जेएनयू बलात्कार और वामपंथ का अवसरवाद

 मुकेश कुमार

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) अकादमिक लिहाज से ही नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक माहौल की दृष्टि से भी देश का सर्वोत्कृष्ट शिक्षण संस्थान है। देश-दुनिया के ज्वलंत प्रश्नों- घटनाओं पर तुरंत प्रतिक्रिया व प्रतिवाद करता है, जेएनयू। यह लंबे समय से वामपंथी-प्रगतिशील विचारों व राजनीतिक व्यवहार की अग्रिम चौकी बना हुआ है। सवाल चाहे जेंडर इक्वलिटी व जस्टिस का हो या फिर सोशल जस्टिस का, लोकतंत्र-धर्मनिरपेक्षता का प्रश्न हो या मानवाधिकार का, जेएनयू कम्युनिटी संवेदनशीलता-प्रतिबद्धता और वैचारिक-राजनीतिक दृष्टि का मानदंड रचता है।



शायद जेएनयू ही ऐसी जगह है, जहां G S C A S H ( जेंडर सेंसेटाइजेशन एंड कमिटी अगेंस्ट सेक्सुअल हरासमेंट ) सबसे प्रभावी व सक्रिय है। लेकिन पिछले दिनों (20 अगस्त) को एक शोध-छात्रा के साथ भाकपा-माले के छात्र संगठन ‘आइसा’ के एक लीडिंग फिगर अनमोल रतन ने छात्रावास में बलात्कार किया। इस घटना और इसके बाद जेएनयूएसयू, जेएनयू में मौजूद विभिन्न संगठनों, महिला संगठनों सहित वामपंथी पार्टियों के रवैये ने बहुत सारे सवालों को सामने लाया है।

वामपंथी  छात्र ताराशंकर के फेसबुक वाल से –
“स्त्री द्वेष और यौन कुंठा लोगों में इतने गहरे धँसी है कि लैंगिक शोषण इस समाज में सर्वाधिक व्यापक अपराध है। बलात्कार कोई अचानक घटित घटना नहीं, बल्कि एक बहुत गहरे स्त्री द्वेषी सोच का परिणाम होता है। बलात्कार हम सबकी, पूरे समाज की सामूहिक विफलता का सूचक है। इसलिए मैं बार-बार कहता हूँ कि जेंडर इश्यू एक ऐसा लिट्मस टेस्ट है, जिस पर बड़े-बड़े ‘प्रगतिशीलों’ की कलई खुल जाती है। प्रगतिशील राजनीति करना और उसे जिंदगी में उतारना दो अलग-अलग बातें हैं! जेंडर जस्टिस या सामाजिक न्याय की कोई भी लड़ाई इस दोमुहेपन  के साथ कतई नहीं लड़ी जा सकती है! बहुत जरूरी है कि जिंदगी की बुनियादी बातों के साथ जेंडर-सेंसिटाईजेशन शिक्षा, एक्टिविज़्म अथवा राजनीति के हर स्टार पर ताउम्र चलने वाला अनिवार्य प्रयास हो। बेहद शर्मिंदा महसूस कर रहा हूँ जेएनयू में घटित बलात्कार की कथित घटना पर! दुख, गुस्सा और शर्मिंदगी तीनों एक साथ सहन करना मुश्किल हो रहा है।”

पूरे देश को याद है, 16 दिसंबर, 2012 को मुनिरिका के पास एक छात्रा के साथ बर्बर गैंगरेप के बाद जेएनयू कम्यूनिटी की प्रेरणादायी लड़ाई! हाँ, इस लड़ाई ने महिलाओं के सम्मान, अधिकार, बराबरी व आजादी के प्रश्नों पर विमर्श को नई ऊंचाई भी दी। जेंडर इश्यू पर देश की संवेदनशीलता व समझ को आगे ले जाने का काम किया। इस लड़ाई में आइसा की भूमिका भी काबिले तारीफ (!) रही और जेएनयू और आइसा से रिश्ता रखने वाली वर्तमान में भाकपा-माले की पॉलिट ब्यूरो मेंबर कविता कृष्णन महिलाओं की ‘बेखौफ आजादी’ की आवाज बनकर सामने आईं। लेकिन जब जेएनयू में ही आइसा के लीडिंग फिगर के जरिये एक शोध छात्रा के साथ बलात्कार का मामला सामने आया, तब क्या हुआ। कविता कृष्णन ने शायद 120 घंटे गुजर जाने के बाद फेसबुक पर एक पोस्ट डाला, जब उनकी चुप्पी पर सवाल उठने लगा। इस बीच उन्होंने कम-से कम एक दर्जन पोस्ट लिखे। खैर कविता कृष्णन और उनका महिला संगठन ‘ऐपवा’, जिस संगठन की वे  राष्ट्रीय सचिव भी हैं, सड़कों पर उतारने की हिम्मत नहीं दिखा पाया। जबकि आइसा और ऐपवा के साथ कविता कृष्णन ऐसे गंभीर मामले पर तुरंत प्रतिक्रिया के लिए जानी  जाती हैं। गंभीर इसलिए भी कि मामला जेएनयू जैसे कैंपस के भीतर का था और वह भी आइसा के लीडर की संलिप्तता थी। यों भी कविता फेसबुक और ट्विटर पर 24 घंटे में कई एक पोस्ट और ट्विट के लिए जानी जाती हैं। भाकपा-माले के पूर्व महासचिव और कम्युनिस्ट सिद्धांतकार विनोद मिश्र के शब्दों में- “कम्युनिस्ट नारी संगठन का विशेष कर्त्तव्य है नारियों की अपनी भूमिका को बढ़ाना। कारण, अंततः नारी को अपनी मुक्ति खुद हासिल करनी होगी। यहां तक कि हमारी पार्टी में भी महिला कार्यकर्त्ताओं की मर्यादा- हानि की घटनाएं घटित होती हैं। कुछ-कुछ पुरुष कार्यकर्त्ताओं द्वारा आम महिलाओं के प्रति बहुत ही गलत आचरणों की रिपोर्ट आती हैं। हम पार्टी संस्थाओं की ओर से अवश्य ही इन मामलों में कदम उठाते हैं। फिर भी मुझे लगता है कि इन मामलों में कम्यूनिस्ट नारी संगठनों को पार्टी पर निगरानी रखने और दबाव पैदा करने की भूमिका का भी पालन करना चाहिए।”विनोद मिश्र के ही शब्दों में- “...नारी मुक्ति संघर्ष की अपनी विशेषताएं हैं, अपनी स्वायत्तता है।”



हाँ, आइसा ने 21 अगस्त को बयान जारी कर कहा कि, “...अनमोल रतन पर लैंगिक उत्पीड़न करने का अपराधिक आरोप है, इस मामले को पूरी गंभीरता से लेते हुए आइसा उन्हें तत्काल प्राथमिक सदस्यता से बर्खास्त करती है। आइसा इस पूरे मामले में दृढ़ता से लैंगिक बराबरी और न्याय के उसूल पर खड़ी है। जब यौन हिंसा का आरोपी हमारा ही एक कार्यकर्त्ता हो, तो यह बेहद जरूरी हो जाता है कि हम गंभीर आत्म आलोचना करें। साथ ही साथ यह बात हमसे संगठन के बाहर और भीतर, सभी जगहों पर महिलाओं के प्रति संवेदनशीलता बनाने की बेहद अनिवार्य लड़ाई को और तेज करने की मांग करती है। यौन हिंसा के खिलाफ लड़ाई दूर-दराज के अंजाने उत्पीड़कों तक नहीं रुकती है। जब आरोपी अपने ही बीच से हो- चाहे वह अपने परिवार वाले हों, अपने मित्र हों, या अपने संगठन के सदस्य हों, तब इसके खिलाफ एक निर्मम लड़ाई लड़ना हमारे समक्ष एक असली और बेहद महत्वपूर्ण चुनौती बन जाता है। अपने सदस्यों के मामले में भी आइसा जेंडर-न्याय के सवाल पर दृढ़ता से खड़ी है। हम शिकायतकर्ता के साथ मजबूती से खड़े हैं और न्याय की उनकी लड़ाई में उन्हें हर संभव सहयोग करेंगे। न्याय के लिए पुलिस तत्काल जरूरी कदम उठाए। आरोपी के खिलाफ विश्वविद्यालय तत्काल अनुशासनात्मक कदम उठाये और उत्पीड़ित को हर संभव मदद दे।”


लेकिन आइसा के बयान के स्पिरिट के साथ उसका एक्शन सामने नहीं आता है
। इस तरह के मामले पर तुरंत प्रतिक्रिया देने व प्रतिवाद में उतारने वाला संगठन 25 अगस्त को सड़कों पर उतरा। इस बीच संगठन के नेता उक्त बयान की कॉपी को दिखाकर काम चलाते रहे। जेएनयू के इस मसले पर बिहार में केवल तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय में छात्रों के एक समूह ने प्रतिवाद किया। इस समूह के प्रमुख नेता व आइसा के पूर्व छात्र नेता  अंजनी का कहना है कि "क्या आरोपी किसी अन्य संगठन या फिर कोई और छात्र होता तो आइसा का यही रवैया रहता?  इस मामले में आइसा भी दिल्ली पुलिस और जेएनयू प्रशासन की तरह एक्शन में सुस्ती दिखाता है। साफ है इस मामले ने संगठन के भीतर पितृसत्ता की मजबूत जकड़न को सामने लाया है। जिसकी अभिव्यक्ति घटना और उसके बाद के रवैये में स्पष्ट रूप से दिखता है। आखिर क्यों इस तरह के तत्व संगठन में लीडिंग फिगर बन जाते हैं? मतलब साफ है संगठन अवसरवादी तौर-तरीके से बनाया-चलाया जा रहा है। इस तरह के संकट के साथ आप संघियों को रोक नहीं सकते हैं, बल्कि उसे आगे बढ्ने- हमला करने का मौका ही देते हैं।" अंजनी का कहना है कि "इस मामले पर अगर आइसा द्वारा तुरंत पहलकदमी ली जाती तो संगठन के भीतर और बाहर अच्छा संदेश जाता! यह कदम संगठन को जेंडर इश्यू पर संवेदनशील बनाने की लड़ाई की दिशा में ले जाता और व्यवहार में जेंडर-न्याय के सवाल पर दृढ़ता सामने लाता। लेकिन 25 अगस्त को प्रतिवाद में देर से आइसा के उतारने ने संगठन के संवेदनशीलता व प्रतिबद्धता से उपजे आवेग की  बजाय चौतरफा आलोचना के दबाव को ही सामने लाया।" अंजनी इस पूरे मामले पर नारीवादी व वामपंथी महिला संगठनों की चुप्पी को भी आश्चर्यजनक बताते हुए इन संगठनों को भी कहीं न कहीं अवसरवाद व पितृसत्ता के दलदल में फंसा हुआ मानते हैं।

बलात्कार की इस घटना और बाद की पूरी स्थिति पर भाकपा-माले के बिहार राज्य कमिटी से पूर्व में जुड़े रहे रिंकु कहते हैं कि " खासतौर पर आइसा सवालों के घेरे में है। बलात्कार तो पितृसत्तात्मक प्रतिक्रिया की चरम अभिव्यक्ति है। लेकिन क्या संभव है कि किसी व्यक्ति के भीतर लीडिंग फिगर बनने की पूरी प्रक्रिया में पितृसत्ता की प्रवृत्तियाँ नहीं दिखाई पड़ रही हों? एकाएक उस प्रवृत्ति की चरम अभिव्यक्ति ही सामने आती है, यह संभव नहीं है! मतलब साफ है आप जेंडर इश्यू पर संवेदनशील व गंभीर नहीं हैं! हाँ, इस मामले में भी यह बात सामने आई है कि प्रगतिशील राजनीति करने और उसे जीने में फर्क होता है! और यह फर्क तब संगठन में गहराई से जड़ें जमाने लगता है, जब आप किसी मसले पर संघर्ष व राजनीति करते हुए संवेदनशीलता, प्रतिबद्धता और चेतना के निर्माण के कार्यभार को भीतर से बाहर तक पीछे छोड़ देते हैं। ऐसी स्थिति में कोई भी मसला आपके लिए महज राजनीतिक हथकंडा होता है! आप अवसरवाद के दलदल में उतारने की ओर बढ़ चले हैं! घटना के बाद भी आइसा और कविता कृष्णन जैसी नेनतृ के रवैये ने इसे और भी साफ कर दिया है।"

इस मामले में आइसा पर सवाल दागने वालों को संघियों के पक्ष में खड़ा होने के  साथ ही जेएनयू छात्र संघ चुनाव में संघी ब्रिगेड को मदद पहुंचाने और जेएनयू पर संघी हमले को मजबूत बनाने का आरोप झेलना पड़ रहा है। वामपंथी-प्रगतिशील समुदाय के एक हिस्से से दबे स्वर में यह भी सुनाई पड़ रहा है कि इस मसले पर चुप्पी साध ली जाय। क्योंकि इसका फाइदा संघ ब्रिगेड ले लेगा। ऐसे लोग वर्तमान परिस्थिति, जेएनयू पर जारी संघी हमले और जेएनयू छात्र संघ चुनाव को ध्यान में रखने की बात कर रहे हैं। हाँ, इस मामले में वामपंथी-प्रगतिशील समुदाय के कमोबेश चुप्पी और जेएनयू कम्यूनिटी के रवैये से भी यह साफ है।

घटना के पांचवे दिन एपवा नेतृ कविता कृष्णन का पोस्ट


रिंकु कहते हैं कि " सबसे पहले तो इस मसले से संघ ब्रिगेड का कोई लेना-देना नहीं है। वामपंथी-प्रगतिशील तबके पर उठने वाले किसी भी सवाल को दबाने के लिए सवाल खड़ा करने वाले को संघी ब्रिगेड के साथ खड़ा कर देना संघी औज़ार का इस्तेमाल ही है। यह कहीं से भी लोकतांत्रिक आंदोलन के हित में नहीं है। यह पुराना तर्क ही है  जो वामपंथी आंदोलन में बड़े भाई सीपीएम-सीपीआई सिंगूर-नंदीग्राम जैसे मामलों में वे -लोकतांत्रिक सर्किल से सवाल उठाने पर गढ़ते रहे हैं। जहां तक सवाल है कि जेएनयू छात्र संघ चुनाव है और बलात्कार मामले पर सवाल उठाने से जेएनयू में संघी ब्रिगेड को फायदा मिलेगा, इसलिए चुप रहा जाए! तो क्या यह अवसरवाद नहीं है? क्या संघी ब्रिगेड से लड़ाई में जेएनयू बलात्कार मामले को दबा देंगे? इस रास्ते से तो जेंडर संवेदनशीलता के निर्माण की लड़ाई आगे नहीं बढ़ेगी! जैसा कि पता चल रहा है लेफ्ट यूनिटी द्वारा जेएनयू चुनाव में इस मसले को दबा दिया गया है। चुनावी सफलता की जिद जेंडर संवेदनशीलता को आगे बढ़ाने, बलात्कार मामले पर सार्थक चर्चा और लोकतांत्रिक चेतना को आगे बढ़ाने की जरूरत की कुर्बानी ले रही है। केवल जेएनयू छात्र संघ पर किसी तरीके से कब्जा कर ही संघी ब्रिगेड के खिलाफ जेएनयू को बचाने की लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती है! पिछले दौर में जेएनयू पर संघी हमले का निर्णायक प्रतिरोध केवल छात्र संघ में लेफ्ट की मौजूदगी और कुछ करिश्माई नेताओं के जरिये नहीं हुआ है, निर्णायक प्रतिरोध महज कुछ संगठनों के बल पर नहीं खड़ा हुआ है। बल्कि निर्णायक प्रतिरोध जेएनयू कम्यूनिटी के लोकतांत्रिक चेतना के बल पर सामने आया है। सबसे महत्वपूर्ण और निर्णायक है- जेएनयू कम्युनिटी की लोकतांत्रिक चेतना! इस चेतना को विकसित करने के बजाय कमजोर कर संघी ब्रिगेड के खिलाफ न ही जेएनयू के भीतर और न ही बाहर निर्णायक लड़ाई हो सकती है। बेशक कुछ संगठनों के लिए चुनावी जीत ही केवल महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन जेएनयू में छात्र- छात्राएं संघी ब्रिगेड को भी चोट देना जारी रखेंगे और उन्हें सिंगूर-नंदीग्राम के साथ तापसी मलिक भी याद रहेंगी! वे शोध-छात्रा के साथ हुए बलात्कार को भी नहीं भूलेंगे और न ही जेंडर संवेदनशीलता को आगे ले जाने व पितृसत्ता को भी चोट देना छोड़ेंगे!"

मुकेश कुमार गांधी विचार में पीएचडी के बाद आजकल पोस्ट पीएचडी के लिए शोध कर रहे हैं.  
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