मन्दिर प्रवेश के लिए यह कैसा संघर्ष ( !)

प्रियंका सोनकर
 प्रियंका सोनकर  असिस्टेन्ट प्रोफेसर दौलत राम कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय. priyankasonkar@yahoo.co.in 
भारत में हिन्दू धर्म में दलितों और स्त्रियों को कभी भी सम्मान के नज़रिये से नहीं देखा गया.  हिन्दू धर्म का आधार यही रहा है जिसमें दलित और स्त्रियां पशुओं से भी बदतर ज़िन्दगी जीने को बाध्य हुए . भारतीय हिन्दू संस्कृति का स्वरूप क्या है? इस भारतीय संस्कृति में धर्म का दबदबा रहा है. हमें यह पता होना चाहिए कि भारत में चाहे कोई भी धर्म क्यों न हो सभी में स्त्रियों पर पाबन्दी लगा दी गयी थी . ईश्वर की कृपादृष्टि स्त्री-पुरूष सब पर समान है फिर चर्च हो या मन्दिर या फिर मस्जिद सबमें धर्मगुरू के स्थान पर पुरूषों को ही क्यों रखा गया ? दुनिया के जितने भी धर्म है सबमें आप देखेंगे कि पुरोहित, पादरी, पुजारी, मौलवी, और वाहेगुरू के नजदीक अर्थात जितने भी धर्मगुरू है सबमें पुरूष ही हैं वही आप को भगवान, अल्लाह, वाहेगुरू और गॉड से मिलन करायेगें. वही मन्दिर का कपाट खोलेंगे, वही ईश्वर का दर्शन करायेंगे, वही दान-दक्षिणा लेंगे और वही आशीर्वाद भी देंगे.  वही आपकी शादियां करायेंगे और शादियों में मन्त्रोच्चारण करेंगे.  सोचने वाली बात यह है कि इन पदों पर स्त्रियों को कभी जगह क्यों नहीं दी गयी. क्यों वंचित कर दी गयी स्त्रियां ? यहां तक कि कुछ जगह पर विशेष हिन्दू देवता (शनिदेव) के दर्शन करना और उनकी पूजा-अर्चना तथा मन्दिर प्रवेश तक से वे वंचित कर दी गयी हैं.  प्रश्न यह है कि ‘ईश्वर के क्रियाकलापों में स्त्री-पुरूष में भेद कैसा और क्यों ? धीरे-धीरे स्त्रियों को भी अब पता चल चुका है कि धर्म की आड़ बनाकर उनके साथ किया गया दोहरा बर्ताव वस्तुतः धर्मगुरूओं की अपनी साज़िश और महत्वाकांक्षाओं की उपज है. इसी समझ ने स्त्रियों में मुक्ति की चेतना को जन्म दिया है.’

हाल ही में केरल और महाराष्ट्र के शनि शिंगुणापुर और त्र्यंबकेश्वर मन्दिर में पूजा के लिए महिलाओं के प्रवेश को लेकर जैसी खींच-तान हुई और वहां के पुजारियों और प्रशासनों तथा पुरूषों का रवैया रहा, वह इस बात की पुष्टि करता है कि आजाद भारत में 21वीं सदी में महिलाओं को समानता का अधिकार अभी तक नहीं मिला है. एक मुहावरा है ‘भगवान के घर में देर है अंधेर नहीं’  किन्तु सवाल यहां देर और अंधेर का भी नहीं है यहां तो भगवान के घर में भेदभाव है जहां पुरूषों को मन्दिर प्रवेश और पूजा की इजाजत है वहीं महिलाओं के लिए निषेध. इस तरह के भेदभाव आज भी तब जारी है जब महिलाओं को भी संवैधानिक अधिकार प्राप्त हैं.  हिन्दू धर्म के अन्तर्गत मनुष्य-मनुष्य में इतने भेदभाव, असमानता और शोषण हैं कि डॉ.अंबेडकर को यह धर्म बहुत निराशा के साथ छोड़ना पड़ा क्योंकि उन्हें पता था कि इस धर्म में रहकर दलितों का कोई उत्थान नहीं हो सकता और यहां तक कि मनुष्य जाति तक को मुक्ति प्राप्त नहीं हो सकती. ‘1930 में डॉ.अम्बेडकर ने दलितों के लिए मन्दिर प्रवेश आन्दोलन चलाया था क्योंकि भारत जैसे देश में हिन्दुओं में ऊंची जातियों को जहां जन्म से ही मन्दिर प्रवेश का अधिकार था लेकिन हिन्दू दलितों को यह अधिकार प्राप्त नहीं था. इसीलिए तब डॉ.भीमराव अम्बेडकर ने कहा था –“हिन्दू इस बात पर भी विचार करें कि क्या मन्दिर प्रवेश हिन्दू समाज में दलितों के सामाजिक स्तर को ऊंचा उठाने का अन्तिम उद्देश्य है ? या उनके उत्थान की दिशा में यह पहला कदम है ? यदि यह पहला कदम है, तो अन्तिम लक्ष्य क्या है ? यदि मन्दिर प्रवेश अन्तिम लक्ष्य है, तो दलित वर्गों के लोग उसका समर्थन कभी नहीं करेंगे. दलितों का अन्तिम लक्ष्य है सत्ता में भागीदारी.’



‘सिर्फ एक शतक पहले तक भारत में दलितों की स्थिति इतनी नारकीय थी कि दास और पशु उनके मुकाबले बेहतर थे. दास और पशु को उनके स्वामी छू सकते थे, पर दलितों को छूना तो दूर, सवर्ण हिन्दू उनकी परछाई तक से अपवित्र हो जाते थे और स्नान के बाद ही शुद्ध होते थे. उन्हें न सार्वजनिक कुओं, तालाबों से पानी लेने का अधिकार था और न विद्यालयों में शिक्षा ग्रहण करने का. यहां तक कि मन्दिर के दरवाजे भी उनके लिए पूर्णतया बन्द थे.” भारत में सौ साल पहले हिन्दू मंदिरों में प्रवेश को लेकर जो स्थिति दलितों की थी आज ठीक वैसी ही स्थिति महिलाओं की है. लगभग चार सौ साल पुराने शनि शिंगणापुर मंदिर में जो महिलाएं प्रवेश करना चाहती थीं उनके प्रयास को नाकाम कर दिया गया. क्योंकि इस मंदिर में महिलाओं का प्रवेश वर्जित है. मंदिर में प्रवेश की कोशिश करने वाली लगभग 400 महिलाओं को पुलिस ने हिरासत में लिया और बाद में चेतावनी देकर छोड़ दिया ये महिलाएं पूजा का अधिकार पाना चाहती थीं जिसके लिए उन्होंने गणतंत्र दिवस का दिन चुना, कुछ प्रदर्शनकारी महिलाएं अभी भी हिरासत में हैं. प्रदर्शनकारी महिलाओं द्वारा 26 जनवरी का ही दिन चुनना शायद जो भी वजह रही हो किन्तु इतिहास को ध्यान में रखा जाय तो हमें यह दिन भारत के गणतन्त्र होने की याद अवश्य दिलाता है. जब सभी भारतीयों को संवैधानिक अधिकार प्राप्ति के लिए संविधान का निर्माण किया गया और भारत को गणतन्त्र राष्ट्र घोषित किया गया.


केरल और महाराष्ट्र के शनिदेव मन्दिरों में उनके प्रवेश पर रोक लगाना इस बात को पूरा सिद्ध कर देता है कि पुरूष देवता (शनिदेव) के मन्दिर में स्त्रियों का कोई काम नहीं . जिस तरह से स्त्री के ऊपर पूर्ण पाबन्दी लगायी गयी है और उनका मन्दिर प्रवेश आन्दोलन जारी है भले ही वो उनके अस्तित्व और अधिकार की बात हो सकती है किन्तु आज महिलाओं को यह समझ लेना चाहिए कि जिस हिन्दू देवता के लिए वे इतना संघर्ष कर रही हैं यदि उनके लिए वहां जगह नहीं है तो उन्हें अपना लक्ष्य त्याग देना चाहिए. यह पितृसत्तात्मक व्यवस्था की पूरी चाल है कि मन्दिरों में स्त्री का प्रवेश कितना वर्जित है और कितना अवर्जित. उन्हें मन्दिरों में प्रवेश की कब, कितनी और कैसे इजाजत मिलनी चाहिए ये भी वही तय करेंगे.  महिलाओं के मंदिर में प्रवेश पर लगी पाबंदी के खिलाफ संभवतः यह अब तक का सबसे बड़ा आंदोलन है. प्रदर्शनकारी महिलाओं का कहना है कि वे पूजा स्थलों पर हो रहे भेदभाव के खिलाफ हैं .अहमदनगर के शिंगणापुर में स्थित इस प्रतिष्ठित शनि मंदिर में महिलाओं को भीतरी हिस्से में प्रवेश पर रोक है. दरअसल यह आन्दोलन उस समय और तीव्र हो गया जब पिछले साल पुणे की ही एक महिला ने मंदिर के चबूतरे पर चढ़कर शनि देव को तेल चढ़ा दिया था. महिलाओं के लिए वर्जित माने जाने वाले इस कृत्य के बाद मंदिर ट्रस्ट ने मंदिर का शुद्धिकरण करवाया था. बाद में पूजा करने वाली महिला ने तो माफ़ी मांग ली, पर शुद्धिकरण को लेकर महिलाओं ने काफी आक्रोश व्यक्त किया .

 पिछले महीने भी रणरागिनी ब्रिगेड की 4 महिलाएं शनिदेव की पूजा करना चाहती थीं, लेकिन उन्हें अनुमति नहीं दी गई थी. ब्रिगेड की महिलाओं ने इसके खिलाफ आवाज उठाई, लेकिन मंदिर प्रशासन ने महिलाओं के मूर्ति पर तेल अपर्ण नहीं करने देने की परंपरा को कायम रखा. भारत में यह कैसी परंपरा है जहां समाज में व्यक्ति-व्यक्ति में वर्णों में, वर्गों में तो भेदभाव है ही, वहीं मंदिरों में भी ये भेदभाव व्याप्त है. पुरूषों को जहां शनिदेव मंदिर में प्रवेश और पूजा करने का अधिकार है वहीं महिलाएं इस अधिकार से वंचित हैं. कुछ महिलाओं द्वारा शनिदेव मंदिर में प्रवेश और पूजा-अर्चना करने के लिए आंदोलन डॉ.अंबेडकर और दलितों के उस इतिहास की याद दिला देता है जब भीमराव अंबेडकर ने धर्म सत्याग्रह किया था . उन्होंने नासिक में कालाराम मन्दिर में दलितों के प्रवेश के अधिकार के लिए इसे आरम्भ किया था.‘ डॉ.अंबेडकर ने 2 मार्च 1930 को हजारों अछूतों को लेकर नासिक के काला राम मन्दिर में कूच किया था. डॉ.अम्बेडकर के धर्म-सत्याग्रह आन्दोलन को सवर्ण हिन्दुओं ने सत्याग्रही अछूतों पर हमला करके कुचल दिया. अछूतों और हिन्दुओं के बीच खुला संघर्ष हुआ. डॉ. अंबेडकर सहित सैकड़ों अछूतो के सिर फूटे, फिर भी अछूतों का जोश कम नहीं होता था. फलस्वरूप, मन्दिर के प्रबन्धकों ने एक वर्ष के लिए मन्दिर के कपाट ही बन्द कर दिये. ’


‘दलित वर्गों के लोग निर्णायक लड़ाई लड़ना चाहते थे. इसलिए वे तब तक आन्दोलन चलाते रहना चाहते थे, जब तक कि मन्दिर के दरवाजे उनके लिए खोल न दिए जायें .किन्तु डॉ.अंबेडकर इस सत्याग्रह को लम्बे समय तक चलाने के पक्ष में नहीं थे .अतः उन्होंने उसे स्थगित कर दिया .इसका कारण स्पष्ट करते हुए उन्होंने बताया कि मन्दिर आन्दोलन इसलिए नहीं किया गया था कि उन्होंने यह अनुभव किया था कि वह दलित वर्गों को ऊर्जा देने और उनकी वास्तविक स्थिति का बोध कराने का बेहतर मार्ग था.  इस सत्याग्रह से उनका यह उद्देश्य पूरा हो गया है और इसलिए अब मन्दिर प्रवेश आन्दोलन की कोई आवश्यकता नहीं है. इसके स्थान पर उन्होंने दलित वर्गों को अपनी ऊर्जा राजनीति पर केन्द्रित करने की सलाह दी .’ महिलाओं को मन्दिर प्रवेश में इजाजत दी भी गयी तो वो भी प्रत्येक दिन में एक घंटे और केवल सूती और शिल्क का वस्त्र पहनकर. यहां तक कि केरल और भारत के बहुत से मन्दिरों में यदि वे मासिक धर्म में है तो उन्हें मन्दिर प्रवेश और पूजा की इजाजत नहीं है. महिलाओं द्वारा ऐसे नियमों को ग्रहण न करना काबिलेतारीफ है.

भूमाता ब्रिगेड तृप्ति देसाई और उनके अनुयायियों द्वारा महिलाओं को सभी उपासना स्थलों पर उपासना के बराबर हक के लिए जो मंदिर प्रवेश आन्दोलन चलाया जा रहा है वह लैंगिक समानता की एक उपलब्धि हो सकती है और भले ही उसमें उन्होंने सफलता  हासिल कर ली हो किन्तु महिलाओं को अपनी शक्ति इस मन्दिर प्रवेश में न लगा कर कहीं और लगाना चाहिए क्योंकि इससे उनका कोई उत्थान नहीं होने वाला. आज महिला सशक्तिकरण इस बात से तय नहीं किया जायेगा कि उन्होंने शनिदेव मन्दिर में प्रवेश के आन्दोलन में विजय हासिल कर ली. उन्होंने अपना अधिकार छीन लिया. आज इस बात की सबसे ज्यादा जरूरत है कि संसद के दोनों सदनों में महिला आरक्षण अभी तक लटका हुआ है. आज जब स्त्रियों को अपने 33 प्रतिशत आरक्षण के लिए लामबद्ध होकर लड़ना चाहिए तो वे ऐसे धर्म में प्रवेश के लिए लड़ाई लड़ रही हैं. महिला आरक्षण के लिए संघर्ष और उसके लिए आवाज उठाने की ज्यादा जरूरत है न कि शनिदेव मन्दिर में प्रवेश की. महिलाओं को ये भली-भांति जान लेना चाहिए कि जिन मन्दिरों में उनके लिए जगह नहीं, जिस ईश्वर और मन्दिर में बैठे धर्मगुरूओं को वे स्वीकार नहीं उन्हें शीघ्र ही उस देवता, धर्मगुरू और धर्म को छोड़ देना चाहिए.आज भारत में बहुत सी समस्यायें महिलाओं के सामने है उन्हें उसके लिए अपना आन्दोलन तीव्र कर देना चाहिये.


कन्या भ्रूण हत्या, पानी की समस्या, शौचालय की समस्या, डायन करार कर मार देने जाने वाली समस्या, दोयम दर्जे की समस्या, मैला प्रथा उन्मूलन, यौन शोषण, सम्मान का जीवन जीने का अधिकार इत्यादि समस्यायें आज भी मौजूद हैं. भारतीय समाज में इन्सानी अधिकार की लड़ाई के लिए महिलाओं को अपना अन्दोलन तेज करने की जरूरत है न कि किसी मन्दिर प्रवेश और उनमें स्थित शनि देवता की पूजा के लिए, क्योंकि समाज में इन समस्याओं को दूर करने के लिए कोई भगवान नहीं पैदा होगा और जिस मन्दिर प्रवेश की लड़ाई वे लड़ रही हैं उससे न तो उन्हें स्वर्ग प्राप्ति होगी और न ही मोक्ष की प्राप्ति. आज भाग्यवाद, ईश्वर और अवतारवाद के खिलाफ अपने सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक तथा मानव के अधिकारों की लड़ाई लड़ने की आवश्यकता है डॉ.अंबेडकर के मन्दिर प्रवेश आन्दोलन से सीख लेकर उन्हें अपने राजनैतिक अधिकारों के लिए एकजुट हो जाना चाहिए क्योंकि डॉ.अंबेडकर का मन्दिर प्रवेश आन्दोलन दलितों को हिन्दुओं के मन्दिर में प्रवेश के लिए नहीं था बल्कि दलितों को उनकी वास्तविक स्थिति का बोध कराना था जिससे वे अपनी दीन-हीन स्थिति पहचान कर अपनी मुक्ति तथा सामाजिक, आर्थिक समानता और राजनैतिक अधिकारों के लिए चेतनाशील हो सके.

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