जाति पर डाका : हिंदी साहित्य में जातिविमर्श

नीरा परमार
 कविता, कहानी और शोध -आलोचना के क्षेत्र में योगदान. एक कविता और कहानी संग्रह प्रकाशित . संपर्क : parmarn08@gmail.com
पढें और समझें कि कैसे साहित्यिक-सांस्कृतिक हस्तियों को सवर्ण बनाया जाता रहा है, उनके गैर सवर्ण होने के बावजूद

प्राचीन काल से भारतीय चिंतन परंपरा और साधना में समाज के हर वर्ग में क्रांतिकारी व्यक्तित्व जन्म लेते रहे हैं. समाज के अभिजात वर्ग से ज्ञान-साधक, युग-प्रवर्तक आते रहे हैं, तो, निम्न कही जाने वाली जातियों में भी ज्ञानमार्गी चिंतक और धर्म-साधक तथा प्रेम-भक्ति का प्रसार करने वाले जन-चेतना के संवाहक विचारक भी होते रहे हैं. इस परम्परा में होने वाले सिद्धों में कंकालीपा शूद्र थे, मीनपा मछुआ थे, चमारिपा चमार थे तथा शालिपा शूद्र जाति में जन्मे थे. नाथों की परंपरा में मत्स्येन्द्रनाथ मछली मारने वाली कैवर्त जाति में उत्पन्न हुए थे, तांतिपा तांती थे, कमारो लुहार थे. संतों की निर्गुण धारा में रैदास चमार, धर्मदास बनिया, सेन नाई, दादू मोची या धुनिया थे. इसी प्रकार रामभक्ति शाखा में नाभाजी डोम कही जानेवाली शूद्र जाति में उत्पन्न हुए थे. कुछ लोगों ने भ्रम फैलाया कि वे क्षत्रिय जाति में जन्मे थे.

आरम्भ से ही अनेक संतों और भक्तों ने भारत की संस्कृति को समृद्ध किया है, लेकिन ब्राह्मणवादी व्यवस्था के पोषकों ने इस सत्य को नकार देना चाहा है. जब-जब निम्न जाति में किसी असाधारण प्रतिभा ने जन्म लिया है, उनके साथ अनेक प्रकार की झूठी, मनगढ़ंत, अंधविश्वास से भरी कपोलकल्पित अलौकिक घटनाओं को जोड़कर बड़ी ही चालाकी के साथ एक सोची-समझी गई साजिश के तहत येन-केन-प्रकारेण
इन्हें उच्च जाति का प्रमाणित किया गया है. तथाकथित सवर्ण वर्गों में यह भ्रम है कि निम्न कही जाने वाली जातियों में साधक, भक्त या संत जन्म ले ही नहीं सकते, अतिविशिष्ट और प्रतिभा संपन्न मात्र उच्च जाति की ही धरोहर हो सकते हैं. इस तर्कहीन विचारधारा को पुष्ट करने में बड़े-बड़े आचार्यों का भी हाथ रहा है. गोरखनाथ का आविर्भाव नाथ परंपरा में हुआ था. शंकराचार्य के बाद भारतवर्ष में इतना प्रभावशाली और महिमावान व्यक्तित्व गोरखनाथ का ही हुआ. स्वयं हज़ारी प्रसाद द्विवेदी यह मानते हैं कि भक्ति आंदोलन के पूर्व सबसे शक्तिशाली धार्मिक आंदोलन गोरखनाथ का योगमार्ग ही था.(1) ‘नाथ संप्रदाय’ में उन्होंने एक विचित्र कल्पना की है, जो इस प्रकार है: ‘‘मेरा अनुमान है कि गोरखनाथ निश्चित रूप से ब्राह्मण जाति में उत्पन्न हुए थे और ब्राह्मण वातावरण में बड़े हुए थे.’’(2) इस अनुभव का क्या आधार अथवा तर्क है? वे शंकराचार्य के समान गोरखनाथ जैसे असाधारण युग-पुरुष को निःसंकोच ब्राह्मणों की बिरादरी में शामिल करने का प्रयत्न करते हैं.

राहुल सांकृत्यायन ने सिद्धों के सिद्ध तांतिया(3) को तांती माना है, लेकिन ‘गंगा’ के पुरातत्वांक(4) में उन्होंने ही इन्हें मगध देशवासी ब्राह्मण बतलाया है. प्रश्न है कि एक ही व्यक्ति की दो जातियां कैसे हो सकती हैं? संत परंपरा की निर्गुणधारा में रैदास रविदास चमार जाति में उत्पन्न बतलाए जाते हैं, पर उन्हें भी ब्राह्मण प्रमाणित करने के लिए विचित्र कल्पना की गई है. संत अनंतदास ने ‘भक्त चरित्र और रैदास की परिचै’ में रैदास के पूर्व जन्म में ब्राह्मण होने की कल्पना की है.(5) प्रियादास लिखी ‘भक्तमाल की टीका’, ‘भक्तिरस बोधिनी’ में भी इसका उल्लेख है कि संभवतः पूर्वजन्म में ब्राह्मण रह चुकने के कारण ही उन्होंने चमार के घर जन्म लेकर भी अपनी मां का दूध नहीं पिया था. स्वामी रामानंद ने आकर जब उन्हें उपदेश दिया और अपना शिष्य बनाया तभी उन्होंने माता का स्तन-पान आरंभ किया.(6) इसी प्रकार ‘रैदास रामायण’ में भी उन्हें पिपलार गोत्र अरु सूर्य रासी ‘कहकर द्विज प्रमाणित करने का प्रयास किया गया है.’ भविष्य पुराण में एकक्षेपक जोड़कर यह कल्पित कहानी दी गई है कि रैदास सूर्यवंश के थे. उन्हें भगवान भास्कर का दूसरा पुत्र बतलाया गया है. इस संबंध में कथा इस प्रकार दी गई है: ‘एक बार शनि, राहु और केतु के प्रकोप को रोकने के लिए सूर्य ने अपने दो पुत्रों को धरती पर भेजा. बड़ा पुत्र इड़ापति (छागन्ह) कसाई के घर सघन नाम से अवतरित हुआ और दूसरा पिंगलापति मानसदास चमार के यहां रैदास के नाम से अवतरित हुआ.(7) इस कपोल कल्पित कथानक की उपयोगिता यही प्रतीत होती है कि यदि रैदास पूर्वजन्म में ब्राह्मण न होते तो इस जन्म में इतने बड़े संत न हो पाते. इस प्रकार की कथाएं इन जातिवादी संकीर्ण मनोवृत्ति को प्रकट करती हैं, जो बिल्कुल तर्कहीन एवं तथ्यहीन हैं. अपनी जाति को लेकर रैदास के मन में केाई कुंठा नहीं है. रविदास की जाति चमार थी, इस तथ्य को लेकर वे अपनी रचनाओं में पर्याप्त मुखर हैं:

(क) नागर जना मेरी जाति विख्यात चमार (ख) कहि रविदास खलास चमारा



जिस रूप में उन्होंने जाति का उल्लेख किया है, उससे यह ध्वनि निकलती है कि संभवतः इसके कारण उन्हें कई तरह की पीड़ाएं झेलनी पड़ी होंगी. अपनी रचनाओं में रविदास ने खुलकर अपने पेशे का वर्णन किया है
जाके कुटुंब के ढेढसभ ढोर ढोवंत.
आभिजात्य वर्ग के लोग, जिन्होंने उन्हें ब्राह्मण सिद्ध करने का प्रयास किया था, इस स्वीकारोक्ति की व्याख्या अजीबोगरीब ढंग से करते हैं कि उनके पिता पशुओं का व्यापार करते थे और समृद्ध व्यापारी थे. इस संबंध में अंतः साक्ष्य सिद्ध तथ्य यह है कि रैदास जूता बनाकर या जूता गांठकर अपनी जीविका चलाते थे. रैदास जात-पांत के घोर विरोधी थे. यदि वे उच्च कुलोद्भव होते तो जाति का झूठा अहंकार पालने के बदले उसका विरोध नहीं करते. रविदास जन्म के कारने होत न कोउ नीच / नर कू नीच करि डारिहै ओछे करम की कीच.
इसके विपरीत तुलसीदास का ब्राह्मणत्व का अहंकार यत्र-तत्र दिखलाई पड़ जाना स्वाभाविक है
पूजिय विप्र गयान गुन हीना. / नहि न सूद्र गुन ग्यान प्रबीना..

इस दंभपूर्ण विचारधारा का प्रतिकार करते हुए रैदास का कथन है कि जन्म से मनुष्य शूद्र नहीं पैदा होता है. उसकी पूजा गुणों के कारण होनी चाहिए, जाति अथवा जन्म के कारण नहीं. तुलसी की विचारधारा के विरुद्ध वे एक सहज मानवीय दृष्टि की प्रस्तावना करते हैं
रविदास ब्राह्मण मत पूजिए जउ होवे गुन हीन / पूजहि चरन चंडाल के जउ होवे गुन परवीन.
उनके लिए ब्राह्मण होकर गुणहीन होना गर्व की बात नहीं है, शूद्र होकर चरित्रवान और गुणवान होना ही उनके लिए गौरव की बात है, जबकि तुलसी के लिए जन्म से उच्च जाति का होना अधिक महत्व रखता है. संतों की जाति बताकर फिर उनका मूल्यांकन करना उनकी महत्ता को कम करके आंकना है. वस्तुतः संत की कोई जाति नहीं होती है, संत सिर्फ संत होते हैं. निर्गुणधारा के संत दादु मोची या धुनिया थे. संत कबीर की तरह इनके संबंध में भी तरह-तरह की भ्रांतिपूर्ण कथाएं फैली हुई हैं. संत दादु भी कबीर के समान ही साबरमती नदी में बहते हुए पाए गए थे. यानी वे जन्म से परित्यक्त कोई कलंकित बालक रहे होंगे और उनकी जाति का किसी को पता नहीं होगा. ऐसे लोगों को समाज निःसंदेह शूद्र मान लेता है.

ब्राह्मणवादी दृष्टि से हिंदी साहित्य के विश्लेषण में रामचंद्र शुक्ल अग्रणी नायक रहे हैं. उन्होंने हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन में विधेयवादी दृष्टि की प्रतिष्ठापना की है. यह एक श्रेय की बात है, पर कुछ कवि और लेखकों की जाति-निर्धारण के विश्लेषण के क्रम में उन्होंने जाति बताने का भी गैर जरूरी काम किया है. यह काम करते समय कई निम्न जाति में उत्पन्न कवियों और लेखकों में अधिकांश को ब्राह्मण और कुछ को सवर्ण घोषित किया है. कुछ उदाहरण देखे जा सकते हैं. कृष्ण भक्ति शाखा के वल्लभाचार्य के शिष्य परमानंद दास कन्नौज निवासी थे. आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के समान वे भी अनुमान लगा लेते हैं कि ‘‘इनका निवास-स्थान कन्नौज था. इसी से ये कान्यकुज्ज ब्राह्मण अनुमान किए जाते हैं.’’(8) उन्होंने तर्कहीन ढंग से यह अनुमान किया और यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि परमानंद दास कन्नौज निवासी होने के कारण ब्राह्मण थे. प्रश्न है कि क्या किसी व्यक्ति के कन्नौज में निवास करने से ही वह ब्राह्मण हो जाता है? यदि ऐसा है तो किसी टिप्पणी की जरूरत नहीं है.


इसी प्रकार रामभक्ति शाखा में नाभाजी जाति से डोम थे. कुछ लोगों ने उन्हें क्षत्रिय प्रमाणित करना चाहा है. रामचंद्र शुक्ल तुलसीदास के सवर्णवाद और मर्यादाबोध के प्रबल समर्थक हैं. उनकी वर्ण श्रेष्ठता को कभी भी कालजयी संत कबीर बर्दाश्त नहीं हुए. कबीर के मानवीय दृष्टि से संपन्न ज्ञान-बोध को उन्होंने अक्खड़ और फक्कड़ कहकर अस्वीकार कर दिया. आचार्य शुक्ल ने नाभादास और तुलसी-मिलन प्रसंग को जिस रूप में प्रस्तुत किया है, वह नितांत अविश्वसनीय है. संदेह नहीं कि उसे सिर्फ तुलसी को महिमामंडित करने के लिए ही उस रूप में प्रस्तुत किया गया है. शुक्ल जी द्वारा उद्धृत प्रसंग इस प्रकार है, ‘‘ऐसा प्रसिद्ध है कि एक बार गोस्वामी तुलसीदास से मिलने वे (नाभादास) काशी गए. पर उस समय गोस्वामी जी ध्यान में थे. इसलिए न मिल सके. नाभाजी उसी दिन वृंदावन चले गए. ध्यान-भंग होने पर गोस्वामी जी को बड़ा खेद हुआ. और वे तुरंत नाभाजी से मिलने वृंदावन चले गए. नाभाजी के यहां वैष्णवों का भंडारा था, जिसमें गोस्वामी जी बिना बुलाए जा पहुंचे. गोस्वामीजी यह समझकर कि नाभाजी ने मुझे अभिमानी न समझा हो सबसे दूर एक किनारे बुरी जगह बैठ गए. नाभाजी ने जान-बूझकर उनकी और ध्यान न दिया. परसने के समय कोई पात्र नही मिल रहा था जिसमें गोस्वामीजी को खीर दी जाती. यह देखकर गोस्वामी जी एक साधु का जूता उठा लाए और बोले इससे सुंदर पात्र मेरे लिए क्या होगा? इस पर नाभाजी ने उठकर उन्हें गले लगा लिया और गद्गद् हो गए.’’(9)

 इस प्रसंग की तर्कहीनता और कपोलकल्पना से स्वयं शुक्ल जी भी अपरिचित नहीं थे. वे स्वयं यह मानते हैं कि ‘‘यह वृत्तांत कहां तक ठीक है, नहीं कहा जा सकता, क्योंकि गोस्वामी जी खान-पान का विचार करने वाले स्मार्त वैष्णव थे.(10) इतना ही नहीं तुलसी की वर्ण श्रेष्ठता और अहंकारजन्य हठधर्मिता उनके रामचरित मानस के कई स्थलों पर झलकती है. अतः नाभादास के प्रसंग में तुलसी के संदर्भ में उपर्युक्त प्रसंग की योजना तुलसी की श्रेष्ठता के प्रति शुक्लजी का अतिरिक्त आग्रह ही माना जाएगा. हिंदी साहित्य के संत और कवि जो स्वयं अत्यंत संवेदनशील और जात-पांत की छोटी-छोटी भावनाओं से ऊपर हैं, इनके लेखन और साहित्य पर विचार करते समय उनकी जाति के संकीर्ण दायरों में घूमना, उनकी वर्ण और जाति श्रेष्ठता को इतर प्रकार से महत्व देना निश्चय ही एक विकृत सोच का परिणाम है. किसी का संत अथवा कवि होना ही क्या उसके व्यक्तित्व और साहित्य पर विचार करने के लिए काफी नहीं हैं, जाति के धरातल पर उसे गौरवान्वित करने का प्रयत्न कर हम क्या सिद्ध करना चाहते हैं? अथवा सवर्णवाद की गर्व-स्फीत घोषणा करना चाहते हैं? रामचंद्र शुक्ल के इतिहास ग्रंथ को यदि ध्यान से देखा जाए तो उसमें आरंभ से अंत तक द्विज दृष्टि की प्रधानता है. इतना ही नहीं उन्होंने बड़ी फुहड़ता से ब्राह्मण लेखकों के नाम के पूर्व पंडित और गैर-ब्राह्मण लेखकों के नाम के पूर्व ‘बाबू’ अथवा ‘श्री’ शब्द का प्रयोग किया है. यह सुखद है कि आज का लेखक अपनी प्रतिबद्धताओं, पक्षधरताओं के बावजूद स्पष्टतः ऐसी उद्घोषणाएं नहीं करता.


संदर्भ :

1. नाथ संप्रदाय, हजारी प्रसाद द्विवेदी, पृ. 106
2. वही, पृ. 107
3. पुरातत्व निबंधावली, राहुल सांकृत्यायन, पृ. 191
4. नाथ संप्रदाय, हजारी प्रसाद द्विवेदी, पृ. 168 से उद्धृत
5. संत रविदास, इंद्रराज सिंह, प्रकाशन विभाग, नई दिल्ली, पृ. 44 से उद्धृत
6. वही, पृ. 45
7. वही, पृ. 45
8. हिंदी साहित्य का इतिहास, रामचंद्र शुक्ल, पृ. 172
9. वही, पृ. 142
10. वही, पृ. 142

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