घर/कहानी

नीरा परमार
 कविता, कहानी और शोध -आलोचना के क्षेत्र में योगदान. एक कविता और कहानी संग्रह प्रकाशित . संपर्क : parmarn08@gmail.com
नीरा परमार हाशिये के साहित्यिक स्त्री विमर्श में उल्लेखनीय हस्ताक्षर है. कहानीकार, कवयित्री और शोधकर्ता के तौर पर उनका जो लेखन रहा है उसमें दलित, आदिवासी व वंचित समुदायों और स्त्री के प्रश्नों का मुख्य स्थान रहा है. उनकी यह कहानी जाति, वर्ग और स्त्री विमर्श तीनों कोण से पढ़ी जा सकती है.
फारूक शाह
कवि / आलोचक

बरसात खत्म होते-होते बंगला तैयार हो जाना चाहिए था. ठेकेदार को बंगले के मालिक ने कहा दिया था कि बंगलौर से आ रहे बेटे-बहू के साथ इस बार की बरसात वे नए बंगले में बिताएंगे. पुराने बंगले में रहते-रहते वे तंग आ चुके थे. नया बंगला वे बनवा भी बड़े शौक से रहे थे. ऊपर-नीचे बड़े-बड़े हॉलनुमा कमरे, बड़े-बड़े बरामदे विशाल लॉन, खुली छत, पूजा घर, सर्वेन्ट्स क्वाटर्स सब-कुछ उनकी छोटी-छोटी रुचियों और हुक्म को ध्यान में रखकर बन रहा था. इस बंगले को बनाने वाले रेजा-कुलिऐं में परबतिया और उसका घरवाला भी था. परबतिया और उसके घरवाले को इस बरसात अपने झोपड़े के खपरैल बदलने की चिंता खाए जा रही थी. पिछले साल ही उन दोनों ने कई बरसात से चूते घर की मरम्मत करवाने की ठानी थी, लेकिन घर पर एक के बाद एक मुसीबतें आती चली गईं और वे कर्ज में डूबते चले गए. पहले छोटे लड़के को मलेरिया हो गया, फिर परबतिया को माँ के मर जाने पर मायके चला जाना पड़ा. वहाँ से लौटी तो बूढ़ा ससुर कै-दस्त की चपेट में आ गया, वह जब तक सम्हले, सास ने खाट पकड़ ली. पिछली बरसात में छोटे-मोटे बरतन इधर-उधर रखे गए लेकिन पाँच-पाँच लड़का-लड़की, बूढ़ा और वे दोनों प्राणी बरसात की झड़ी में भीगते बीमार होते रहे. इस बरस अगर बरसात के पहले मरम्मत नहीं करवाई तो पूरे परिवार को पेड़ के नीचे गुजारा करना होगा.

बंगले की ढलाई आज खत्म हो गई थी. अब तेजी से टाइल्स बिछाने, दरवाजे़-खिड़कियाँ आदि लगवाने का काम शुरू होने वाला था. परबतिया की बड़ी लड़की मुँह अंधेरे उठकर माँ के काम में हाथ बंटाती, घर-आँगन बुहारना, कुएं से पानी लाना, भात पकाना ये सारे छोटे-बड़े काम वह माँ के साथ तेजी से निबटाती. सुबह ही बंगले पर पहुँचती. कल तक जहाँ सीमेंट और ईंट के बिखरे ढेर थे, आज वहीं भव्य आलीशान बंगला खड़ा था. सब मजदूरों ने झुलसती गर्मी में तन-मन से मेहनत की थी. देखते-देखते बंगले में शीशे की तरह चमकते रंग-बिरंगे टाईल्स बिछ गए. बाथरूम में हरे रंग के अन्य जगह हल्के भूरे. बगल की दीवारें भी हल्के पीले रंग में रंग उठी. एक-एक फर्श, एक-एक दीवारे चमक लिए अपनी खूबसूरती में एक दूसरे से जैसे होड़ लेने लगी. बंगले का मैनेजर दूसरे मजदूरों के साथ पुराने बंगले का फर्नीचर सजाने लगा. ड्राइंगरूम में आदमी समा जाए ऐसे मखमली विशाल सोफे, दीवान, दीवार तक सटे कारपेट, धूप-छांह से खेलते रेशमी पर्दें, विशाल झाड़फानूस, एक से एक नायाब कला कृतियाँ सज गई. बंगले के शयन कक्ष, पूजा-घर, बाथरूम भी धीरे-धीरे सामान से एक नयी आभा पाने लगे. बरामदे में भी लगा झूला जरा-सा छू लेने पर नदी में उठती लहरों-सा तरंगित हो उठता. सेठानी और कॉलेज में पढ़ने वाली उनकी बेटी नौकरों से सारा फर्नीचर इधर से उधर खिसकवाते रहती. सब इकट्ठे होते तो पुराने बंगले के दोष गिनाते और नए बंगले की एक-एक खूबियों की प्रशंसा करते नहीं अघाते.

परबतिया और उसका घरवाला मैनेजर के कहने पर बंगले के अंदर छुटा हुआ साफ-सफाई का काम निबटाने में लग गए. आसपास कोई नहीं रहने पर घरवाले की धीमी डपट के बावजूद परबतिया अपने खुरदरे हाथों से कभी रेशमी परदे को, कभी मखमली गलीचे तो कभी सोफे को छू लेती. सेठ जी के परिवार में उनकी लड़की का स्वभाव बहुत कड़ा था. इसलिए मैनेजर कोई ऐसी स्थिति आने न देना चाहता था, जिससे सबके सामने उसे जलील होना पड़े. बंगले का काम एक दो दिन में पूरी तरह से निबट जाने वाला था. सब मजदूर-रेजाओं को छुट्टी दे दी गई थी. बंगले की मालकिन ने परबतिया और उसके घरवाले को गृह-प्रवेश तक रोक लिया था. इधर रात-दिन की झड़ी से परबतिया के घर का खपरैल जगह-जगह से चूने लगा था. पूरा परिवार इस कोने से उस कोने में सोते-सोते आँखों में रात काट देता. छोटे-छोटे बच्चों को पानी से बचाने में वह स्वयं भींग जाती. चूल्हे की आग से आखि़र कितनी बार कपड़े सुखाती. दिन भर की हाड़तोड़ मेहनत के बाद भीगे कपड़ों में ठिठुरती झपकी लेती, पानी का वेग आँखें खोल देता, फिर किसी तरह सोने की कोशिश करती. सपने में बंगले के झिलमिलाते परदे, मखमल कालीन, ऊँचे पलंग दीखते. हड्डी ठिठुराती मिट्टी की दीवार से सटी परबतिया इन सबका कोमल स्पर्श याद करती अंधेरे में उसका घर और बंगला सब गड्डमड्ड हो जाता.


नए बंगले को दुल्हन की तरह सजाया गया था. सारे मेहमान आ चुके थे. सब कमरे चहल-पहल लिए खचाखच भरे थे. पूरा बंगला गेंदे के फूल और आम के पत्तों की मालाओं से सजाया गया था. गेट के बाहर विशाल तोरण द्वार बना था. दरवाजे़ के दोनों तरफ सुंदर गमले और केले के पत्ते पेड़ों की तरह सजाए गए थे. सुंदर अल्पना से बंगले का द्वार और भव्य लग रहा था. बंगले के पीछे वाले विशाल आंगन में मीठे पकवान की सुगंध वातावरण में भर उठी थी. इस बार की बरसात में ठंड लग जाने के कारण परबतिया की कमर और घुटने में तेज दर्द हो रहा था. सुबह से मालकिन के बताए कामों को वह चुपचाप दर्द दबाए किए जा रही थी, सबसे छोटे लड़के को रात भर तेज बुखार था, जिसके चलते वह एक पल सो नहीं पाई थी. काम करते-करते उसे बार-बार चक्कर आ रहे थे.
 शहर में औरों के लिए पेशाब-पाखाने की थोड़ी-बहुत व्यवस्था होती ही है, लेकिन गरीब मजदूर रेजाओं के लिए ऐसी कोई सुविधा नहीं होती. मजदूर तो कहीं चले जाते हैं, लेकिन रेजाओं के लिए आड़ खोजना मुसीबत बन जाती है. ऐसे तो शर्म-लाज छोड़कर वे खड़े-खड़े ही पशु कर तरह पेशाब कर लेती हैं, लेकिन माहवारी के समय घर बैठना तो होता नहीं, ऐसे में उनका जीना दूभर हो जाता है. पखाने के लिए भी उनको प्राणों पर संकट आ जाता है. ठेकेदार की गालियों से बचते हुए वे जैसे-जैसे ये सब काम भी निबटा लेती हैं.

परबतिया सुबह से चार-पाँच बार बंगले के पिछवाड़े आड़ में गई थी. उसे एक घंटे से पेशाब लगा हुआ था. मालकिन की लड़की के एक के बाद दूसरे छूटते हुक्म के कारण वह साँस भी नहीं ले पा रही थी. पूजा-घर, बड़ा आँगन, बरामदा धोने-पोछने के बाद लड़की सिर पर सवार थी कि जल्दी से जल्दी बाथरूम धो दे. सुबह नौ बजे रहे थे. घर की औरतें छत पर रात में लगाई गई मेंहदी एक-दूसरे को दिखा रही थी. मेहमानों का आना शुरू हो गया था. परबतिया को पेशाब के लिए आँगन पार करके जाना होता. लड़की छत से उसे गुजरते देखती और चिल्लाने लगती. पेशाब का दबाव बढ़ने से परबतिया के पेट में जोरो से दर्द होने लगा. तबियत ठीक न होने से चक्कर आ रहे थे. उसका घरवाला सब्जियों, फलों और मिठाइयों की टोकरी ढो रहा था, नहीं तो वह उससे कहकर चुपचाप चली जाती. आज मिठाई रुपए मिलने के लालच में उसका घरवाला भी क्यों सुनता. वह तो मन ही मन खुश था कि रेजा-कुलियों में सिर्फ़ वह और उसकी घरवाली ही रोक लिए गए हैं. घर के नौकरों के साथ उन्हें भी ईनाम मिलेगा. परबतिया दर्द से दाँत भींच झाड़ू लेकर लड़कों के बेडरूम में घुसी. बाथरूम में जिस दिन हरे रंग का टाइल लग रहा था, उसी रात को उसका बूढ़ा ससुर रात भर दमे के कारण आँगन में छटपटाता खाट पर करवट-बदलते रह गया था. परबतिया का सुख-दुख इस बंगले की एक-एक ईट से जुड़ा हुआ था.


वह कल यहाँ से चली जाएगी, लेकिन बंगला बनाते समय किस तरह आंधी-पानी में उसने मुसीबतों का पहाड़ उठाया है, ये सारी बातें इन दरवाजों-दीवारों में कैद रहेंगी. किस तरह पीड़ा से कराहते हुए उसने माथे पर तसला उठाए ईट-गारा ढोया है, क्या वह एक-एक घड़ी को भूल सकती है. लड़की बहुत ही शौकीन मिजाज थी. बाथरूम में गुलाबी रंग का बाथ-टब था. नए चमचमाते स्टील के नल, झरने, साबुन, शैम्पू की शीशियाँ और छोटे-बड़े नैपकिन-तौलिए करीने से रखे हुए थे. एक तरफ नक्काशीदार बड़ा-सा आईना लगा हुआ था. परबतिया थोड़ी देर के लिए सारा दर्द भूल इस साफ जगमगाती दूसरी दुनिया को देख भौंचक्की रह गई. अचानक उसे लगा कि वह पेशाब के दबाव को रोक नहीं पाएगी. दर्द पूरे शहर में जैसे लहरें लेने लगा. पीड़ा की तेज लहर उसको संज्ञा-शून्य किए दे रही थी. लग रहा था उसके दिमाग ने काम करना बंद कर दिया है. बाथरूम का दरवाज़ा उसने उढ़का दिया, हड़बड़ी में दरवाज़ा बंद करे इसके पहले ही वह राहत की लंबी साँस लेकर बैठ गई. कुछ देर के लिए उसका सारा तनाव ठहर गया. लड़की का क्रोध, मेहमानों की चहल-पहल, हवन की अग्नि का पवित्र धुआँ, वह मिल रही राहत में जैसे सब कुछ भूल गई.


अचानक धड़ाक से बाथरूम का दरवाज़ा खुला ‘ओ माई गॉड’ की आतंकमयी चीत्कार के साथ दरवाज़ा बंद हो गया. चीख लड़की की थी. परबतिया का इतनी देर से रुका हुआ पेशाब रुकने का नाम नहीं ले रहा था. उसने भय से आँखें बंद कर ली. बाथरूम के बाहर लड़की की चीख-पुकार से भीड़ जमा हो गई. मालकिन और उनकी लड़की बेतहाशा गालियाँ दिए जा रही थी. परबतिया ने बाथरूम में बड़ी बाल्टी से दो-तीन बाल्टी पानी डाल दरवाज़ा खोल दिया. लड़की के कमरे में भीड़ जमा हो गई थी. बंगले के मालिक, बंगलौर वाले बेटे-बहू, मैनेजर और कपड़े-जेवर से लदी औरतें कमरे में जमा थी. लड़की की आँखें गुस्से, घृणा और जुगुप्सा से बाहर निकली जा रही थी. रोष से जबान लड़खड़ा रही थी. उसका घरवाला भय और अचरज से उसको घूरे जा रहा था. लड़की का तमतमाया, लाल हुआ गोरा मुँह विकृत हो उठा था, ‘‘जरा इस कमीनी की हिम्मत तो देखो. आज गृह-प्रवेश के दिन पूजा-पाठ के समय महारानी यहाँ घुसी हुई है.’’ उसने क्रोध से फूट पड़ते हुए उँची एड़ी का सैंडल हाथ में ले लिए, ‘‘ठहर अभी मजा चखाती हूँ. हरामज़ादी, तेरी यह मजाल!’’ चारों तरफ ‘मारो साली को’ की आवाज़ें आ रही थी. ‘‘माफी दे दो छोटी मालकिन, जी अच्छा नहीं था, इसलिए ऐसी ग़लती हो गई,’’ परबतिया ने आँसुओं से तर चेहरा लिए हाथ जोड़ दिए.


क्रोध तो बंगले के मालिक-मालकिन को भी आ रहा था. लेकिन आज के दिन वे कोई हंगामा नहीं चाह रहे थे. मालिक ने मालकिन को हुक्म सुना दिया कि इन कमीनों को अभी घरसे बाहर करो. मालिक पत्नी पर बरस रहे थे कि इतने नौकर-चाकर के रहते हुए इन रेजा-कुली को रोकने की क्या जरूरत थी. परबतिया का घरवाला अपना गुस्सा काबू में रख नहीं पाया. कहाँ तो उसने सोचा था कि दो शाम का खाना और ईनाम लेकर घर जाएगा और कहाँ मेहनत-मजदूरी के रुपए भी गंवाने पड़ रहे थे. उसने बरामदे में पड़ा मोटा डंडा उठा लिया और परबतिया की कमर पर एक लात जमाते हुए उसे डंडे से धुनने लगा. दाँत पीसते हुए परबतिया का झोटा पकड़ घसीटते हुए घर ले जाने लगा, ‘‘साली मेमसाब की चाल सीखती है. चल कुतिया घर चल, आज शाम को हाँडी नहीं चढे़गी न तो सब शौख निकलता हूँ तेरा...’’ परबतिया के घरवाले पर जैसे भूत सवार था. रोती चिल्लाती घरवाली को माँ-बहन की गंदी-गंदी गालियाँ देता घसीटता वह उसे घर ले रहा था.
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