मेरे पिता

पवन करण
पवन करण हिन्दी के महत्वपूर्ण कवि हैं. 'स्त्री मेरे भीतर' चर्चित  कविता संग्रह . संपर्क :  pawankaran64@rediffmail.com 
बहन और मां के प्रेम के पक्ष में कवितायें लिखने वाले हम सबके प्रिय कवि पवन करण का आज जन्मदिन है. पितृसत्तात्मक समाज  की  सबसे बड़ी ग्रंथी है पुरुष का पिता-पति-बेटा के  रूप में स्त्री का संरक्षक होने की , डिक्टेटर होने की. पवन करण की कवितायें पढ़ते हुए यह ग्रंथी पिघलती जाती है. आज उनके जन्मदिन पर उनकी कविताओं से अलग कुछ - ' पिता की यादें.' पिता होना ही पितृसत्ताक होना नहीं है. बडे आत्मीय संस्मरण का एक हिस्सा. 

दिसंबर शुरू हो चुका था 2012 का बरस पिता के लिये बहुत कठिन था. पिछले बरसों से लगातार खराब चलती आई उनकी तबीयत इस बरस तीन बार बिगड़ी. पहली और दूसरी, दोनोें बार, हमें ऐसा लगा कि वे  गये, लेकिन सौ बरस जीने की अपनी अदम्य इच्छा के चलते उन्होंने हमें दोनों बार अपना कुतका ( अंगूठा ) दिखा दिया. इस बरस मई-जून में जब पहली बार पिता गंभीर रूप से बीमार पड़े तब छुट्टियों में तीनों बहनों का अपने बच्चों के साथ घर पर आने का समय था. जो उनके  लिये वरदान साबित हुआ.  पिता की हालत बहनों के घर पर आने से, कुछ पहले से, खराब होती जा रही थी, जिसके चलते वे अपनी समझ लगातार खोते जा रहे थे. उनके द्वारा बोले जाने वाले वाक्य उनके मुंह में गड़बड़ाने लगे थे. साथ ही लगातार वे इतने कमजोर हो रहे थे कि रात को गुसलखाने में गिरने लगे थे. उन दिनों मैं पिता के पास ही घर में ग्राउंड फ्लोर पर बने हाॅल में जिसमें पिता नितांत अकेले रहते थे, सोने लगा था. उनकी हालत देखकर बहनों के साथ-साथ मुझे भी लगने लगा था, कि वे उम्र का अंतिम पड़ाव तय कर रहे हैं और किसी भी दिन वे हमें छोड़ सकते हैं. युवावस्था से तपेदिक के शिकार रहे पिता उम्र बढ़ने के साथ-साथ बुरी तरह असाध्य अस्थमा के शिकार होते गये. अस्थमा के अकाट्य प्रभाव के चलते अपने अंतिम दो-तीन बरसों में तो वह बिस्तर पर तकिये में मुंह घुसाये घुटनों के बल बैठे-बैठे सोेते रहते. हम उन्हें समझा-बुझा कर या फिर उन पर गुस्सा करते हुए पीठ के बल बिस्तर पर लिटा भी देते तो वे कुछ देर बाद सांस लेने में आराम देने वाली अपनी उसी शारीरिक मुद्रा में बैठ जाते. इस तरह रात-दिन सांस लेने के लिये उनको इस तरह संघर्ष करते देखना बहुत पीड़ा दायक था. मगर पीड़ा को अपने पर हावी न होने देना उसका बखान न करना तथा पीड़ा का लगभग तिरस्कार करना, उनकी उस जीवटता में शामिल था जो हमें आश्चर्य में डाले रहती थी। उन्हें अंतिम चार-पांच बरसों में डायबिटीज भी हो गयी थी.

हालांकी  वे उन भारतीय पुरूषों में से थे जो ये कतई मानने को तैयार नहीं थे, कि शक्कर की भी कोई बीमारी हो सकती है. उनके लिये तो शक्कर ही जीवन था. शक्कर नही तो जीवन नहीं. जब भी डायबिटीज का जिक्र चलता, वे कहते पता नहीं ये कहां से हो गई. बहनों ने आते ही पिता की देखभाल शुरू कर दी. चूकि बहनें गर्मियों में ही घर आतीं हैं तो घर में नीचे हाॅल में ही अपने बच्चों के साथ अपना डेरा जमा लेती हैं. हाॅल के ऊपर दो मंजिला मकान बना है इस वजह से हाॅल गर्मियों में ठंडा रहता है और एक बड़े कूलर और पंखे के सहारे उसमें रहना आसान होता है. बिजली चले जाने पर भी कुछ समय उसमें आराम से बिताया जा सकता है. बहनों के बच्चे भी आराम से अपने खेल-कूद और शोर-शराबे के साथ उसमें समा जाते हैं. फिर पिता के पास साथ रहने का संतोष सबसे ऊपर. बहनें जब आतीं और महीने पंद्रह रोज रहतीं तो मैं पिता की तरफ से निश्चिंत हो जाता. मैं पिता के उन दिनों को उनके जीवन के सबसे अच्छे दिन मानकर चलता. हालाकि मां की मृत्यु के बाद घर में, हम सबके साथ रहते हुए भी, अकेले रहते उनकी जिंदगी और मन में अकेलापन इस कदर भर गया था, कि अपने दोस्तों के अलावा उनके पास ज्यादा देर तक बैठा रहने वाला घर का कोई भी सदस्य उन्हें नहीं सुहाता था. थोड़ी देर चलकर उनके पास बैठा जाये यह सोचकर मेरे अलावा घर का कोई सदस्य उनके पास ज्यादा देर बैठ जाता तो वे खुद ही कहने लगते जाओ ऊपर जाकर अपना काम देखो. क्या तुम्हें कोई काम नहीं है, जो मेरे पास बैठे हो.  ब्याह के बाद बरस में एक बार घर में आने वालीं बहनों के मामले में उनका यही हाल था. वे उनका भी अपने पास ज्यादा रहना बर्दाश्त नहीं करते थे.

 मैं शाम को घर लौटता तो मुझसे कहते, ये बच्चे दिन भर ऊधम करते हैं. दिन में सोने भी नहीं देते. और ये तीनों लड़कियां हैं जो रात-रात भर आपस में बातें करती रहती. सोती नहीं हैं. पता नहीं क्या बातें करती हैं. इनकी बातें ही खत्म नहीं होती. तब हंसते हुए मैं उनसे कहता, अरे बरस में एक बार तीनों एक साथ घर आती हैं, मिलती हैं, तो अपने मन की बातें करती रहती हैं. ससुराल में कहां इन्हें खाने-पीने और इस हद तक बोलने-बतराने की आजादी होती है. इस मामले में मेरी समझाइस सुनकर पिता, “फिर ठीक है भईया तुम जानो” कहकर चुप हो जाते. मगर एक बार तो अपने अकेलेपन की रक्षा करते पिता ने हद ही कर दी, जो मेरी छोटी बहन ने मुझे दफ्तर से जब मैं घर लौटा, तब बताया. घर में रहते दस दिन से ज्यादा रह चुकीं अपनी बेटियों से वे बोले, मोड़ियों अब तुम्हें यहां रहते हुए बहुत दिन हो गये. अब ऐसा करो कि अपने-अपने घर जाओ. जाकर अपना घर संभालो. भैया अर्थात मेरी बात करते हुए उन्होंने यह भी कह दिया कि वो अकेला कमाने वाला है. उस पर ज्यादा बोझ डालना ठीक नही. तुम आती हो तो उसका खर्चा भी तो होता होगा ना. जबकि खर्च या बोझ की कोई बात ही नहीं थी. उनकी पेंशन से ही इतने पैसे बच जाते थे कि बहनों का आराम से आना-जाना और भावनाओं से भरा सम्मान हो जाता था. किंतु बात बहनों के घर से अपने बच्चों के साथ अपने-अपने घरों के जाने की नहीं, उनके अकेलेपन की थी, जिसके साथ रहने की उन्हें आदत पड़ गई थी. उनकी कही इस बात को जब सबसे छोटी बहन ने मुझे बताया तो मैं और तीनों बहनें खूब हंसे. भले ही ही अपनी बेटियों से कही उनकी बात को सुनकर हम सब हंस कर रह गये. मगर तीस साल पहले विधुर हुए पिता का अकेलापन धारदार हंसिये की तरह मुझे, पिता से ज्यादा काटता.


अपने अकेलेपन को लेकर उनके भीतर कितनी टीस थी इसे उन्होंने, अपने अंतिम बरस में किसी बात पर अकेले में मुझसे खीजते हुए कि हमसे तो बड़ी गलती हो गई, यह कहने के अलावा हमें कभी नहीं बताया. ” अब जो है सो है “ यह कहकर उन्होंने हमेशा विषय बदल दिया. बीमारी और अकेलेपन से परेशान पिता अपनी जिस गलती की तरफ इशारा कर रहे थे. मैं उसे जानता था. मगर परिवार की जो हालत थी. उसमें जिस कदर निर्धनता और अशिक्षा पसरी हुई थी. उसे देखते हुए मां की मृत्यु के बाद पिता ऐसा-वैसा कोई कदम उठाने की स्थिति में थे भी नहीं. हालाकि बिना सोचे-समझे बुआजी ने उन पर इस बात का पर्याप्त दबाब बनाया कि उनहें दूसरा विवाह कर लेना चाहिये. मगर पिता ने ऐसा कोई कदम नहीं उठाया. मगर जब तक पिता जीवित रहे मेरे भीतर इस बात को लेकर हमेशा बेचैनी बनी रही कि काश हम इतने धनी होते कि पिता, घर में तो कतई नहीं, मगर चाहते तो घर के बाहर अपने मन का कुछ कर लेते. छोटे से घर में तो वैसे भी दरिद्रता और तपेदिक के साथ मैं और मुझसे छोटी चार बहनें ठुसे थे. ऐसे में उनके लिये कुछ भी कर पाना संभव नहीं था. सोचता हूं यदि उन्होंने ऐसा कोई निर्णय ले लिया होता तो क्या होता ? मगर आगे चलकर मेरी नौकरी के चलते घर की कुछ हालत सुधरी तो उन्होंने घर से दूर थोड़ा-बहुत कहीं कुछ किया तो था. जिसके बारे में घर में और घर के बाहर चलने वाली खुसुर-पुसुर मेरे कानों तक पहुंची. मगर मैंने उस पर कभी ध्यान नहीं दिया. यह उन्हें लेकर मेरी समझदारी थी. उन्हें लेकर मुझे खुद पर इतना विश्वास था कि कहीं कुछ मामला बिगड़ेगा भी तो मैं उसे संभाल लूंगा. मगर ऐसा कुछ हुआ भी नहीं. मैं उनके जीवन और अकेलेपन को लेकर ऐसा ही सोचता और चाहता भी था. वह एक समय का मामला था जो पिता के स्तर पर ही निपट गया.

मैंने महसूस किया कि अंतिम दिनों में उन्हें अपना अकेलापन अखरने लगा था. चूकि वे पढ़ नहीं सके थे, तो पढ़े-लिखे लोगों के बीच अपना स्थान बना पाने में विफल रहते थे. इस वजह से यहां सिटी सेंटर  में रहने आने के बाद शुरू में तो उन्हें कुछ समस्या हुई मगर कुछ ही दिनों में यहां भी उन्होंने अपना समाज बना लिया था. जिसके बीच उनकी सुबह शाम कटती. जिसकी आदत उन्हें माधवगंज और अपनी युवावस्था से थी. आश्चर्य की बात यह थी कि बीमारी की सघनता में बेहद कमजोर होते जाने तथा गुसलखाने और हाॅल तथा रास्ते में गिर पड़ने के बावजूद उन्होंने  घर से बाहर जाना और अपने दोस्तों के बीच बैठना बंद नहीं किया. घर के बाहर निकलकर जिस चाय के ठेले पर उनकी नियमित बैठक होती. वहां कुछ युवा आॅटो चालक भी बैठते तो धीरे-धीरे उनकी उन आॅटो चालकों में से एक-दो से गहरी पटने लगी. वे उनसे मजाक करने के साथ उनका बड़ा आदर भी करते. देर या थकान-बुखार होने पर कई बार आॅटो चालक उन्हें घर छोड़ जाते. अंतिम दिनों में जब वे घर से बाहर निकले बिना नहीं मानते थे. तो मैंने उनसे कह दिया. आप किसी आॅटो वाले को कह दो कि वह आपको घर से ले जाया करे और घर पर छोड़ जाया करे. मैंने देखा कि वे ऐसा करने लगे थे. लेकिन उनकी खराब हालत को देखकर घर-बाहर सब ऐसा चाहते थे कि वे घर में ही रहें. आॅटो वालों ने भी कहा भैया अब इन्हें बाहर नहीं निकलने दिया करो. अब इनके हाथ-पैर काम करना बंद कर रहे हैं और ये चल भी नहीं पाते हैं. मगर पिता इस मामले में किसी की मानने को तैयार नहीं थे. घर से बाहर निकले बिना वे जी ही नहीं सकते थे. चूकि मैं दिन भर अपने कार्यालय में रहता तो दिन में उनके घर से बाहर निकलने पर नियंत्रण नहीं रख पाता था.


चूकि अंतिम दिनों में उनकी तबीयत ज्यादा खराब थी और ऐसे में एक आॅटोवाला उन्हें लेने घर आया तो उनकी बहू यानि मेरी पत्नी ने उससे यह कहते हुए, देखते नहीं, उनकी कितनी तबीयत खराब है और ऐसे में भी आप उन्हें बाहर ले जा रहे हो, उन्हें कहीं कुछ हो गया तो, यह कह आॅटो वाले को कर डांट कर भगा दिया. आॅटोवाला बहू के बारे में पिता के भय से परिचित था तो वह चुपचाप सुनकर चला गया। उसने उससे यह तक नहीं कहा कि मुझसे बाबूजी ने कहा है, तभी मैं उन्हें लेने आया हूं. यह बात दुखी होते हुए पिता ने शाम को मैं जब दफ्तर से घर लौटा तब मुझे बताई तो मैंने अपनी पत्नी को समझाया कि मेरे ही कहने पर ही आटो वाला उन्हें लेने आता है, ताकि वे थोड़ा घर से बाहर जाकर घूम कर आ सकें और उनका मन लगे. हमारे पास तो समय है नहीं कि उन्हें  कहीं ले जा सके.  हालाकि वे कभी हमारे साथ नहीं जाते, क्योंकि वे अपने अंतिम समय तक मस्तराम थे. उस दिन के बाद आॅटोवाला उनकी बहू से डरकर बाबूजी को आवाज लगाकर बुलाने की जगह उनके हाॅल के या घर के दरवाजे पर दिखाई देने की प्रतीक्षा में घर के चक्कर लगाने लगा. घर में सर्दियों में जब वे मेरी धौंस के चलते नहा-धोकर घूप में पलंग पर लेटे होते. घर में काम करने वाला लड़का उनके पास आकर चुपचाप बताता कि बाबूजी नीचे आॅटोवाला आपको देख रहा है तो वह नीचे उतरकर उसके साथ घर से बाहर चले जाते. मैं भी यही चाहता था कि अपने अंतिम समय तक वे घूमते-फिरते रहें. उनके हाथ-पैर चलते रहे.उन्हें  जीते देख और उनके बारे में सोचते हुए मुझे हमेशा लगता कि समय ने उनके लिये यह कैसा जीवन चुना था ? माधवगंज में सड़क वाला ग्यारह बाई बारह फुट जमीन पर एक के ऊपर एक कमरों की शक्ल में बना मकान तथा यहां सिटी सेंटर में लिया बड़ा मकान जिसमें ऊपर की मंजिलों पर तीन बेडरूम और एक बड़ा तथा एक छोटा दो हाॅल थे. दोनो ही ऐसे थे जो उनके परिवार से अलग रहने की परिस्थितियां निर्मित करते थे.

जब हम माधवगंज वाला घर छोड़कर सिटी सेंटर वाले घर में पहुंचे, तो स्वाभाविक रूप से हमने उनके और उन्होंने अपने रहने के लिये भूतल पर बने हाॅल को चुन लिया. जो पहली मंजिल पर बने भाग के बराबर ही था. जिसमें उनके लिये हाॅल से लगा बाथरूम था जो इससे पहले उनके जीवन में शामिल नहीं था. उन्होंने भले ही इस बारे में कभी कहा नहीं मगर जिसकी कमी उन्हें लगातार खलती रही। वह गुसलखाना उनका था जिसका बस वही उपयोग करते. या बहनें जब आतीं तब उनका उपयोग होता अथवा किसी मेहमान के आने पर उनके अलावा कोई उसका उपयोग करता. चूकि पुरूष मेहमानों के लिये हमने हाॅल में ही रूकने की व्यवस्था की हुई थी, अतः जब भी कोई आता वह हाॅल में ही पिता के पास ही रूकता. मगर किसी के आने और अपने एकांत में खलल पड़ने पर पिता भले ही बाहर से कुछ नहीं कहते, मगर भीतर ही भीतर खीजते, उनकी खीज हमें उनके चेहरे पर दिखाई देती. पिता उसी हालत में हमारे साथ एक ही मंजिल पर रह सकते थे कि जो घर हमने लिया था वह एक ही मंजिल पर बना होता. और उसमें भी उनके लिये एक कमरा अलग होता, जो उनके जीवन में संयोग से भी नहीं था. उन्हें युवावस्था से ही भयानक तपेदिक था, जिसकी वजह से वे लगातार खांसते और कफ उगलते रहते इस कारण भी वे हमसे घर में  कुछ दूरी बनाकर चलना चाहते थे. वे इस मामले में समझदार थे. चूकि परिवार में तपेदिक का खूंखार इतिहास रहा था, जिसके बारे में मैंने अपने आत्मकथ्य के पहले खंड बुरा बच्चा में लिखा भी है इस वजह से हम भी यही चाहते थे कि उनसे थोड़ी दूर बनी रहे तो बेहतर क्योंकि तपेदिक को जिस हद तक हमारे परिवार ने भोगा था, हमारे जानने वालों में से शायद ही किसी परिवार ने भोगा हो. इस वजह से पिता के साथ-साथ हम भी कतई यह नहीं चाहते थे कि वह और आगे बढ़े. मैंने पिता के तपेदिक का बहुत इलाज कराया, इतना कि मैं उन्हें तपेदिक की दवाईयां खिलाते-खिलाते और मेरे आग्रह और दबाव पर वे दवाईयां खाते-खाते थक गये. मगर उनका यह रोग कभी उनहें छोड़कर दूर खड़ा नहीं हुआ. साल-साल भर दवाईयां खिलाने के बाद भी वे मुंह से खून उगलने लगते. उनका मुंह से खून और कफ उगलना तो मरते दम तक बंद नहीं हुआ.


अंतिम दिनों तक एक्सरे उन्हें तपेदिक होना बताता रहा. आखिरी के महीने में मेरे और उनके बीच इस बात पर सहमति बनी की अब सब दवाईयां बंद कर दी जायें. बहनों ने उनकी इच्छा के अनुसार उनके लगातार सूखते और निढाल होते जा रहे हाथ-पैरों पर लहसुन मिलाकर गर्म किया जाता सरसों का तेल लगाना शुरू कर दिया. जो बहनों के सिवा घर में इतनी आत्मीयता से कोई नहीं कर सकता था. हालाकि उनके कृशकाय शरीर को देखकर लगने लगा था कि अब बहुत देर हो चुकी है, मगर इससे उन्हें फौरी तौर पर राहत मिलती, क्योंकि उनका बदन कसरती था. उन्हें लगता था कि उनके शरीर में रक्तसंचार धीमा हो रहा है. इस वजह से उनका शरीर अब हमेशा दुखता रहता है अतः उनके शरीर को मालिस की बहुत जरूरत है. युवावस्था से ही में सुबह जल्दी उठकर घूमने जाने तथा व्यायाम करने की आदत के चलते जो अब शरीर कमजोर पड़ने के साथ-साथ छूट चुकी कि वजह से उनका शरीर अब जाकर तड़कता था. उनके हाथ-पैरों की रगड़कर मालिस करते हुए उनके साथ बातें करते जाने वाली बहनों में सबसे बड़ी सुनीता ने उन्हें खांसी और कफ के चलते पीने के लिये गरम पानी आदि भी देना प्रारंभ कर दिया. जिसके बारे में इससे पहले मेरे साथ-साथ किसी ने नहीं सोचा था, हालाकि उससे उन्हें कितना आराम मिला, यह मैं ठीक-ठीक तो नहीं कह सकता. मगर जब मैं उनके लिये हाॅल में नीचे ही गर्म करने के लिये बिजली का बर्तन तथा रात में रात भी पानी गर्म बनाये रहने वाला जग ले आया, तो  पिता बोले क्यों इतने पैसे खर्च कर रहे हो, हटाओ इन्हें यहां से, घर में क्या बर्तनों की कमी है, जो ये और खरीद लाये. वे पुराने जग की तरफ इशारा करके बोले क्या ये बर्तन नहीं हैं.

हालांकी वे कहते तो यह सब उनके लिये बहुत पहले ही कर चुका होता. मगर उनका हर तरह की सुविधा से चिढ़ना किसी को भी परेशान कर सकता था. पिता हमेशा कम सुविधाओं में जिये. इस हद तक कि उन्हें अपने लिये जूते तक खरीदना गवारा न था. जब भी मैं कहता कि चलो आपको नये जूते पहना लाऊं. वे कहते क्या करना है जूतों का, मुझे कहां जाना है. वो तुम्हारे पुराने जूते रखे तो हैं, यदि मुझे कहीं जाना होगा तो मैं उन्हें ही पहन लूंगा. लेकिन मृत्यु से तीन बरस पहले मैं उन्हें जबरदस्ती मोटर सायकल पर बिठाकर ले गया और उन्हें एक जोड़ी उनके नाप के जूते पहना लाया. जो बमुश्किल  उन्होंने एक-दो बार पहने. जिसे उनकी मृत्यु के बाद पत्नी ने किसी रिश्तेदार को दे दिया. मैं उसी बरस उन्हें उनकी पसंद के के कपड़े भी दिलाकर लाया. मैंने उन्हें कपड़े की दुकान पर ले जाकर बिठा दिया. जब उनके पास मुझसे बचने का कोई चारा नहीं रहा तो उन्होंने अपनी पसंद से चार जोड़ी पेंट-शर्ट के कपड़े अपने लिये खरीदे. जो मैंने हाथों-हाथ दर्जी के यहां सिलने डलवा दिये. जिसमें से उन्होंने दो ही जोड़ी कपड़े पहने. दो जोड़ी बिना पहने कपड़े उनकी लोहे की अलमारी में अंतिम समय तक रखे रहे.  जिंदगी में पहली बार जब मैं इस तरह उनकी पसंद के कपड़े दिलवा रहा था. मैंने उन्हें अपनी पसंद के रंग की शर्ट का कपड़ा दिलवाना चाहा तो उन्होंने मना कर दिया. मेरी पसंद के रंग को मना करते हुए उन्हें अपनी पसंद के रंग की शर्ट का कपड़ा खरीदते देखना. पिता को लेकर मेरी दुर्लभ स्मृतियों में से एक हैं. अपनी पसंद के रंग की शर्ट को भी उन्होंने एक दो बार ही पहना. वे जब भी उसे पहनते मेरा मन उल्लास से भर जाता. मुझे हमेशा वह शर्ट, शर्ट की तरह नहीं, उनकी पसंद उनके मन के उस हिस्से की तरह दिखाई देती जिससे मेरा तक परिचय नहीं था.


 हालांकी  उन्हें खुद दुकान पर ले जाकर कपड़े दिलवाने के पीछे कुछ बरस पहले मुझसे उनकी कही यह बात मेरा पीछा रही थी कि हमारा क्या है हम तो उतरन पहनते रहते हैं. वे अधिकतर मेरे वे कपड़े ही पहनते थे जिन्हें मैं पहनना बंद कर देता था. मैं उनसे उनकी इस बात पर क्या कहता. मगर इतना जरूर था कि मैं उनकी इस बात पर अपना मन मसोसकर रह गया. मगर मैंने उनसे इतना जरूर कहा, बाबूजी, चलो मेरे साथ चलो आप जैसे कपड़े लेना चाहो मेरे साथ चलकर ले लो, मैं आपसे हमेशा कपड़े लेने की कहता हूं, मगर आप ही मना कर देते हो. चलो मेरे साथ. अभी चलो. फिर मेरे कपड़े आपके लिये उतरन कैसे हो सकते हैं. मैं आपका बेटा हूं. आपने आज तक ऐसा नहीं कहा. आप खुशी-खुशी पहन लेते हैं. फिर आप तो खुद सक्षम हैं. कमाते हैं. आपको पेंशन मिलती है. आप जैसा चाहें पहन सकते हैं. अब आप ही न लेना चाहें तो मैं क्या करूं. चलो, मेरे साथ मैं आपको अभी जैसे आप चाहें कपड़े दिलवाकर लाता हूं. फिर अपनी कही इस बात पर मुझे दुखी होते देख वे बोले कोई बात नहीं मैं तो यूंही कह रहा था. ये इतने सारे कपड़े हैं तो इनका क्या होगा. चलो, जाओ मैंने तो यूंहीं कह दिया. मगर पिता के मन में कपड़ो को लेकर जो फांस थी, वह उस रोज उभरकर बाहर आ गई. मैं सोचता हूं कपड़ों को लेकर पिता के मन को जानने की मैंने कभी कोशिश नहीं की. सिर्फ पहनने के कपड़ों को ही क्यों ? उनके बिस्तर के बारे में, वे जिस कमरे में वे रहते, जिस में उनकी इच्छा जाने बिना हम चाहे जिस मेहमान को सुला देते, उसके बारे में.  वे क्या खाना चाहते हैं इस बारे में, उनहोंने कुछ कहा नही तो हमने भी यह मान लिया कि उन्हें सब स्वीकार है. हो सकता है वे यह चाहते हों कि जिस तरह वे बचपन में मुझे जबरदस्ती कपड़े पहनाते और खिलाते-पिलाते होंगे. मुझे भी उन्हें अच्छा खिलाने-पिलाने की जिद करनी चाहिये थी. मां थी नहीं तो फिर उनसे कौन पूछता कि आज कौन सी सब्जी खाओगे.

 हालांकी  जहां तक मुझे याद है मेरी शादी के बाद कभी उनसे यह पूछा भी कि कौन सी सब्जी खाओगे तो उन्होंने  कह दिया, भैया से पूछो वह क्या खाना चाहता है. मगर उनके जाने के बाद लगता है कि हर चीज के बारे में  उनसे जिद करके पूछना चाहिये था. मैं खुद से पूछता हूं उनके जाने के बाद ही यह क्यों लग रहा है, तब क्यों नहीं लगा. तब क्या घर की संवेदना सो रही थी. हां लेकिन जब बहने  घर आतीं रसोई से अधिकार समाप्त हो जाने के बाद भी वे पिता से खाने को लेकर उनकी पसंद जरूर पूछती. मगर पिता बहनों को अपनी पसंद बताकर कतई प्रोत्साहित नहीं करते. हमेशा उनसे यही कहते तुम्हें जो खाना हो वह बना लो, या भैया से पूछो. बहनें जब भी आतीं तो पिता का अकेलापन तोड़ने की नियत से उनसे हमेशा कुछ दिन के लिये को अपने घर चलकर रहने और अपने साथ चलने की कहती.  कभी-कभार वे उनको किसी तीर्थ पर ले जाने की भी मुझसे बात करती.  मैं भी जिन दोस्तों के बीच रहता उनके माता-पिता को तीर्थयात्रा पर जाते हुए देखता तो मैं सोचता कि काश मां होती तो मैं भी इन्हें मां के साथ अपने खर्च पर तीर्थ यात्रा करने भेजता. सोचता कि इस बहाने ही सही जीवन भर घर और बीमारियों  में ही हाड़ खपाने वाले पिता भी इस बहाने कहीं घूम आते. मगर कभी-कभार पूजा-पाठ करने वाले, कभी मंदिर नहीं जाने वाले, कर्मकांडों और को लेकर हमेशा नाक-भौं सिकोड़ने वाले पिता तीर्थ यात्रा की बात पर चलने पर लपककर कहते, कुछ नहीं होता इनसे ये सब फालतू बाते हैं. उनके अपनी बेटी के घर जाकर रहने का तो प्रश्न तो इसीलिये नही उठता था कि वे बेटियों की कही इस बात को सुनकर हमेशा कहते क्यों, यहां क्या मैं ठीक नहीं हूं, यहां मुझे किस बात की परेशानी है. यहां भी तो सब ठीक है. मां नहीं रही तो पिता कहीं घूमने नहीं गये. मैंने किसी के साथ उनके जाने की कोशिश भी की तो उसका कोई नतीजा नहीं निकला. धीरे-धीरे हम उनके तीर्थ-यात्रा पर जाने की बात भूलते चले गये, और देखते-देखते उनके गंभीर रूप से बीमार पिता के अंतिम यात्रा पर जाने का समय निकट आ गया.


यह उनकी आदत में शामिल था कि वे मुझसे अपने किसी काम के लिये कभी-कभार ही कहते. मगर अपनी आदत के मुताबिक मैं उनकी पूछ-परख, देखभाल, और उनके काम करता रहता. पत्नी सुबह ऊपर मेरे कमरे में चाय लेकर आती तो उससे सबसे पहले मेरा यही पूछना होता. बाबूजी को चाय दे आईं ?   कई बार वह मुझ पर इस बात को लेकर खीज भी जाती कि क्या मैं बाबूजी को चाय देकर नहीं आती जो चाय पीने से पहले रोज मुझसे यह पूछते हो. कई बार मेरे पूछने पर वह गुस्से में कहती हां दे आई, इन्हें विश्वास ही नहीं होता. यहीं हाल रात के खाने का था. साढ़े आठ बजे खाना खाने के लिये बैठते समय पूछता, बाबूजी को खाना पहुंचा दिया. इस बात पर पत्नी की प्रतिक्रिया तीखी होती. पत्नी की पिता के प्रति बेरूखी मुझे हमेशा संदेह से भरे रहती. पिता की मृत्यु के बाद मेरी बिटिया ने कहा भी कि हमसे गलती हुई हमने बाबा की तरफ उतना ध्यान नहीं दिया. पता नहीं उसका इशारा किसकी तरफ था. सबकी तरफ या. हालांकी मैं  मानता हूं कि मेरी एक भी बहन यहां ग्वालियर में ब्याही होती, तो उनका अकेलापन कुछ कम होता. जिसे वह स्वयं अपने बेटे के लिये पसंद करके लाये हों और बेटे ने एक इस वजह से भी उसके प्रति अपनी जिम्मेवारी बनाये रखी हो वह बहू, बेटी होने से इंकार कर दे, ससुर के लिये इससे अधिक तिरस्कारपूर्ण और दुखद क्या होगा. मगर पत्थर का चेहरा तो बदल सकता है स्वभाव नहीं. यह सोचकर मैं मन मसोसकर रहा जाता. साथ ही मेरा भी अपने आप में खोया रहना निश्चित तौर उनकी अनदेखी करता था. हालांकी, बहनों के घर पर रहने आने के दौरान भी, उनके जल्दी से बिस्तर से उठकर गुसलखाने में जाकर कफ न उगलपाने तथा उसे बिस्तर के पास ही फर्श पर ही थूक देने अथवा उल्टी कर देने पर, उसे में ही साफ करता. आखिरी बरस में उनकी उतारी चड्डी बनियान भी मैंने धोना शुरू कर दी थी. कपड़े धोने के लिये मैंने धोबी को कह दिया था. वह आता और उनके कपड़े धोकर दे जाता. मैंने उनसे कह दिया था कि आप कंजूसी मत करना आप तो अपने कपड़े धोने के लिये धोबी को दे देना. उसे धुलाई के पैसे मैं दे दूंगा.

हालांकी  मेरे पैसे देने की नौबत कभी नहीं आई क्योंकि उनके पास पेंशन के पर्याप्त पैसे रहते थे, जिसे वे एक माह में खर्च भी नहीं कर पाते थे. मैंने माधवगंज का मकान बेचकर उन्हें यहां लाने के बाद इस बात का शुरू से ही ख्याल रखा कि उनकी जेब में हमेशा पैसे रहे. बेचे गये मकान के पैसों को मैंने बैंक में उनके नाम से फिक्स कर दिया और उस पर मिलने वाले ब्याज का पैसा भी उनके और मेरे नाम से बैंक में खुला खाते में जमा करवाने लगा. जिसके बारे में बार-बार मुझसे पूछते. कई बार वे बेचे गये मकान के रूपयों के बारे में संदेह व्यक्त करते तो मैं गुस्से में उनसे कहता. आपको विश्वास नही तो चलो मेरे साथ बैंक में जाकर पूछ लो आपके सारे रूपये जमा हैं मैंने उसमें से एक भी पैसा खर्च नहीं किया है ? पिता के बुजुर्ग होने को लेकर सोचते हुए मेरा हमेशा से यह मानना रहा और मैं इस बात का उल्लेख अपने दोस्तों के बीच और खुद पिता से भी करता भी रहा कि बुजुर्ग की जेब खाली होने का मतलब उसकी जिंदगी खाली हो जाना है. पैसा बूढ़ा, बच्चा जवान सब को ताकत देता है. ऐसा कभी नहीं होना चाहिये कि घर के बुजुर्ग का पैसा उसकी जगह उसके बच्चों की जेब में हो, बुजुर्गों की इससे बड़ी पराधीनता क्या होगी. बुजुर्ग का रूपया बुजुर्ग की जेब में ही होना चाहिये. इसीलिये हर महीने की पहली-दूसरी तारीख को मैं पेंशन की अस्सी प्रतिशत राशि निकालकर उनके हवाले कर देता. जिसमें से वे कुछ बचा लेते कुछ अपने खाने-पीने पर खर्च कर लेते. घर में मेरा सब को सख्त निर्देश था कि अपनी पेंशन के पैसे का वे क्या करते हैं, यह जानने की कभी कोशिश मत करना. वरना मुझसे बुरा कोई नहीं होगा. वे अपने पैसे का चाहे जो करें, चाहे आग लगा दें. हालाकि अंतिम बरसों में उनके साथ यह भी होने लगा था कि रास्ते में उनसे रूपये गिर जाते या जब वे घर से माधवगंज जाते तो टेम्पों में उनकी जेब कट जाती जिसका मुझे बाद में किसी और से पता चलता.


पिता मुझे सीधे और तुरंत इसीलिये नहीं बताते कि मैं सुनकर नाराज होउंगा. जब उनके साथ दो-चार बार ऐसा हो गया तो मैंने एक दिन उन्हें आराम से समझाया कि आप जितने पैसे एक दिन में खर्च कर सकते हो उतने ही रूपये लेकर चला करो, सारे पैसे लेकर टेम्पों में सफर क्यों करते हो. उतने ही रूपये जेब में होंगे तो कहीं गिर जायें या कोई निकाल भी ले तो ज्यादा नुकसान तो नहीं होगा तो मेरी बात उनकी समझ में आ गई. फिर वे उतने ही पैसे लेकर घर से बाहर लेकर निकलते जितने कि उन्हें जरूरत होती, बाकी पैसे वे घर में ही अपनी उस अलमारी में रख जाते, जो उनकी कहलाती थी, जो माधवगंज में मकान में उनके कमरे में रखी थी, और जो अब उठकर यहां नये मकान में आ गई थी. जो भले ही उनकी अलमारी कहलाती थी मगर जिसमें माधवगंज से लेकर यहां तक मैं उसमें उनसे ज्यादा घुसा हुआ था, अपनी जेब की जगह जिसमें अब वे मेरे कहने पर पेंशन के पैसे रखने लगे थे. बीच-बीच में मुझे मालूम चलता उनके पेंशन के पैसों में से उनके साथ-साथ उनके नाती का भी चटोरापन सधता.माधवगंज बाजार में जहां हम पहले रहते थे. वहां शरीर की मालिस करने के लिये लोग मिल जाया करते थे, किंतु यहां कालोनी में मालिस करने वाला मिलना मुश्किल था. माधवगंज छोड़कर यहां आने के बाद जो उनकी कुछ शिकायतें थी. जिन्हें वह लगातार हमसे दोहराते रहते. जैसे कि यहां कालोनी में बस अपने घर में अकेले पागलों की तरफ पड़े रहो। न कोई बोलने को न बतराने को, सब अपने घरों में घुसे रहते हैं, वहां बाजार में घर था तो कम-से-कम समय तो कटता था. फिर दूर होने की वजह से यहां कोई मिलने भी नहीं आता, कभी-कभार कोई आ जाये तो ठीक वरना किसी से दोस्त यार से मिले महीनों गुजर जाते हैं और वहां तो बाजार में आते-जाते ही लोग मिलते हुए चले जाते थे. न तो यहां समय ही नहीं कटता और नहीं यहां खाने को कुछ ठीक मिलता है.

वहां बाजार था तो सब सस्ता चटर-पटर उपलब्ध था. मिठाई- कचैड़ी-पकौड़ी की दुकाने थी.  जब चाहा उठे और जाकर खा लिया. इसी सस्ती मिठाई और कचैड़ी पकौड़ी खाने की आदत ने जीवन के अंतिम बरसों में उनके स्वास्थ्य को गहरे से प्रभावित किया. उसका कारण यह रहा कि जब हम माधवगंज वाला मकान छोड़कर यहां रहने के लिये आये तो पिता की वजह से हमने माधवगंज बाजार के उस मकान को नहीं बेचा था, जिसके बारे में पिता को जीवन में यह कहते हमने कई बार सुना कि अरे हमारा मकान तो बहुत सही जगह बाजार में हैं. कम से कम वह हमें भूखा तो नहीं मरने देगा. यदि हमने घर के दरवाजे पर रखकर ही कुछ सामान बेचना शुरू कर दिया तो जीवन कट जायेगा, और यही उन्होंने पिछले बीस बरस तक किया भी. 
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