अकथनीय का कथन - एक औरत की नोटबुक

शालिनी माथुर
 आलोचक. स्त्रीवादी आलोचना में सशक्त हस्तक्षेप. 
जो लेखिका पिछले पैंतालिस वर्षाे से निरन्तर लिख रही हो, जिसका लेखन स्तर अपनी स्तरीयता से कभी डिगा न हो, जिसकी कलम की धार समय के साथ-साथ पैनी होती गई हो, और कहानियां लिखने के अतिरिक्त जिसकी सामाजिक चेतना और सामाजिक समझ ने उसे जमीनी सामाजिक कार्याे से जोड़ रखा हो, उनकी हर नई किताब अपना परिचय खुद होती है. हमारे समय की बहुचर्चित और प्रतिष्ठित कथाकार सुधा अरोड़ा ऐसी ही लेखिका हैं और उनकी नई किताब मेरे सामने है ''एक औरत की नोटबुक'' एक लम्बी लेखकीय यात्रा करने वाली लेखिका के इस झोले में बेसक़ीमती सामान है, जिसे उन्होंने जिन्दगी के गलियारों से बटोरा है और उस सामान का ब्यौरा इस नोटबुक में लिख दिया है. इस नोटबुक में दो लंबे आलेख है. आलेखों के दायरे में आती दस छोटी कहानियां, कहानियों को विश्लेषित करते वक्तव्य , कविताओं के कुछ टुकड़े ओैर एक साक्षात्कार. बेहतरीन कहानियां लिखने के लिए जानी जाने वाली इस कथाकार ने एक पत्रकार की भांति सामाजिक परिघटनाओं और उनमें चोट खाती, छटपटाती और संघर्ष करके फिर उठती हुई स्त्रियों पर आलेख लिखे है. पुस्तक की कहानियां आकार में छोटी , कलात्मक और प्रतीकात्मक होते हुए भी सरल सहज और बोधगम्य है. इन आलेखों ओैर कहानियों का रचना काल 1994 से 2009 तक विस्तृत है. ये किसी क्षणिक आवेग या आवेष में की गई रचनाएं नही है.
            
कोई भी रचना पढ़ते समय मुझे यह जानना बेहद रुचिकर और महत्वपूर्ण लगता हेै कि रचना किन समयों में, कैसी परिस्थितियों में और किस भावना से रची गई होगी. मैंने सुधा अरोड़ा जी से कहा था कि हर रचनाकार को अपनी रचना के साथ अपना एक वक्तव्य अवश्य देना चाहिए. दिन-तारीख़ समेत. सुधा जी ने अपने सरल सहज स्वभाव के अनुरूप हंस कर कहा साहित्य में ऐसे थोड़े ही होता है. लेखक का काम है रचना करना, रचना को अपने हिसाब से समझना और अर्थ निकालना पाठक पर छोड़ देना चाहिए. इस बात को एक वर्ष बीत गया. एक औरत की नोटबुकमें सुधा जी की दस कहानियां है और उनके साथ उनके वक्तव्य. अक्सर कहानियां जीवन की हक़ीक़त से कुछ ज़्यादा सच्ची होती है. अपनी हक़ीक़त से ज़्यादा सच्ची कहानियों के साथ जुड़े उनके वक्तव्यों ने पाठकों के सामने कहानियां पढ़ने के लिए कई नए दृष्टिकोण रखे है. वक्तव्यों के आलोक में कहानी को देखें तो हमें कई नए रंग दिखाई देंगे. कहानियां वक्तव्यों से बेहतर हैं या वक्तव्य कहानी से बेहतर , यह कह पाना सम्भव नहीं. रचनाकार स्वयं अपनी रचना पर टिप्पणी कर दे, फिर भी पाठक के पास उसके नए आयाम ढूंढने की गुंजाइस  बनी रहती है. इन कहानियों के साथ बंधे वक्तव्य पाठक की जिज्ञासा शान्त नहीं करते बल्कि पाठक को ओैर प्रश्नाकुल बनाते है. कहानियों के कथानक और वक्तव्यों के कथ्य स्त्री की अकथनीय व्यथा के कथन है.

‘‘अपने लिए कब जीना सीखेगी ओैरत?’’ वक्तव्य के साथ गुंथी कहानी है. ‘‘एक औरत तीन बटा चार. ’’कहानी छोटी है - कलात्मक और प्रतीकात्मक. कहानी की शुरूआत ऐसी है मानो ओ. हेनरी ने कोई किस्सा सुनाना शुरू किया हो. एक तीस बरस पुराना घर था। वहाँ पचास बरस पुरानी एक औरत थी. उसके चेहरे पर घर जितनी ही पुरानी लकीरें थीं.” (पृष्ठ-126) वह एक खूबसूरत औरत थी - आखिरी उंगली पर डस्टर लपेटे - हर कोने कोने की धूलसाफ करती हुई. इसी दिनचर्या में से समय निकाल कर वह बाहर भी जाती बच्चों की किताबें लेने - साहब की पसंद की सब्जियां लेने” ” हर महीने की एक निश्चित तारीख को सखी सहेलियों के साथ चाय पार्टी में भी हिस्सा लेतीपर हर बार घर से बाहर निकलते समय वह अपना एक हिस्सा घर में ही छोड़ आती.” (पृ 131) इस प्रतीकात्मक कहानी का अंत वहां होता है जहां पर आत्मकेन्द्रित , दंभी पति पक्षाघात की बीमारी से उठकर छड़ी ले कर चलने योग्य हुआ ओैर उसका घर संसार चलाने में अपना सर्वस्व लगा देने वाली उसकी खूबसूरत पत्नी उसकी ‘‘ छड़ी बन गईजो साहब के बाएं हिस्से के अनुरूप अपने को हर माप के सांचे में ढाल ले. यह एक पूरी ओैरत के तीन बटा चार ‘‘मांस का लोथबनने की कहानी है. उधर ‘‘ताराबाई चाल- कमरा नम्बर एक सौ पैंतीस’’ में रहने वाली गरीब श्रमजीवी महिला अपने पति के परपीड़न सुख और निर्संश बेरहमी को झेलने के बाद गालियों की बौछार कर लेती है , जिसे अनसुना करके मर्द करवट बदल कर खर्राटे भरने लगता है. (पृ 43) ‘‘उस बांझ औरत के अड़तीस वर्षीय मरद को मरे आज चैदहवां दिन था.’’ यातना देने वाले पति को याद करने के लिए स्त्री स्वयं को यातना देती है स्वयं को सिगरेट से जलाती हुई. 

कमरे में दम्पत्ति का भीड़ की तरह एक दूसरे से टकराना कतराना, रात के समय छत पर टंगे और दीवारों पर बैठे ख़र्राटों का आस-पास पसर जाना, और मरे हुए पति के धुंधलाए अक्स का खाट पर पैर हिलाते हुए बैठना, सारे बिम्ब पति के परपीड़न सुख और पत्नी के आत्मपीड़क आनन्द को दिखाते है. बड़े घर की ‘‘तीन बटा चार औरत’’ घर से निकलते समय केवल ‘‘एक बटा चार साथ’’ ले जाती है और छोटे घर में रहने वाली गरीब औरत पति के मरने के चैदह दिन बाद पहली बार अपने आपको आईने में देखती है.सारे बिखरे हुए टुकड़ों को मिलाकर उसने अपना चेहरा पहली बार एक साथ देखा. गले से नीचे उसने अपने आप को आईने में देखा ही नहीं था. उच्च और निम्न वर्ग के दम्पत्तियों के ये चेहरे हिंसा के सूत्र में बंधे है. स्त्री के त्याग पर पति का पनपना और त्याग का अनादर, उपेक्षा और अवहेलना करते हुए हिंसक ही बने रहना.  ‘‘रहोगी तुम वहीकहानी, जो लेखिका ने अपने बारह वर्ष के मौन के बाद 1993 में लिखी, एकालाप शैली में लिखी छोटी कहानी है जो अत्यंत लोकप्रिय हुई. सारा दिन घर घुसरी बनी क्यों बैठी रहती हो. खुली हवा में थोड़ा बाहर निकला करो. बाल छोटे करवा लो, सूरत भी कुछ सुधर जाएगी.और फिर पन्द्रह साल बाद यह तुमने बाल क्यों इतने छोटे करवा लिए है. तुम्हें क्या लगता हेै, छोटे बालो में बहुत खूबसूरत लगती हो? यू लुक हारिबल. (पृ 99)सुधा जी टिप्पणी करती है कि  ‘‘यह कहानी पुरुष के लगातार बोलने और औरत के चुप रहने की कहानी नहीं है. 

यह कहानी स्त्री के बदलने और पुरुष के स्वभाव की यथास्थिति की कहानी हैयहां दृष्टव्य है कि स्त्री बदल रही है अपनी मर्जी से नहीं. पति की प्रताड़ना से और पति के उकसाने पर परन्तु फिर भी पति को संतोष नहीं. बदली हुई स्त्री के बदलाव को पति चिन्हित तो करता है - कटे बालों को , रोज़ दाल रोटी बैगन भिंडी और आलू की जगह बायल्ड वेजेटेबल्स को, समाज सेवा को और किताबों को, पर उसे न सम्मान दे पाता है , न स्वीकृति - कितनी भी किताबें पढ लो तुम्हारी बुद्धि में बढ़ोत्तरी होने वाली नहीं है. ‘‘ रहोगी तुम वही” (पृ 99) वाक्य में कितना तिरस्कार भरा है और कितनी हिकारत.   स्त्री शिक्षा , स्त्री सशक्तिकरण का स्रोत बनेगी , यह उम्मीद कैसे पूरी होगी ? पुरुषवादी मानसिकता और पूर्वाग्रह तो स्थिति को बदलने ही नहीं देते.वह कब बदलेगा? यह सवाल चिरंतन है.लेखिका पूछती हैं. मुझे लगता है सशक्तीकरण एक मानसिक अवस्था है, उस व्यक्ति की, जिसे सशक्त होना है और सशक्त महसूस करना है. स्त्री को अपनी अवस्था बदलनी है. वह तब बदलेगी जब वह स्वयं को अपनी दृष्टि से देखेगी. सामाजिक दृष्टि की परवाह किए बगै़र.  ”समुद्र में रेगिस्तानकहानी इस संकलन की एक बहुत ख़ास कहानी है. केवल अपने शिल्प की बारीक बयानी और अमूत्र्तन के कारण ही नहीं बल्कि अपने कथ्य में छिपी गहन और प्रच्छन्न करुणा के कारण भी क्योंकि यह पूरी पुस्तक ही एक औरत की नोट बुक है इसलिए इस कहानी की मुख्य पात्र भी एक औरत ही है. इस औरत ने अपनी रचनात्मकता को पीछे छोड़ कर एक अधेड, तीन बच्चों वाले पुरुष का घर बसाया पर स्वयं अधेड़ होने तक पीछे छूट गई अकेली. 


सुधा अरोड़ा 

हमारे देश में विवाह औरत को नई पहचान नहीं दे पाता, बल्कि उससे उसकी निजी पहचान भी छीन लेता है। नायिका छवि भी कहानी के अन्त में अपना नाम याद करती हेै, और पहचान पा लेती है. खुद अपने आप से परिचित होती है. अपर्णा सेन की फिल्म परमा के अन्तिम दृष्य में भी घर से बहिष्कृत नायिका को एक पौधे का भूला हुआ नाम याद आ जाता है. कृष्णपल्लवी.  ‘‘समुद्र में रेगिस्तान’’ कहानी उन कहानियों में से है जो ‘‘अपना षिल्प अपने आप गढ़ती है.’’ कहानी यूँ षुरु होती है मानो कविता हो. दिन ,हफ्ते, महीने, साल. लगभग पैतीस सालों से वे खड़ी थी. खिड़की के आयताकार फ्रेम के दो हिस्सों में बँटे समुद्र के निस्सीम विस्तार के सामने. ऐसे जैसे समुद्र का हिस्सा हों वे. वे मानो कैलेंडर में जड़े एक खूबसूरत लैडस्केप का हिस्सा बन गई थी.” (पृ-111) व्यक्ति की मनःस्थिति जैसी होती है वाह्यजगत् भी उसे वैसा ही दिखाई देता है.  ”तीस साल पहले समुद्र ऐसा मटमैला नहीं था. चढ़ती दुपहरी में वह आसमान के हल्के नीले रंग से कुछ ज़्यादा नीलापन लिए दिखता. आसमानी नीले रंग से तीन शेड गहरा.”(पृ-112)” दस साल बाद एक दिन अचानक जब गर्मी की छुट्टियां खत्म होने पर, बच्चे वापस पंचगनी के हाॅस्टल लौट गए, उन्हें समुद्र बदरंग सा नीला लगा.समय गुज़रता गया. न जाने कब वह खिलंदड़ा समुद्र एकाकी और हतास  रेगिस्तान में बदल गया.कहानी के अंत में न जाने कैसे खिड़की के बाहर हिलोरें लेता रेगिस्तान उमड़ते समुद्र की तरह बेरोकटोक कमरे में चला आया और सारे बांध तोड़ कर उफनता हुआ उनकी आंखों के रास्ते वह निकला। (पृ-115) नायिका का जीवन और समुद्र मानो एक ही गति से बहते है.
           
एक दिन अचानक एक पुराने सहपाठी ने उन्हें नाम से बुलाया और दीवारों पर लगी पेंटिंग्स के कोनों पर लिखा उनका छोटा सा नाम वहां से निकल कर पूरे कमरे में फैल गया. कमरे के बीचोंबीच वह नाम जैसे उनकी प्रतीक्षा में बैठा था.अपने नाम का भूलना और उसका याद आ जाना हमारी खु़द से मुलाक़ात का प्रतीक है. नाम खोया नहीं था , वहीं बैठा था कमरे में , लिखा था तस्वीर पर , याद था हमारे सहपाठियों को , ज़िन्दा था उनकी स्मृतियों में , भुलाया तो सिर्फ हमने था - उस सुख की चाहत में जो सुख हमें इस पितृसत्तात्मक समाज की परिवार नामक इकाई का हिस्सा बनकर , विवाह नामक संस्था में प्रवेश करके , पति नामक प्राणी के माध्यम से प्राप्त होने वाला था. पर हो न सका. मिला क्या, और छूटा क्या ? कहानी में मातृत्व की चाहत के संकेत है, छह आठ और दस साल के बालकों को पालने के लिए किए गए दूसरे विवाह के संकेत भी है.  परन्तु सच बात तो यह है कि मातृत्व की चाहत भी समाज में द्वारा निर्मित ही होती है, तभी तो विश्व के हर समाज में यह भावनाएं तथा चाहतें अलग अलग रूप में दिखलाई पड़ती हेै. इस प्रकार की कथाओं में पति के देहान्त और वयस्क पुत्रों के जाने के बाद खाली घोंसले में अकेली छूटी नायिकायें हमें मन्नू भंडारी, मालती जोशी, उषा प्रियंवदा की रचनाओं में भी मिलती हेै परन्तु यह कहानी ख़ास है. क्योंकि यह कहानी समाज द्वारा छोड़ी हुई औरत की नहीं बल्कि स्वयं अपने आप से बिछुड़ी हुई औरत की दास्तान है, जिनका नाम उनकी प्रतीक्षा कर रहा था , ‘‘जिससे वे हुलस कर मिलीं और ढह गईं.” (पृ-115)
           
 ”अन्नपूर्णा मंडल की आखिरी चिट्ठीका ज़िक्र किए बिना इस पुस्तक पर चर्चा पूरी नहीं हो सकती. पूरब में कलकत्ते के पास बांकुड़ा से लेकर पश्चिम में बम्बई तक फैला वितान, बरसात का मौसम, भीगी सड़क, तालाब, पोखर, नाली, कीचड़, केंचुए वर्षा  में भाई-बहनों का एक साथ खेलना, ”मोैसम की पहली बरसात देखकर हम कैसे उछलते कूदते, माँ का वर्षा  आने की खबर देते, जैसे पानी की बूँदे सिर्फ हमें ही दिखाई देती है, और किसी को नहीं” (पृ-32) और निर्धन माँ बाप का बेटी ब्याहने का सपना, बेटी का ब्याह कर पराए देश जाना, उसकी गृहस्थी और जुड़वां बेटियों का जन्म. अपने जीवन से त्रस्त क्षुब्ध, निराश  और व्यथित औरतें कितना डरती है बेटियों को जन्म देते ! उन्हें ज्ञात है - लड़की होना होता क्या है. पूरी कहानी बाहर से एक भौगोलिक विस्तार रचती है बंगाल के एक छोटे से गांव से बम्बई तक और भीतर ही भीतर रचती है एक अवचेतन का संसार जिसके भीतर रहते हुए एक सूत्र से गुंथे है. पराए देश  ब्याही गई बेटी और उसके माँ बाप. क्या वे उसकी पीड़ा जानते नहीं, फिर भी यही सुनना चाहते है कि बेटी सुखी है.तुम्हें मेरे ख़त कभी मिले ही नहीं.बेटी ने माँ बाप को लिखा तो था उन्होंने पढ़ा ही नहीं. पढ़ना चाहा नहीं. इस कहानी पर विस्तार से लिखने की इच्छा है. पर वह टिप्पणी फिर कभी , ऐसी रचना पर लेखनी उठाते हाथ कांपते है. ‘‘डर’’ और ‘‘करवा चौथी औरत’’ मध्य तथा उच्च मध्य वर्ग की पढ़ी लिखी औरत की दयनीय स्थिति की कहानियां है. लेखिका ने इन्हें करुण कथा की तरह नहीं ,रुचिकर क़िस्से की तरह बयान किया है. 



अपने ही घर में गृहिणी का डर कर रहना (डर) और अपने ही घर में धीरे धीरे महत्वहीन होते चले जाना (करवाचौथी औरत) मध्यवर्गीय स्त्री की वास्तविकता है. ‘‘सत्ता संवाद’’ कहानी एक स्त्री का एकालाप है जो पैसा कमाने और घर की सारी जिम्मेदारी उठाने के लिए मजबूर स्त्री द्वारा गैर ज़िम्मेदार लेखक टाइप पति को झेलते रहने से उपजा क्रोध है जो खीझयुक्त बड़बड़ाहट के रूप में उभरता है. स्वयं को लेखक मानने वाले पाठक पाठिकाएं कदाचित् इस कहानी से सरलता से तादात्म्य स्थापित कर पाएंगे, जब कि यह कहानी किसी और प्रकार के दम्पत्ति की भी हो सकती है. ‘‘ तीसरी बेटी के नामः ये ठंडे सूखे बेजान शब्द ’’कहानी उस लड़की के विषय में है जिसने प्रेम किया, प्रेम विवाह किया, पढाई भी की और नौकरी भी, परन्तु वह अपने महत्वाकांक्षी ईष्यालु पति के द्वारा मारी गई. ‘‘तुझे तो फिर फिर बनना है औरत ’’ शीर्षक वाले वक्तव्य में लेखिका ने इस कहानी को नयना साहनी और अंजू इल्यासी जैसी महिलाओं की हत्या के आलोक में लिखा बताया है जो अपने पुरूष साथियों द्वारा मारी गई. सार्वजनिक स्मृति की आयु बहुत छोटी होती है। इस तरह की घटनाएं हत्याकांडों के रुप में हिन्दी अखबारों के मुखपृष्ठ पर कुछ दिन स्थान पाती हैं, फिर लुप्त हो जाती है. लोग कहते हैं, ये औरतें सबकुछ जानते हुए भी सार्वजनिक जीवन में आई ही क्यों थीं ? पुरुष तो बदमाश होते ही है. कहानी के रुप में प्रस्तुत हो कर यही विचार भावनाओं में अनुस्यूत हो जाते हैं और हदय के भीतर घर कर जाते है. ‘‘बड़ी हत्या,छोटी हत्या’’ कहानी संवाद शैली में लिखी गई कहानी है. जिसमें घर की बुज़ुर्ग महिला दाई द्वारा नवजात कन्या की हत्या करवाती है. 

बीस बरस तक पालपोस कर बड़ी की गई बेटी को दहेज कम मिलने के कारण आधा टिन मिट्टी के तेल में फूंक दिया जाएगा , दादी यह जानती है, इसलिए नवजात पोती की हत्या करवा देती है. उस दाई से, जो सबेरे से दो हत्याएं और कर चुकी है. ससुराल में जलने से बेहतर है जन्मते ही मरना. वक्तव्य में लेखिका ने कहा है.बेटा बेटी के जन्म को भारतीय व्यापारी वर्ग तो नफा नुकसान के अर्थ में देखता ही है मध्यवर्ग भी संतान में लड़के का शुमार हुए बिना परिवार को पूरा नही मानता. ’’ (पृ-59) सुधा अरोड़ा की कई कहानियां यहां एक दूसरे के बरक्स खड़ी है. ‘‘रहोगी तुम वही’’ के सामने ‘‘सत्ता संवाद’’ , ‘‘एक औरत-तीन बटा चार’’ के सामने ‘‘ताराबाई चाल’’ ,‘‘अन्नपूर्णा मंडल’’ के सामने ‘‘समुद्र में रेगिस्तान’’, ‘‘तीसरी बेटी’’ के सामने ‘‘बड़ी हत्या,छोटी हत्या’’और डर के सामने करवाचौथी औरत. बाहर से बहुत दूर ओैर कितने अलग अलग दिखने वाले विश्व  भीतर से बिल्कुल एक से है. सम्पन्न दम्पत्ति और विपन्न दम्पत्ति के घरों में सत्ता समीकरण एक जैसे है. कहानियां दर्शाती हैं कि सुविधाएं सुख का पर्याय नहीं होतीं, संभ्रान्तता से क्रूरता कम नहीं होती.  कोई आवश्यक नहीं कि शिक्षा और उच्च पद किसी व्यक्ति  को मानवीय रिश्तों को बेहतर बनाने की सलाहियत दे सके. मानसिक प्रताड़ना के खि़लाफ अपने लम्बे आलेख में लेखिका ने वर्गीय आधार पर प्रताड़ना का विश्लेषण किया हेै. लोग मार्क्सवादी वर्ग की धारणा को जानते है, जहाँ मिल मालिक मजदूर का शोषण करता है , वह पूँजी और श्रम की लड़ाई है, और अमीर और ग़रीब की. परन्तु घरों के भीतर एक और तरह की लड़ाई जारी है जिसमें गरीब गरीब को ही सताता है और अमीर अमीर को ही. यह लिंगाधारित भूमिका विभाजन का प्रतिफल है.

जिसमें अधिकतर पुरुष ही शोषक की भूमिका में रहता है, अपने ही वर्ग की स्त्री को सताता हुआ. अपवाद हर जगह हो सकते है पर अमूमन होता यह है कि तकनीकी प्रबंधन की उच्च शिक्षा प्राप्त अभिजात घरों से आए लड़के किसी इज्जतदार प्रतिष्ठित घराने की ज़हीन, देखने में आकर्षक लड़की से सगर्व शादी करना चाहते है, पर सारी मसक़्क़त केवल उसे हासिल करने तक सीमित होकर रह जाती है फिर उसका मुख्य स्पेस रसोई हो जाता है. ’’ लेखिका ऐसे महिला कलाकारों की गणना करती हैं जिन्हें उनकी कला पर रीझकर पति ने चुना पर कला जगत् छोड़ने पर मजबूर किया,  फलस्वरूप वे विवाह संस्था से बाहर आ गई. वे कहती हैं कि ‘‘ निम्न वर्ग का पुरुष गु़स्सा आते ही हाथ उठा देता है, वह इतना शातिर नहीं होता. सूक्ष्म किस्म की मानसिक प्रताड़ना आमतौर पर आर्थिक रूप से सम्पन्न संभ्रान्त अभिजात पुरूष या फिर सामाजिक फलक पर प्रतिष्ठा प्राप्त बुद्धिजीवी पुरुष देते है.  ‘‘आक्रामकता के खि़लाफः एक आम औरत की आवाज़ ’’ पुस्तक का प्रथम आलेख है. इसमें लेखिका ने परामर्श केन्द्र से जुड़े अनुभवों को आधार बनाया है. मैंने देखा है कि आमतौर पर परामर्श केन्द्र मध्यवर्ग की शिक्षित महिलाओं की पहल पर स्थापित हुए हेैं तथा उन्हीं के द्वारा संचालित है. पर इनमें मामले निम्न आय वर्ग की महिलाओं के होते हैं जिनमें से अधिकांश को मध्यवर्गीय महिलाओं ने भेजा होता है. कामकाजी, श्रमजीवी, घरों में चौका बर्तन करने वाली, कपड़े धोने वाली, सब्जी वाली - महिलाओं का एक बड़ा वर्ग इनका लाभार्थी है.
            
पच्चीस वर्ष से ऐसे ही परामर्श केन्द्रों के साथ काम करते हुए मैंने भी यही पाया है कि उच्च तथा मध्य वर्ग की महिलाएं गरीब स्त्रियों के केस लाती हैं, उन्हीं का सरेआम बयान करती हैं , परन्तु वे यह नहीं बतातीं कि उनके अपने घर के भीतर पारिवारिक रिश्तों के टूटने बिखरने की स्थिति क्या है. अपनी आया-बाई, महरी-मिसरानी की व्यथा कहकर और उनके पतियों को उनके किए की सज़ा दिलवा कर मानो वे अपने सुशिक्षित, समृद्ध, सम्भ्रान्त दिखने वाले पतियों से उनकी क्रूरता तथा हिंसा का बदला ले रही होती हैं. जब कोई महिला हमारे परामर्श केन्द्र में चार ऐसे केस भेज चुकी होती है, मैं समझ लेती हूँ कि पांचवा केस उसका खुद का होगा. सुधा अरोड़ा ने संभ्रान्त मुखौटे वाले क्रूर पुरुषों द्वारा की जाने वाली हिंसा पर बहुत विस्तार से चर्चा की है जहां हिंसा जूतों डंडो, लाठी और गालियों से नहीं होती बल्कि होती है - उदासीनता और उपेक्षा भरी निर्मम चुप्पी से.‘‘ द वायलेंस आॅफ सायलेंस. ’'साहित्य समाज का दर्पण होता है , या साहित्य को समाज का दर्पण होना चाहिए या फिर साहित्य को समाज का पथप्रदर्शक भी होना चाहिए. ये प्रश्न स्त्री विमर्श तथा दलित विमर्श के संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाते है. सुधा अरोड़ा एकाधिक बार कह चुकी है कि क्या कहानियां सिर्फ दोपहर की फु़र्सत में महिलाओं को अच्छी नींद सुलाने के लिए लिखी जानी चाहिए? क्या हर कहानी का पहला उद्देष्य मात्र मनोरंजन होना चाहिए ? नहीं. ’’ (पृ-9) 

यह पुस्तक इसे सिद्ध ही नहीं करती , इसके व्यावहारिक पक्षों का विष्लेशण भी करती है. इस पुस्तक की कहानियां समाज का दर्पण हैं और उन पर दिए गए वक्तव्य पथप्रदर्शक.  साहित्यकार समाज से ही प्रसंग उठाता है और उनमें कल्पना के रंग भरकर नाटक, कहानी, उपन्यास और कविता के रूप में अपनी रचना कह कर प्रस्तुत करता है. साहित्यकार समाज का ऋणी होता है. विमर्श  के नाम पर प्रकाशित सैकड़ों पुस्तकों के बीच कथाकार और सामाजिक कार्यकर्ता सुधा अरोड़ा की यह पुस्तक अपनी इस विशेषता के लिए जानी जाएगी कि इस किताब के रूप में एक साहित्यकार ने समाज को उसका ऋण चुकाया है.
                                             
             
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