देवयानी


 प्रेमकुमार मणि चर्चित साहित्यकार एवं राजनीतिक विचारक हैं. अपने स्पष्ट राजनीतिक स्टैंड के लिए जाने जाते हैं. संपर्क : manipk25@gmail.com
मिथकों की ब्राह्मणवादी पितृसत्ताक व्याख्या के साथ सांस्कृतिक राष्ट्रवादी प्रतिक्रान्ति के एजेंडे में लगे हैं. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने ओणम के दिन ' वामन जयन्ती' मनाने की घोषणा की. वही वामन जिसे महात्मा फुले किसानों के राजा बलि का हत्यारा बता रहे हैं. यानी इन ब्राह्मणवादी मिथकों का पुनर्पाठ भी पिछले दो दशकों से हो रहा है. इस बीच इन मिथकों में पुरुषवादी प्रवृत्तियों का पाठ और कथाओं के 'बिटवीन द लाइंस' व्याख्याओं से कथा के भीतर चुप स्त्री की मुखरता हमारे संवेदनशील कथाकारों का प्रिय विषय रही है. भीष्म साहनी का ' माधवी' एक उदाहरण है . कथाकार प्रेमकुमार मणि 'देवयानी' की कहानी में उसकी मुखरता से इस मिथकीय कथा का स्त्रीवादी पुनर्लेखन कर रहे हैं. पढ़िए उनकी कहानी 'देवयानी'

मैं देवयानी, एक बार फिर अपनी कहानी कहना चाहती हूँ. महाभारतकार व्यास को अपनी कहानी सुनाई  थी. उन्होंने जितना और जैसा समझा लिख दिया. उनके लिखे का विरोध करने के लिए मैं प्रस्तुत नहीं हुई हूँ. यह भी नहीं कहती, उनहोंने मुझे समझने की कोशिश नहीं की. किन्तु...उनकी सीमा को भी जानती हूँ. आख़िर तो वे पुरुष ही थे. कोई पुरुष एक स्त्री को आख़िर कितना समझ सकता है? समझ भी सकता है क्या?

आज जब कुछ कहने के लिए जमी हूँ, तो बरबस बहुत कुछ ख़याल आ रहा है. पिता का घर, कच की निगाहें, ययाति की बाँहें और बहुत कुछ. सोचती हूँ, मैं क्या हूँ और कुछ तय नहीं कर पाती. एक देवयानी के जाने कितने रूप हैं. किस रूप में मैं वास्तविक हूँ, इसे स्थिर करना मेरे लिए भी मुश्किल है. लोग कहते हैं मैं ययाति की पत्नी हूँ, उसके पुत्रों की माँ. लेकिन कच की क्या हूँ, जिसे लेकर इतनी किंवदंतियाँ हैं, इतनी कथाएँ-उपकथाएँ हैं. शर्मिष्ठा से भी रिश्ता तय कर पाना सहज नहीं है. हस्तिनापुर की साम्राज्ञी और भविष्य की राजमाता तो हूँ ही. नहीं हूँ मैं तो केवल देवयानी. और इस देवयानी की तलाश में ही जाने कब से देवयानी परिक्रमा कर रही है. धरती ने सूर्य के और चाँद ने धरती के जाने कितने चक्कर लगाए होंगे, लेकिन मेरी गति को कोई छू नहीं सका. आज जब संयत हूँ, तब अपने बारे में कुछ कहना चाहती हूँ. सबसे पहले तो यह तय करना चाहती हूँ कि मैं ययाति की पत्नी हूँ या कच की प्रेमिका. या फिर शुक्राचार्य की पुत्री. या कि अदद देवयानी. यदि सच कहूँ तो आज मैं  उपेक्षती हूँ पुरुषों को; चाहे वे पिता हों, पति हों अथवा प्रेमी.



सबसे पहले कच तुम! पता नहीं कहाँ से और कैसे बात शुरू करूँ. जब भी तुम पर सोचती हूँ मैं सभी तारतम्य भूल जाती हूँ. लगता ही नहीं तुम इसी जीवन में, मेरी यादों के बीच साथ हुए थे. तुम्हारा आकार इतना कुछ भूल चुकी हूँ कि मेरे लिए तुम निराकार नाम के अलावा कुछ नहीं हो लेकिन तुम्हारी सत्ता, तुम्हारे अस्तित्व से इतनी घिरी हूँ कि तुम रोम-रोम में समाए हो.

तुम मंत्र सीखने आये थे मेरे पिता के पास. अमरता का वह संजीवनी मंत्र जिससे मृत जी उठते हैं. मैंने तुममें संजीवनी तलाशने की कोशिश की और किंचित सफल भी हुई. कच, तुमने मेरी स्थिति का आकलन करने की कभी कोशिश नहीं की. पिता के घर में मेरी स्थिति का ख़याल करो. जहाँ हर समय युद्ध की प्राविधिकी पर चर्चा चल रही हो, वहां मेरा राग सुनने वाला कौन था? वैज्ञानिक और विधुर पिता को सबसे कम चिंता थी तो मेरी. हर समय अन्वेषण, अनुसंधान और विज्ञान. यही उनका ओढना-बिछौना था. मैं तो बस उनकी जिम्मेवारी थी. माँ की धरोहर, जिसे उचित वय में उचित व्यक्ति के साथ उन्हें बाँध देना था. इस उचित की तलाश में कभी-कभार वे दिख भी जाते थे.

विवाह को हमारे यहाँ कहा जाता है-विवाह बंधन. तत्सम होकर कहूँ तो परिणय-सूत्र बंधन. हम स्त्रियाँ इसे अनुबंध मानकर चलती हैं, लेकिन होता है यह बंधन ही. कन्या का पिता विवाह के डोर में उसे बांध जाता है और जन्म देने से उसके जिम्मे जो उतरदायित्व आया होता है, उससे मुक्त हो जाता है. मुझ मातृहीन के लिए पिता का स्नेह कम था, यह नहीं कहूंगी, लेकिन लोकाचार के अनुसार मुझे परिणय-सूत्र में तो डालना ही था. एक पिता के लिए कन्या का विवाह ही उसका इष्ट होता है.


और ऐसे में तुम्हारा आना हुआ. लगा मेरी बंद जिंदगी में हवा का एक शीतल झोंका आया और तन के सारे झरोखे खुल गए. मेरी कोरी जिंदगी में तुम इंद्रधनुष की तरह खिल उठे. देवशिशु, तुम नहीं समझ सकते, किस तरह तुमने मेरी जिंदगी को अर्थों से भर दिया. वह तुम हो जिसने शुक्राचार्य की अल्हड़ बेटी को प्रगल्भ देवयानी बनाया. तुम अमृत प्रवाह लेकर आये और मैं उसमें खो गई. सुध-बुध खो बैठी. स्वयं को समर्पित कर सयानी हो गई...धन्या हो गई...अनंत का अंतहीन विस्तार...


और यह लोगों को दिखा. लोग किसी के दुःख पर भले ध्यान न दें, सुख पर ज़रूर ध्यान देते हैं. हमारी आँखों में सुख छलछला रहे थे और उनमें जो काजल के डोर पड़े थे, उससे लोगों ने हमारे उमंग को रेखांकित माना. फिर इन सब के अपने-अपने अर्थ दिए. मुझे दुनिया की परवाह कहाँ थी. मैं तो बस मगन भर थी.

लोक की नजर तुम पर भी थी और जब सोचती हूँ कि वे कितना सही थी कि तुम्हें वही समझ रहे थे, जो तुम थे. लोगों को यह अच्छी तरह दिखा कि तुम सामान्य देवशिशु नहीं हो. ज्ञान के प्रति तुम्हारी विकल उत्सुकता लोगों के कान खड़े करने के लिए पर्याप्त थी. असुरों ने तुम्हें कूटा, काटा और कुत्तों  को खिला दिया. मैंने धरती का कोना-कोना छान मारा, लेकिन तुम न मिले. कैसे मिलते. आख़िर में पिता के पास बिछ गई. जानते हो कच, पिता को कुछ भी नहीं कहना पड़ा मुझे. वे सब कुछ समझ गये. उनहोंने अपने मन्त्रों का इस्तेमाल किया. तुम कुते का पेट फाड़ते हुए निकल गये. तुम्हें समंदर में फेंका गया और पिता के प्रताप से तुम लहरों पर बिछलते हुए आ गये. और तीसरी बार तो तुम्हें खाक कर असुरों ने सुरा के साथ मेरे पिता को पिला दिया. मैंने तुम्हें जिलाया, पिता से कहकर. उन्हें कितनी बड़ी परीक्षा देनी पडी, यह तुमसे अधिक कौन जनता है. उनहोंने अपने जान की बाजी खेली थी. इसी क्रम में तुमने संजीवनी के सूत्र सीख लिए.

कच, तुमने सूत्र जान लिए, मंत्र सीख गए. तुम्हें अब क्या चाहिए था. अब तुम सिद्ध पुरुष थे. कुछ भी सिद्ध कर सकते थे. तुमने मेरी व्याख्या कर दी. दलील दी कि अब हम भाई-बहन हैं, क्योंकि ‘मैं तुम्हारे पिता के पेट से निकला हूँ.’ कितना मजबूत तर्क था! अकाट्य! पुरुष युग-युग से ऐसे ही तर्क देता है, युग-युग तक ऐसे ही तर्क देता रहेगा. राम को सीता का परित्याग करना था तो कैसे अकाट्य तर्क दिए थे! तुम्हारे तर्क का कोई जवाब हो सकता था भला! जनक सहोदरा भाई से विवाह असुरों में होता होगा, देवता इसका निषेध करते हैं. मैं देवशिशु भला, जनक सहोदरा अर्थात बहन का पाणि-ग्रहण कैसे कर सकता हूँ.

मैंने तो समझा तुम कोई बड़ी बात कह रहे हो. तेरे राग में ऐसी डूबी थी कि तुम्हारे तर्क पर कोई ध्यान ही नहीं दिया. लेकिन तुम्हारी पहेली का जब अर्थ खुला, तो मैं किंकर्तव्यविमूढ़ हो गई. अपनी संस्कृति का परिचय तुमने इस रूप में दिया कि जाते-जाते हम असुरों की प्रजाति को लांछित करना न भूले. यह तुम्हारी गुरुदक्षिणा थी. कच, किसी भी परंपरा में भाई-बहन का विवाह निषेध है. बस इतने के लिए देवताओं के कुल की श्रेष्ठता बघारना तुम्हारी अहमन्यता नहीं थी क्या? तुमने अपने पुरुष होने का भी दंभ दिखलाया कि तर्क केवल तेरे भेजे में उगते हैं. यह सही है कि स्त्री तर्क-वितर्क नहीं, स्नेह और सृजन करती है. उसकी ताकत तर्क में नहीं, प्रेम में है. एक स्त्री को आदि से अंत तक बस प्रेम चाहिए होता है, निश्छल प्रेम. वही उसकी ताकत है, वही उसकी आकांक्षा. लेकिन ऐसा भी नहीं है कि तर्क का जवाब नहीं दे सकती. कच, पिता के उदार से निकलने के बाद तुम मेरे भाई बन गए और अपने जाने तुमने बड़ी तीरंदाजी कर दिखाई, लेकिन कभी इस पर सोचा है है कि कुत्तों के पेट से निकलने के बाद तुम क्या हुए थे!

तुम तुनकना मत. मैं तुम्हें चिढ़ा नहीं रही, न ही गलिया रही हूँ. मैं तो बस तुम्हारे छल को तुम्हारे सामने कर रही हूँ. पुरुष जब अपने ही रचे छल से रू-ब-रू होता है तब क्या होता है, यह सब अब पता है मुझे. लेकिन तुम पर आज दया करने के सिवा और कुछ नहीं कर सकती. तुम मेरी ओर से शांत हो. जाओ कच, पिता द्वारा सीखे मंत्रों के सहारे देवताओं के फौज-फाटे सजाओ और जरूरत पड़ने पर उन्हें संजीवनी का आसव पिलाओ. अपने कुल की इस निष्काम सेवा के लिए तुम्हें कितना याद किया जायेगा, नहीं जानती. लेकिन मानवता के इतिहास में तुम्हारी कैसी जगह होगी, इसे अवश्य जानती हूँ. तुम इतिहास के कूड़ेदान में चले जाओगे कच. तुम्हारे मंत्रों का कोई मोल नहीं रहेगा. तुम सहित तुम्हारे सरे देवता पत्थर बन जायेंगे. यही अमरता होगी. यही होगा तुम्हारे मंत्रों का मोल. तुम, तेरे मंत्र और मंत्रदाता सब मर चुकेंगे, बची रहेगी केवल देवयानी.

और ययाति तुम! हो सके तो मुझे क्षमा करना. और यह इसलिए कि आज स्वीकारती हूँ कि तेरे साथ मैं ईमानदार नहीं रह सकी. तुमने मुझे अंधे कुएँ से निकाला और मेरे पति बने. लेकिन शायद मैं कभी तुम्हारी पत्नी नहीं बन पाई. तुमसे मेरी अनर्गल अपेक्षा थी कि तुम मेरे देवयानी को समझो. लेकिन तुम देवता नहीं, मनुष्य थे. तुम्हारी अपनी अपेक्षाएँ थीं. तुमने मुझमें स्वयं को ढूँढना चाहा. जैसा कि मैंने समझा, तुमने स्वयं को मुझ पर न्योछावर कर दिया. बावली मैं ऐसी कि तुम्हारे प्रेम को समझ नहीं सकी. मैं तो एक त्वरा में थी. एक सम्मोहन में, और कच मुझ पर पूरी तरह छाया था. मैं तुममें भी लगातार कच ही ढूँढती रह गई. तुममें कच की तलाश करते-करते मैं तुम्हारे पुत्रों की माँ बन गई, लेकिन मेरी तलाश बंद नहीं हुई. आज सोचती हूँ तो लगता है, कहूँ, ईश्वर तुम यदि कहीं हो तो, ऐसा दाम्पत्य किसी को मत देना. शर्मिष्ठा जब मेरी सहेली हुआ करती थी, उसने एक कथा सुनाई थी. एक रानी झरोखे में बैठकर नित्य प्रतिदिन देर तक राजपथ का अवलोकन करती थी. राजपथ पर एक से एक कुमार सुबह-शाम भ्रमण के लिए निकलते थे. रानी उन्हें निहारती रहती थी. फिर किसी एक को मन के एकांत में सुरक्षित बैठा लेती थी. जब वह पति के साथ होती थी, मुंदी आँखों के बीच उस कुमार को मन में साकार करती थी और भूल ही जाती थी कि वह पति के बाँहों में है. यद्यपि  कि रानी ने किसी पर-पुरुष को कभी छुआ तक नहीं, लेकिन इस मानसिक चालाकी से वह नित्य नए पुरुष का आस्वाद करती थी. इसी के समांतर उसी नगर में एक गणिका थी, जो कभी किसी की प्रेयसी हुआ करती थी. परिस्थितियों ने उसे गणिका बना दिया था और ऐसे में उसकी विवशता थी कि वह रोज कई अनचाहे पुरुषों की अंकशायिनी बने. वह गणिका बनती तो थी कई की अंकशायिनी, लेकिन मन में केवल अपने प्रेमी को साकार करती थी. इस तरह अनेक पुरुषों में वह केवल एक को प्राप्त करती थी. कथा सुनाकार शर्मिष्ठा ने मुझसे पूछा था, रानी और गणिका में कौन है सती? मैं शर्मिष्ठा का मुँह ताकती रह गई थी. मेरे लिए तय कर पाना बहुत मुश्किल हुआ था. आज मैं इस कथा-पहेली का जवाब दे सकती हूँ. ययाति, तुम्हारे पास केवल मेरा शरीर थे. मन का कोना तक कभी तुम्हें छूने नहीं दिया मैंने. और आज इसलिए तुम पर मैं दयार्द्र हूँ. तुम्हारी हर हरकत के लिए मैं और केवल मैं जिम्मेवार हूँ. इतना भी अभागा पति होता है कहीं कि उसमें किसी अन्य पुरुष की तलाश उसकी पत्नी कर रही हो?



लेकिन क्या करूँ ययाति! मैं विवश हूँ, सारी देवयानियाँ विवश होती हैं, वे केवल कच के लिए बनी होती हैं. मैं केवल कच के लिए बनी थी. देवशिशु के लिए बनी थी. वह छली था, धोखेबाज था, लेकिन कच तो केवल वही था. आज अपनी एकांत अभिलाषा तुझसे कहूँ? रंज मत होना. यदि होना भी तो इतना मत कि मेरे उमंग की पूरी त्वरा ही टूट जाय. क्योंकि अवसाद के इन सांद्र आवेगों के बीच भी आज मैं पूरी तरह विमुक्त, अपने आसमान में अपनी ही दीप्ति से दमक रही हूँ. लेकिन हे हतभाग्य! ऐसे क्षणों में भी कच ही मेरे मन का केंद्रक है. और जिस एकांत अभिलाषा की बात कर रही थी, वह यही कि तुम क्षण भर के लिए ही सही एक बार कच बन जाओ न! कोशिश करके देखो.

...और फिर तो तुम कुछ भी करो ययाति. मुझे धोखा दो, छल करो या जी भरकर सताओ. तुम पा जाओ हजार-हजार शर्मिष्ठाएँ और हजार-हजार जवानियाँ, तुमसे हमारी कोई ईर्ष्या नहीं होगी.

लेकिन मैं फिर बहक गई. फिर अपनी ही कहानी ले बैठी. चली थी तुम्हारा दर्द समझने-सहलाने, बैठकर अपना ही कपास ओटने लगी. लेकिन तुम तो जानते हो मैं स्वस्थ नहीं हूँ और कब क्या कर बैठूँगी, स्वयं भी नहीं जानती. आख़िर हूँ तो शुक्राचार्य की ही बेटी. थोड़ा-सा झक्की तो होना ही चाहिए न!

मैं जानती हूँ तुम्हारे अनुभव अच्छे नहीं हैं. फिर भी कहूँगी, अभी मुझ पर विश्वास करो. आज पूरे अंतर्मन से कामना कर रही हूँ कि जो सुख मैं तुम्हें कभी नहीं दे सकी, वह सुख तुम शर्मिष्ठा से पा सको. आज मैं कह सकने की स्थिति में हूँ कि तुम्हारे सुख से मैं भी किंचित सुखी होऊँगी. जिस सुख की सदा मैंने आकांक्षा की, वह मेरे हिस्से नहीं तो, तेरे ही हिस्से सही. मैं इसे जानकर संतुष्ट होऊँगी. मेरा बोध मुझे संतुष्ट करेगा. मैं झूठ नहीं कहूँगी, अपना गुनाह कबूलने में संकोच भी नहीं करूंगी. मैंने पूरे दाम्पत्य में जितना तुझे सताया है, उस पर सचमुच शर्मिंदा हूँ. एक विवश स्त्री का यह अपराध यदि क्षमा कर सको, तो आभार स्वीकारूँगी.

और शर्मिष्ठा अब तुम भी! सबसे पहले तो मेरे लिए यह तय कर पाना मुश्किल है कि तुझे क्या कहकर संबोधित करूँ. मेरी बाल सखा! आज तू मेरी सौत है. मेरे बारे में तुम्हारे ख़याल कैसे होंगे समझती हूँ. मित्रता का धर्म मैंने नहीं निभाया, इसे स्वीकार करने में मुझे आज कोई संकोच नहीं है, सखी! अपराध स्वीकारती हूँ. तुम्हारे पिता के लाख अनुनय और अपने पिता के लगातार समझाने के बावजूद मैंने तुम्हें दासी बनाने की ज़िद की. मैं इतने गुस्से में थी कि तुम्हारी आँखों में दोल रहे प्रायश्चित को भी नहीं पहचान सकी. क्या उस बार हमारी लड़ाई कोई पहली बार हुई थी? और हुआ ही क्या था, हम दोनों ने एक-दूसरे को पहन लिया था? बस यही न! लेकिन तुमने तो हद ही कर दी थी. ठीक है, झोंटा-झोंटी मैंने ही शुरू की, लेकिन मैंने तो तुम्हें राजकुमारी कभी नहीं माना, तुम तो मेरी सखी भर थी. उस समय अचानक राजकुमारी कैसे बन बैठी और उस पर भी एक से बढ़कर एक बात. शर्मिष्ठा सोच जरा, क्या-क्या कहा था तूने! हम तुम्हारे पिता के टुकड़ों पर पलते हैं. वृषपर्वा की प्रगल्भ राजकुमारी को क्या यह बात शोभा देती है, तुम्हीं कहो न! तुमने मुझे सखी से ब्राह्मण की बेटी बना दिया. इससे भी न हुआ तो कुएँ में धकेल दिया. तुमने तो अपने जाने मार ही दिया था, मुझे...और ऐसे में ययाति आये. जब मुझे मालूम हुआ कि वे हस्तिनापुर के राजा हैं, तो तुम्हारी बातें एक बार कौंध गई. ययाति की आँखों में लालसा थी. मेरे ह्रदय में प्रतिशोध की ज्वाला. हमारे विवाह के आधार यही थे. पिता को इस प्रतिलोम विवाह पर आपति थी. मैंने उन्हें तैयार किया. और इस तरह मैं हस्तिनापुर की रानी बन गई. आश्वस्त हुई कि अब कोई मुझे टुकड़ों पर पलने वाली नहीं कहेगा. तू राजकुमारी तो मैं रानी. लेकिन इतने भर से मेरे ह्रदय की आग कैसे बुझती.

जब मेरे पिता क्रुद्ध हुए तो वृषपर्वा का असुर-राज दोल गया और आह सखी, राजनीति भी क्या चीज है. वृषपर्वा ने सचमुच तुम्हें हमारे हाल पर छोड़ दिया और मेरी मति ऐसी मारी गई कि तुम्हें दासी बनाने की ज़िद कर बैठी. अपने पिता, असुरों के हित के लिए तुमने दासी होना स्वीकार लिया.

 शर्मिष्ठा! मैं भूल ही गई कि प्रतिशोध से किसी शुभ की शुरूआत नहीं हो सकती. तुमने सब कुछ सह लिया. हस्तिनापुर में मैंने तुम्हें जितना सताया, उन सबके लिए मैं शर्मिंदा हूँ. तुमने मुझे जो कुछ कहा था, गुस्से में कहा था. लेकिन मैं तो सबकुछ होश में कर रही थी. कभी-कभी तो सोचती हूँ मैं हूँ ही ऐसी. और यही तो है, जिसके कारण मैं कभी कुछ नहीं बन सकी, न पत्नी, न प्रेमिका, न सखी. यह भाव सांद्र होते ही मैं अपराध-बोध से भर जाती हूँ.

आज तुम ययाति की प्रेयसी हो, पत्नी भी, अन्या होकर भी अनन्या. मैं तो कहीं की नहीं रही.... लेकिन मेरे कथन का यह अर्थ मत लेना कि कहीं का होना चाहती हूँ. या तुम्हारे सुख पर किंचित मात्र भी ईर्ष्या पालती हूँ. शर्मिष्ठा! मेरी सखी, यदि तुम्हें विश्वास न हो तो अपने पुत्रों- यदु-तुर्वसु को साक्षी बनाकर कहूँगी कि आज मेरी धडकनों के पाशर्व में केवल तुम हो. मैं समझती हूँ जितना सार्थक और विश्वस्त संवाद तुमसे कर सकूंगी, किसी से नहीं कर सकूंगी.

सखी, तुम यह मत समझना कि मैं दुखी हूँ और पिता के घर किसी रंजगी में बैठी हूँ. हस्तिनापुर से मेरा कोई मोह, कोई आकर्षण नहीं है. उसके प्रति कोई उत्तरदायित्व हो तो उसे तुम संभाल देना. मैं इन तमाम सांसारिकता और सामाजिकता से ऊब चुकी हूँ. बहुत भटक चुकी, अब नहीं भटकना चाहती. मैं समझती हूँ मनुष्य, चाहे वो स्त्री हो या पुरुष, दो तरह से सुख की तलाश करता है. पहले तो वह सांसारिक बनता है. अपना सुख दुनिया के अन्य कारकों में में खोजना चाहता है. और जब थक जाता है तो वह अपने ही भीतर प्रवेश करता है, इस तलाश में. तुम इसे आध्यात्मिकता भी कह सकती हो. शर्मिष्ठा? तुम तो जानती हो सुख की तलाश में मैं किस हद तक सांसारिक बनी. कच और ययाति के पौरुष, हस्तिनापुर की समृद्धि, तुम जैसी राजकुमारी को सताने के अहम् सब मैंने देखे. सब में सुख की तलाश की. किंतु कितना सुखी हूँ, वह केवल मैं जानती हूँ.

इसलिए एक बार फिर मैं अपने देवयानी को तिनका-तिनका जोड़ रही हूँ और इसमें मुझे सचमुच का रचनात्मक सुख मिल रहा है. इस सुख की व्याख्या करना मुश्किल है, लेकिन अनुभूत आनंद अद्भुत है. आनंद की वर्षा में मैं नहा रही हूँ. मेरा सारा कलुष मिट गया है. मैं आज पूरी तरह विमुक्त केवल देवयानी हूँ.
लेकिन शर्मिष्ठा, मैं तुमसे कुछ पूछना चाहती हूँ और इसे एक सौत का नहीं, एक सखी का सवाल मानकर ईमानदार उत्तर देने की कोशिश करना. क्या तुम सचमुच ययाति से प्रेम करती हो? अनुपूरक सवाल यह भी होगा कि क्या सचमुच ययाति प्रेम करने लायक है? कहीं ऐसा तो नहीं कि जैसे मैं उसमें लगातार कच तलाशती रही, तुम उसमें देवयानी तलाश रही हो. कहीं एक बार फिर ययाति इस्तेमाल तो नहीं किया जा रहा है! मेरी सखी, कहो न, ऐसा नहीं है न!
(यह कहानी 66 / बया, जून, 2007 में प्रकाशित है.)
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