कोठागोई : किस्सों का अपना चुनाव

संजीव चंदन

सबलोग के स्त्रीकाल कॉलम में प्रकाशित 

भारत में गणिकाओं, नगरवधुओं, वेश्याओं का पुराना इतिहास है. राम ने अपने भाई भरत को संबोधित करते हुए कहा कि वेश्याओं का साथ मनोरंजन का एक महत्वपूर्ण साधन है. ( रामायण. अयोध्याकाण्ड) महाभारत के युद्ध के वक्त युद्ध शिविरों में वेश्याओं की उपस्थिति का उल्लेख महाभारत में मिलता है.
अश्वघोष ने लिखा है : 
द्वैपायनो धर्मपरायानाश्च रेने समंकशिषु –वेश्यवहवा 
ययाहतो, मुच्चलननू पुरेण पादेन विद्युल्लतयेव मेद्यः 
( धर्मात्मा व्यास ने काशी में वेश्यागमन किया. जैसे विफुल्लता मेद्य पर प्रहार करती है, उसी तरह उन्होंने उन वेश्याओं के नूपुर वाले चंचल पैरों का प्रहार झेला –अश्वघोष सौंदरानंद, 7-30)  रामायण, वर्तिका सूत्र और कामसूत्र आदि में वेश्याओं के संगठन के भी उल्लेख हैं.  प्राचीन भारत को समझने के ‘स्रोत- ग्रंथों’ में वेश्याओं के कई प्रकार बताये गये हैं, उनमें एक प्रकार रूपजीवाओं का है. रूपजीवाओं के तहत नटी वेश्याएं थीं, जो गीत –नृत्य से अपना जीवन यापन करती थीं. एक प्रकार गणिकाओं का था, जिनमें दो तरह की स्त्रियाँ होती थीं, कोठे पर रहने वाली, निजी घरों में रहने वाली. गणिकाओं को उच्चवर्गीय शिक्षित तथा गुणी वेश्याओं के तौर पर समझा जाता था. गणिकाओं का यद्यपि सामंत –जमींदारों , बाद में नवाबों उच्चवर्गीय कुलीनों के बीच सम्मान जरूर था, लेकिन ‘घर-बाहर’ के दायरे में वे बाहर की प्रतिनिधि थीं, जो स्त्रियों के लिए सम्मानजनक नहीं माना जाता था. सतीत्व, पत्नीत्व को आदर देने की सामाजिक –सांस्कृतिक व्यवस्था रूढ़ थी. इस तरह इनका एक अलग संसार बनता गया, जो सामान्य लोगों के बीच यथार्थ से ज्यादा किस्से –कहानियों की तरह उपस्थित थीं. कोठों की यह परंपरा हाल के दिनों तक आबाद रही है, बिहार के मुजफ्फरपुर के कोठे उनमें से एक हैं- कोठे हकीकत हैं, तो कोठे किस्से और कहानियां भी हैं . कहानियों में लोकप्रियता के तत्व भी हैं- रससिद्धी के तत्व. जबकि इन्हीं कहानियों से समाजशास्त्रीय अनुसंधान भी किये जा सकते हैं – समाज में जेंडर और जाति विभाजन को समझने के लिए.
चतुर्भुज स्थान , मुजफ्फरपुर की एक नर्तकी 

 पिछले साल वाणी प्रकाशन से प्रकाशित प्रभात रंजन की ‘ कोठागोई’ मुजफफरपुर के कोठों के किस्सों  की रोचक प्रस्तुति है, जिसका इरादा तय है कि कोई समाजशास्त्रीय अनुसंधान नहीं है. किस्से हैं , तो किस्सागोई होगी, कोठों के किस्से हैं तो उन्हें ‘कोठागोई’ कहा जाना अर्थ –चमत्कार के लिहाज से भी और ‘रससिद्धी’ के उद्देश्य से लोकप्रिय लेखन के लिहाज से भी उचित ही है. साहित्य में इन दिनों लोकप्रिय साहित्य का अपना दवाब है, सोशल मीडिया से इस लोकप्रिय लेखन को मदद भी मिलती है- बल्कि दोनो के आपसी सामंजस्य से साहित्य की कुछ विधाओं ने जन्म भी लिया है – मसलन ‘लप्रेक’- ( लघु प्रेम कथा).  पिछले दिनों फेसबुक, ट्वीटर, से लेकर साहित्य के मेलों –महोत्सवों में ‘लप्रेक’ की जितनी धूम रही,  वह नये समय की पाठकीयता के अनुरूप भी थी और साहित्य के बाजार के अनुरूप भी. इस धूम के बीच प्रभात रंजन की ‘कोठागोई’ ने अपनी अलग ही जगह बनाई. लगभग साल भर तक इस किताब की भी चर्चा रही, लोगों ने, साहित्यिक संस्थाओं ने , साहित्य –महोत्सवों ने किताब और प्रभात जी,  दोनो को हाथो –हाथ लिया. मुझे लगता है कि अब एक साल बीत जाने के बाद, चर्चाओं से अलग इस किताब को देखा जा सकता है-प्रभावमुक्त होकर.

किताब के लेखक की योजना में और उसके प्रयासों में एक ख़ास बात दिखती है कि वह जिनके किस्से कह रहा है, उनके प्रति दूसरेपन के भाव ( अदरनेस) से मुक्त हो, या उनका पवित्र उद्धारक या उनके काम और व्यक्तित्व के प्रति भद्रजन का भाव लिए उन्हें ‘ विक्टिम’ ( पीड़ित)  की तरह न देखे. इस मायने में मुझे यह किताब अच्छी लगी. जबकि कोठों के जीवन को लेकर हिन्दी की बहुचर्चित किताब, अमृतलाल नागर की ‘ ये कोठेवालियां’ को लेकर मेरी यही शिकायत रही है कि वह जबरदस्त अदरनेस के भाव में लिखा गया है. कोठे के जीवन जी रही स्त्रियों को अनिवार्य ‘विक्टिम’ मानते हुए.  ‘ये कोठेवालियां’ के विपरीत ‘ कोठागोई’ में न तो विक्टिमहुड की कोई नजर है और न ही इस किताब की योजना के लिए यह अनुकूल होता. बल्कि किस्सों से जो तस्वीर बनती है,  वह यह कि कोठों पर उनका होना जितना उन्हें विक्टिम नहीं बनाता है, उससे ज्यादा कोठों की संस्कृति के ख़त्म होने और कोठों के उजड जाने से वे विक्टिम होती हैं- लेखक का उद्देश्य रुदन से ज्यादा रससिद्धि है – जो समाज के द्वारा स्त्री के लिए नियत ‘गृहिणी’ और सतीत्व संपन्न पत्नी की भूमिकाओं से अलग जीवन जीती स्त्रियों की कहानियों में स्वतः पाई जाती हैं –कहानियां बनती ही ऐसे हैं – ये नियत ढर्रे पर चलने वाले लोगों के लिए ‘अजनबी-परिचितों’ की कहानियां हैं- आबाद और बर्बाद होने की कहानियां.



कोठागोई को पढ़ते हुए मुजफ्फरपुर के लोग ‘ चतुर्भुज स्थान की इन गायिकाओं’ की पहचान तलाश सकते हैं, या उन ‘रसिकों’ की जो इनके महफ़िलों के नियमित शान थे, कुछ क्रेता और कुछ मुहब्बत कर बैठे गंभीर किस्म के आशिक लोग- जमींदार से लेकर लेखक –गीतकार-कवियों तक की पहचान इनमें शामिल है. चतुर्भुज स्थान का जिक्र हो और किम्वदंती बन गये ‘महाकवि’ जानकीबल्लभ शास्त्री की चर्चा न हो, तो बात पूरी नहीं हो सकती है. इसलिए किताब में उनका होना लाजिमी था, उसी अंदाज में जिस अंदाज में वे किम्वदंती बनते गये- हिन्दी साहित्य के इतिहास से जितना अनुपस्थित, उतना ही उपस्थित –उतने ही जोर –शोर से स्वीकृति प्राप्त ‘महाकवि !’  यह सच है कि लेखक कोठों के इन किस्सों का समाजशास्त्रीय अध्ययन करने नहीं बैठा था, बल्कि ऐसे अध्ययन के लिए ये किस्से आधार हो सकते हैं, लेकिन क्या यह किताब किस्सों का सयोंजन (कम्पाइलेशन) मात्र है – नहीं इसकी एक योजना है, एक अंतरदृष्टि काम कर रही है इसमें –चुनाव की अन्तरदृष्टि और इसी से इस किताब और लेखक की ‘राजनीति’ भी तय होगी –या हम पाठकों की रुचि –अरूचि के कारण भी तय होंगे.

पिछले दिनों एन एस डी के रंगमहोत्सव के दौरान एक मराठी मंचन देखा. यह मंचन महाराष्ट्र के प्रसिद्द ‘लावणी नृत्य’ पर लिखी गई एक शोधपूर्ण किताब पर आधारित था. लावणी के नर्तकियों का जीवन इन मुजफ्फरपुर की कोठेवालियों से अलग नहीं होता था. इसके दर्शक और मुरीद भी समाज का कुलीन तबका होता रहा है. किस्सागोई की शैली में हुए इस मंचन में लावणी की अनिवार्य मांसलता और गीतों और नृत्य में यौनिकता के स्पष्ट सन्देश और इशारे दर्शकों को सीटियाँ बजाने के लिए आतुर कर रहे थे – रस्ससिद्धि का भरपूर आयोजन! इसके बावजूद लेखक की अपनी दृष्टि लावणी की नर्तकियों की सामाजिक अवस्थिति को स्पष्ट कर देती है. लेकिन ‘कोठागोई’ वहीं असफल होता दिखता है. एक लम्बे कालखंड के किस्सों में बदलते समाज –समय और संस्कृति की सारी झलकियाँ मिल जाती हैं, झलक नहीं मिलती है तो गायिकाओं, नर्तकियों की सामाजिक अवस्थिति की , कि किस जाति-समाज से ये आती हैं और उनके होने में उनके जाति- समाज की क्या भूमिका है.

 लेखक अपनी किताब की भूमिका में लिखता है, “ आप ‘कोठागोई’ के किस्सों का आनन्द लें. अच्छी लगे तो उन गुमनाम गायिकाओं के गुण गायें, न जमे तो दोष इस लेखक का.’ कोठों के इर्द –गिर्द बदलते समय के साथ लेखक ने बदलती संस्कृति को जरूर दर्ज किया है, ‘ समय बदल रहा था. पुराने जमींदार, सेठ, दरबार सब एक –एक कर खत्म हो रहे थे. शहराती लोगों का मिजाज बदल रहा था. गाना –नाचना उनके लिए कला का कोई रूप नहीं रह गया था. वह तो उनके लिए खालिस मनोरंजन भर था. पैसा फेको तमाशा देखो. अगर नाच –गान एक साथ ही हो तो – मुजरा का जोर बढ़ता जा रहा था. नवदौलातियों की नई खेप शहर में आ गई थी. पथ निर्माण विभाग, सिचाई विभाग का बजट बढ़ रहा था....थोक में माल कमाने वालों का एकदम नया तबका सामने आ रहा था, इस तबके को न अपनी परम्परा से मतलब था, न संस्कृति की उस जीती-जागती धरोहर पर उनको नाज था.’

ग्राहकों की प्रतीक्षा 

संस्कृति  मुजफ्फरपुर में क्या सिर्फ नवदौलतिये शुक्ला, शर्मा नामधारियों के कारण बदल रही थी ? या लेखक जिस नाज पर अपना ईमान लेकर आ रहा है, उसे नकारने वाले हाशिये के लोगों की दखल से भी बदल रही थी ? क्या मजदूरों – दलितों के संघर्ष इन दिनों दर्ज नहीं हुए थे, या नाच –गान के ‘ जमींदार या साहबी ठाठ’ को निम्नवर्ग से चुनौती और धमकियां मिलनी शुरू नहीं हुई थीं? किस्से और भी होंगे, जो इस किताब की योजना के अनुकूल नहीं होंगे. इसलिए शेष पाठकों और शोधार्थियों के लिए, जिनका उद्देश्य ‘ रससिद्धि’ के अतिरिक्त भी होगा-उनके लिए यह किताब भी शोध सामग्री है और इसमें छूट गये अवांतर प्रसंग भी शोध सामग्री होंगे. इस किताब पर ज्यादा बोझ डालना भी अनुचित होगा क्योंकि इसके फ्लैप पर ही फिल्म निर्देशक इम्तियाज़ अली का साफ़ संकेत अंकित है , ‘ बदनाम कहे जाने वाली गायिकाओं की विरासत को एक सलाम है कोठागोई. प्रभात रंजन की कोठागोई इस संस्कृति से प्रेरित किस्सों का एक मजेदार संग्रह है. पढ़िए और सुनाइये, क्योंकि दोनो में बराबर मजा है.’

सभी फोटो गूगल से साभार 

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