वहशी राष्ट्रवाद: अपने ही नागरिकों के खिलाफ जंग

इति शरण
युवा पत्रकार. सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यकर्ता. संपर्क : ई मेल- itisharan@gmail.com
देश में कुछ दिनों पहले असहिष्णुता का मामला खूब गरमाया था, जिसके विरोध में कलाकार, बुद्धिजीवी, लेखक अपना पुरस्कार लौटा रहें थे। आज भी देश में विभिन्न रूपों में असहिष्णुता का वातावरण बना हुआ है। यह असहिष्णुता का वातावरण पूरी तरह से सत्ता पोषित है। सत्ता जब संकट में होती है, तो वह ऐसे ही घिनौने वातावरण का निर्माण करके देश में घृणा और आतंक का माहौल पैदा करती है, अपने बचाव के लिए देश के लोगों को बांटने का काम करती है। धर्म, जाति, संप्रदाय, के आधार पर लोगों को लड़वाती है। सरकार जब जनता की नजरों में गिरने लगती है और हर मोर्चे पर नाकामयाबी से बुरी तरह घिरने लगती है तब वह देश को एक और नए संकट की ओर धकेलने लगती है। आज वर्तमान में हमारे यहां सत्ता का यही चरित्र देखने को मिल रहा है।

बदकिस्मती से सीमा पार की सरकार भी उतनी ही जनविरोधी, कट्टर और हर मोर्चे पर विफल सरकार है। दोनों ही देशों की सरकार इस वक़्त भयावह और चौतरफा संकट से घिरी हुई है। अपने संकट को कम करने और उसे ढकने के लिए दोनों ओर से युद्ध जैसा माहौल बनाये रखने की भरपूर प्रयास किये जा रहे हैं। इसी का नतीजा था, सरहद पार से हमारे यहां हुआ उरी हमला और उसके जवाबी कार्रवाई में हमारी तरफ से किया गया सर्जिकल अटैक। इन हमलों से दोनों देशों की सरकारों को कुछ फायदा जरूर हुआ हो हुआ मगर देश और जनता कई स्तरों पर असहनीय तकलीफें झेल रही हैं।

ये दोनो देश अंतरराष्ट्रीय दवाबों के कारण सीधे युद्ध तो नहीं कर सकते, मगर आज अपनी ही जनता के खिलाफ दोनो देशों  की सरकारें एक तरह से युद्ध की स्थिति पैदा करवा रही हैं। यही कारण है कि आज सरहद इस पार और उस पार भी कलाकारों पर हमले किये जा रहे हैं। हमारे यहां पाकिस्तानी  कलाकारों, पाकिस्तानी फिल्मों का विरोध हो रहा, तो सरहद पार हमारी फिल्मों और मीडिया पर भी प्रतिबंध लगाना जारी है।

मुंबई में 'मामी फिल्मोत्सव' में एक बेहतरीन और क्लासिक पाकिस्तानी फिल्म 'जागो हुआ सवेरा' के प्रदर्शन पर रोक लगा दिया गया। जिस फवाद खान को हमारी देश कि जनता ने सर आँखों पर उठा रखा था, आज उसी फवाद को नफ़रत की निगाह से देखा जाने लगा है। अचानक लोगों को वह एक दुश्मन देश का नागरिक नज़र आने लगा। फिल्म निर्देशक करण जौहर को अचानक इस पाक कलाकार को अपनी फिल्म में लेने पर अफसोस होने लगा और उन्होंने आगे से अपनी फिल्म में किसी भी पाकिस्तानी कलाकार को शामिल ना करने की कसमें भी खा ली हैं।



आज कला और कलाकारों को ही नफरत का जरिया बनाया जा रहा है, जबकि हर तरह की नफरतों के नकाब उतारने का नाम ही है कला। वह सीमाओं से परे और किसी भी संकट के समय संपूर्ण रूप से मानवीयता और मानवीय सरोकारों के झंडे बुलंद करती नजर आती है। युद्ध के समय कला ही नफरत की  आग पर पानी डालने का काम करती है। युद्ध के हर दौर में कलाकारों ने अपनी लेखनी, अपने नाटक, अपनी गीतों के जरिये शांति लाने में अपनी भूमिका निभाई है। कहा भी जाता है एक बंदूक की ताकत से ज्यादा मजबूत होती है कलम की ताकत। 'क्या जुल्मतों के दौर में भी गीत गाये जाएंगे, हाँ जुल्मतों के दौर के ही गीत गायें जाएंगे।'

मगर आज उसी कला जगत और कलाकारों पर हमला हो रहा है और यह किसी न किसी रूप में सत्ता प्रायोजित है। जब सत्ता पोषित इस फासीवादी और घिनौने सामाजिक/राजनीतिक माहौल के प्रतिरोध में कोई संस्था सामने आ रही है, तो उनपर ही हमले किए जा रहे हैं। इसका ही परिणाम था इंदौर में भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) के 14वें राष्‍ट्रीय सम्‍मेलन में कुछ संघी विचारधाराओं के लोगों का हमला। वे लोग कार्यक्रम के बीच में मंच पर चढ़ आयें और हंगामा करने लगें। जबकि इप्टा के इस कार्यक्रम का आयोजन  'सबके लिए एक सुंदर दुनिया' के संदेश के साथ किया गया था। हाल ही में मुंबई में भी कुछ ऐसी ही घटना देखने को मिली, जब एक सांस्कृतिक कार्यक्रम के दौरान कुछ इसी तरह की विचारधारा के लोगों ने हिंसक हमला कर दिया था। फरवरी के महीने के दौरान इप्टा जेएनयू की टीम जब एक मजदूर संगठन के आमंत्रण पर उत्तराखंड के पौरी में नाटक करने गई उस वक़्त भी उनका विरोध किया गया, आयोजकों को धमकी दी गई। नाटक के दौरान बिजली काट दी गई। बाद में जेएनयू की टीम ने मोबाइल की रौशनी में नाटक किया। वहीं उत्तर प्रदेश के वृंदावन में होने वाले नास्तिक सम्मेलन को विश्व हिंदू परिषद और स्थानीय धर्माचार्यों के विरोध के कारण रद्द करना पड़ा।



एक तरफ हिन्दुवादी संगठन नारी सुरक्षा का दिखावा करता है और दूसरी तरफ एक स्त्री को अभद्र गाली देने से भी पीछे नहीं रहता। जब बॉलिवुड अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा पाक कलाकारों के समर्थन में सामने आई तो इसी विचारधारा के लोग प्रियंका को गंदी-गंदी अभद्र गालियां देने लगे। एक तरफ ये भारत माता की जय के नारे लगवाते हैं और दूसरी तरफ देश की स्त्री का इस कदर अपमान करते हैं। यह है इनका दोहरा रूप।

इन घटनाओं को देखकर 1989 की याद आती है, जब नुक्कड़ नाटक 'हल्ला बोल' के प्रदर्शन के दौरान शासक पार्टी के गुंडों ने नाटक कर रहें कलाकारों पर हमला कर दिया था। इस हमले में रंगकर्मी सफ़दर हाशमी बुरी तरह से ज़ख्मी हुए। उसी रात को सिर में लगी भयानक चोट की वजह से सफ़दर हाशमी की मृत्यु हो गई। आज एक बार फिर कुछ वैसा ही हमला जारी है।

सनद रहे कि हमारी आज की यह कट्टर हिंदूत्ववादी सरकार हिटलर की मानवद्रोही प्रवृत्ति पर चलने तथा आज की एक सबसे क्रूर और आक्रामक सरकार अर्थात इजरायल सरकार जैसी ही दिखने में विश्वास रखती है। राजनीति में आने से पहले हिटलर खुद एक पेंटर था। मगर राजनीति में आने के बाद उसने और उसकी नाज़ी पार्टी ने कला के सभी रूपों पर हमला शुरू कर दिया था। एक कलाकार होने के नाते हिटलर कला की ताकत से वाक़िफ था। वह जानता था कि कला उसकी तानाशाही के लिए खतरा बन सकती है, इसलिए सत्ता में आने के बाद उसने इसे कुचलने का अभियान चलाना ही मुनासिब समझा। आज हमारी सरकार और सरकार संरक्षित कुछ गुंडा गिरोह क्या हिटलर के नक्शे कदम पर चलती नहीं दिख रही है ?



नफरत का यह माहौल सिर्फ पाकिस्तान के लिए ही नहीं फैलाया जा रहा, बल्कि एक अघोसित युद्ध की स्थिति तो चीन के साथ भी पैदा की जा रही है। देश में बड़े स्तर पर चीनी सामानों का विरोध हो रहा है। यह विरोध कोई आम आदमी के दिमाग की उपज नहीं है, बल्कि यह विरोध भी हमारी सत्ता की सोची समझी रणनीति का हिस्सा है, यह विरोध भी सत्ता पोषित ही है।

अपनी तमाम नाकामियों पर पर्दा डालने के लिए यह एक छद्म युद्ध का माहौल तैयार करने की कोशिश की जा रही है। देशभक्ति का एक झूठा पाठ पढ़ाया जा रहा है। अगर आप देश भक्त हैं, तो चीनी सामानों का विरोध करें। मगर मुझे समझ नहीं आता यह कैसा विरोध है ? इस विरोध की आड़ में तो सिर्फ़ छोटे थोक विक्रेताओं और रेडी पर सामना बेचने वाले दूकानदारों के आर्थिक हितों पर ही हमला बोला जा रहा है। क्यों नहीं बड़ी-बड़ी चीनी कंपनियों के माल तथा उनका कारोबार करने वाले बड़े भारतीय व्यापारिक घरानों का बहिष्कार किया जा रहा ? हमारे इस तरह के अविवेकी विरोध से चीन कोई बड़ा नुकसान नहीं होने वाला, बल्कि हमारे ही देश के सबसे निचले स्तर के कारोबारियों को उजाड़ने का काम ज़रूर हो रहा है। दिवाली में चाइनीज लाइट बेचने वाले एक दुकानदार ने बताया, हर दिवाली में चाइनीज लाइट बेंचकर 40-50 हजार रुपए कमा लेता था, उन पैसों से उसके घर में दिवाली मनती थी, मगर इस बार कोई चाइनीज लाइट खरीद ही नहीं रहा।  उसने बताया, कमाई तो दूर की बात है, इन लाइटों को खरीदने पर हमने जो पैसे लगाए हैं उसका पूरा नुकसान ही उठाना पड़ेगा। हमारे इस बर्ताव से चीन में भारत की एक नकारात्मक छवि बन रही। हम जान कर एक देश के सामने खुद को दुश्मन की तरह पेश कर रहें। पाकिस्तानी की तरह यहां भी युद्ध का माहौल बनाया जा रहा है।



चीन के बारे में कहा जा रहा कि पाकिस्तानी की तरफ उसका रुख नर्म हैं, और उसकी नीति भारत विरोधी है। जाहिर है भारत के प्रति चीन की यह कोई नई नीति नहीं हैं। चीन पहले भी पाकिस्तान के समर्थन में दिखा है। यह चीन का कोई नया स्टैंड नहीं। उसने कहा है कि पाकिस्तान भी आतंकवाद का शिकार हो रहा। काफी समय से भारत और चीन के संबंध में तनाव की स्थिति देखी जा रही, मगर इस सबके बीच इधर दोनों देशों के बीच व्यापार संबंध में सुधार भी आया है। अब अगर ऐसी स्थिति जारी रही तो भारी आर्थिक तनाव पैदा होने का खतरा हो सकता है जिसका सबसे अधिक खामियाजा हर हालत में हमें ही उठाना होगा। और यह कैसी विडंबना है कि एक तरह हमारी सरकार चीनी सामना के बहिष्कार का माहौल बना रही, वहीं दूसरी तरह भारतीय सेना तथा चीनी सेना का संयुक्त सैन्य अभ्यास भी चल रहा है। दोनों देश की सेनाओं ने जम्मू-कश्मीर के पूर्वी लद्दाख में मिलकर सैन्य अभ्यास किया है। यह भारत सरकार के दोयम स्टैंड का प्रदर्शन तो नहीं है ?

अभी देश के दो बड़े राज्यों उत्तर प्रदेश और पंजाब में चुनाव होने वाला है, हमारी मोदी सरकार इस वक़्त देश में हर मोर्चे पर अपनी घोर विफलताओं और आक्रमक जन विरोधी रवैये को लेकर खुद को बेहद कमजोर महसूस कर रही। उसके खिलाफ विरोध के स्वर और उसके अंदरूनी तनाव भी अब खुलकर सामने आए हैं। बिहार के चुनाव में इस सरकार की बुरी स्थिति साफ देखने को मिली थी। कयास लगाये जा रहे हैं कि आने वाले इन चुनावों में उसकी स्थिति उससे भी बुरी होने जा रही है। चहुंतरफा संकट से घिरी इस सरकार को अपनी मौत साफ़ नज़र आ रही है और यही कारण है कि अपनी मौत टालने की ख़ातिर अब वह कोई भी हथकंडे अपनाने से बाज़ नहीं आने वाली। उसी का नतीजा है अंध राष्ट्रवाद का आतंक कायम करना, सीमा और देश के भीतर भी युद्ध जैसी स्थिति को निरंतर बनाये रखना और जो भी शक्तियां सरकार के इन घिनौने हथकंडे के विरोध में सामने आयें उन पर निरंतर हमले करवाना। कला और कलाकारों पर सबसे ज़्यादा हमला इसलिए भी क्योंकि वे ही हैं जो सत्ता की साजिशों पर सबसे अधिक पैनी नज़र रखते हैं और उसके विरुद्ध जन प्रतिकार की सबसे सशक्त धारा का निर्माण भी करते हैं।
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