धार्मिक औरतें या गुलाम औरतें ....!

 संजय सहाय 

सन् 2000 में शनि शिंगनापुर मंदिर में स्त्रियों के प्रवेश पर निषेध के खिलाफ एक पदयात्रा आयोजित की गई थी. पंढरपुर से शनि शिंगनापुर तक की इस विरोध यात्रा का नेतृत्व जाने-माने तर्कवादी,लेखक और महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के अध्यक्ष नरेन्द्र अच्युत दाभोलकर ने किया था. इस पदयात्रा में अनेक प्रगतिशील लोगों सहितदेश की जानी-मानी हस्तियां शामिल हुई थीं जिनमें डाॅ. श्रीराम लागू और किसान नेता एन.डी. पाटिल उल्लेखनीय हैं. हालांकि तब दक्षिणपंथी शक्तियों भाजपा और शिवसेना सहित उनके हिंदुत्ववादी संगठनों ने उनके शिंगनापुर में स्त्रियों के प्रवेश कराने के इस प्रयास को विफल कर दिया था. मजेदार बात यह कि वोटों को ध्यान में रख 2011 में उसी भाजपा ने राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के साथ मिलकर कोल्हापुर के महालक्ष्मी मंदिर के दरवाजे स्त्रियों के लिए खुलवा दिए थे. भाजपा का स्त्रियों के प्रति उमड़ा यह आदर और प्रेम वैसा ही था जैसा कि अपनी खस्ता हालत को देखते हुए उनमें चकराता के दलितों के लिए आज अचानक उमड़ पड़ा है. 26 जनवरी, 2016 को इसी मुद्दे को लेकर रणरागिनी भूमाता ब्रिगेड की कार्यकर्ताओं को शनि शिंगनापुर के सत्तर किलोमीटर दूर सूपा गांव में गिरफ्तार कर लिया गया. पुलिस ने उन्हें चार सौ वर्ष पुरानी उस घटिया-सी परंपरा को तोड़ने से रोक दिया जिसके खिलाफ यह आंदोलन चलाया जा रहा था. तुर्रा यह कि ऐसा उन्होंने स्त्रियों को ही उन हानिकारक तरंगों से बचाने के लिए किया था जो शनिदेव की मूर्ति से उन स्त्रियों के प्रवेश करने पर निकल सकती थीं. इस आंदोलन की सूत्रधार सुश्री तृप्ति देसाई ने कहा कि यह लोकतंत्र के लिए एक काला दिन है. अप्रैल आते-आते हाईकोर्ट के निर्देश पर मंदिर के न्यासियों को स्त्रियों के लिए गर्भगृह के द्वार खोलने पड़े. कुल चार महीनों के इस आंदोलन से चार सौ वर्षों की यह न्यायहीन परंपरा धूल चाटती नज़र आई.


हालांकि पितृसत्ता के चौकीदार शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद बिलबिलाकर धमका गए कि स्त्रियां जीत का जश्न न मनाएं.शनि के पूजन से उन पर बलात्कार बढ़ने वाले हैं. इसी प्रकार 29 अप्रैल, 2016 को सुश्री तृप्ति और उनकी भूमाता ब्रिगेड की सदस्याओं ने मुंबई के हाजीअली दरगाह में घुसने की चेष्टा की. विडंबना यह रही कि भिन्न राजनीतिक दलों और संस्थाओं से संबद्ध एक सौ मुसलमान महिलाओं ने ही उनको अंदर घुसने से रोक दिया इस दरगाह में 2011 तक महिला जायरीनों के प्रवेश पर प्रतिबंध न था किंतु उसके बाद यह कहकर रोक लगा दी गई कि एक पुरुष संत की दरगाह होने की वजह से यहां सिर्फ पुरुषों का प्रवेश ही उचित होगा. 13 मई को पुनः तृप्ति ने महिलाओं के लिए तयशुदा सीमा तक पहुंचकर पंद्रह दिनों का अल्टीमेटम दिया है कि या तो पुरुषों की तरह महिलाओं को भी अंदर तक जाने की छूट मिले अन्यथा शिंगनापुर की भांति ही यहां भी आंदोलन होगा. तृप्ति नासिक और कोल्हापुर के मंदिरों में भी ऐसे परिवर्तन लाने के लिए आंदोलन की योजना बना रही हैं. स्त्रियों को पुरुष से कमतर अथवा अपवित्र मानने वाली इस पुरुषवादी व्यवस्था का इस्तेमाल बेशर्मी के साथ अनेक उपासना स्थलों में होता रहा है. केरल के सबसे पुराने और भव्य मंदिरों में से एक शबरीमाला श्री अयप्पा मंदिर में दस वर्ष की आयु से लेकर पचास वर्ष तक की महिलाओं का प्रवेश वर्जित है. 'हजार वर्षों से चली आ रही इस प्रथा में रजस्वला महिलाओं को अपवित्र माना जाता रहा है. कुछ ही वक्त पहले मंदिर बोर्ड के अध्यक्ष ने एक बेहूदा-सा बयान जारी किया था कि जब तक महिलाओं के मासिक स्राव  की जांच करने वाला यंत्र न बन जाए तब तक उनके मंदिर प्रवेश पर निषेध रहेगा. केरल के ही पद्मनाभ स्वामी मंदिर के गर्भगृह में स्त्रियों के जाने पर रोक है.

विश्व के सबसे धनी मंदिरों में से एक इस मंदिर के प्रबंधन का मानना है कि महिलाओं के गर्भगृह में प्रवेश से मंदिर के खजाने को बुरी नज़र लग जाएगी और कि सोलह हजार रानियों के साथ विलास करने वाले कृष्ण के मूल स्वरूप विष्णु महाराज स्त्रियों को देख कुपित हो जाएंगे. इसी तरह म्हस्कोबा मंदिर (पुणे), मारूति मंदिर (बीड) पटबौसी सत्र मंदिर (असम), पुष्कर के कार्तिकेय मंदिर (राजस्थान), रनकपुर के जैन मंदिर या दिल्ली  की निजामुद्दीन दरगाह के साथ-साथ देश के अनेक पूजागृहों में स्त्रियों के प्रवेश पर आंशिक या पूर्ण प्रतिबंध है तमाम धार्मिक स्थलों में प्रतिबंधों के पीछे स्त्री  को माहवारी के दौरान अपवित्रा माना जाना एक बड़ा कारण होता है. एक प्राकृतिक प्रक्रिया स्त्री  को अपवित्र बना डालती है किंतु उसी स्त्री के  ‘अपवित्र’ जननांगों से पैदा होने वाले पंडित-मुल्ला स्वयं को पवित्रता की प्रतिमूर्ति मानते हैं. ऐसा प्रतीत होता है कि उपासना स्थलों के पुजारी शायद हगते-मूतते भी नहीं होंगे बहरहाल, जहां तक बात रही ऐसे आंदोलनों की तो बराबरी के हक की लड़ाई का औचित्य समझ में आता है किंतु व्यापकता में देखा जाए तो यह पितृसत्ता के षड्यंत्रकारी और घिनौने खेल में एक खिलौना बने रहने की जिद्द से अधिक और कुछ नहीं है. विश्व के तमाम धर्म पितृसत्ता के संरक्षण और पोषण हेतु पुरुषों द्वारा ही गढ़े गए हैं. हर धर्म का संस्थापक और उसका परमपिता कोई पुरुष ही होता है. अलबत्ता कुछ स्त्रियों को छोटे-मोटे ओहदे दे दिए गए हैं किंतु परमपिताओं से बहुत नीचे के दर्जे के. सनातन धर्म हो या प्राचीन यूनानी धर्म, ज़रूरत पड़ने पर देवताओं द्वारा इन देवियों के यौन शोषण में भी कोई गुरेज नहीं होता. इंद्र से लेकर यूनानी देवता ज़ियूस तक के बलात्कारों और व्यभिचारों के किस्सों से धर्मग्रंथ भरे पड़े हैं. अपनी पुत्री सरस्वती से विवाह कर लेने में ब्रह्मा को कोई आपत्ति नहीं थी. ज़ियूस ने भी अपनी बहन हेरा से विवाह किया था.


 परम शक्तिशाली जूपिटर भी उसी  ज़ियूस का रोमन संस्करण हैं. गोया कि कोई भी पुरुष इन ईश्वरों/देवताओं के हवाले अपने तमाम कुकर्मों को जायज़ ठहरा सकता है.बहू-बेटियों का बलात्कार कर भी देवतुल्य बना रह सकता है. बचाव में तो खाप पंचायतें खड़ी हो ही जाती हैं. देवियों को विष कन्याओं और वेश्याओं की तरह इस्तेमाल करने में भी ‘ईश्वरों’ को कभी परहेज नहीं रहा जैन स्त्रियां तो स्वर्ग जा ही नहीं सकतीं जब तक वे पुरुष योनि में पुनर्जन्म न ले लें. बुद्ध भी स्त्रियों को अपवित्र मानते थे. अपने भिक्षुकसंघ में स्त्रियों को शामिल करते हुए बुद्ध ने जो नियम और कानून बनाएथे उसमें उनका पूर्वाग्रह साफ झलकता है. उन्होंने मान रखा था कि स्त्रियां स्वभावतः बुरी होती हैं. बुद्ध ने भिक्षुणियों को भिक्षुओं के बराबरका दर्जा नहीं दिया. न ही उन्हें स्वतंत्र रूप से सोचने-समझने और रहनेकी आजादी दी. घुमा-फिराकर उन्हें भिक्षुओं के नियंत्रण में ही रहना था मैथुनक्रिया और स्त्रियों की यौनिकता को लेकर भी बुद्ध का नज़रिया बहुत भटका हुआ था. आनंद ने पूछा”भंते स्त्रियों के साथ हम कैसा व्यवहार करें ?/ “बुद्ध ने उत्तर दिया-”आनंद उनका अदर्शन.“/ आनंद ने प्रतिप्रश्न किया-”भंते, दिखाई दे जाने पर उनसे कैसा व्यवहार करें ?/ “बुद्ध ने उत्तर दिया”उनसे असंवाद !“ इसी तरह ईसाई धर्म में रोमन कैथोलिक या आर्थोडाॅक्स चर्च में महिलाएं पुरोहित नहीं बन सकतीं. पोप और कार्डिनल जैसे ओहदे सिर्फ पुरुषों के लिए सुरक्षित हैं. इस्लाम में अनेक कायदे-कानूनों आ परिधान संहिता में बंधी महिलाएं बिना पति या नजदीकी रिश्तेदार के हज नहीं कर सकतीं.

मूर्खतापूर्ण हिंदू मान्यताओं की तर्ज पर ही मासिक धर्म के वक्त उनके तवाफ़ (काबा के सात चक्कर) पर रोक है. इसी तरह खास परिस्थितियों को छोड़ महरम बगै़र या पति की इजाजत के बिना वे मस्जिद नहीं जा सकतीं. वहां भी औरतों के बैठने की जगह पुरुषों के पीछे ही होती है. सिर्फ सिक्ख धर्म को छोड़ दें.जहां स्त्री -पुरुष के लिए समान अधिकारों की बातें कही गई हैं (हालांकि यह अब तक कितना हासिल हो पाया है कहना कठिन है) तो यहूदी, सनातन, जैन, बौद्ध, ईसाइयत या इस्लाम कुल मिलाकर सभी धर्मों में औरतों की हैसियत बद से बदतर है. जबकि सभी धर्मों की सबसे समर्पित भक्त महिलाएं ही होती हैं. धर्म का सारा व्यापार और कारोबार उनके ही भरोसे चलता है. आस्था की बड़ी कीमत औरतें चुकाती हैं. उनका यह आत्मपीड़क व्यवहार अचरज में डालता है. हर प्रकार के छोटे-बड़े त्याग करने का जिम्मा स्त्रियों के सर होता है और पुरुषों को एकतरफा अधिकार है कि अपनी मर्दानगी उन पर झाड़ते रहें. उन्नीसवीं-बीसवीं सदी में शरीर विज्ञानी ईवान पेट्रोविच पावलोव जिस क्लासिकल कंडीशनिंग की या मनोविज्ञानी एडवर्ड थाॅर्नडाइक और बी.एफ. स्किनर जिस आॅपरेंट कंडीशनिंग की बातें करते रहे उसे पितृसत्ता अपने संरक्षण हेतु धर्मों के सहारे सहस्राब्दियों  से सफलतापूर्वक आजमाती रही है. हमारे यहां लोग इस कंडीशनिंग को ‘संस्कार’ के नाम से जानते हैं.


पितृसत्तात्मक धर्म व्यवस्थाओं ने लोगों.विशेषकर स्त्रियों को संस्कारों की घुट्टी पिला-पिलाकर और मर्यादाओं की दुहाई दे-देकर मानसिक रूप से अपंग बना डाला है. ये सभी भक्त धर्मों के बंधक हैं. मजे़दार बात यह है कि इन्हें गुलामी तक पहुंचाने वाले वे ही हैं जो खुद भी उसी व्यवस्था के दास हैं. कुल मिलाकर यह एक भयानक अंतहीन चक्र है जिससे छूटना नामुमकिन लगता है. यदि स्त्रियों को वाकई बराबरी का दर्जा चाहिए तो उन्हें  तमाम धर्मों को लात मारनी होगी. छोटे-बड़े हर ईश्वर को खंडित करना होगा. उन्हें निर्णय लेना होगा कि ‘मां’ प्रकृति और ‘पिता’ परमेश्वर में से किसे चुनें ! पहला रास्ता उन्हें और उनकी संतानों को तार्किक और वैज्ञानिक सोच की ओर ले जाता है और दूसरा पितृसत्ता की चाकरी की तरफ ! विश्व के सभी धर्म चारित्रिक रूप से सीढ़ीदारहोते हैं जहां कभी भी सबके बराबरी पर खड़े रहने की कोई संभावना नहीं होती. मानवता और तार्किकता के लोकतांत्रिक समतल वहां नहीं पाए जाते. यदि स्त्रियां वाकई नास्तिक हो जाएं तो उनकी और उनकी कोख से निकलने वाली आधुनिक पीढ़ियों के सहारे हजारों सालों की इस दासता का अंत चंद वर्षों में ही हो जा सकता है.

हंस के जून अंक का संपादकीय ( साभार ) 
कथाकार संजय सहाय मासिक पत्रिका हंस के संपादक हैं. संपर्क: sanjaysahay1@gmail.com
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