करुणा और प्रेम की रचनाकार उषा किरण खान


निवेदिता
पेशे से पत्रकार. सामाजिक सांस्कृतिक आंदोलनों में भी सक्रिय .एक कविता संग्रह ‘ जख्म जितने थे’. भी दर्ज कराई है. सम्पर्क : niveditashakeel@gamail.com 
जो लोग आपके प्रिय हों उनके बारे में लिखना आसान नहीं होता। उषा किरण खान के बारे में लिखना मेरे लिये समुद्र के गहरे जल में उतरने जैसा है। जानती तो उन्हें वर्षो से थी पर वह जानना एक पत्रकार का एक लेखक को जानने जैसा था। जैसे-जैसे उनके नजदीक गयी मैंने पाया जिन्दगी ढ़ेर सारे रंगों के साथ मौजूद है। हैरान थी एक स्त्री के भीतर इतने सारे रंगों को देखकर। जिन्दगी के इस पड़ाव पर बहुत कम लोग इतने सक्रिय रहते हैं। उन्हें देखकर मुझे हमेशा महान अभिनेत्री जोहरा सहगल की याद आती है, जो जिन्दगी के 92 साल तक अभिनय करतीं रहीं, थिरकती रहीं। जीवन से भरी हुई जोहरा सहगल ने इस मुकाम को पाने के लिए लंबा संघर्ष किया। एक स्त्री के लिए रचना  एक संघर्ष है। जब स्त्री रचती है तो परंपराएं टूटतीं हैं। स्त्री के लिए लिखना खून से सनी राहों पर चलने जैसा है। ये राह उषा किरण खान ने चुना और अपनी धुन में आगे बढ़ती गयीं। इस धुमावदार  और रोमांचक सफर में आम लोगों की जिन्दगी, हमारी परंपरा, हमारे इतिहास को उन्होंने समेटा और अदब की दुनिया में नया मुकाम बनाया।

उषा दी के लेखन में ज्ञान और संवेदना का अद्भुत सामंजस्य है। अपने लेखन में उन्होंने  मानवीय सच को प्रमाण के तौर पेश किया। वह एक कठिन डगर पर चल पड़ीं, जहां पहले से कोई निशान नहीं था। अपने पैरों पर चलकर उन्होंने जो राह बनायी वह हर स्त्री की राह बन गयी। एक बार मैंने उनसे पूछा था कि आप लिखती कब हैं? उन्होंने हंसते हुए कहा कि एक औरत को अपनी गृहस्थी के साथ लेखन के लिए समय निकालना आसान नहीं है। मैंने अपने लिए चार बजे भोर का समय चुना । सारे दिन काम-काज के बाद इतनी थकान होती थी कि लिखने के लिए वक्त नहीं निकाल पाती थी। फिर हमने तय किया कि चार बजे सुबह मेरे लिखने का समय होगा। वह आदत आज तक बनी हुई है। हिन्दी और मैथिली में उन्होंने लगातार लिखा और अभी भी लिख रहीं हैं। फागुन के बाद,सीमांत कथा,रतनारे नयन,पानी पर लकीर,त्रिज्या और भामती जैसे उपन्यास ने  पाठको के मन के भीतरी परत को कुरेदा है। उषा दी इतिहास की छात्र रही हैं,इसलिए इतिहास को स्त्री की नजर से देखना, इतिहास में गुमनाम हुए उन पात्रों को जीवंत करने की कला उनके पास  है। उन्होंने मिथिला के बडे दर्शानिक वाचस्पिति मिश्र की पत्नी भामती पर उपन्यास लिखा। उपन्यास में स्त्री स्वर को बहुत ही सहज ठंग से उठाया गया है। उनकी खासियत है कि  स्त्री मुद्दे पर अपनी बात कहने के लिए ना नारा लगाती हैं, ना परचम लहराती हैं। पर जो कहती हैं उसमें सच्ची आग और तड़प होती है।

बाबा नागार्जुन के साथ उषा किरण खान 
उनके उपन्यास भामती से -’वाचस्पति काम में ऐसे लीन हुए कि उन्हें दीन-दुनिया की सुध ही नहीं रही । नवविवाहिता भामती इस दौरान उनकी सेवा करती रही। जब उनका लेखन संपन्न हुआ तो वाचस्पति ने देखा एक अधेड़ स्त्री दीप जला रही है । पूछा आप कौन? भामती ने उत्तर दिया मैं आपकी पत्नी हूं।’ उषा दी के लेखन की खासियत यही है। उनके पात्र अपनी पीड़ा का जश्न नहीं मनाते, न ज्ञान बघारते हैं। सच को बिना किसी मिलावट के कहने की कला ने ही उन्हें अदब की दुनिया में बेहतरीन अफसानानिगार बनाया । बड़ी कथाकार से ज्यादा वे एक बेहतर इंसान हैं। यह बात मैं इसलिए कह पा रही हूं कि उन्हें नजदीक से जाना है,वर्षो से उन्हें साधना करते हुए देखा है। उषा दी कला के विभिन्न आयाम से जुड़ी रही हैं। लेखन के साथ-साथ उनकी दिलचस्ची रंगमंच में है। निमार्ण कला मंच की स्थापना और रंगमंच में लगातार सक्रिय रहना कला के प्रति उनके गहरे लगाव को दर्शाता है। हीरा डोम, सात भाई चंपा,उगना रे मोर कतेए गेला समेत कई नाटक का लेखन किया। बतौर साहित्यकार,नाटककार और समाजिक कार्यकर्ता के रुप में लगातार सक्रिय उषा दी के भीतर कई दुनिया है। वो दुनिया बेहद अपनी है जानी-पहचानी।

 उषा दी को मैंने उनके हर रुप में देखा है। उनका कमरा हमसबों की पसंदीदा जगह है। जहां हम दुनिया भर के साहित्य से लेकर प्रेम प्रसंग और साहित्यकारों के छिछोरेपन तक की चर्चा करते हैं। कमरा काफी खुला और हवादार है। घर का दूसरा हिस्सा जितना बेतरतीब रहता है उनका कमरा उतना ही सलीके से सजा हुआ। लकड़ी के मेज पर नीले बिल्लौरी गुलदान में कागज के फूल या कभी ताजा फूल। कोने के मेज पर किताबें ही किताबें।  कई बार प्यार से रामचन्द्र खान को उलाहना देती हैं कि सारे कमरे में किताबे फैला कर रखते हैं इसलिए इस कमरे में मैं उन्हें आने नहीं देती। पहली बार जब मैं उनसे अखबार के लिए साझात्कार लेने गयी तो उस समय मकान पर कुछ काम चल रहा था। वीरान बाग में ईटों से लदे ट्रक खड़े थे। सीमेंन्ट की बोरियों की गर्द उड़ रही थी।  जर्द पत्ते गर्द के उस नांचते भंवर में चक्कर काटते जा रहे थे। हम बातें करते रहे। उनकी बातों में इतना रस था वक्त का पता ही नहीं चला। बाहर चांद निकल आया , कमरा चांद की रौशनी से भर गया तो हमने विदा लिया। ऐसी ही हैं उषा दी। मैं हमेशा उनके घर की चाय पीना पसंद करती हूं। ताजे पत्ती की खूशबू जो उनके घर की चाय में है वह कहीं नहीं।

आयाम की साथी लेखिकाओं के साथ उषा किरण खान 

आयाम, लेखिकाओं का संगठन,  केे गठन के बाद हमारी बैठकें जमने लगी हैं। लिखने -पढ़ने वाली महिलाओं की टोली में साहित्य के रंग के अलावा जीवन के तमाम रंग शामिल रहते हैं। मुझे लगता है कुछ चीजें उन्हें विरासत में मिलीं। वह है यथास्थिति से विद्रोह। हम अंदाज लगा सकते हैं कि आजादी के पहले जब स्त्रियों की दशा इतनी खराब थी उससमय उनकी मां का विधवा विवाह हुआ। आज भी हमारे समाज में विधवा विवाह मुश्किल से होता है। हम कल्पना कर सकते हैं कि उस दौर में उनकी मां, पिता और पूरे परिवार को क्या कुछ झेलना पड़ा होगा। उषा दी को उदार परंपरा अपने घर से ही मिली। पिता गांधीवादी थे। बचपन में ही राजनीति से जुड़े लोगों का घर आना-जाना था। बड़ा सा आश्रम। सावन में झांकियां निकलती। कीर्तनों की बड़ी घूम रहती। किसी दिन भगवान का फूलों का सिंगार होता, किसी दिन भगवती की पूजा होती। गांव में बड़ी दूर दूर  से कीर्तनियां आते। गुलाब, चमेली और बेले भगवती घर महंक उठता। कुंवारी लड़कियों का भोजन होता। मुहर्रम के दिनों ताजिया निकलता। पूरे गांव की औरतें ताजिया को सजाती,सवांरती। संस्कृति के विभिन्न रंगों के बीच उषा दी बड़ी हुई। इसलिए उनके विचारों में भी और उनके लेखन में भी हमारे देश की संस्कृति और सभ्यता के विभन्न रंगों का समावेश है। हमारी जिन्दगी में किस्से रंग भरते हैं। उषा दी के पास किस्सों की कमी नहीं है। उसे सुनाने की कला भी उनके पास है।

कई बार उनकी कहानियां पढ़ते हुए लगता है कि किस्से की दुनिया की वो जादूगरनी हैं। किस्सों का पिटारा लेकर बैठ गयी तो उसमें से हजार रंग झिलमिलाते रहते है। अनुभव व ज्ञान का ऐसा मेल कम दिखायी देता है,जो जिन्दगी की सोच और संवेदनाओं से लबरेज हो। घर संभालती स्त्री, नाटक लिखती स्त्री, सामाजिक असमानता के खिलाफ स्त्री। कितने मोर्चे पर उन्हें देखा। कभी खमोशी से साथ देते हुए कभी मुखर। शायद यही वजह रही होगी कि बाबा नागार्जुन की वो उतनी ही प्रिय थीं । नागार्जुन उनके पिता के मित्र थे। आजादी के आंदोलन के दौरान जेल में दोनों की मुलाकात हुई औ वे गहरे मित्र हुए। यह मित्रता पिता के गुजर जाने के बाद भी कायम रही। उषा दी को वो अपनी सगी बेटी ही मानते थे। उनकी मुन्नी के भीतर कला की इतनी बड़ी दुनिया देखकर वे खुद  हैरान रहते थे। नामवर सिंह कहते हैं नागार्जुन की काव्य भूमि विपुल है और विषम भी। विषम इतनी कि इस उंची-नीची भूमि में समतल की अभ्यत आंखें अक्सर घोखा खा जाती है। जो बस्तु औरों की संवेदना को अछूती छोड़ जाती है वही नागार्जुन के कवित्व की रचना भूमि थी। अक्खड़ और यायावर कवि अपनी मुन्नी के लिए प्यार से लबालब भरे पिता थे। जो हमेशा आर्थिक परेशानियों से घिरे रहते थे। उषा दी की मां बिना कुछ बताये उनकी मदद करती थीं। जिन्दगी इन सबसे मिलकर बनती है। उषा दी कहती है पता नहीं कितने लोगों ने मिलकर सवारा है मुझे। किन किन घाराओं से बहते-बहते यहां तक पहुंची। स्त्री का जीवन ऐसा ही है। बहते बहते ठौर लगती है।

उषा किरण खान 
आम तौर पर स्त्रियों के जीवन में धर्म की गहरी भूमिका रहती है। ऐसी स्त्री कम मिलती है जिसे धार्मिक कर्मकांड. पर भरोसा नहीं हो। धर्म की गहरी समझ है उनके भीतर। इसलिए वे उस पर हंस भी पाती हैं। एकदिन हमसब उनके पास बैठे थे। धर्म पर बहस चल रही थी। उन्होंने कहा पता है कभी-कभी भगवान विष्णु की  तस्वीर देखकर ‘जिसमें वे नागशेष पर लेटे हुए हैं और लक्ष्मीजी उनका पांव दबा रही हैं’ मुझे ये ख्याल आता है कि अगर समुद्र में तैरती मछलियां देखकर नागशेष को भूख लग जाय और वे मछली खाने के लिए लपक पड़े तो विष्णुऔर लक्ष्मी जी का क्या होगा। हंसते -हंसते हमारे पेट में बल पड़ गए। मैं सोच रही थी कि कितना साहस है इस स्त्री में जो धर्म पर हंस सकती है और धर्म से गहरा अनुराग भी रखती है। जो स्त्री के जीवन में धर्म की भूमिका को जानती है और धर्म से परे मनुष्यता के पक्ष में खड़ी रहतीं हैं। शायद यही वजह है कि उनकी कहानियों  में हमेशा वैसे पात्र होते हैं जो मनुष्यता के पक्ष में खड़े रहते हैं। उनकी कहानियों में आंचलिकता की खुशबू   है। सुख,दुख, जय,पराजय का बयान ऐसा जैसे आप उस कथा के भीतर हों। उनकी कहानियों में एक सहज प्रभाव मिलता है, वे बोझिल नहीं होतीं। इस सहजता की खास वजह है उषा दी का अपने कथा-अंचल से जुड़ा होना। वे अपने इर्द-गिर्द की घटनाओं की दर्शक नहीं हैं उसकी भागीदार हैं। लोक जीवन की धारा में गहरे तक डूबी हैं।

उनकी कहानियों और उपन्यास में करुणा और प्रेम गुंथे हुए हैं। प्रेमकथा की परिणति करुणा में होती है।  भामती उपन्यास में आधी उम्र पति की सेवा में बीत जाती है तब पति को ज्ञान होता है कि भामती उनकी पत्नी है। मानवीय संवेदनाओं की इतनी सूक्ष्म और सहज अभिव्यक्ति उनकी  कहानियों में है कि आप पढ़ेगें तो डूब जायेंगे और जो डूबे सो पार। उषा दी को मैंने टुकडे-टुकड़े में जाना है। वे बेहद जिंदादिल और दिलेर औरत हैं। जीवन से लबालब भरी हुई। उनके संपूर्ण कला-अनुभव के हमसब हिस्सेदार हैं। उनको पढ़ते हुए उन पात्रों की आप हरारत महसूस कर सकते हैं। विविध रंगों और छवियों के साथ उनकी कहानियां हमारे दिलों में उतरती है और गालिब की नज्म की तरह वह दिल के आर -पार नही जाती दिल में धंस जाती है।  
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