यौन हिंसा और न्याय की भाषा: चौथी क़िस्त

अरविंद जैन
स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने मह्त्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब 'औरत होने की सजा' हिन्दी में स्त्रीवादी न्याय सिद्धांत की पहली और महत्वपूर्ण किताब है. संपर्क : 9810201120
bakeelsab@gmail.com
न्याधाशीशों ने फिर से अपनी मर्दवादी जुबान खोली. खबर है कि गुजरात के जज महोदय ने गुलबर्ग सोसायटी में हुए हत्याकांड, आगजनी और बलात्कार पर अपना न्याय देते हुए कहा कि 'आगजनी और हत्याकांड के बीच बलात्कार नहीं हो सकता है.' उन्हीं जज साहब ने अभियुक्तों से यह भी कहा कि हम आपके चेहरे पर मुस्कान देखना चाहते हैं.'जजसाहबों का मर्दवादी मिजाज न्याय नहीं है, ऐसे अनेक निर्णय हैं, जिनमें वे बलात्कार पर निर्णय देते हुए खासे कवित्वपूर्ण हो जाते रहे हैं. इसके पहले भी भंवरी देवी बलात्कार काण्ड में निर्णय देते हुए जज साहब ने कहा था कि ' जो पुरुष  किसी नीची जाति की महिला का जूठा नहीं खा सकता  वह उसका बलात्कार कैसे कर सकता है?' यह विचित्र देश है. कल ही नायक का तमगा लिए सलमान खान साहब ने भी बलात्कार के दर्द की तुलना अपने काम के थकान से पैदा दर्द से करते पाये गये. यह एक मानसिकता है. न्यायालयों की इसी सोच और भाषा पर स्त्रीवादी ऐडवोकेट अरविंद जैन ने काफी विस्तार से लिखा था कभी, काफी चर्चित लेख. स्त्रीकाल के पाठकों के लिए उसे धारवाहिक प्रकाशित कर रहे हैं हम.
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चरित्र प्रमाणपत्र कहाँ है

बंटी उर्फ बलविन्द्र सिंह बनाम मध्य प्रदेश41 सामूहिक बलात्कार का एक ऐसा मामला है, जिसमें पच्चीस वर्षीय विवाहिता महिला के साथ बलात्कार करनेवाले पाँचों अभियुक्तों को बाइज्जत रिहा करते हुए मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति श्री एस.के. सेठ और एस.के. चावला ने निर्णय में लिखा, ''यहाँ यह बता दें कि यह सामूहिक बलात्कार का मुकदमा है. एक औरत, जो भले ही कितनी भी दुराचारी क्यों न हो, इतने व्यक्तियों को अपमानजनक ढंग से सामूहिक सम्भोग करने की आमतौर पर सहमति नहीं देगी, जैसे वह सार्वजनिक प्रयोग के लिए कोई जानवर हो. उन्होंने आगे कहा, ''कानून मानता है कि भले ही कोई स्त्री अनैतिक चरित्र की हो या वेश्या ही हो, उसकी अपनी गरिमा और सम्मान होता है. उसके इस नीच व्यवसाय के कारण ही उसके साथ अतिक्रमण नहीं किया जा सकता.  लेकिन निर्णय के अन्त तक आते-आते न्यायमूर्तियों ने स्थापना दी, ''लेकिन यह भी मानना पड़ेगा कि फिर भी, अनैतिक चरित्र पूर्णतया गौण परिस्थिति नहीं होगी. यह स्वयं सारी कहानी को अविश्वसनीय बना सकता है. यह कहानी से उस सम्भावना शक्ति को छीन सकता है, जो किसी ऐसी महिला ने सुनाई हो, जिसका कोई नैतिक चरित्र ही नहीं. जिस अनैतिक चरित्र की महिला पर विश्वास करना कठिन है, अगर वह यह कहे कि कुछ व्यक्तियों ने उसके साथ (बलात्) सम्भोग किया है, बशर्ते कि इस बात का कोई सन्तोषजनक प्रमाण उपलब्ध न हो.

वर्षों पूर्व मद्रास उच्च न्यायालय के एक निर्णय42 में भी कहा था, ''किसी वेश्या की मर्यादा को भी सम्मान सुरक्षा का उतना ही अधिकार है, जितना किसी अन्य महिला को, लेकिन हर बार, न्याय की तुला में एक तरफ बलात्कार और अपमानजनक पीड़ा होती है और दूसरी तरफ पीडि़ता का नैतिक चरित्र. जाहिर है ऐसे में, ऐसी स्त्री के साथ न्याय असम्भव है, क्योंकि उसकी पूरी कहानी सन्देह के घेरे में ही घूमती रहेगी. उसकी बात पर कौन यकीन करेगा ? फिलहाल ऐसे सामाजिक या मानसिक बदलाव की कोई आधारभूमि नजर नहीं आ रही. सिर्फ न्यायमूर्तियों को दोषी ठहराना भी व्यर्थ होगा, क्योंकि वे भी उसी समय और समाज की उपज हैं, जिसमें नैतिकता, मर्यादा, पवित्रता, यौनशुचिता वगैरह की सारी जिम्मेवारी सिर्फ स्त्री पर लाद दी गई है. धर्मशास्त्रों से लेकर न्यायशास्त्रों तक में. स्त्री के लिए इस दुश्चक्र  से बाहर निकलने का तब तक कोई दरवाजा नहीं, जब तक सत्ता और सम्पत्ति पर निर्णय लेने का उसे भी बराबर हक नहीं मिल जाता या वह न्याय व्यवस्था की गूढ़ भाषा पढऩे-समझने योग्य नहीं हो जाती. सुशिक्षित और प्रतिष्ठित, सचेत और अधिकारों के प्रति पूर्ण रूप से जागरूक.

वक्ष, जाँघ, नितम्ब या पीठ पर चोट के निशान दिखाओ

बिरम सोरेन बनाम पश्चिम बंगाल 43 केस में अभियुक्त घर में अकेली लडक़ी (उम्र सोलह-सत्रह वर्ष) के साथ बलात्कार करके भाग गया. माँ-बाप लौटकर आए तो लडक़ी के बताने पर थाने में रिपोर्ट दर्ज करवाई. सत्र न्यायाधीश ने बलात्कार के अपराधी को दस साल कैद और 5000 रुपए जुर्माना की सजा सुनाई. लेकिन उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति एस.पी. राजखोबा ने अपील का फैसला सुनाते हुए कहा, ''स्वाभाविक परिणाम यह होगा कि दोनों में प्रेम था या नहीं, मगर स्थितियों ने शारीरिक मिलन का अवसर प्रदान किया. अधिकांश ग्रामीण फुटबाल मैच देखने गए हुए थे. कुछ अड़ोसी-पड़ोसी भी फुटबाल मैच देखने गए हुए थे और माता-पिता बाजार. वह घर में अकेली थी. सारे तर्कों को तोड़ते हुए दोनों की आत्मीय यौन इच्छा बढ़ गई और यौन आनन्द उठाते हुए उन्होंने सम्भोग कामना शान्त की. यौन झिल्ली फटने और खून बहने का कारण यह है कि उसके जीवन में सम्भोग का प्रथम अनुभव था. शरीर के किसी हिस्से पर चोट के निशान नहीं होना, उसकी इस बात को झूठा प्रमाणित करता है कि उसने प्रतिरोध किया था और नतीजतन ब्लाउज फट गया था....बाहरी चोटों का न होना जैसे वक्षस्थल पर नाखूनों के निशान, जाँघ, नितम्ब और पीठ वगैरह पर खरोंच सहमति का सुझाव ही देते हैं.
अन्त में न्यायमूर्ति ने कहा, ''पीडि़ता के गुप्तांगों पर चोट के निशान हमें भय से कँपकँपा देनेवाले हैं. परन्तु हम यह कहने को विवश हैं कि बलात्कार का मामला नहीं है....अभियुक्त को जेल से आजादी दे दी जाए...दूसरे न्यायमूर्ति जे.एन. होरे ने लिखा, ''मैं सहमत हूँ, और निर्णय में अपने हस्ताक्षर कर दिए.

लगता है, अदालत के लिए बलात्कार एक 'स्टीरियो टाइप' है कर्मकांड की तरह उसमें वही सब होना है जो होना चाहिए. यह सब बलात्कार को 'संयोग में बदलने की युक्तियाँ हैं. बलात्कार की शिकार स्त्री सिर्फ एक गवाह है. गवाह को केवल बलात्कार का अनुभव दोहराना है. अपने अस्तित्व को भुलाकर दोबारा बताना है कि बलात्कार कब, कहाँ, कैसे और किसने किया. यही नहीं, यह भी बताना है कि उसने खुद क्या किया ? कुछ नहीं किया तो क्यों ? यानी एक बार फिर 'बलात्कार'. मामूली-सी भूल-बलात्कार को सहमति से सम्भोग में बदल सकती है. बदलती रही है. 'वक्षस्थल पर नाखूनों के निशान और जाँघ, नितम्ब और पीठ वगैरह पर खरोंच दिखाना मत भूलना. वरना...न्याय की भाषा में इसे 'सहमति का सुझाव' समझा जाएगा, समझा जाता है. सिर्फ यह कहना काफी नहीं कि उसने मेरी 'इज्जत' लूट ली, अपना 'मुँह काला' किया, जीवन 'बर्बाद' कर दिया या उसने मेरे साथ 'वो काम किया जो उसे नहीं करना चाहिए था. 'हर सेक्सुअललॅस्ट' अपहरण और बलात्कार के एक अन्य मामले में न्यायमूर्तियों ने स्कूल सर्टीफिकेट को प्रामाणिक नहीं माना और डॉक्टरी रिपोर्ट को महज राय मानते हुए अभियुक्त को सन्देह का लाभ देकर छोड़ दिया. बलात्कार के आरोप को सहमति से सम्भोग घोषित करते हुए न्यायमूर्तियों ने कहा, ''अपीलार्थी के साथ रहने में नन्दा की पूर्व सहमति थी ताकि वह अपनी यौन लिप्सा शान्त कर सके.44 न्याय की भाषा में, अब तक जहाँ 'हिज सेक्सुअल लॅस्ट' का इस्तेमाल किया जाता रहा है, वहाँ अब 'हर सेक्सुअल लॅस्ट' लिखा जाने लगा है. मर्दों की दुनिया में स्त्री के  'मौन' को सम्भोगेच्छा ही मानकर चला जाता है.


अनिल कुमार बनाम हरियाणा45 में उच्च न्यायालय के न्यायमूर्तियों का निर्णय है कि एक जवान लडक़ी और एक युवा व्यक्ति एकान्त में, एक ही छत के नीचे, तीन दिन से ज्यादा रहे हों, तो इससे यही निष्कर्ष निकलता है कि अनिवार्य रूप से वे आपस में मैथुन करते रहे होंगे. इस निष्कर्ष के आधार बिन्दु वही प्रचलित मिथ हैं कि स्त्री-पुरुष के बीच घनिष्ठ सम्बन्धों का मतलब है यौन सम्बन्ध. इसके अलावा कुछ और तो सोचा ही नहीं जा सकता है न. सुभाष बनाम हरियाणा46 में बलात्कार के आरोप को सहमति से सम्भोग मानते हुए न्यायमूर्तियों का कहना था, ''स्कूल प्रमाणपत्र के अनुसार लडक़ी की उम्र सोलह वर्ष से ज्यादा है और डॉक्टरी रिपोर्ट के मुताबिक यह सम्भोग की आदी है. शरीर पर न कोई चोट का निशान है और न खून बहने के ताजा चिह्न. लडक़ी द्वारा लिखे दो प्रेम पत्रों से पता लगता है कि वह अभियुक्त से प्रेम करती थी. अगर प्रेम और सहमति थी, तो फिर बलात्कार का आरोप वह लगाती ही क्यों ?

ब्रजेश कुमार बनाम हरियाणा47 में उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति कहते हैं, ''अगर कोई सोलह वर्ष से बड़ी उम्र की लडक़ी सम्भोग में आनन्द उठाने के लिए, स्वेच्छा से किसी पुरुष के सामने समर्पण करती है तो यह नहीं कहा जा सकता कि पुरुष ने बलात्कार किया है. यहाँ, 'सम्भोग का आनन्द'और पुरुष के सामने 'स्वेच्छा से समर्पण' की भाषा-संरचना के पीछे वही पुराना तर्क है कि ऐसी स्त्री स्वयं बलात् (सम्भोग) की इच्छुक होती है. अच्छी लडक़ी होती तो अपनी जान जोखिम में डालकर भी 'सतीत्व' या 'कौमार्य' की रक्षा करती. औरत के प्रतिरोध न करने का अर्थ है स्वेच्छा से समर्पण. और कानून या न्याय की भाषा में इसे 'बलात्कार' नहीं माना जाता. विवाहित महिला के साथ बलात्कार के एक मामले में सत्र न्यायाधीश ने तीन वर्ष कठोर कारावास की सजा सुनाई, परन्तु उच्च न्यायालय के माननीय न्यायमूर्ति श्री पी.पी. गुप्ता ने अभियुक्त को रिहा करते समय कहा कि पीडि़ता की गवाही पूर्णतया अमान्य और अविश्वसनीय है. निर्णय में लिखा है, ''यह विश्वास करने के लिए बेहद असम्भावित है कि पीडि़ता को उस समय भी यह पता नहीं लग पाया कि अभियुक्त उसका पति है या कोई और, जब अभियुक्त ने सम्भोग आरम्भ किया. एक विवाहित महिला और वह भी दो बच्चों की माँ, साँसों की गन्ध, डीलडौल, लिंग के आकार और लम्बाई, सम्भोग के तरीके और अन्य तत्त्वों तक से फौरन महसूस कर लेगी कि सहवास करनेवाला व्यक्ति उसका अपना पति है या कोई अन्य व्यक्ति....अस्तु, यह तथ्य कि सम्भोग शुरू होने के समय पीडि़ता ने न तो कोई प्रतिरोध किया और न ही शोर मचाया, उसके अपने व्यवहार को सन्देहास्पद बनाता है...उसने अभियुक्त को सम्भोग पूरा करने का अवसर दिया और इसके बाद ही शोर मचाना शुरू किया.48

सचित्र कोकशास्त्र से मुकाबला करती न्याय की भाषा

न्यायाधीश का अगला तर्क यह था कि उस दिन अँधेरी रात थी. तब वह अभियुक्त को कैसे पहचान सकती है–यह भी स्पष्ट नहीं होता. यही नहीं, यह भी सम्भवत: विश्वास योग्य नहीं है कि अभियुक्त ने एक हाथ से मुँह बन्द करके रखा और चारपाई से नीचे लाकर सम्भोग करने में कामयाब रहा... अभियुक्त को झूठे मुकदमे में फँसाने की इस सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि अभियुक्त के पिता और पीडि़ता के पति के सम्बन्ध तनावपूर्ण थे. उपरोक्त निर्णय में न्याय की भाषा तर्क (कुतर्क) की भाषा है. सामाजिक जीवन में स्त्री की स्थिति को भयावह अनुभव की भाषा नहीं कहा जा सकता. हालाँकि कानून और न्याय हमेशा तार्किक नहीं होता. नहीं हो सकता. अँधेरे में औरत अपने पति 'परमेश्वर' को तो पहचान सकती है–अभियुक्त को नहीं. पति को 'साँसों की गन्ध' या 'लिंग का आकार और लम्बाई' से पहचाना जा सकता है. मानो विवाहित औरतें पति के 'लिंग का आकार और लम्बाई' इंचटेप से नाप कर रखती हैं. दरअसल कानून, न्यायशास्त्र और ऐतिहासिक निर्णय ऐसी भाषा (अंग्रेजी) में हैं, जिसे 'बहुमत' पढऩा-लिखना ही नहीं जानता, समझना तो और दूर की बात है. जिस दिन 'बहुमत' अनपढ़ नहीं रहेगा या अपनी भाषा में जानने लगेगा, उस दिन यह 'न्याय की भाषा' नहीं रहेगी. नहीं रह सकती.
जनता की भाषा में ही न्याय की भाषा विकसित और समृद्ध हो सकती है. अगर अदालत की भाषा वादी, प्रतिवादी या मुवक्किल की भाषा नहीं है तो उस बेचारे वादी, प्रतिवादी या मुवक्किल को तो पता ही नहीं लगता कि वकीलों ने बहस में क्या कहा और न्यायमूर्ति ने क्या हुक्म दे दिया. मुवक्किल, वकील और न्यायमूर्ति जब एक दूसरे की भाषा को समान रूप से समझेंगे, तब सबको मालूम रहेगा कि क्या हुआ. न्याय या अन्याय ? गलत या सही ? विरोध-प्रतिरोध की सम्भावनाएँ बढ़ेंगी तो अन्याय की सम्भावना स्वत: समाप्त हो जाएगी. उस स्थिति में न्यायमूर्ति के निर्णय का हर शब्द, बहुत सोच-समझकर लिखा जाएगा, लिखना पड़ेगा, वरना...जनता सवाल करेगी और सवालों के जवाब भी देने ही पड़ेंगे.

'फिट ऑफ पैशन' : टोकन पनिशमेंट

राजू और कृष्णा बनाम कर्नाटक राज्य49 से सैलीना डिसूजा नाम की इक्कीस वर्षीया एक नर्स को अपने भाई की शादी में जाना था. रास्ते में देर हो गई. बंगलौर पहुँची तो पाँच बज गए. बस में साथ सफर कर रहे दो युवकों पर विश्वास करके, रात को होटल के एक कमरे में रुक गई. लडक़ों ने बारी-बारी से बलात्कार किया. मौका मिलते ही चीखी, चिल्लाई, शोर मचाया. सत्र न्यायाधीश ने 1980 में राजू को अपराधी माना मगर कृष्णा को नहीं. अभियुक्त की युवा उम्र और इस तथ्य को देखते हुए कि लडक़ी स्वेच्छा से अभियुक्त के साथ होटल के एक ही कमरे में रहने के लिए आई थी, जहाँ अभियुक्त ने सम्भोग कामना के दौर (फिट ऑफ पैशन) में बलात्कार किया, अभियुक्त राजू को उस दिन अदालत बन्द होने तक हिरासत में रखने और 500 रुपए जुर्माने की सजा सुनाई. बलात्कार के मामले में ऐसी 'टोकन' सजा का, शायद यह 'अभूतपूर्व निर्णय' कहा जा सकता है. अपील में उच्च न्यायालय के न्यायमूर्तियों ने 2 अगस्त, 1982 को दोनों अभियुक्तों को दोषी पाया और सात साल कैद का आदेश दिया. इसके विरुद्ध अभियुक्तों ने सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर की. सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति श्री के. जयचन्द्रा रेड्डी और जी.एन. राय ने 12 अक्टूबर, 1993 को फैसला सुनाते समय कहा, ''भारतीय दंड संहिता की धारा 376 के अन्तर्गत दोनों अभियुक्तों की सजा में हस्तक्षेप करने का हमें कोई कारण नहीं मिला. जहाँ तक दोनों अभियुक्तों को सात साल कैद की सजा का सवाल है, हमें ऐसा लगता है कि यह असम्भव नहीं है कि शुरू में अभियुक्तों की वास्तव में यह ही इच्छा रही हो कि लडक़ी को भाई के घर जल्दी से जल्दी पहुँचाने में मदद की जाए. लेकिन बाद में जब वह रात को होटल के एक ही कमरे में साथ रहने को सहमत हो गई तो दोनों नवयुवक यौन हवस के शिकार हो गए और उन्होंने लडक़ी की असहमति और विरोध के बावजूद बलात्कार किया.

अभियुक्तों की बहुत युवा उम्र और उन परिस्थितियों को देखते हुए, जहाँ इस बात की सभी सम्भावनाएँ मौजूद हैं कि वे अपनी सम्भोग कामना के दौरे पर काबू नहीं पा सके, सारी सौम्यता और नैतिकता भुला बैठे और अन्तत: बलात्कार का अपराध किया (कर बैठे). इस तथ्य को भी देखते हुए कि यह घटना बहुत पहले घटी थी और इस अदालत तक मुकदमेबाजी के दौरान, दोनों ही बहुत बदनामी और मानसिक पीड़ा झेल चुके हैं, हम सोचते हैं कि अगर दोनों अभियुक्तों को कम सजा सुनाई जाए, तो भी न्याय का लक्ष्य पूर्ण हो जाएगा. इसलिए हम निर्देश देते हैं कि इन दोनों अभियुक्तों को तीन साल कठोर कारावास का दंड भुगतना चाहिए....अपील के दौरान अभियुक्त जमानत पर रहे हैं। उन्हें हिरासत में ले लिया जाना चाहिए ताकि वे सजा भुगत सके. अभियुक्त के विद्वान वकील का तर्क था, ''लडक़ी ने खुद उत्पे्ररित किया था. अभियुक्त नौजवान था. उत्प्रेरणा और गम्भीर रूप से उकसाने पर, वह सम्भोग इच्छा के वशीभूत हो, मानसिक सन्तुलन खो बैठा. उस उम्र में यह सब होना बहुत स्वाभाविक है. क्या सचमुच 'वेरी नेच्युरल' नहीं ? राज्य सरकार की ओर से विद्वान अधिवक्ता ने गम्भीरतापूर्वक कहा, ''अगर वह थोड़ी-सी बुद्धिमान और सतर्क होती तो शायद इन दो अनजान युवकों पर विश्वास न करती और ऐसा दुर्भाग्य न झेलना पड़ता.


हालाँकि शिक्षित है, मगर दिल से बहुत सीधी-सरल और मानवीय अच्छाइयों का सम्मान करनेवाली. सिर्फ भरोसा और विश्वास क रने का अर्थ यह नहीं कि अभियोजन पक्ष पर अविश्वास किया जाए....अगर अभियुक्त ने दुष्कर्ष नहीं, बल्कि लडक़ी की मदद की है तो यह अपेक्षा नहीं की जाती कि वह अभियुक्तों पर बलात्कार का झूठा आरोप लगाएगी. सवाल है कि आखिर वह ऐसा क्यों करेगी वह ही क्या, कोई भी नहीं कर सकता. उपरोक्त केस में सत्र न्यायाधीश द्वारा सुनाई 'टोकन पनिशमेंट' से लेकर सुप्रीम कोर्ट के उदारवादी-सुधारवादी निर्णय तक, एक शब्द बार-बार दोहराया गया है–'फिट ऑफ पैशन'. न्यायमूर्तियों द्वारा ही नहीं, बल्कि बचाव पक्ष के वकीलों द्वारा भी दो युवा लडक़े और एक जवान लडक़ी, तीनों होटल के एक ही कमरे में। रात का समय. ऐसी स्थिति में 'सभी सम्भावनाएँ मौजूद' हैं. नवयुवकों को 'सम्भोग इच्छा का दौरा' पडऩा भी 'स्वाभाविक' है और 'सौम्यता और नैतिकताÓ के पाठ भूल जाना भी। तेरह साल कोर्ट-कचहरी के दौरान युवकों ने कितनी 'बदनामी और मानसिक पीड़ा' झेली होगी ? तेरह में ग्यारह साल तो सर्वोच्च न्यायालय में ही लग गए. हाँ ! यही सब सचमुच 'बहुत स्वाभाविक' है. 'वेरी नेच्युरल', यू नो


क्रमशः.....
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