किरण मुक्तिप्रिया की कवितायें

किरण मुक्तिप्रिया
  युवा कवयित्री. साहित्यिक पटल पर देर से लेकिन दुरुस्त उपस्थिति pkiran34@gmail.com
सामाजिक जीवन में पिछले अनेक वर्षों से सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर सक्रिय कवयित्री किरण मुक्तिप्रिया की कविताएँ अपने अलग तेवर लिए हुए है। वे कथ्य को अपने अनुभव की आँच पर तपाकर कविताएं रचती है। चूंकि कवयित्री कई सालों से एक महिला संगठन से जुड़ी रही है , इसलिए स्वाभाविक तौर पर उनकी कविताओं में स्त्री जीवन के संघर्षों के बहुआयामी चित्र देखने को मिलते है। किरन मुक्तिप्रिया की कविताएँ स्त्री अस्मिता की पहचान के मुख्य बिंदु को पहचानते हुए, जिसमें वे स्वयं के स्त्री होने की पहचान के साथ-साथ एक मनुष्य होने की चेतना को अपने भीतर समेटकर चलने की कविताएँ है। किरन अपनी कविताओं में पूरे स्त्री समाज के स्वाभिमान व पीड़ा, के साथ उसके वजूद को पहचाने की कशमकश और उस कशमकश को एक सधा उत्तर देते हुए उसे निकल पाने की आशा जगाती है। तमाम तरह के भाषायी छल छद्म से दूर, सीधे मन में उतर जाने वाली भावप्रवण शैली में कविता लिखने वाली किरन एक बेहद संभावनाशील कवयित्री  हैं । 
अनिता भारती  ( साहित्यकार) 

हमें तो हारना ही था

हमें तो
हारना ही था
हमेशा से हमारे
स्वाभिमान को
दम्भ का नाम दिया तुमने
और कर डाले सारे जतन
उसे तोड़ने के
अगर उससे निकल भी गयी
तो सार्वजानिक प्रहार किया मुझपर आखिर
तुम्हारे पास
हक थे
हथियार थे
सारे साधन मौजूद थे
ज़माने के
और उस पर
इस ज़माने का साथ
जो सदियों से तुम्हारे ही
पक्ष में देता रहा है
सभी निर्णय
तुम्हारे लिए ही
तुम्हारे हिसाब से
गढता रहा है
नैतिकता की नित नयी
परिभाषा
और हमेशा कटघरे
में खड़ा किया
उसने हमें
हमें तो हारना ही था।


हादसे

हादसे
अक्सर बुरे नहीं होते
ऊर्जा देते हैं
सभी संभावनाओं
को समेट एक
नई उड़ान की ।
महावर
से नहीं
खून से
रंगे हैं
पाँव मेरे
मंज़िल को
तय करना है
एक
गहरी छाप
छोड़ते हुए।।

कोख

एक नाटक
के पात्र की तरह
तुमने
बिठाया मुझे मंडप में
बांधा
एक रिश्ता अपनेपन का
साज़िश थी
वो तुम्हारी
मेरी कोख को
अपना गुलाम बनाने की।
कोख में
पनपा एक बीज
बढ़ाता
तुम्हारे ही वंशबेल को
जिसे सीचना था
मुझे अपने खून से
उस
महिमामंडित समाज के लिए
ठीक वैसे ही
जैसे
बीज बोने देने के लिए ।
जीते हुए
दोनों एहसास को
छूटते हुए
खुद से
करती रही तुम्हे पूरा
खुद की जरूरतों के
बखान में रिश्तों से
करते रहे धोखा
फिर भी
बने रहे
नामजद मुख्तार
इस कोख के।
जिसमें न पाने पर
खुद को
वंचित
किया मुझे
उस सुख से
जिसके होने पर
कुछ
बचे रह जाने
का एहसास था।
अब पर्दा
गिरने को है
खली हाथ हूँ मैं
कुछ भी नहीं
हासिल मुझे
न तुम
ना ही मेरी कोख
जिसके लिए
बिठाया था मुझे
मंडप में.


वक़्त

चुरा लो
थोड़ा सा
वक़्त खुद
के लिए भी
जिसमे
कर सको श्रृंगार
लिख सको कोई
कविता
देख सको सपने
अपनी खूबसूरती के
जी सको वो पल
जो बस
सपने बन
कर रह गए
बीते वक़्त की तरह ।
कोशिश की
ताउम्र
उसे अपनी मुट्ठी
में क़ैद करने की
भ्रम था
क़ि अपनी रफ़्तार
से काबू कर
लिया है जिसे ।
देखो तो
कबका बिखरा
हुआ है सामने
तारामंडल में
लहराते गोलपिंडो सा
तुम्हारे
वजूद की तरह ।।

एहसास

एक
एहसास
जिसके लिये
कम पड़ जाते
हैं कवि के शब्द
रंगकर्मी की
परिकल्पनाएं
औरत के आंसू
किसी बच्चे के
सपनों की उड़ान
खुद बयां
होता खामोश
जुबान से
घुलता आँखों
के भीतर
रीसता शरीर
के रोमछिद्रों से
धीरे धीरे
हो जाता है
जज़्ब
इस खोखली
विरासत में

सिहरन

आज
भी एक
सिहरन
उस
एहसास
के साथ
रूह की
गहराइयों से
गुज़रती
पहुँचती तो
होगी
तुम तक

तो
क्या
हम नदी
के
किनारे हुए

राहें

आज
मैं गुज़रती
हूँ जिन राहों से
कल तुम्हे भी
गुज़ारना होगा
क्योंकि
हमनें
कभी नहीं
बुने  नए सपने
कभी नहीं
बनाये रास्ते
उन सपनों तक
हमेशा माँगते
रहे उधार
जिंदगी से
जिंदगी के टेढ़े मेढे
रास्तों पर
देखा है
एक दूसरे की
जगहों को
बदलते हुए.

घर

घर
सिर्फ चार दिवारों
और एक छत का
ढांचा नहीं
बहुत से अनसुलझे
रिश्तों की
कहानी होती है
जहां
हर शख्स हाज़िर है
अपने अपने मुखौटे
के साथ तत्परता से
अपने हिस्से का
लेखा जोखा लेकर
और साबित
करना चाहता है
खुद को सबसे
बेहतर
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