पिंक के बहाने 'अच्छी औरतें' और 'बुरी औरतें'

डिसेन्ट कुमार साहू
पी.एच.डी समाजकार्य ई-मेल - dksahu171@gmail.com महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा

शिक्षा और रोजगार ऐसे कारक हैं जिनके कारण सोशल स्पेस में महिलाओं की उपस्थिति बढ़ी है. हालांकि शिक्षा की अंतर्वस्तु और रोजगार की प्रकृति का विश्लेषण करें तो पता चलता है कि इन दोनों ही कारकों ने बहुत हद तक यथास्थितिवाद की स्थिति बनाकर रखी है. घोषित-अघोषित कई ऐसे नियम हमारे समाज में हैं जो महिलाओं को आत्मनिर्भर, सशक्त, विचारशील होने से रोकते आ रहे हैं,जेंडर और यौनिकता से जुड़े कायदे उन घोषित-अघोषित नियमों में प्रमुख हैं. इन कायदों को मानने पर हमें 'अच्छा' और तोड़ने पर 'बुरा' घोषित किया जाता है। फिल्म पिंक के बहाने 'अच्छी औरत' तथा 'बुरी औरत' के मापदण्डों पर चर्चा कर लेनी चाहिए, इन मापदण्डों को बनाए रखने से किसे फायदा है? तथा अच्छी औरत का अच्छी बनी रहना इस समाज के लिए कितना जरूरी है? फिल्म देखने वाले लगभग सभी लोगों ने इसे अच्छी और यथार्थ फिल्म का दर्जा दिया. लेकिन क्या वे समाज के यथार्थ की बात करते हुए खुद को खंगाल पाते हैं? क्या वे फिल्म की नायिकाओं के साथ ईमानदारी से खड़े  होते हैं या भावुकतावश ही खुद को उनके साथ पा रहे हैं. क्योंकि मीनल का हमला किसी राजबीर के सर पर नहीं बल्कि उस मानसिकता पर है जो औरत को सिर्फ एक जिस्म, एक वस्तु समझता है. जो किसी लड़की के हँसने, बात करने, शराब पीने और उसके कपड़ों के माप से उसका चरित्र निर्धारण कर लेता है.

फिल्म समाज के ढांचे को उघाड़ती है, हमें मौका देती है एक इंसान के मन में बैठे मर्दवादी मन को टटोलने की. हम इस समाज में वही पुरुष हैं जिन्हें लड़कियों के ना को हाँ समझना सिखाया जाता है। क्यों? क्योंकि लड़कियों को सिखाया जाता है- शर्माना, यौनिक इच्छाओं से संबन्धित पहल ना करना. वहीं दूसरी ओर हमारा समाज पुरुष यौनिक छवि को आक्रामक और निडर के रूप में गढ़ता है.  ऐसे में उनके द्वारा किये जाने वाले हिंसक तथा आक्रामक व्यवहारों के लिए लड़कियों को ही दोष दिया जाता है तथा इस घटना को 'सबक सिखाने', औकात दिखाने' के रूप में परिभाषित किया जाता है ताकि भविष्य में उन कायदों को कोई और न तोड़े. हम सबका समाजीकरण जेंडर और यौनिकता के कायदों के अनुसार होता रहता है. हम उन कायदों के अनुसार ही चलते हैं. ये कायदे अपने मानने वालों को भी प्रभावित करती है और न मानने वालों को भी। इसका सबसे बड़ा उदाहरण LGBTQ समूह है जो इन कायदों को तोड़ने के कारण ही समाज में बहिष्कृत जिंदगी जी रहे हैं. इन कायदों के अनुसार लिंग के दोहरे मापदंड हैं इसलिए पुरुषों की तुलना में महिलाएं ज्यादा नियंत्रित और शोषित की जाती हैं.

समाज में जो आदर्श 'अच्छी महिलाओं' के लिए गढ़े गये हैं तथा जिसके आधार पर उनसे वैसा ही बनने का आग्रह किया जाता है, उन आदर्श अच्छी महिलाओं की तुलना में 'पिंक' की पात्र 'बुरी महिलाओं' के वर्ग में आती हैं. ये बुरी महिलाएं जेंडर तथा यौनिकता के उन कायदों को तोड़ती हैं जिसे समाज में स्त्रियों के शोषण व नियंत्रण के लिए बनाया गया है. फिल्म की तीनों पात्र कामकाजी महिला हैं जो अपनी घरों से बाहर रहती हैं, अपनी जिंदगी से जुड़ी फैसले खुद लेती हैं, छोटे कपड़े पहनती हैं, शराब पीती हैं, उनके विवाह पूर्व यौन सबंध हैं, वे अपने यौन साथी का चुनाव करने के लिए स्वतंत्र हैं, इसके साथ ही उनमें असहमति की हिम्मत है. ये वो कायदे हैं जिसे ना तोड़ने के लिए परिवार, पड़ोस, समाज, मीडिया, फिल्म व टी.वी. सीरियलों के द्वारा हमारे सामने 'आदर्श' पेश किया जाता है. याद कीजिए उन फिल्मों व सीरियलों को जिसमें 'बुरी औरतों' का चित्रण इन्हीं कायदों को तोड़ने वाली के रूप में किया जाता रहा है. अच्छी वही हैं जो इन कायदों को तोड़ती नहीं हैं। क्योंकि इन्हीं कायदों पर तो जाति, धर्म, वर्ग की विशाल दीवार खड़ी है.

भारतीय समाज में अच्छी और बुरी औरत के गढ़न में यौनिकता की मुख्य भूमिका होती है. यही कारण है कि फिल्म में लड़कियों को घर से निकलवाने की कोशिश करने से लेकर न्यायालय में दोषी ठहराने तक की प्रक्रिया में उन्हें 'चरित्रहीन' घोषित करने की कोशिश की जाती है. किसी महिला के चरित्र पर उंगली उठाना सबसे आसान और प्रभावकारी तरीका होता है, यह आरोप सिर्फ लड़की के जीवन को प्रभावित ही नहीं करता बल्कि उसका परिवार भी समाज में कलंकित महसूस करता है. अपनी पुस्तक 'हम हिंदुस्तानी' में सुधीर कक्कड़ व कैथरीना कक्कड़ भारतीय समाज में स्त्री यौनिकता पर लिखते हुए कहते हैं 'लड़कों के विपरीत, जो लड़कियां यौन-अभिलाषा को जरा भी सार्वजनिक कर देती हैं, वे न केवल अपनी प्रतिष्ठा को जोखिम में डाल देती हैं, बल्कि उनके यौन शोषण का शिकार होने की संभावना बन जाती है.' अर्थात जब औरतें अपनी स्वतन्त्रता, अपनी आनंद के लिए जीने लगती हैं तो समाज में ऐसी महिलाओं को आसानी से उपलब्ध यौन वस्तु के रूप में देखा जाने लगता है तथा उसके ना को भी अपने पुरुषवादी मानसिकता के कारण हाँ समझा जाता है. आखिर सवाल उठता है वो कौन से कारण हैं जो हमें 'अच्छी औरत' के कायदे की ओर खीचते हैं?


जेंडर और यौनिकता के कायदे सीखते हुए हम लगातार शक्तिशाली (powerful) या शक्तिहीन  (powerless) के अनुभवों से गुजरते हैं. यह हमारे खुद के अनुभव भी होते हैं और यह स्थिति हम दूसरों में भी देखते हैं. जैसे- कोई लड़की किसी भी रूप में जेंडर और यौनिकता के कायदों को तोड़ती है तो उसे हमारे समाज में अच्छा नहीं माना जाता, ऐसी लड़कियों को परिवार में सम्मान नहीं दिया जाता, पारिवारिक निर्णयों में उनकी सहभागिता नहीं ली जाती या ज़्यादातर ऐसे मामलों में लड़कियों को परिवार से बहिष्कृत कर दिया जाता है अर्थात सामाजिक संरचना में इनकी स्थिति शक्तिहीन की होती है. लड़कों के साथ भी यही स्थिति हो सकती है या होती भी है लेकिन लड़कियों की तुलना में उनकी स्थिति ज्यादा बेहतर होती है. इस तरह हमारे परिवार तथा समाज के सत्ता केंद्र में वही होते हैं जो कायदे नहीं तोड़ते. दंड के रूप में शक्तिहीन की स्थिति व पुरस्कार के रूप में शक्तिशाली की स्थिति हमें उन कायदों को मानने के लिए आकर्षित करती है.

जेंडर व यौनिकता के कायदों पर ही पितृसत्तात्मक समाज खड़ा है और इसका सीधा संबंध स्त्री की प्रजनन शुद्धता से जुड़ा है. रक्त शुद्धता को बनाए रखने के लिए ही स्त्री की यौनिकता को नियंत्रित किया जाता है. इस ढांचे को बनाएँ रखने के लिए जरूरी है कि इन कायदों को सहज और प्राकृतिक रूप में फैलाया जाए. अगर किसी तरह की चुनौती मिलती भी है तो उन क्रियाओं को 'असामाजिक' व 'अनैतिक' घोषित कर दिया जाता है. अच्छी औरतों के अच्छी बनी रहने से ही ये सामाजिक संरचना चल रही है, जिस दिन इन मानकों की परवाह ना करते हुए स्त्रियाँ अपनी स्वतंत्रता, अपनी आनंद के लिए जीने लगेंगी जाति, धर्म तथा वर्ग के ढांचे टूट जाएगें.

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