1990 के बाद का हिंदी समाज और अद्विज हिंदी लेखन

प्रमोद रंजन
 संपादक,फारवर्ड प्रेस. बहुजन साहित्य की अवधारणा सहित चार अन्य किताबें प्रकाशित. ईमेल आईडी janvikalp@gmail.com

1990 का दशक वैश्विक परिदृश्य अनेक सकारात्मक-नकारात्मक परिवर्तनों का  वाहक बना था. भारत भी इससे अछूता नहीं रहा. विशेषकर उत्तर के राजानीतिक और धार्मिक जीवन में तो यह दशक एक जलजला लेेकर ही आया. मंडल कमीशन के आधार पर अन्य पिछड़ा वर्गों को आरक्षण दिए जाने (7 अगस्त, 1990), उदारीकरण की नीतियां लागू किये जाने (24 जुलाई, 1991), अयोध्या में बाबरी मस्जिद को ढाहे जाने (6 दिसंबर, 1992) ने गंगा-यमुना के मैदानों में ऐसी उथल पुथल मचायी, जिससे हिंदी पट्टी के नाम से जाने जाने वाले इन प्रदेशों का शायद ही कोई नागरिक अछूता रहा हो.

प्रोफेसर देवेंद्र चौबे ने इस घटनाक्रम की व्याख्या इस प्रकार की है ‘‘भारतीय समाज और राजनीति में मंडल कमीशन अर्थात् 1990 के बाद परिवर्तन की जो प्रक्रियाएं दिखलाई पड़ती हैं वह तो है ही, लेकिन भारतीय परिदृश्य के समानांतर अगर हम वैश्विक परिदृश्य पर नजर डालें तो साफ पता चलता है कि परिवर्तन की ये प्रक्रियाएं दूसरे विश्वयुद्ध के बाद ही शुरू हो गई थीं. जब जर्मनी और इटली में नस्ल या अफ्रीका और लैटिन अमेरिका सहित अनेक देशों में रंग के नाम पर किए जा रहे उत्पीड़न के खिलाफ उत्पीड़ित समुदाय उठ खड़ा होता है और प्रतिरोध की एक समानांतर ताकत विकसित करता है. भारतीय प्रसंग में 1947 में देश विभाजन, नई सामाजिक-आर्थिक, राजनीतिक स्थितियां भी सांस्कृतिक व्यवस्था के लिए एक प्रस्थान बिंदु था. ..1990 के बाद परिवर्तन की जो प्रक्रिया दिखलाई पड़ती है उसकी एक अंतर्धारा पहले से ही चली आ रही थी जिसकी व्यापक परिणति साहित्य और विचारधारा की दुनिया में 90 के बाद दिखलाई पड़ती है. अगर हम ध्यान दें तो पता चलता है कि इन आंदोलनों और संघर्षों ने भारतीय समाज और राजनीति के क्षेत्र में कुछ ऐसे लोगों को जन्म दिया, जिन्होंने संरचनात्मक स्तर पर बदलाव लाने की प्रक्रिया शुरू की. चाहे वह दलित प्रसंग में कांशीराम हो या नक्सलवाद के संदर्भ में चारू मजूमदार अथवा पिछड़े वर्ग के सामाजिक परिवर्तन के एक मुख्य कारक के रूप में कर्पूरी ठाकुर. इस तरह के कई और लोग अथवा नायक हैं जिन्होंने भारतीय समाज, राजनीति, विचार और उसकी संरचना को बुनियादी स्तर पर बदलने की कोशिश की. इसी का परिणाम था कि 1990 तक आते-आते एक बड़े बदलाव के संकेत दिखलाई पड़ने लगे. मंडल कमीशन को लेकर हुआ आंदोलन, बाबरी मस्जिद का ध्वंस होना और आर्थिक उदारीकरण तथा भूमंडलीकरण की प्रक्रियाएं आदि इन बदलावों के प्रत्यक्ष कारक बने.’’(1)

भूमंडलीकरण के आलोचक रहे अभय कुमार दुबे भी इस निरंतरता को रेखांकित करते हुए कहते हैं कि ‘‘पहली नजर में लगता है कि भूमंडलीकरण का यह पल अचानक कहीं से आया और हम पर हावी हो गया. लेकिन, असल में इस लम्हे के लिए धीरे-धीरे कई साल से राष्ट्रातीत और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक जमीन पक रही थी.‘ (2) अभय उन बुद्धिजीवियों को भी आड़े हाथों लेते हैं जो यह कहते हैं कि ‘‘अगर 15 अगस्त राजनीतिक आजादी का दिन माना जाएगा तो 24 जुलाई को आर्थिक आजादी का प्रतीक माना जाना चाहिए.‘‘ उनका मानना है कि यह कथित ‘‘आर्थिक आजादी परमिट कोटा राज खत्म करके ऐसा निजाम बनाने की कोशिश भर नहीं थी, जिसमें राष्ट्र और नागरिकों का लाभ सर्वोपरि होता. इस आर्थिक आजादी का मतलब न केवल भारतीय अर्थव्यवस्था का विश्व बाजार से जुड़ते चले जाना है, वरन् भारतीय वित्तमंत्री को अंतररार्ष्ट्रीय मुद्रा कोष  और विश्व व्यापार संगठन के दफ्तर में जा कर अपने कामों का हिसाब देना है. उसे अंतराष्ट्रीय रेटिंग ऐजेंसियों द्वारा दी गयी सनद पर मोहताज रहना है. इसका मतलब यह भी है कि भारतीय अर्थव्यवस्था को धीरे-धीरे अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी के रहमो-करम पर निर्भर होते चले जाना है.‘‘ (3) मीडिया शिक्षण से जुड़े आनंद प्रधान भी मानते हैं कि ‘‘मुक्त बाजार एक विचारधारा है जो ‘विचारधारा के अंत’ के बाद विश्वविजेता बन कर उभरा है. इसलिए यह मुक्त बाजार हवा में नहीं बना या बन रहा है, बल्कि भूमंडलीकरण, उदारीकरण, निजीकरण के जरिए विश्व स्तर पर और विभिन्न देशों के अंदर स्वयं को संगठित और सशक्त कर रहा है. रूप (फार्म) के स्तर पर भूमंडलीकरण का आकर्षक चोला पहने, मुक्त बाजार चाहे अपनी वल्दियत छुपाने की कितनी भी कोशिश करे, उसका सार या अंतर्वस्तु  साम्राज्यवाद की पुनःस्थापना है.’’(4)

उदारीकरण के बाद आये विभिन्न परिवर्तनों में से एक - बढ़ती अश्लीलता और घरों में बंद रहने वाली भारतीय स्त्री की छवि का टूटना भी लेखकों की चिंता का प्रमुख कारण है.  उदारीकरण के बाद फिल्म, टीवी सीरियलों व समाचार माध्यमों की प्रकृति में आये परिवर्तनों को चिन्हित करते हुए समरेंद्र सिंह कहते हैं कि ‘‘उदारीकरण और ध्रुवीकरण के प्रभाव में स्त्री के बचे-खुचे स्वाभिमान और सम्मान को उससे छीन लिया गया और उसे ‘सेक्सी-सेक्सी‘ और मस्त-मस्त चीज में परिवर्तित कर दिया गया.‘‘(5)  इसी क्रम में अरूण कुमार त्रिपाठी कहते हैं कि ‘‘डांस बारों की लड़कियों में ज्यादा संख्या उनकी है जो या तो दलित हैं या फिर नट जैसी नाचने-गानेवाली आदिवासी (घुंमंतु) जातियां हैं... गरीब वर्गों के पारंपरिक व्यवसाय के खत्म होते जाने और उदारीकरण के दौर में स्त्रियों पर देह-प्रदर्शन और देह-व्यापार का दबाव बढा है.‘‘(6)

इसी दौर में लागू हुए मंडल कमीशन के बारे में ख्यात वामपंथी कथाकार भीष्म साहनी कहते हैं कि ‘‘जिस ढंग से आपने इन नौकरियों की बात उठाई है, आप इन्हें कुछ नौकरियां दे भी देंगे तो क्या सचमुच इनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति में अंतर आएगा? हां! इसका लाभ एक जरूर होगा कि ये लोग अपने अधिकारों के प्रति अधिक सचेत हो जाएं और शायद इनमें किसी हद तक एकजुटता भी आए, पर इनका उत्पीड़न करने वाले तत्व भी अधिक उत्तेजित हो उठेंगे. तब पिछड़े हुए गांवों में इनकी रक्षा कौन करेगा? इन नौकरियों से इनकी आर्थिक स्थिति कितनी मजबूत हो जाएगी कि वे इस उत्पीड़न का डटकर मुकाबला कर सकेंगे? आपने जल्दबाजी में जो कदम उठाया है उसका एक नतीजा तो जरूर निकलेगा कि हमारे समाज में जात-पात का जंतु और अधिक खूंखार बनेगा....इस स्थिति में यही बेहतर होगा कि इस समय मंडल कमीशन की सिफारिशों के क्रियान्विति को स्थगित किया जाए.’’  (7) वे आरक्षण का विरोध करने वाले संगठनों के सुर में सुर मिलाते हुए कहते हैं कि ‘‘सवाल ऊंची या नीची जात का नहीं है, हमारा देश, अपनी अनगिनत कमजोरियों-बुराइयों के बावजूद अपने पिछड़ेपन से जूझ रहा है, हमारे विद्यार्थी कड़ी मेहनत करते हैं, शिक्षा के क्षेत्र में होड़ बढती जा रही है, पढाई का बोझ बच्चों पर उत्तरोत्तर बढता जा रहा है. उस स्थिति में हमारा कोई अधिकार नहीं है कि हम किसी योग्य विद्यार्थी को उसकी संभावनाओं से वंचित करें. समाज को उनके प्रति भी उतना ही बड़ा दायित्व है जितना उन पिछड़ी जातियों के प्रति जो शताब्दियों से उपेक्षित और वंचित रही हैं. पर आप एक के मुंह से कौर छीनकर दूसरे के मुंह में डालें, इसका तो आभास मात्र भी देना गलत है.’’ (8) ख्यात मार्क्सवादी आलोचक रामविलास शर्मा कहते हैं कि क्या ‘‘कुछ बिरादरियों को संगठित करने से क्या जात-बिरादरीवाद खत्म हो सकता है? हमारा कहना है यह है कि इसे खत्म करने के लिए वर्ग के आधार पर लोगों को संगठित करना चाहिए. गरीब किसानों को जाति के आधार पर विभाजित करने से किसको लाभ होता है? इसे धनी किसानों और पुराने जमींदारों का लाभ होता है.’’  (9)जबकि नामवर सिंह कहते हैं कि ‘‘जबसे आरक्षण चला है, तब से जातिवाद बढ़ा है‘‘.(10)



इसी प्रकार दक्षिणपंथ के हिमायती माने जाने वाले ख्यात कथाकार शैलेश मटियानी मंडल कमीशन की अनुशंसाओं को लागू किये जाने पर में कटू शब्दों का प्रयोग करते हुए कहते हैं कि ‘‘मंडल आयोग की सबसे भयानक विसंगति ही यही है कि इसने जाति व्यवस्था की टूटती दीवारों को नए सिरे से अभेद्य बनाए जाने की दुरभिसंधि का रास्ता खोला है. आर्थिक आधार पर आरक्षण से इंकार, स्पष्ट है कि उद्देश्य सिर्फ जातियों के वोटों के धनाढ्य सौदागरों के निहित स्वार्थों की पूर्ति है-पिछड़ी जातियों को सामाजिक परिप्रेक्ष्य में आगे लाना नहीं. पिछड़ी जातियों के धनाढ्यों के मोहनों के लिए भी आरक्षण और सवर्ण जातियों के लल्लुओं तक को साफ इंकार के द्वारा मंडल आयोग ने सामाजिक न्याय के सारे पाखंड को खुद ही उजागर कर दिया है. वास्तविकता यह है कि मंडल आयोग की निष्पत्तियां सामाजिक न्याय नहीं, बल्कि जातीय घृणा और प्रतिशोध की तर्क प्रणालियों पर आधारित हैं. ढाई हजार वर्षों का बदला चुकाने की सारी विकल्पविह्वलता सामाजिक परिवर्तन का जातिवादी निदान खोज निकालने के उस लल्लूचिंतन की उपज है, जिसे सामाजिक न्याय का मुखौटा ओढ़ाया गया है. जाति आधारित बंदरबांट को सामाजिक न्याय की संज्ञा देना सामाजिक न्याय का माखौल उड़ाना है.’’(11)

उपरोक्त उद्धरणों में हम देखते हैं कि भारतीय राजनीति और सामाजिक जीवन को गहराई से प्रभावित करने वाले इन जटिल बदलावों को सभी सामाजिक पृष्ठभूमि से आने वाले हिंदी साहित्यकारों ने अपने-अपने तरह से गहराई से रेखांकित किया है. लेकिन इन विश्लेषणों में प्रायः उनके सामुदायिक हित हावी रहे हैं. अधिकांश द्विज लेखकों ने इसके अश्लीलता और धर्मनिरपेक्षता वाले पक्ष पर अधिक बल दिया है तथा ‘बाजार के प्रभुत्व‘ से आक्रांत रहे हैं. मंडल कमीशन का जिक्र आते ही इनके भवें तन जाती हैं. भीष्म साहनी, शैलेश मटियानी, रामविलास शर्मा, नामवर सिंह जैसे अनेक बड़े द्विज लेखक भी इस मामले में विचारधारओं की सीमा-रेखा मिटा देते हैं तथा मंडल कमीशन का पुरजोर विरोध करते हैं. हालांकि द्विज लेखकों में इसके ऐसे अपवाद भी मौजूद हैं, जिन्होंने अपने सामुदायिक हितों से इतर जाकर भी सामाजिक न्याय का पक्ष लिया है. लेकिन सामान्यतः इस तबके से आने वाले प्रमुख लेखक अपने लेखन में एक ओर जहां ‘धर्म निरपेक्ष‘ हैं तथा मंदिर आंदोलन के विरोधी हैं वहीं वे बाजार व्यवस्था से नफरत करते हैं. इसी प्रकार वे मंडल कमीशन की अनुशंसाओं के लागू होने को समाज में एक किस्म के उत्पात की शुरूआत मानते हैं.

दलित व पिछड़े वर्ग के लेखकों का मत

1990 के बाद का दशक दलित साहित्य के तेज उभार का भी दशक है, जिसके पाश्र्व में फुले-आम्बेडकरवाद और अर्जक संघ-बामसेफ के आंदोलनों के साथ-साथ मंडल आंदोलन की उर्जा भी काम कर रही थी, जिसका प्रतिबिंब ‘हंस’ के पन्नों पर भी दिख रहा था. प्रेमकुमार मणि बताते हैं कि ‘‘हिंदी में दलित साहित्य की चर्चा 1980 के बाद तीव्र हुई. 1990 में मंडल आंदोलन के बाद राजनीति में जब जाति विमर्श शुरू हुआ, तब साहित्य में यह विमर्श तीव्रतर हुआ’’(12)
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इन दोनों तबकों - दलित और ओबीसी- से आने वाले लेखकों में 1990 के बाद हुए सकरात्मक परिवर्तनों को श्रेय अपने तबके रखने की होड़ भी दिखती है. मसलन, कंवल भारती कहते हैं कि ‘‘साहित्य और राजनीति का विकास होता है सामाजिक आंदोलन से, किंतु दलित आंदोलन की तरह या उसके समानांतर पिछड़े वर्गों का कोई आंदोलन देशव्यापी नहीं हो सका. मंडल आंदोलन भी दलित आंदोलन का ही हिस्सा था. ओबीसी ने इस आंदोलन में भाग तक नहीं लिया था.‘‘(13)  तो, अन्य पिछड़ा वर्ग से आने वाले आलोचक चौथीराम यादव कहते हैं कि ‘‘देश में जितने भी सांस्कृतिक आंदोलन हुए, उनमें ओबीसी नायकों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रही है....शुरूआत में दलित आंदोलन और दलित साहित्य का ओबीसी नायकों ने विकास किया. इसे अगर देश के स्तर पर देखें तो जोतिबा फुले ओबीसी थे. शाहू जी महाराज ओबीसी थे. पेरियार ओबीसी थे और उत्तर भारत में ललई सिंह यादव, रामस्वरूप वर्मा और सभी लोग दलित आंदोलन के मजबूत पक्षधर थे. इन लोगों ने आंदोलन चलाया और उसको आगे बढ़ाया.‘‘(14)

इन दावों-प्रतिदावों से इतर एक बात जो स्पष्ट दिखती है वह यह है कि 1990 के दशक में हुए परिवर्तनों पर इन तबकों - विशेषकर अन्य पिछड़ा वर्ग और दलित समुदाय - से आने वाले लेखकों की राय द्विज लेखकों की तुलना में अनुपातिक रूप से कहीं अधिक सकारात्मक है. उनकी नजर उदारीकरण के नकारात्मक परिवर्तनों के साथ-साथ इस पर भी रहती है कि खुली अर्थव्यस्था भारतीय समाज की जकड़न को भी तोड़ेगी. वे जहां बाबरी मस्जिद के विध्वंस पर चिंतित होते हैं वहीं यह भी रेखांकित करते हैं कि मंडल आयोग की अनुशंसाएं लागू होने के बाद जमीनी स्तर पर सामाजिक परिवर्तन की लहर चलने लगी है. वे यह भी चिन्हित करते हैं कि इस प्रक्रिया में उपभोक्तवाद की बुराइयों के साथ-साथ भारतीय समाज में आधुनिकता की बयार भी आ रही हैै. वे एक ओर इसे लोकतंत्र द्वारा वंचित तबकों के लिए किये जाने वाले कल्याणकारी कामों में बाधक व ‘आरक्षण‘ पर लटकी तलवार की तरह देखते तो दूसरी ओर इसके चाल-चलन को देसी सामंत-पूंजीवाद से मुक्ति का साधन भी मानते है.

उदारीकरण पर अद्विज वैचारिकी की बहुआयमिता को अन्य पिछड़ा वर्ग से आने वाले समाजशास्त्री योगेंद्र यादव के लेखक की बानगी से से समझा जा सकता है. वे 1990 के दौर में हुए परिवर्तनों को ‘मकार’ का नाम देते हुए कहते  हैं कि उस दौर में ‘‘राष्ट्रीय क्षितिज पर एक साथ तीन मकार उभरे. यह सोवियत संघ के विघटन का भी समय था, जिसने भारतीय समाज में समाजवादी मुहावरे का बोलबाला कर दिया था. ये तीन मकार हैं, मंडल, मंदिर और मार्केट. विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार ने अगस्त, 1990 में जब अचानक पिछड़ों के लिए आरक्षण की सिफारिशों को लागू कर दिया तब मंडल पिछड़ों के उस आंदोलन का पर्याय बन गया. मंदिर से तात्पर्य संघ परिवार के रामजन्मभूमि आंदोलन से है, जिसकी परिणति छः दिसंबर, 1992 को बाबरी मस्जिद ध्वंस में हुई. तीसरा मकार यानी मार्केट से आशय आर्थिक उदारीकरण और भूमंडलीय अर्थव्यवस्था से जुड़ी नीतियों से है....इन तीन मकारों के कारण राजनीतिक विमर्श में बुनियादी बदलाव आया. यह बदलाव किस हद तक था इसे सैद्धांतिक शुद्धतावाद की पैरोकार कम्युनिस्ट पार्टियों की सोच में आये कुछ परिवर्तनों से समझा जा सकता है. अनेक दशकों तक वर्ग संघर्ष के सिद्धांत से बंधी रही भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने मंडल आंदोलन के बाद यह सच्चाई मान ली कि भारतीय समाज में सामाजिक असमानता की जनक जाति भी है.’’(15)  योगेंद्र यादव तथ्य की ओर भी ध्यान दिलाते हैं कि स्वदेशी का नारा लगाने वाली भाजपा ने भी चुपचाप उदारीकरण की नीतियां अपना लीं तथा ‘‘मंडल आयोग के खिलाफ प्रदर्शनों को उकसाने के बावजूद भाजपा ने आधिकारिक रूप से उसे स्वीकार कर लिया तथा वह लगातार संगठन के भीतर पिछड़े वर्गों के उभार को समायोजित करने की भरसक कोशिशों में लगी हुई है.‘‘ (16) योगेंद्र इन सकरात्मक परिवर्तनों के खतरों पर भी नजर रखते हैं. उनका मानना है कि इसने ‘‘अब तक वंचित रहे जिन लोगों को राजसत्ता तक पहूंचाया है, उन्हें शायद अंत में पता चले कि इतिहास ने एक बार फिर उन्हें धोखा दे दिया है.’’ (17) हंस के संपादक राजेंद्र यादव इसमें एक और आयाम जोड़ते हैं तथा इसके साथ उदारीकरण के आगमन को पूंजी और अपराध के गठजोड़ के रूप देखते हैं. वे महसूस करते हैं कि इससे समाज में स्मृतिलोप बढ़ रहा है. 1995 में हुए एक चर्चित हत्यांकांड का हवाला देते हुए हंस के सितंबर, 1995 अंक में वे कहते हैं कि ‘‘पिछले डेढ़ महीने से भारतीय राजनीति पर नैना साहनी या तन्दूर कांड छाया हुआ है. सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी का सक्रिय सदस्य और युवा कांग्रेस का अध्यक्ष सुशील शर्मा मुख्य अभियुक्त है. उसने अपनी ‘पत्नी’ नैना साहनी की गोल मार्केट स्थित फ्लैट में हत्या की और लाश के टुकड़े करके अपने मित्र के ‘बगिया‘ रेस्त्रां में उन टुकड़ों को मक्खन लपेट-लपेटकर तन्दूर में जलाने की कोशिश की. सब्जी बेचने वाली एक महिला ने इस कांड की सूचना पुलिस को दी और ‘अशोक यात्री निवास’ के अधिकारियों की धर-पकड़ शुरू हुई, लाश को पुलिस ने कब्जे में ले लिया. पिछले दिनों, महीने भर बाद उसका दाह-संस्कार कर दिया गया. उधर सुशील शर्मा फरार होकर मद्रास में प्रकट हुआ, जहां उसने कोर्ट से जमानत ले ली. बाद में उसे गिरफ्तार करके दिल्ली लाया गया. अब यहां पर उस पर हत्या का मुकदमा चल रहा है. यह सब मैं इसलिए लिख रहा हूं कि एक से एक भयानक घटनाओं के सिलसिले के बीच अगले किसी कांड के आते ही हम सब यह भूल जाएंगे और साल-छह महीने बाद याद करना भी मुश्किल होगा कि नैना साहनी कौन थी. पटना के बाॅबी या भागलपुर के पापिया बोस हत्याकांड, या लातूर के सेक्स स्कैंडल को आज हम कहां याद रख पाते हैं? फिर हम आर्थिक राजनैतिक और सत्ता की जिन आपराधिक और रोमांचक प्रचंडताओं में जी रहे हैं, वहां अभी और भी बड़े-बड़े कांड देखने हैं. यहां पैंसठ करोड़ का बोफोर्स घपला देश की सत्ता बदल सकता था वहां आज बीस-बीस हजार करोड़ खाकर नेता डकार नहीं ले रहे. भ्रष्टाचार की यह अभूतपूर्व सामाजिक स्वीकृति सचमुच हमें स्वर्णयुग में ले आई है. आर्थिक उदारीकरण के तहत सुविधाओं और सपनों के फ्लडगेट (परनाले) खोले जाएंगे तो भ्रष्टाचारों और अपराधों की बाढ़ तो आएगी ही. यह ग्लोबल फिनोमिना है.‘‘(18)

लेकिन राजेंद्र यादव मंडल आंदोलन के मुद्दे पर कहते हैं कि ‘‘आरक्षण अगर नहीं होगा, तो दलित और स्त्री सामाजिक न्याय की लड़ाई कैसे लड़ेंगे? यह असमान शक्तियों की लड़ाई है. कमजोरों को ताकतवरों से लड़ने के लिए कोई तो सहारा चाहिए. जिसको आपने कभी बढ़ने नहीं दिया, जिनको आपने कभी अवसर नहीं, उन्हें शिक्षा और नौकरियों आदि में आरक्षण नहीं मिलेगा, तो वे कभी आगे आ ही नहीं सकते. अगर आप कहेंगे कि पहले शिक्षा लो, पहले मेरिट लाओ, पहले काम का अनुभव लाओ, तब तो आप इन चीजों की दौड़ से उनसे इतना आगे निकल चुके होंगे और इनका स्वरूप इतना बदल चुके होंगे कि वे तो आपके बराबर कभी आ ही नहीं सकते. जब तक आप अवसर नहीं देंगे, वे आगे नहीं आ सकते.’’(19)


योगेंद्र और राजेंद्र यादव से आगे बढ़ते हुए दलित लेखक कंवल भारती 90 के दशक में देश में हुए अनेक ऐसे परिवर्तनों का भी उल्लेख करते हैं कि जो प्रायः इस विषय पर विचार करने वाले लेखकों की नजरों से ओझल रह जाते हैं. वे बताते हैं कि ‘‘भारतीय राजनीति में 1990 का दशक सामाजिक न्याय और सामाजिक परिवर्तन का दशक माना जाएगा, क्योंकि इसी दशक में मंडल आयोग की शिफारिशें लागू हुईं और दलित-पिछड़ी जतियों को शासन में भागीदारी हासिल हुई. इसी दशक में दलित राष्ट्रपति का मुद्दा भारतीय राजनीति में गर्म हुआ और इसी दशक में दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों का राजनैतिक ध्रुवीकरण अस्तित्व में आया. उत्तर प्रदेश में दलित महिला को मुख्यमंत्री और केंद्र में पिछड़े वर्ग की सरकार बनाने वाला भी यह दशक है और अति दलितों तथा महिलाओं के लिए पृथक आरक्षण की मांग भी इसी दशक में मुखर हुई. भारतीय राजनीति में 1990 का दशक ही हिंन्दुत्व के आंदोलन का भी दशक है. इसी दशक में राममन्दिर का धर्मोन्माद पैदा हुआ और राम रथ की यात्राएं निकलीं. इसी दशक में हिंदू लहर ने आयोध्या की बाबरी मस्जिद तोड़ा और सारे भारत का सामाजिक सद्भाव बिगाड़ा.‘‘(20)

भारती जी की स्थापना है कि ‘‘सामाजिक परिवर्तन और हिंदुत्व का आंदोलन दोनों आकस्मिक घटनाएं नहीं हैं, वरन् इन दोनों के बीच गहरा संबंध है. ये दोनों क्रांति और प्रतिक्रांति की घटनाएं हैं. स्थापित व्यवस्था के विरूद्ध दलित-पिछड़ी जातियों की क्रांति ने सामाजिक परिवर्तन को जन्म दिया और उनके विरूद्ध भारतीय जनता पार्टी, विश्व हिंदू परिषद् तथा अन्य संगठनों ने हिन्दुत्व का आंदोलन चलाकर प्रतिक्रांति की.’’(21)

हिंदी में अनुदित और समादृत हो चुके मराठी लेखक शरणकुमार लिंबाले भी इस दौर में हिंदुत्व के उभार पर चिंता जताते हुए कहते हैं कि ‘‘उन्होंने राम मंदिर का प्रश्न उठाकर लोगों को इमोशनली ब्लैकमेल किया. बाबरी मस्जिद के ध्वस्त होने से लेकर गुजरात के दंगों तक का दौर उग्र हिंदुत्व का है. इस दौरान प्रगतिशील हिंदुओं ने मौन साध लिया.’’(22)

अन्य पिछड़ा वर्ग से आने वाले आलोचक हरिनारायण ठाकुर मंडल कमीशन के लागू होने को बड़ा परिवर्तनकारी  मुकाम बताते हुए लिखते हैं कि ‘‘निश्चय ही यह क्रांति दलित और पिछड़ों के इतिहास में सबसे बड़ी क्रांति थी, जिससे देश में न केवल राजनीतिक बदलाव आया, बल्कि दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यकों की बहुत बड़ी तादाद एक मंच पर दिखाई पड़ने लगी. इससे इन वर्गों में मनो-सामाजिक स्तर भी बदलाव आने लगे.’’(23)  इस प्रकार हम देखते हैं कि दलित और अन्य पिछड़ा वर्ग से आने वाले लेखक उदारीकरण के सकरात्मक-नकारात्मक -दोनों पहलुओं को रेखांकित करते हैं. लेकिन मंदिर आंदोलन के विरोध और मंडल आंदोलन के समर्थन में उनमें कोई मतभेद नहीं है.

आदिवासी लेखकों का रूख

आदिवासी समुदाय से आने वाले अधिकांश लेखक 90 के दशक में हुए परिवर्तनों से अपने सामुदायिक हितों को हुए भयवाह नुकसान का जिक्र करते हैं तथा अपनी संस्कृति पर हो रहे हमले से बेचैन तथा उसकी रक्षा के लिए चिंतित हैं. वे भी इन नीतियों को आक्रामक और अराजक तरीके लागू किये जाने पर कड़ी आपत्ति दर्ज करते हैं. इस प्रसंग में यह उल्लेखनीय है कि अन्य पिछड़ा वर्ग और दलित लेखकों की तुलना में आदिवासी लेखकों द्वारा किया गया उदारीकरण का विरोध न सिर्फ बहुत तीखा है बल्कि इस मामले में उनके विचार उपरोक्त तबकों के लेखकों से काफी अलग हैं. वे इसे आदिवासी समुदाय के विनाश की परियोजना के रूप में देखते हैं. दरअसल, हिंदी में आदिवासी साहित्य का प्रादूर्भाव का एक प्रमुख उद्देश्य उदारीकरण का प्रतिकार भी रहा है. जैसा कि आदिवासी साहित्य को परिभाषित करते हुए गंगा सहाय मीणा का भी निष्कर्ष है कि ‘‘1991 के बाद आर्थिक उदारीकरण की नीतियों से तेज हुई आदिवासी शोषण की प्रक्रिया के प्रतिरोधस्वरूप आदिवासी अस्मिता और अस्तित्व की रक्षा के लिए राष्ट्रीय स्तर पर पैदा हुई रचनात्मक उर्जा आदिवासी साहित्य है.’’(24)  आदिवासी साहित्य को और व्याख्यायित करते हुए आदिवासी लेखिक वंदना टेटे लिखती हैं कि ‘‘आधुनिक आदिवासी साहित्य, जिसकी काल-परिधि औपनिवेशिक दिनों को छूती है, मूल रूप से असहमति का सृजन है. आदिवासी समाज उन मूल्यों से असहमत है, जिससे दुनिया को अंततः नष्ट होना है. वह दुनिया को बचने के लिए सृजन कर रहा है. उसकी चिंताओं में पूरी सृष्टि, समष्टि और प्रकृति है. जिसका एक प्रमुख अंग इंसान भी है. आदिवासी साहित्य के केंद्र में इंसान है ही नहीं. वहां समष्टि है, प्रकृति है, समूची दुनिया है.‘‘(25)


पूरी दुनिया, समष्टि के बचाव के लिए फिक्रमंद आदिवासी दर्शन कथित भूमंडलीकरण की मार से किस प्रकार लहुलुहान हुआ है, इसे युवा आदिवासी लेखक ग्लैडसन डुंगडुंग इस प्रकार बयान करते हैं ‘‘आर्थिक उदारीकरण के बाद देश में विदेशी पूंजीनिवेश बढ़ता गया और नक्सलवाद दलित बस्तियों से निकलकर आदिवासियों के गांवों में पहुंच गया. इसी बीच झारखण्ड एवं छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों की स्थापना हुई जहां देश की आकूत खनिज संपदा मौजूद है. इन राज्यों की सरकारों ने औद्योगिक घरानों के साथ एम.ओ.यू. की झड़ी लगा दी है लेकिन आदिवासी समाज के बीच मानव संसाधन का विकास नहीं किया. फलस्वरूप, औद्योगिकरण आदिवासियों के विनाश का कारण बनता जा रहा है.’’(26)

आदिवासी कवियत्री निर्मला पुतुल अपनी एक कविता में बाजार के प्रलोभनों दुष्प्रभावों का प्रतिकार करते हुए कहती  हैं -‘‘ऐसे में जब बाजार से गुजरते/एक गिलास पानी मिलना कठिन हो गया है/ और पेप्सी आसान/नहीं चाहकर हम आसान रास्ते अपना लेते हैं दोस्त! और वे लोग/जो हमारे भीतर/जल-जंगल-जमीन बचाने का जज्बा देखते हैं/झारखण्डी अस्मिता और देशज संस्कृति तलाशते हैं/उन्हीं की संगति ने हमारी भाषा बिगाड़ दी/और प्यास बुझाने के लिए/पेप्सी और स्प्राइट का चस्का लगा दिया.’’(27)

आदिवासी लेखिका रोज केरकेट्टा की चिंता है कि ‘‘बीसवीं सदी के अंतिम दशकों से झारखंड में भी वैश्वीकरण की नीति को स्वीकार कर लिया गया है विरोध का स्वर भी उठा है परंतु स्वर को सुनने के लिए आधुनिक कान तैयार नहीं हैं. अतः यहां की राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक स्थिति में तेजी से परिवर्तन एवं गिरावट आ रही है....20वीं सदी में शहर और गांव के बीच की खाई चौड़ी हुई है और 21 वीं सदी में यह खाई ज्यादा चौड़ी और गहरी हो जाएगी.‘‘(28)  वे कहती हैं कि ‘‘भूमंडलीकरण स्त्रियों के हित में नही है. यह झारखंडी महिलाओं के हित में और भी नहीं है....हमें इन निरीह महिलाओं और बच्चियों के लिए सोचने और काम करने की जरूरत है.’’(29)  रोज केरकेट्टा के सरोकारों को तथ्यों से पुष्ट करते हुए आदिवासी पत्रकार हेराल्ड एस. तोपनो बताते हैं कि ‘‘आदिवासी बच्चों की मृत्युदर अचानक बढ़ गई है. कई घातक बीमारियों ने भी आदिवासियों को विलुप्त होने के कगार पर ला खड़ा किया है. चेंचु जो एक प्राचीन जनजाति है, वह जल्दी ही खत्म हो जाएगी. 1981 की जनगणना के मुताबिक चेंचु जनजाति के सिर्फ 39 सदस्य कोरापुट, गंजाम और सुंदरगढ़ जिले में थे. संबंलपुर और सरगुजा क्षेत्र में केवल 142 बिरहोर जनजाति के लोग थे. बैगा आदिवासियों की संख्या केवल 188 थी, जो कोरापुट, सुंदरगढ़ ईलाके रह रहे हैं. मनकिड़िया एक घुमंतु (नोमाड) जनजाति है, जो मयुरभंज और क्योंझर जिले में निवास करते हैं. वे बंदरों का शिकार कर जीविकोपार्जन करते हैं. इनकी जनसंख्या मात्र 200 है. कोरवा और धारा जनजातियां 1000 हैं. इन लुप्त होती जा रही जनजातियों को बचाने और उनकी जनसंख्या वृद्धि के लिए सरकार कोई भी ठोस कदम नहीं उठा रही है.‘‘(30)

मत-मतांतर 

विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सीएसडीएस) ने 1996 और 1998 के आम चुनावों के बाद उदारीकरण/निजीकरण के बारे में मतदाताओं की राय जानने के लिए एक सर्वेक्षण किया था. इस सर्वेक्षण का मुख्य उद्देश्य यह जानना था कि क्या कांग्रेस सरकार द्वारा शुरू की गयी नयी आर्थिक नीतियां चुनावी मुद्दा बन सकी हैं. इस सर्वेक्षण के नतीजे बड़े रोचक थे. इस सर्वेक्षण के बारे सीएसडीएस के प्रोफेसर संजय कुमार बताते हैं कि 1998 तक ‘‘पचास प्रतिशत से भी ज्यादा आदिवासी यह बता पाने की स्थिति में नहीं थे कि विदेशी कंपनियों को व्यापार की खुली छूट दी जानी चाहिए या नहीं. कुछ आदिवासियों में जो इस मुद्दे पर अपनी राय रखते हैं, केेवल 15 प्रतिशत इसके पक्ष में थे कि भारत में विदेशी कंपनियां खोली जानी चाहिए. दलित मतदाताओं की राय भी कुछ इसी तरह की रही. इस मुद्दे पर सबसे अधिक मतभेद ऊंची जाति के मतदाताओं में रहा. साथ ही इस नीति के सबसे बड़े समर्थक भी इसी वर्ग से रहे. अगर हम अन्य पिछड़ा वर्ग के मतदाताओं को देखें तो पाएंगे कि पचास प्रतिशत से कुछ कम लोग इस मामले में अपनी कोई राय ही नहीं रखते, साथ ही सहमत लोगों से असहमत लोगों की संख्या भी अधिक निकाली...सुधार नीतियों के प्रति असहमति भाव सबसे अधिक आदिवासी समुदाय में ही है.‘‘(31)

आम मतदातओं के बीच किए गये इस सर्वेक्षण के आंकड़ों का मिलान इन तबकों से आने वाले विद्वान लेखकों के मतों समक्ष रख कर किया जाए तो इन तबकों के सामुदायिक हितों की भी एक कामचलताऊ तस्वीर बनती है. जाहिर है आम मतदाताओं की तुलना में लेखकगण इन हितों को बेहतर समझते हैं तथा चुंकि उन पर अपने लोगों को दिशा देने की जिम्मेवारी भी है, इसलिए वे न सिर्फ उदारीकरण से हुए परिर्तनों की बारीकियों में जाते हैं बल्कि इससे होने वाले अपने सामुदायिक नफा-नुकसान की विस्तृत समालोचना भी करते हैं.

आदिवासी लेखकों के उदारीकरण से असहत मतों के समांतर दलित और पिछड़े समुदाय से आने वाले प्रमुख लेखकों का मानना है कि 1990 के दशक में जो परिवर्तन हुए - विशेषक नई आर्थिक नीति के संदर्भ में - उनसे अद्विज समाज को नुकसान ही नहीं, फायदा भी हुआ है. ऐसे लेखकों का मानना है कि उदारीकरण ने व्यक्ति स्वतंत्र्य को बढ़ावा दिया है. बंद बाजार व्यवस्था में आर्थिक गतिविधियों पर द्विज वर्चस्व बना रहता है तथा अद्विजों को अपने श्रम और व्यापारिक कौशल को अभिव्यक्त करने का अवसर ही नहीं मिलता है. इसके विपरीत निजीकरण तथा भारतीय बाजार के दरवाजे विदेशों के लिए भी खोल देेने से एक ऐसी प्रतिद्वंद्विता का दबाव पैदा होता है, जिससे अद्विज तबकों के भी लाभान्वित होने की संभावना बढ़ जाती है. मसलन, अन्य पिछड़ा वर्ग से आने वाले  प्रेमकुमार मणि उदारीकरण के विरोध को एक पक्षीय मानते हैं. अपने एक लेख में वे उस दौरान के परिदृश्य को चित्रित करते हुए बताते हैं कि उदारीकरण के साथ ही ‘‘राज्य संपोषित अथवा केन्द्रित अर्थव्यवस्था, अब बाजार केन्द्रित, मार्केट सेन्ट्रिक हो गयी थी. अचानक हुई इस उलट-पुलट ने दलित-पिछड़ों को भौंचक कर दिया. उन्हें यह लगा कि उनके सामूहिक हितों, कलेक्टिव इंटरेस्ट की धज्जियां उड़ा दी गयी है . सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम एक-एक कर उखड़ने लगे और एनडीए राज में जब व्यापक विनिवेश नीति अपनाई गयी तब ऐसा लगा कि बहुजनों का मटिया-मेट हो जायेगा.


यह वह समय था जब बहुजनों की पहली या दूसरी पीढ़ी स्कूल जा रही थी. अंग्रेजी पर इस तबके की पकड़ मजबूत नहीं थी और ज्यादा से ज्यादा एक छोटा वर्नाकुलर लिटरेट तबका बन सका था, जिसके ज्यादातर लोग सरकारी नौकरियों में थे. उदारीकरण के बाद इनके बीच निराशा की स्थिति थी क्योंकि सरकारी नौकरियां घटने लगी थीं. दलित-पिछड़ों के बीच यह बात चर्चा में थी कि सत्ता में बैठे ब्राह्मणों ने षडयंत्र किया है. आरक्षण ने सरकारी नौकरियों में उनकी भागीदारी को संकुचित किया तो उन्होंने विश्वामित्र की तरह एक अभिनव स्वतंत्र बाजार की संरचना कर डाली. यह बाजार उच्चे तबके अर्थात सवर्णों का अभयारण्य है, ऐसा प्रचारित हुआ.
ल्ेकिन क्या यह दृष्टि का केवल एक कोण ही नहीं है?’’ (32) वे मानते हैं कि ‘‘अभी संक्रमण काल है और इसकी मुश्किलें हैं. बहुजन बाजार के बीच उपभोक्ता के रूप में खड़ा है, लेकिन उपभोक्तावाद की हाय-तौबा वह नहीं मचा रहा है. वह बाजार का अध्ययन कर रहा है. उसमें घुसने की तैयारी कर रहा है. ग्लोबल इकॉनॉमी ने इंडियन इकोनॉमी के ब्राह्मणवादी चरित्र को खारिज कर एक अनुकूल स्थिति का सृजन किया है.‘‘(33)

उदारीकरण का मुखर समर्थक दलित लेखक चंद्रभान प्रसाद भी इसी प्रकर के तर्क उदारीकरण के समर्थन में रखते हुए कहते हैं कि ‘‘उदारीकरण और वैश्वीकरण या नव पूंजीवाद ही सदियों से शोषण, दमन और भेदभाव का शिकार बने दलितों की मुक्ति की राह है. भारत में 1990 से लागू हुई नवउदारवादी नीतियां जातीय विषमता को खत्म करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं.‘‘ (34) प्रसाद अपने दावे की पुष्टि के लिए इस संबंध में हुए सर्वेक्षणों का भी हवाला देते हैं. वे बताते हैं कि ‘‘अमेरिका के पेनीसिल्वानिया विश्वविद्यालय सेंटर फार एडवांस्ड स्टडीज आॅफ इंडिया के वित्तीय सहयोग से हुए सर्वेक्षण में उत्तर प्रदेश के 20000 परिवारों का सर्वे किया गया और पाया कि दलितों की स्थिति में बदलाव हुआ है. आजमगढ़ के ग्रामीण इलाकों में अब पहले की तुलना में ज्यादा दलित दूल्हे बारात में कार में बैठकर जाते हैं.

प्रसाद के मुताबिक इस परिवर्तन की वजह यह है कि अब दलितों की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ है और वे बेहद गरीबी के दलदल से बाहर निकल आए हैं. अब उन्हें रोजाना जमींदारों के हाथों अपमानित भी नहीं होना पड़ता. अब उन्हें जमींदार के लिए बेगार भी नहीं करनी पड़ती. ... धीर-धीरे ही सही दलितों की परंपरागत पेशों से ही जुड़े रहने की मजबूरी खत्म हो रही है.‘‘(35)

चंद्रभान जिस सर्वेक्षण का हवाला देते हैं वह आजमगढ़ के गांवों में किया गया था. जिन गांवों में यह किया गया था. उन गांवों के बारे में उनका दावा है कि ‘‘वहां एक महत्वपूर्ण परिवर्तन यह देखने को मिला कि खेती करने में सदियों से चली आ रही बैलगाड़ी का इस्तेमाल बंद हो गया है. दलितों ने खेतिहर मजदूर के तौर पर काम करना बंद कर दिया है. इसलिए किसान ट्रेक्टर खरीदकर या किराए पर लेकर अपना काम चलाते हैं. कुछ खेती करनेवाले दलित परिवारों के पास अपने ट्रैक्टर हैं. अब दलित मरे हुए जानवरों को उठाने का काम भी कम ही करते हैं. अब ऊंची जाति के लोग उनसे यह काम जबरदस्ती नहीं करवा सकते. इतना ही नहीं दलितों के खानपान में आर्थिक स्थिति सुधरने के कारण बदलाव आने लगा है. अब वे अच्छा अनाज और दाल आदि खाने में सक्षम हैं... इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि समाज में बढ़ती समृद्धि ने दलितों को भी आर्थिक रूप से सशक्त बनाया है और यह प्रक्रिया जारी है. इसमें नवउदारवाद ने अहम् भूमिका निभाई है. ..अगले पचास सालों में जाति खत्म भले ही न हो लेकिन आर्थिक गतिविधियों का प्रसार उसे बेअसर जरूर बना देगा.‘(36)


बहुजन वैचारिकी के उपरोक्त्त लेखकों के साथ-साथ दक्षिणपंथ से जुड़े रहे दलित लेखक रामशंकर कठेरिया भी यही बात मानते हैं. हालांकि उनका संगठन एक समय ‘स्वदेशी’ के प्रचार में जोर शोर से लगा था लेकिन अपनी किताब में वे कहते हैं कि ‘‘भूंडलीकरण के इस दौर में वैज्ञानिक और तकनीकी दृष्टि से जो विकास हुआ है, आधुनिकीकरण जिस प्रकार चारों ओर साफ तौर पर दिखता है, दलित उससे काफी हद तक वंचित हैं. किंतु यह भी एक वास्तविकता है कि जिस प्रकार शिक्षा-संस्थानों में विभिन्न प्रावधानों द्वारा दलितों के लिए शिक्षा का पथ प्रशस्त किया है, उससे वैश्वीकरण और आधुनिकीकरण की मुख्यधारा में दलितों की सहभागिता क्रमशः बढ़ी है. बहुत से अच्छे अध्यापक, वकील, इंजीनियर, डाॅक्टर, वैज्ञानिक दलित समुदाय से आए और उन्होंने अपने-अपने क्षेत्रों में अपना वर्चस्व स्थापित किया.‘‘ (37) हलांकि मार्क्सवाद से प्रभावित दलित-ओबीसी लेखक भी उदारीकरण की मुखालफत करते हैं. मसलन, मार्क्सवादी दलित लेखक आनंद तेलतुंबड़े अपना विरोध दर्ज करते कहते हैं कि ‘‘कुछ बुद्धिजीवियों का कहना है कि इससे दलितों की अक्षमता दूर करने में मदद मिल सकती है. हालांकि यह तर्क पूरी तरह गलत नहीं है, लेकिन यह देश में पूंजीवाद के पिछले एक सदी के अनुभवों पर आधारित नहीं है. जिस प्रकार से पूंजीवाद ने कुशलता के साथ जाति का इस्तेमाल किया है, वैश्वीकरण जो वर्तमान सूचना संचार के युग में पूंजीवाद का ही स्वरूप है, इस पर कोई सकारात्मक असर नहीं डालने वाला है.‘‘(38)

अद्विज लेखकों के बीच सभी प्रकार के मत-मतांतरों से गुजरते हुए हम पाते हैं विभिन्न विचारधाराओं से आने वाले दलित और पिछड़े समुदायों से आने वाले लेखक ‘‘दलित-बहुजन मुक्त अर्थव्यवस्था का न ज्यादा अभिनंदन कर रहे हैं और ना ही उससे ज्यादा भयभीत हैं. उन्हें महसूस हो रहा है कि ग्लोबल अर्थव्यवस्था ने देशी बनिया ब्राह्मणवादी अर्थव्यवस्था को चुनौती दी है और वे उम्मीद कर रहे हैं कि अंततः वह उसे ध्वंस्त कर देगी. वह बाजार के बीच उपभोक्ता के रूप में खड़ा है, लेकिन उपभोक्तावाद की हाय-तौबा वह नहीं मचा रहा है. वह बाजार का अध्ययन कर रहा है. उसमें घुसने की तैयारी कर रहा है.‘‘ (39) लेकिन आदिवासी लेखकों के विचार इस मामले में अलग हैं. वे यह समझते हैं कि उदारीकरण उपजे कथित विकास से उनकी संस्कृति और परंपरा ही नहीं, अपने भौतिक हितों पर कुठाराघात होगा. अद्विज तबकों द्वारा लिखे गये रचानात्मक साहित्य में भी स्वाभिक तौर पर उनके उपरोक्त विचार प्रमुखता पाते हैं.

संदर्भ

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8. भीष्म साहनी, हंस के विमर्श भाग-1, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2012, पृ. 205
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16. वही, पृष्ठ, 53
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18. राजेंद्र यादव, आदमी की निगाह में औरत, राजकमल प्रकाशन, 2001, पृ़, 40
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23. हरिनारायण ठाकुर, ‘दलित साहित्य का समाजशास्त्र’, भारतीय ज्ञानपीठ, 2004, पृ., 375
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27. निर्मला पुतुल, कविताकोश डाॅट ओआरजी
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29. वही, पृ.,31
30. हेराॅल्ड एस. तोपनो, ‘उपनिवेशवाद और आदिवासी संघर्ष’, सं. अश्विनी कुमार पंकज, विकल्प प्रकाशन, दिल्ली, 2015, पृ.,35
31. संजय कुमार, ‘भारत का भूमंडलीकरण‘, सं., अभय कुमार दुबे, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 2008, पृ., 311
32. प्रेमकुमार मणि, ‘चिंतन के जनसरोकार, द मार्जिनलाइज्ड, दिल्ली, पृ., 22
33. वही, पृ. 23
34. सतीश पेडणेकर, आजादीडाॅटमी/दलित एंड इकोनाॅमिक रिफार्म
35. वही
36. वही
37. रामशंकर कठेरिया, दलित साहित्य: नई चुनौतियां, प्रभात प्रकाशन, दिल्ली, पृ., 36
38. आनंद तेलतुंबड़े, ‘जनवादी समाज और जाति का उन्मूलन‘, आधार प्रकाशन, पंचकुला, 2016, पृ., 36
39. प्रेमकुमार मणि, ‘चिंतन के जनसरोकार, द मार्जिनलाइज्ड, दिल्ली, पृ., 22

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