जिज्ञासा

अभिनव मल्लिक
सामाजिक मुद्दों पर सक्रिय अभिनव मल्लिक फारवर्ड प्रेस के संवाददाता है संपर्क :abiotdrugs@gmail.com
उस दिन मैं अपने क्लिनिक,त्रिलोकनाथ स्मृति स्वास्थ्य केंद्र  में मरीज़ देखने में व्यस्त था. बाहर बहुत सारे मरीज़ और मेडिकल रिप्रेजेन्टेटिव प्रतीक्षारत थे. दिन के करीब साढ़े एग्यारह बजे थे …बाहर से जोर की आवाज़ आयी - हम डाकटर बाबू के बड़का भाई तिरलोक मल्लिक को जानते हैं...बीरपुर के उनके स्कूल से ...हमको अन्दर  जाने दीजिये ...हमारी घरवाली को पेट मे बहुते दरद है ...सीधे टीसन से आ रहें हैं. लगा जैसे मुकेश की आवाज़ में रामायण का चोपाई सुन रहें हैं....इतने में एक बूढ़े बाबा जबरदस्ती अन्दर आये और दीन  भाव से कहने लगे – ‘डॉक्टर बाबू, मेरी दासिन के पेट में बहुत दर्द है, दर्द से छटपटा रही हैं. कम्पोडरबाबू अन्दर नहीं आने देता. आप बुढ़िया को पहले देख लीजिए बाबू … ’मेरा ध्यान भंग हुआ. बाहर मैंने किसी महिला के कराहने की आवाज़ सुनी.मैंने कहा – ‘अन्दर ले आइये बाबा.’  वह कराहती हुई अन्दर आ गई.
मैंने पूछा - ‘आपका नाम ?’
‘सितिया दासिन.’
 मैंने लिखा श्रीमती सीता देवी.
‘घर?’
‘जी ,हमलोग गोबर गरहा के रहने वाले हैं.’ बूढ़े ने जवाब दिया.
मैंने लिखा - गौरव गढ़..

शहर से एक-दो किलोमीटर पर यह गाँव हैं. पुराने लोग अभी भी इसे गोबर -गरहा ही कहते है. पर गाँव का नाम गौरव गढ़ ही है. महिला कोई पचास -पचपन की रही होगी. पके बाल, सामान्य वेश-भूषा, माथे पर रमानंदी तिलक और गले में कंठी.. वो सकुचाई - सी मेरे सामने कुर्सी पर बैठ गई.उसके चेहरे पर दर्द की लकीरें साफ़ दिख रही थी. उसके साथ पैसठ - सतर साल का एक बूढ़ा था. साधुओ सा वेश, माथे पर वही रमानंदी तिलक, गले में कंठी. एक हाथ में कमंडल, एक हाथ में लाठी. मैंने बाबा का नाम पूछा और उन्हें बैठ जाने को कहा.
‘मेरा नाम सीता राम दास है.’  बाबा ने बताया और बूढी की बगल वाली कुर्सी पर बैठ गए. ‘यह मेरी दासिन है. इसे पेट में बहुत दरद हो रहा हैं. पेट में सुल्फा भोकता है.’ दासिन यानी उनकी पत्नी. कम्पाउण्डर ने बूढी को टेबुल पर लिटाया ...मैंने पूछा – ‘कहाँ दर्द है ? कब से है ?’ ‘रास्ते से ही सरकार. दर्द रास्ते में ही उठा आज सबेरे से’. बाबा कह रहे थे - हमलोग चारों धाम करके अभी अयोध्याजी से आ रहे हैं.बाट-घाट में खाने-पीने का कोई ठीक तो रहता नहीं. बुढिया चटोर है, अंट-शंट खाती आई हैं.अभी ट्रेन से उतर कर सीधे आपके पास आ रहें हैं. आपका नाम बहुत सुना हैं. आप पुराने डाकटर हैं. गाँव में डाकटर थोरे ही रहता है, ठगते हैं सब..... मैंने दासिन को देखा. ब्लड प्रेशर भी मापा… 120/80..नार्मल. बाबा ने कहा –‘डाकटर बाबू, जरा जनतर लगा कर पेट देख लीजिए. रह - रह कर टीस मारता हैं...टिसियाता हैं.जनतर अर्थात आला ... एसथेटसकोप.  हाजमे की गड़बड़, खाने - पीने की अनियमितता के कारण पेट में कुछ गैस बगैरह बन रहा था.मैंने कहा - ‘बाबा, घबराने की बात नहीं हैं, आप चिंता नहीं करें.

एक सूई लगा देता हूँ . इन्हे बाहर ले जाकर लिटा दे. अभी दर्द कम जायेगा. दर्द कम होने पर गाँव चले जाये.’ मैंने नर्स ...चंचल को सूई दे देने को कहा. वे दोनोंबाहर चले गए. मैं फिर मरीज़ देखने में व्यस्त हो गया.
करीब ...एक बजे ...मरीजों की भीड़ छंट जाने के बाद बाबा अन्दर आये और बोले – ‘बाबू, दर्द तो कम हो गया है,क्या हमलोग गाँव जा सकते हैं ?’ फिर उन्होंने टेंट से कुछ रुपए निकल टेबुल पर रखा  - ‘डाकटर, बैध, राजा, बाभन को बिना दक्षिणा दिए काम नहीं लेना चाहिए. बाबु, अपनी फ़ीस ले लीजिए ....बाहर कम्पोडर...फ़ीस नहीं ले रहा है ..कहता है की यहाँ बाबा, साधु, भगत… से फ़ीस नहीं लिया जाता है.’ डाकटर साहेब ...आप अपना फ़ीस के लीजिए और सूईया का भी दामकाट लीजिए.’ मैंने हाथ जोड़े – ‘बाबा, आपलोग चारो धाम से पुण्य कमाकर आ रहें हैं. आपलोगों का आशीर्वाद ही मेरी फ़ीस है. आप त्रिलोक भैया को भी जानते है … आप निश्चिन्त होकर इन्हे गाँव ले जाएँ ...मैं एक गैस की दवा ...आपको दे देता हू, यदि जरुरत पड़े तो फिर इन्हे लेकर आ जाएँ.’ बाबा बोले - ' अब तो कहीं भी पुण्य - धरम नहीं हैं बाबु, सुब तमाशा है. अयोध्या का पुण्य तो उसी दिन चला गया, जिस दिन रामलला के नयन से ढब - ढब लोरचुने लगा .....'मैं कुछ समझ नहीं सका. बाबा रामानन्दी साधु होकर भी कैसी बातें कर रहें हैं - 'बाबा, आप क्या कह रहें हैं? जरा बैठ कर समझाइए.'  हाँ बाबू , घोर कलयुग आ गया - बाबा बैठ गए - दुनिया में अब कहीं भी धरम नहीं रहा. जब करम ही ख़राब हो गया तो धरम कहाँ से बचेगा ? सब ख़तम हो गया बाबू, सब ख़तम हो गया ...सब ख़तम. हम दोनों बहुत जगह घूमे. मंदिर गया, मसजिद गया, बहुत घूमा, बहुत तीरथ गया. सब जगह अच्छा करम था, धरम था,प्रेम था,परमेश्वर था. लेकिन अब जगहे जगह दंगा हैं, फसाद है, फौज करफू है, व्यभिचार - हिंसा है। दिन - दहाड़े लूट लेता है.


भगवान को बाँस - बल्ला - लोहा से घेर - घार कर जेल में डाल दिया है. इस देश से सत्य, अहिंसा, प्रेम सब गायब हो गया है, बाबू !’ कहते - कहते बाबा बिलखने लगे. इसी बीच दासिन भी आकर खड़ी हो गई. उनके पेट का दर्द शायद कम हो गया था. बाबा का विलाप जारी था – ‘गाँधी बाबा ... कहते थे अल्लाह - ईश्वर सब एक हैं. जो राम है, वही रहीम है। यही कबीर दास भी कहते थे. पर अब तो बाबू , सब धरमके भगवान  भिन्न हो गए , जैसे हम दोनों को हमारे बेटों ने भिन्न कर दिया ......' बच्चे की तरह पुचकारते दासिन बाबा को संभाले बाहर चली गई.
उनलोगों के चले जाने के बाद मैं फिर अपने काम में व्यस्त हो गया. बात आयी - गयी ...हो गई. दस - बारह दिनों बाद बाबा फिर दासिन के साथ आए. उनकी दासिन पूर्णतः स्वस्थ हो चुकी थी. अपने साथ वो कददू, कोहड़े और कमंडल में तक़रीबन एक - डेढ़ किलो दूध लेकर आए थे. उन्होंने कहा - 'डाकटर बाबू, दासिन तो बिलकुल ठीके हो गई है. अपनी ही कुटी पर कददू है, कोहरा है , गाय भी है. यह सब आपके लिए है.'  मैंने सभी चीजें घर भिजवा दीं और बाबा से बैठने का आग्रह किया. उन्होंने मेरे चैम्बर में लगे महर्षि मेंही दास के तस्वीर को प्रणाम किया… फिर वे बैठे. मैं बाबा से यह जानना चाह रहा था की उस दिन जब वे दासिन को दिखाने आये थे तो उन्होंने बताया था की रामलला के नयन से ढब - ढब लोर चूने लगा था, इस प्रसंग में मैंउसी दिन से जिज्ञासु था. मैंने बाबा से पूछा तो वे कहने लगे - 'सच बाबू , अब ईमान - धरम नहीं रहा. साधु, पंडित, मुल्ला, मोलबी तरह - तरह के भेस बना कर परवचन करता है. पर कुछो बूझता - सूझता भी है. अरे, अपने धरम पर रहो, अपने को सुधारो, गाँव -घर - समाज सुधारो. नाहक क्यों जात - धरम के नाम पर मारकाट , दंगा - फसाद करातेहो ?'

बाबा ने कहा - 'बाबू , आपलोग तो पढ़े - लिखे विद्वान आदमी हैं. हम आपके बाप - दादा, गंगा बाबू और बाबू रघुनन्दन मल्लिक को भी जानते हैं ....बहुत खानदानी हैं आपलोग ....फिर आप मेंही बाबा के शिष्य भी हैं ...नेता - मंतरी तो हरदमे आपके पास आते रहते हैं ...पिछला इलेक्शन में आप वोटो माँगने हमारे गाँवआये थे और नेत्रदान शिविर करवाने का परोगराम भी बताये थे ...कब, .कहिया नेत्रदान शिविर होगा बाबू? एक साँस में कह गए बाबा.
पर बाबा मेरा यह प्रश्न टाल गए की रामलला के नयन में ढब - ढब लोर क्यों था ? बाबा ने फुसफुसा कर कहा - 'बाबू, आजकल तो ढेर नेता हो गए हैं. लगता हैं की वोट की खातिर फुट डालकर मंतरी - संतरी बनने का षड़यन्त्र चल रहा है. क्या यहसच है बाबू ? फिर मेरा प्रश्न - ' बाबा राम लला के नयन में ढब - ढब लोर क्यों था. मेरे बहुत कुरेदने पर बाबा ने दासिन की ओर देखा. आँखों ही आँखों में शायद कुछ बात हुई.मुझे लगा दासिन अपनी असहमति प्रकट कर रही है. फिर भी बाबा बताने लगे - ' हाँ बाबू , हमलोगों ने देखा, रामलला के नयन से ढब - ढब लोर चू रहा था. आज से चार-पाँच बरस पहिले, हमलोग भी अयोध्या में उस धरम - धक्का के हिलोर में फंस गए थे. जबकि एक जगह में लोहा के पोल - बल्ला से घेरा हुआ था ...बंदहिस्सा ..वहाँ अन्दर जाने पर पुलिसिया पहरा लगा था. उसको बाबरी मसजिद कहते हैं ..वहाँ पूजा - पाठ - जल नहीं चढ़ता ... मोटा - मोटा सिकरी चारों तरफ लगाकर बंद था. देखते - देखते लोग बन्दरों की तरह मसजिद की  गुम्बद पर चढ़ गये। कह रहे थे की कोनो सेना के लोग हैं ...सनिमा की नगरी से आए हैं. बड़का - बड़का लोडीस्पीकर से एक जनानी का परवचन हो रहा था ...एक धक्का और दो .... एक - एक ईट पलक झपकते जमीन पर गिरा दिया.

यह देखते ही बुढ़िया छाती पीट -पीट कर रोने लगी - हे भगवान, हे देव, यह विधर्मी सब अल्लाह मियां के घर को गिरा रहा है. हे भगवान ! अब क्या होगा ? सच कहते हैं बाबू, यह दृश्य देख कर रामलला भी रोने लगे हमलोगों ने देखा बाबू, रामलला लोगों की दुर्बुधि पर बिलख रहे थे. नयन में ढब - ढब लोर ! बुढिया लगातार रोती जा रही थी और भीड़ में घुसती भी जा रही थी.' बाबा ने फिर धीरे - से कहा - 'बाबू बुढिया भीड़ में घुसकर एक ईट आँचल तले चुरा कर ले आई. हम कितना भी समझाते रहे, मत रोओ. अल्लाह मियां और भगवान का घर तो सारे संसार में है. एक घर तोड़ देने से क्या वे भाग जाएँगे. लोगों की तो बुधि ही खो गई है, आँखों में धुंध छा गया है। तुम मर रोओ. पर औरतजात, अपनी जिद पर अड़ी रही, की  अल्लाह मियां के घर का यह पवितर ईंटा गाँव ले ही जाऊँगी. आखिर बुढ़िया की जिद पर लुकते – छिपाते वह ईंटा हमलोग गाँव ले ही आए .... उसके बाद अबकी ही हमलोग अयोध्याजी गये थे, बाबू.' बाबा उठ खड़े हुए. दासिन भी उठ खड़ी हुई. तब तक उनका कमंडल घर से वापस आ गया था.मैंने खड़े हो कर उनका कमंडल उन्हें वापस किया. जाते - जाते बाबा छण भर को ठमके और पूछा - 'बाबु, यह देश तो गताल खाते में जा ही रहा है. पर क्यों और किसकी वजह से ? बुढ़िया ने बाबा का हाथ पकड़ कर खींचना शुरू किया – ‘अहाँ त सठिया गेल छी ...बिना मतलब बक - बक करैय छी. एतेक किरिया - सप्पथ के बादो डाकटर बाबू के ईंटा वाला बात बतैये देलियेय.   सप्पथ तोड़वय त नीक नैय हेतय।‘('तुम तो सठिया गए हो. बिना मतलब बक-बक करते हो। इतना किरिया सप्पथ के बाद भी तुमने डाकटर बाबु को ईंटा वाली बात बता ही दी. सप्पथ तोड़ेंगे तो बुरा होगा ही ना !')
 

एक अनजाने, रहस्यमय भाव से बूढ़ी अपने पति को खींच कर बाहर ले जाने लगी. बाबा का प्रतिवाद था की डाकटर बाबु समझदार...खानदानी लोग हैं, कहने से.मन हल्का हो गया. बाबा दासिन के साथ चले गए. उनका मन तो हल्का हो गया, पर मेरा मन भारी हो गया. बहुत सारे सवाल मुझे कुरेदने लगे. एक अनपढ़ -गवाँर मुझे क्या कह गया ?  क्या सचमुच देश की इस हालत के लिए हम सब दोषी हैं ?  क्या सचमुच हम सबों ने संविधान को अपने जीवन की राष्ट्रीयता में उतारने की शपथ लेकर उसे भंग किया है ? आजादी के पचास सालों बाद भी क्या हम एक समतामूलक राष्ट्र का निर्वाण कर सके ? डॉक्टर न जाने कितने मरीजों से रूबरू होते हैं, क्या वो सबको याद रख पाते हैं ? पर कभी - कभी ऐसे भी मरीज़ आते हैं, जिन्हें भूलना संभव नहीं होता. मैं भी बाबासीताराम दास और सितिया दासिन को भूल नहीं पाया. मेरी यह जिज्ञाशा बनी ही रह गई की आखिर अल्लाह के घर की वह पाक ईंट का उन्होंने क्या किया. महीनों बीत गए, सालों बीते. पर बाबा लौट कर नहीं आए. बाबा के ऊपर मेरा ध्यान लगा था. मैंने अपने बड़े भाई ..मुक्ति भैया से भी पूछा.  भैया ..आप त्रिलोक भैया के बीरपुर स्कूल में रहने वाले किसी आदमी को जानते हैं ?..जो सुपौल के आस पास के गाँव का हैं ? ‘हाँ , त्रिलोक एक बार बताया था की उसके स्कूल मे गोबर गरहा का कोई भगत ..खेती - बाड़ी करता है ...राम का भक्त है ...और उसका नाम भी शायद भगवान  के नाम पर है ...भगत टाइप आदमी है.’ ‘हाँ ..सीताराम ..’मुझे लगा की बाबा का अस्तित्व है. कहाँ मैं उनके रहस्यमय होने की कल्पना करने लगा था. जो भी हो .. मेरी जिज्ञाशा अनुत्तरित ही रह गई. हुआ ऐसा की उसी गाँव में नेत्रदान शिविर का आयोजन हुआ.

मैं इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के अध्यक्ष के नाते चिकित्सकों के दल के साथ उस गाँव पहुँचा.बाबा सीताराम दास और सितिया दासिन अभी भी मेरी स्मृति में बने थे. शिविरोपरांत पूछने पर पता चला की बाबा गाँव के दक्षिणी भाग में एक कुटिया बना कर रहते हैं. अपने दोनों पुत्रों से अलग. उनकी पत्नी की मृत्यु हाल - फ़िलहालमें ही हुई है. मैं मुखियाजी के साथ उनकी कुटिया पर पहुँचा. बाबा कुटिया के बाहर ही मचान पर बैठे मिल गए. मैंने उन्हें प्रणाम किया, पर उन्होंने मुझे पहचाना नहीं. मुखियाजी ने बताया कि उनकी आँखों की रोशनी कमजोर हो गई है. आँखों में मोतियाबिन्द है. गाँव में ही नेत्रदान शिविर लगने के बावजूद, बहुत कहने पर भी बाबा ऑपरेशन कराने को तैयार नहीं हुए. बाबा लगातार अपनी जिद पर अड़े रहे. उनका कहना था की जब लोग आँखें होते भी अंधे है तो मैं ऑपरेशन क्यों करवाऊ,अंधा ही भला हूँ . मुखिया जी ने उन्हें बताया की सुपौल से डॉक्टर मल्लिक साहेब उनसे मिलने आये हैं. तब तक बाबा मचान से उतर चुके थे. उन्होंने एकदम नजदीक आकर मुझे देखा और पहचान लिया - 'हाँ, चीन्ह गये डाकटर बाबू, हमारे दासिन को जब पेट में दरद हुआ था तो आप ही ने ठीक किया था. आपसे बहुत बातचीत भी हुई थी.दासिन हमको डाँटी भी थी. बाबू, हमारी दासिन ने तो हाल ही में समाधि ले ली, हमेशा आपकी चर्चा किया करती थी ....'बाबा ने नजदीक आकर कहा - 'बाबू, अब हमें भी जीने का मन नहीं है .....' अपार करुणा और दुख से भींगी बाबा की यह बात मुझे कहीं गहरे छू गई.उन्होंने स्नेह से मुझे मचान पर बिठाया. किसी को एक लोटा पानी लाने कहा. पानी आने पर उन्होंने मुझे पैर धोने कहा. मैंने यन्त्रवत पैर धोये. बाबा मुझे अपने अपनी कुटिया मेंले गये. कुटिया एकदम साफ -… सुथरी, चिकनी मिट्टी से लिपी - पुती, झक्क.


एक तरफ एक खाट  बिछी थी, जिस पर साधारण - सा बिस्तर था. एक कोने में अलगनी पर रखे कुछ कपड़े, एक जगह कमंडल, लाठी और कुछ बर्तन थे .कुटिया के एक कोने में एक सिंहासन रखा था. सिंहासन पर बाबा के रामलला विराज रहे थे. मैंने उन्हें प्रणाम किया. अकस्मात नज़र टिठक गई. मैं टकटकी बाँधे उधर ही देखता रह गया.  रामलला के ठीक बगल में एक ईट रखी थी, जिस पर एक माला रखा था, कुछ अरहूल फूल रखे थे, तुलसीदल रखे थे. सिंहासन के नीचे जल रही अगरबत्ती की सुगंध चारो दिशाओ में फैल रही थी. मेरे सामने एक चमत्कार घटित हो रहा था. ऐसा चमत्कार रोजमर्रे की जिन्दगी में देखने को नहीं मिलता. मुझे लगा रामलला मुस्कुरा रहें हैं. मैंने दुबारा सिंहासन के सामने अपना माथा टेका और उठ कर खड़ा हुआ. पलट कर देखता हूँ तो बाबा निर्विकार - भावसे खड़े हैं. बिलकुल शांत, स्थिर, आँखे बन्द. उनकी आँखों में मोतियाबिन्द है, पर आन्तरिक दृष्टि की अनुपम आभा उनके मुखमंडल पर फैल रही है. सालों - साल से अन्दर दबी जिज्ञासा आज उत्तरित हो रही थी - एक अनन्त अनुत्तरित जिज्ञासा.
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