश के बड़े-बड़े भूमिहार और दलितों एव पिछड़ों के नेता गांव पहुंचे. दुर्गी रमेश के बगैर फ़िर अकेली हो गयी थी. मधेसर सिंह की जोरु ने उसे मुख्य अभियुक्त बनाया था. मिथिलेश सिंह भी जेल में था. पूरा यादव टोला खाली पड़ा था.अनहोनी की संभावना देख सिधेसर मिसिर बेटी को लाने पहुंचे. बहुत समझाया दुर्गी को लेकिन वह नहीं मानी. कहने लगी कि अब तो यहां मेरी अर्थी ही जाएगी. गांव वालों ने भी खूब समझाया. लेकिन सब बेकार.

चन्द्रदीप यादव की पत्नी ने लाज त्यागते हुए मिसिर जी के सामने कहा कि कनिया अभी चल जा, जब समय ठीक होई त फ़िर चल अईह. मिसिर जी ने भी कहा कि अब हम तुम्हें कोई ताना नहीं देंगे. तुम हमारी बेटी हो, तुम्हारा यहां रहना ठीक नहीं है.दुर्गी को नहीं जाना था, वह नहीं गयी. वह अपने घर में हसिया, बरछी और रमेश के बाबू जी की बंदूक हमेशा अपने साथ रखती थी. वह हर शाम तूफ़ान केआने का इंतजार करती और फ़िर जागी आंखों में सारी रात गुजार देती.उस दिन रात करीब साढे ग्यारह बजे किसी ने दुर्गी का दरवाजा खटखटाया.दुर्गी ने कोठा पर चढकर देखा. कुछ पुलिस वाले खड़े थे. उपर से ही बोली क्या बात है? आप लोग इतनी रात क्यों आये हैं? दारोगा विश्वजीत सिंह ने आवाज दिया कि दरवाजा खोलो. हमें जानकारी मिली है कि तुम्हारे घर में उग्रवादी छुपे बैठे हैं. दुर्गी ने कहा कि यहां उसके अलावा कोई और नहीं है. मैं दरवाजा नहीं खोलूंगी.विश्वजीत सिंह के कहने पर पुलिस वालों ने दुर्गी के घर का दरवाजा तोड़ डाला.इससे पहले कि दुर्गी कुछ करती विश्वजीत सिंह ने उसे पकड़ लिया और जबरन जीप में डाल दिया. थाना में उसे एक कमरे में रखा गया. थोड़ी देर बाद विश्वजीत सिंह और मधेसर सिंह का बेटा समरेन्द्र सिंह कमरे में दाखिल हुए. दुर्गी ने विरोध किया. लेकिन भूखे और हिंसक लोमड़ियों का मुकाबला वह अकेले कैसे कर पाती.सुबह-सुबह उसे छोड़ दिया गया.


घर गयी. किसी से कुछ नहीं कहा. दिन भर पड़ी रही और रात के खौफ़नाक मंजर को याद करती रही, ‘कहां एक ये भूमिहार और ब्राह्मण जो कहते हैं नारी को देवी शक्ति मानते हैं और दूसरी ओर उसकी इज्जत भी लूटते हैं. इन सबसे अच्छे तो दलित और पिछड़े हैं जो कम से कमअपनी मां-बेटियों की इज्जत करना तो जानते हैं.‘दो दिनों बाद दारोगा विश्वजीत सिंह फ़िर दुर्गी के घर पहुंचा. इस बार दुर्गी ने कोई विरोध नहीं किया. दारोगा भी खुश था. उसे अपनी मर्दानगी पर नाज हो रहा था. स्साली एक बार में ही दीवानी हो गयी है. दुर्गी कमरे में एक मचिया पर बैठ गयी. दारोगा उसे बाहों में जकड़ना चाहता था. दुर्गी ने भी उसे मना नहीं किया और न ही कोई विरोध. दारोगा दुर्गी के उपर था और तभी दुर्गी ने हसिये से वार किया. दारोगा का गर्दन आधे पर लटक गया. फ़िर दुर्गी ने उसके गर्दन को पूरी तरह से अलग किया. दुर्गी हाथ में दारोगा का सिर लिए चली जा रही थी. गांव वाले बदहवास थे. भूमिहार टोले के लोग भी खामोश. इस बार किसी ने भी नहीं कहा, ‘दुर्गी’ छिनार जा रही है…’

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