तो देख्यो है घूंघट पट खोल- मीराबाई : हिन्दी की पहली स्त्रीवादी : आख़िरी क़िस्त

रोहिणी अग्रवाल
रोहिणी अग्रवाल स्त्रीवादी आलोचक हैं , महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर हैं . ई मेल- rohini1959@gmail.com
मीरा उत्पीड़न का विरोध कर उन्मुक्त स्त्री का सपना देख सकती है, अपनी स्त्री-नियति को बदल नहीं सकती. मीरा का स्त्री विमर्श इस तथ्य को बहुत गहरे रेखांकित करता है कि व्यवस्था एक साथ अमूर्त और ठोस है, जड़ और सनातन। इसके पास न संवेदना है न भाषा. अतः संवाद की संभावना भी नहीं. अपनी मूल संरचना में यह यंत्र-मानव है. मनुष्यता का निषेध कर मनुष्यता का दिखावा करने वाला तकनीकी कौशल. मध्ययुगीन सामंती समाज की जकड़न में बंधी मीरा की बड़ी सीमा यह रही है कि उन्होंने लोकतांत्रिक व्यवस्था में शिक्षा और कानूनी अधिकारों के वरदान से सम्पन्न स्त्री को देखा नहीं. उनके युग की स्त्री सदैव दो मुट्ठी अन्न के लिए दूसरों पर आश्रित रही. योनि और गर्भ के अतिरिक्त उसकी कोई सत्ता नहीं रही. उसके पैरों को घर की ड्योढी लांघने और हाथों को अपने लिए कुंआ खोदने की स्वतंत्रता नहीं थी. मीरा अपने आप में पूर्ण 'अकेली' औरत का बिंब नहीं रच सकती. मुक्ति की कामना शून्य से अनंत तक पहुंच जाने की इकलौती छलांग नहीं होती, मुक्ति-छलांगों की लम्बी शृंखला की एक कड़ी मात्र होती है जो परम्परा से दिशा और ताकत लेकर उसमें अपनी एक और छलांग जोड़ती है. मीरा के पास विरासत के नाम पर पराधीनता में सुख ढूंढने का कांतासम्मत उपदेश है. इसलिए बेशक वह वर्जनाओं को तोड़ कर आत्मप्रसार का निर्णय ले, विद्वद्जन से दिशा-निर्देश पाने के बहाने  उन्हें अपनी लड़ाई में शरीक होने की दावत दे, जन-जन तक अपनी बात पहुंचा कर जनमत बनाने का प्रयास करे.
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बरजी मैं काही की नाहिं रही 
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वह अपने अकेलेपन से त्रस्त है. स्त्री को लेकर परंपरा और परिवेश में पसरी अनुर्वर अनुगूंजों ने उसे चुप्पियों को सर्जनात्मक बुनावट देने का विवेक नहीं दिया है. वह आत्माभिमानिनी संवेदनशील जागरूक स्त्री की तरह उन सभी स्थितियों का विरोध अवश्य कर रही है जो समकालीन स्त्री विमर्श का केन्द्रीय स्वर है किंतु अपनी देह और जीवन-दिशा के संदर्भ में लिए गए निर्णयों को अंत तक अडिग भाव से स्वीकार नहीं कर पाती.  मीरा की इस पराजय में पितृसत्तात्मक व्यवस्था के दबाव मुखर होते हैं जो आज की उन्मुक्त स्त्री के हर स्वतंत्र निर्णय से बौखला कर उस पर अनैतिक और उच्छ्रंखल हो जाने का आरोप लगाते है. चूंकि पितृसत्तात्मक व्यवस्था के पास स्त्री और पुरुष को, सवर्ण और दलित को नापने के प्रतिमान अलग-अलग हैं, अतः नैतिकता और दायित्व, अधिकार और स्वतंत्रता की परिभाषाएं स्थित्यानुसार बदलने लगती है. मीरा का स्त्री विमर्श कृष्णा सोबती और मृदुला गर्ग के जरिए आगे बढ़ कर यदि मैत्रेयी पुष्पा तक न आया होता तो क्या स्त्री अपनी दैहिक मुक्ति की मुखर घोषणा के साथ देह को अस्त्र बना कर प्रतिद्वंद्वी पुरुष को पटकनी दे पाने का हौसला बटोर पाती? पराए मर्दों को लेकर चटखारेदार बातें करती कृष्णा सोबती की मित्रो चूंकि अंततः अपने उसी बगलोल पति सरदारी को समर्पित है और दाम्पत्येतर देह सम्बन्ध को पूरी ऊर्जा से भोगने वाली मनु (चितकोबरा) अंततः समाजसेवा में आश्रय पाती है, अतः व्यवस्था को न विवाह संस्था के टूटने का खतरा है, न नैतिकता के दोहरे मानदंडों के खिलाफ उठाए जाने वाले आंदोलन की आशंका. लेकिन मनु जैसी स्त्रियां जब 'सिरफिरे' आंदोलनधर्मी सरोकारों से जुड़ कर मंदा, अल्मा, सारंग बनती हैं तो न केवल सड़क-चौराहे पर नैतिकता के दोहरे मानदंडों को अभिमानपूर्वक तोड़ती पुरुष-सरीखी निर्लज्ज और नग्न स्त्री दिखाई पड़ती है, बल्कि पुरुष का 'उपयोग' कर राजनीति में घुसपैठ की 'मर्दाना' चालें भी चलती है.

 शतरंज की बिसात पर जब सामने वाला खिलाड़ी बराबर का चतुर हो तो हार के जोखिम में खेलने का मजा खत्म हो जाता है. इसलिए मर्दवादी आलोचना समकालीन स्त्री विमर्श को पितृसत्तात्मक व्यवस्था का अतिक्रमण कर अपने लिए मानवीय स्पेस की आकांक्षा करती स्त्री-मुक्ति की अवधारणा के रूप में नहीं पढ़ती, देह-विमर्श में गूंथ कर थू-थू करती है.अपनी अंतिम परिणति में आंसू, समर्पण, दीनता का प्रसार करता मीरा का स्त्री विमर्श उसे स्वीकार्य है. यहां तक वह उसके विद्रोह और वेदना को सहानुभूति भी देती है और व्यवस्था को बदलने में अपनी 'मगरमच्छी' तत्परता भी निवेदित करती है. जुलूस में अंधी गली तक जाने और फिर निरापद अपनी दुनिया में लौट आने में भला क्या बुराई है? मीरा के अंतर्विरोध - पितृसत्तात्मक व्यवस्था का आंतरिकीकरण करने की मानसिकता - एक इकाई के रूप में मीरा की पराजय को भले ही संकेतित करें, मीरा द्वारा उत्पन्न स्त्री-चेतना को धूमिल नहीं करते.



संदर्भ

 ''बास्या कूस्या टूकड़ा ये, भाभी और मिलेगी खाटी छाय/भैं सोवो भूखा मरो ये, भाभी नहीं मिलैगो हरि आय'', मीरां बृहत् पदावली भाग 1, राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान, जोधनुर,पद 395
 ''साधुन के संग बैठ बैठ के, लाज गमाई सारी / नित प्रति उठि नीच घर जावो, कुल कूं लगावो गारी.बड़ा घरां की छोरी कहावो, नांचो दे दे तारी'' वही, पद 16
 ''राणांजी तें जहर दियो मैं जाणी / जैसे कंचन दहत अगिन में, निकसत बाराबांणी / लोकलाज कुलकाण जगत की, दी बहाय ज्यूं पांणी /अपने घर का परदा कर लौं, मैं अबला बौरांणी / तरकस तीर लग्यो मेरे हियरे, गरक गयो सनकांणी'' वही, पद 505
 ''राणांजी म्हारे गिरधर प्रीतम प्यारो . . . जन्म जन्म रो पति परमेश्वर, राणाजी कोन बिचारो।'' वही, पद 509
 ''राणांजी हूं अब न रहूंगी तोरी हटकी / साध-संग माहि प्यारा लागै, जाल गई घूंघट की  / . . . हार सिंगर सभी ल्यो अपना, चूड़ी कर की पटकी / मेरा सुहाग अब मोकूं दरसा, और न जाने घट की / महल किला राणां मोहिं न चाहिए, सारी रेशम पट की / हुई दीवानी मीरां डोलै, केस लटा सब छिटकी.'' वही, पद 515
 ''जोगी आ जा आ जा, जोगी पांइ परूं मैं हौं चेरी तेरी / प्रेम-भक्ति को पैंडो न्यारो, हमकूं गैल बता जा / अगर चंदन की चिता बनाऊँ, अपने हाथ जला जा / जल बल भई भस्म की ढेरी, अपने अंग लगा जा'' वही, पद 176
 'मन हमारा बांध्यो माई / कंवल नैन अपने गुन तीखण तीर बेध शरीर दूरि गयो माई / लाग्यो तब जान्यों नहीं, अब न सह्यो जाई री माई / तंत मंत औषद करउ, तऊ पीर न जाई / है कोऊ उपकार करे, कठिन दरद री माई / निकटि हो तुम दूरि नहीं, बेगि मिलो आई. / मीरां गिरधर स्वामी दयाल, तन की तपति बुझाई री माई'' वही, पद 368
 ''ऐसी ऐसी चांदनी में पिया घर नांई / चार पहर दिन सोवत बीत्ये, तड़पत रैन बिहाई / मैं सूती पिया अपने म्हैल में, सालूड़ा में आई सरदाई'' वही, पद 56 
 ''मेरा मन को वैरागी कर गयो रे / हाथ लकुटिया कांधे कमलिया, जमुना पार उतर गयो रे / बारा बरस से सेवा कीन्हीं, रमती बिरियां रम गयो रे / सुण सुण हे मेरी पाड़ पड़ोसन, जलती में पूलो दे गयो रे / मीरां के प्रभु हरि अविनासी, धूकती धूनी धर गयो रे '' वही, पद 438
 ''गोबिंद का गुण गास्यां / राणोजी रूसैला तो गांम राखैला, हरि रूठ्यां कुमलास्यां / राम नाम की जहाज चलास्यां, भवसागर तिर जास्यां.'', वही, पद 129
 ''एक बिरियां मुख बोलो रे, धुतारा जोगी / . . . पूरब जनम की मैं हूं गोपिका, अधबिच पड़ गयो झोलो रे।/ जगत बदीती तुम करो मोहन, अब क्यों बजाऊँ ढोलो रे / तेरे कारए सब जग त्याग्ये, अब मोहे कर सों लो रे'' वही, पद 55
 ''माई मैं तो लियो है सांवरिया मोल./ कोई कहै सोंधो कोई कहै महंगौ, मैं तो लियो है हीरा सूं तोल।/कोई कहै हलको कोई कहै भारी, मैं तो लियो री ताखड़ियां तोल / कोई कहै छाने कोई कहै वोड़े, मैं तो लियो री बाजतां ढोल / कोई कहै घटतो कोई कहै बढ़तो, मैं तो लियो है बराबर तोल / कोई कहै कालो कोई कहै गोरो, मैं तो देख्यो है घूंघट पट खोल.'' वही, पद 385
  ''पूर्ण में से पूर्ण निकल भी जाए तो भी जो बाकी रहता है, वह पूर्ण ही है.'' कुंदनिका कापड़ीआ, दीवारों के पार आकाश, पृ0 276
 ''हरष शोक म्हारे मन नांही, नहिं लाभ नहिं हानी, कंचन लेर अगन में राख्यो, निकस्यो बाराबानी.''पद 153 
 गोविंद दुबे साचोरा ब्राह्यण तिनकी वार्ता: ''. . . और अेक समें गोविंद दुबे मीराबाई के घर हुते तहां मीरा बाई सों भगवद्वार्ता करत अटके. . . . ब्रजवासी ने आपके वह पत्र दीनों सो पत्र बांचे के गोविंद दुबे तत्काल उठे, तब मीरा बाई ने बहुत समाधान कियौ परि गोविंद दुबे ने फिर पाछें न देखौ.''
तथा
 अथ कृष्णदास अधिकारी तिनकी वार्ता: '' . . . कृष्णदास ने तौ आवत ही कही जो हूं तौ चलूंगौ. तब मीराबाई ने कही - जो बैठौ तब कितनेेक मोहर श्रीनाथजी को देने लागी सो कृष्णदास ने न लीनी और कह्यौ जो तूं श्री आचार्य महाप्रभून् की सेवक नाहीं होत ताते तेरी भेंट हम हाथ ते छूवेंगे नाहीं. सो ऐसे कहिकें कृष्णदास यहां ते उठि चले.'' चौरासी वैष्णवन की वार्ता
''मैं मंदभागण काहे को सरजी, पिया मोसूं रहत उदासी / तुम हो हमारे अंतरजामी, मैं थारा चरणां री दासी / मीरां तो कुछ जाणत नांही, पकड़ी टेक निभासी.'' वही, पद 62
  ये पद हैं - 398, 405, 568
 ''म्हारा हरिजी, चाकरी री चाह म्हारे मन राखोला सरण हजूरी / बैल बंधावो भांवे घोड़ा बंधावो, चाहै करावो मजूरी / खाबा पीबा की म्हांकी चिंता मत कीज्यौ, कंगनी दीज्यो भांवै कूरी / ओढ़न कूं कारी कामरिया दीज्यो और चटाई खजूरी / जो थे देशी, सो म्हे लेशी, याई मत म्हारे पूरी / मीरां के प्रभु गिरधर नागर, निज चरणन की धूरी'' वही, पद 405
  पद 428
 ''उडि जावो री म्हारी सोनचिड़ी / काहे सूं मढ़ाऊँ थारी आंख पांखड़ी, काहे सूं मढ़ाऊँ थारी चोंचजड़ी / रूपा सूं मढ़ाऊँ थारी आंख पांखड़ी, सोना सूं मढ़ा ऊँ थारी चोंचजड़ी.'' वही, पद 45
 ''श्री तुलसी सब गुण निधान दुख हरन गुसांई /. . . हमको कहा उचित करबो है सो लिखियो समझाई.'' पद 571
''राणांजी म्हारे गिरधर प्रीतम प्यारो. . . जन्म जन्म रो पति परमेश्वर, राणेजी कोन बिचारो.'' वही, पद 509
 ''राणांजी हूं अब न रहूंगी तोरी हटकी / साध-संग माहि प्यारा लागै, जाल गई घूंघट की / . . . हार सिंगर सभी ल्यो अपना, चूड़ी कर की पटकी / मेरा सुहाग अब मोकूं दरसा, और न जाने घट की / महल किला राणां मोहिं न चाहिए, सारी रेशम पट की / हुई दीवानी मीरां डोलै, केस लटा सब छिटकी'' वही, पद 515
 ''जोगी आ जा आ जा, जोगी पांइ परूं मैं हौं चेरी तेरी / प्रेम-भक्ति को पैंडो न्यारो, हमकूं गैल बता जा / अगर चंदन की चिता बनाऊँ, अपने हाथ जला जा / जल बल भई भस्म की ढेरी, अपने अंग लगा जा'' वही, पद 176
 'मन हमारा बांध्यो माई / कंवल नैन अपने गुन तीखण तीर बेध शरीर दूरि गयो माई / लाग्यो तब जान्यों नहीं, अब न सह्यो जाई री माई / तंत मंत औषद करउ, तऊ पीर न जाई / है कोऊ उपकार करे, कठिन दरद री माई / निकटि हो तुम दूरि नहीं, बेगि मिलो आई / मीरां गिरधर स्वामी दयाल, तन की तपति बुझाई री माई.''' वही, पद 368
''ऐसी ऐसी चांदनी में पिया घर नांई /चार पहर दिन सोवत बीत्ये, तड़पत रैन बिहाई / मैं सूती पिया अपने म्हैल में, सालूड़ा में आई सरदाई.'' वही, पद 56 
''मेरा मन को वैरागी कर गयो रे / हाथ लकुटिया कांधे कमलिया, जमुना पार उतर गयो रे / बारा बरस से सेवा कीन्हीं, रमती बिरियां रम गयो रे / सुण सुण हे मेरी पाड़ पड़ोसन, जलती में पूलो दे गयो रे / मीरां के प्रभु हरि अविनासी, धूकती धूनी धर गयो रे.'' वही, पद 438
''गोबिंद का गुण गास्यां / राणोजी रूसैला तो गांम राखैला, हरि रूठ्यां कुमलास्यां / राम नाम की जहाज चलास्यां, भवसागर तिर जास्यां.'', वही, पद 129
''एक बिरियां मुख बोलो रे, धुतारा जोगी / . . . पूरब जनम की मैं हूं गोपिका, अधबिच पड़ गयो झोलो रे / जगत बदीती तुम करो मोहन, अब क्यों बजाऊँ ढोलो रे / तेरे कारए सब जग त्याग्ये, अब मोहे कर सों लो रे.'' वही, पद 55
''माई मैं तो लियो है सांवरिया मोल।/ कोई कहै सोंधो कोई कहै महंगौ, मैं तो लियो है हीरा सूं तोल / कोई कहै हलको कोई कहै भारी, मैं तो लियो री ताखड़ियां तोल / कोई कहै छाने कोई कहै वोड़े, मैं तो लियो री बाजतां ढोल।/कोई कहै घटतो कोई कहै बढ़तो, मैं तो लियो है बराबर तोल।/कोई कहै कालो कोई कहै गोरो, मैं तो देख्यो है घूंघट पट खोल।'' वही, पद 385
 ''पूर्ण में से पूर्ण निकल भी जाए तो भी जो बाकी रहता है, वह पूर्ण ही है.'' कुंदनिका कापड़ीआ, दीवारों के पार आकाश, पृ0 276
 ''हरष शोक म्हारे मन नांही, नहिं लाभ नहिं हानी, कंचन लेर अगन में राख्यो, निकस्यो बाराबानी.''पद 153 
 गोविंद दुबे साचोरा ब्राह्यण तिनकी वार्ता: ''. . . और अेक समें गोविंद दुबे मीराबाई के घर हुते तहां मीरा बाई सों भगवद्वार्ता करत अटके . . . ब्रजवासी ने आपके वह पत्र दीनों सो पत्र बांचे के गोविंद दुबे तत्काल उठे, तब मीरा बाई ने बहुत समाधान कियौ परि गोविंद दुबे ने फिर पाछें न देखौ.''
तथा
अथ कृष्णदास अधिकारी तिनकी वार्ता: '' . . . कृष्णदास ने तौ आवत ही कही जो हूं तौ चलूंगौ. तब मीराबाई ने कही. जो बैठौ तब कितनेेक मोहर श्रीनाथजी को देने लागी सो कृष्णदास ने न लीनी और कह्यौ जो तूं श्री आचार्य महाप्रभून् की सेवक नाहीं होत ताते तेरी भेंट हम हाथ ते छूवेंगे नाहीं. सो ऐसे कहिकें कृष्णदास यहां ते उठि चले.'' चौरासी वैष्णवन की वार्ता
''मैं मंदभागण काहे को सरजी, पिया मोसूं रहत उदासी / तुम हो हमारे अंतरजामी, मैं थारा चरणां री दासी / मीरां तो कुछ जाणत नांही, पकड़ी टेक निभासी. '' वही, पद 62
 ये पद हैं - 398, 405, 568
''म्हारा हरिजी, चाकरी री चाह म्हारे मन राखोला सरण हजूरी / बैल बंधावो भांवे घोड़ा बंधावो, चाहै करावो मजूरी /खाबा पीबा की म्हांकी चिंता मत कीज्यौ, कंगनी दीज्यो भांवै कूरी /ओढ़न कूं कारी कामरिया दीज्यो और चटाई खजूरी /जो थे देशी, सो म्हे लेशी, याई मत म्हारे पूरी /मीरां के प्रभु गिरधर नागर, निज चरणन की धूरी.'' वही, पद 405
  पद 428
''उडि जावो री म्हारी सोनचिड़ी / काहे सूं मढ़ाऊँ थारी आंख पांखड़ी, काहे सूं मढ़ाऊँ थारी चोंचजड़ी / रूपा सूं मढ़ाऊँ थारी आंख पांखड़ी, सोना सूं मढ़ा ऊँ थारी चोंचजड़ी '' वही, पद 45
  ''श्री तुलसी सब गुण निधान दुख हरन गुसांई / हमको कहा उचित करबो है सो लिखियो समझाई '' पद 571
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