शराबबंदी , महिला मतदाता और नीतीश कुमार

संजीव चंदन
                                                       
नीतीश कुमार की नई सरकार के द्वारा शराबबंदी को महिलाओं का व्यापक समर्थन मिल रहा है. राज्य और राज्य से बाहर की महिलायें उनके इस फैसले के साथ खड़ी हैं. हाल ही में उन्होंने यह भी बताया कि उन्हें महाराष्ट्र के वर्धा से कुछ महिलाओं ने पत्र लिखकर उनसे अनुरोध किया है कि वे बिहार आकर उन्हें बधाई देना चाहती हैं. इन्ही दिनों नीतीश कुमार राज्य से आगे बढ़कर अपनी राजनीति विस्तृत करना चाह रहे हैं. राष्ट्रीय राजनीति में अपनी दावेदारी के प्रसंग में भी शराबबंदी को मुद्दा बना रहे हैं और भाजपा शासित राज्यों में शराबबंदी की चुनौती दे रहे हैं.



तो क्या शराबबंदी नीतीश कुमार का एक भावुक मुद्दा भर है या वे महिलाओं को मतदाता के रूप में एक अलग इकाई के रूप में देख रहे हैं तथा उनकी रहनुमाई से एक बड़े वोट बैंक की राजनीति कर रहे हैं. यदि ऐसा है, तो एक सवाल यह भी है कि क्या महिलायें अलग मतदाता के रूप में व्यवहार करती हैं, पति और परिवार से अलग निर्णय लेते हुए? इसका कोई विश्वसनीय अध्ययन या आंकड़ावार दावा नहीं मिलता. हालांकि नीतीश कुमार अपने राज्य में लगातार महिलाओं के लिए नीतिगत निर्णय लेकर उनकी राजनीतिक चेतना की दिशा में काम भी कर रहे हैं.

बिहार उन प्रदेशों में है, जो 1920 के दशक में महिलाओं को दूसरे प्रदेशों के द्वारा दिये जाने वाले मताधिकार के प्रति अडियल रुख अपनाता रहा था और 1929 में कई राज्यों के द्वारा पहल किये जाने के बाद बिहार विधानसभा ने इसे पारित किया था. जबकि 2005 में नीतीश कुमार ने स्थानीय निकायों के चुनावों में महिलाओं को 50% आरक्षण देने वाला बिहार को पहला राज्य बनाया. नौकरियों में 33% प्रतिशत, कुछ में 50% तक का आरक्षण नितीश सरकार की एक और पहल है. उनकी साइकिल योजना की चर्चा देश भर में हुई है. लेकिन क्या महिलायें अपने लिए इन पहलों का प्रत्युत्तर चुनावों में मतदान के रूप में दे रही हैं, यद्यपि पुरुषों की तुलना में उनका वोटिंग प्रतिशत अधिक रहा है

मैंने पिछले चुनावों के दौरान महिला मतदाताओं के मन जानने की कोशिश की थी. मुझे तो कम से कम युवाओं और महिलाओं के मत किसी अलग एजेंडे से संचालित होकर अपना अलग व्यवहार करते नहीं दिखे, ऐसा नहीं होता तो नीतीश कुमार के द्वारा महिलाओं के लिए किये गए कार्य की चर्चा करने वाली लडकियां या महिलायें किसी ख़ास जाति-समूह की नहीं होतीं.  इस अध्ययन में गौरतलब था कि महिलाओं की सुरक्षा सभी लडकियों, महिलाओं के लिए अहम मुद्दा था, चाहे वह जे डी वीमेंस कालेज की लडकियां हों या मसौढी और हाजीपुर की महिलायें. लेकिन जब सुरक्षा और महिलाओं के सम्मान के वैसे मामले सामने आये, जहां उनके प्रिय नेताओं पर सवाल उठते हैं, वे पुरुषों की तरह ही बचाव के तर्क के साथ उपस्थित हुईं.



इसके बावजूद कि महिला मतदाताओं के निजी राजनीतिक निर्णय के पुख्ता आंकड़े नहीं हैं, किसी राजनेता का लगातार महिलाओं को एक अलग राजनीतिक इकाई के रूप में देखते हुए अपनी नीतियाँ तय करना सुखद है. शराबबंदी के प्रति महिलाओं के आग्रह को देखते हुए नीतीश कुमार की यह पहल भी इसी रूप में स्वागत योग्य है. हालांकि नितीश जिस वर्धा के महिलाओं के उत्साह का हवाला दे रहे हैं, उस वर्धा में अपने 10 साल के प्रवास के आधार पर मैं यह कह सकता हूँ कि यद्यपि वर्धा जिला में पूर्ण शराबबंदी है, लेकिन वहाँ अवैध रूप से हर जगह शराब उपलब्ध है. इसके अलावा पूर्ण बंदी को सुनिश्चित कराने में पुलिस और अदालत का का अतिरिक्त समय लगता है. जिले में कई पुलिस अधीक्षकों ने शराबबंदी हटाने और उसे सिर्फ गांधी आश्रम तक सीमित करने का प्रस्ताव भेजा है, जो गांधीवादियों के दवाब में संभव नहीं हो सका है. जिले में पत्रकारिता के अनुभव के आधार पर यह भी दावा करने में कोई हर्ज नहीं है कि वहाँ अवैध शराब के निर्माण में भी कई महिलायें लगी हैं. फिर भी यह भी सच है कि अधिकाँश महिलायें शराबबंदी की पक्षधर हैं और एक दूरदर्शी राजनेता की तरह उनके हित में काम करना अनुचित भी नहीं है.

लेखक स्त्रीकाल के संपादक हैं 

इस लेख का एक हिस्सा दैनिक भास्कर में प्रकाशित 
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